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सिलिका

सूची सिलिका

बालू या रेत सिलिका या सिलिकॉन डाईऑक्साइड (Silica, SiO2), खनिज सिलिकन और ऑक्सीजन के योग से बना है। यह निम्नलिखित खनिजों के रूप में मिलता है: १. क्रिस्टलीय: जैसे क्वार्ट्ज २. गुप्त क्रिस्टलीय: जैसे चाल्सीडानी, ऐगेट और फ्लिंट ३. अक्रिस्टली: जैसे ओपल। .

28 संबंधों: चूना पत्थर, तबाशीर, प्राचीन मिस्र, पृथ्वी, पोज़ोलान, फोरामिनिफेरा, बलुआ पत्थर, बैसिलेरिएसी, बोरोसिलिकेट काँच, भूगोल शब्दावली, मंगल ग्रह, मृदा विज्ञान, यूनियन कार्बाइड, लैटेराइट मृदा, सिलिकन कार्बाइड, सिलिका जेल, सिलिकोन, सोडियम, सीमेंट, जल (अणु), विशिष्ट ऊष्मा धारिता, काच निर्माण, कांच, क्रॉनिक ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिसीस, क्षुद्रग्रह वर्णक्रम श्रेणियाँ, ४३३ इरोस, S-श्रेणी क्षुद्रग्रह, 132524 एपीएल

चूना पत्थर

thumb चूना पत्थर (Limestone) एक अवसादी चट्टान है जो, मुख्य रूप से कैल्शियम कार्बोनेट (CaCO3) के विभिन्न क्रिस्टलीय रूपों जैसे कि खनिज केल्साइट और/या एरेगोनाइट से मिलकर बनी होती है। चूना पत्थर वस्तुत: कैलसियम कार्बोनेट है, पर इसमें सिलिका, ऐल्यूमिना और लोहे इत्यादि सदृश अपद्रव्य अंतर्मिश्रित रहते हैं। गृहनिर्माण के लिये चूनापत्थर बहुत अच्छा होता है और भारत के विभिन्न भागों की स्तरित चट्टानों से सुविधापूर्वक यह उत्खनित होता है। चूना पत्थर अनेक किस्मों में उपलब्ध है। यह रंग, विन्यास, कठोरता और टिकाऊपन में विभिन्न गुणों का होता है। सघन कणवाले गहन ओर मणिभीय पत्थर गृहनिर्माण के लिये उत्कृष्ट होते हैं। ये कार्यसाधक, दृढ़ और टिकाऊ होते हैं। चूना पत्थर पर तनु अम्ल की क्रिया बड़ी सरलता से होती है, अत: औद्योगिक नगरों के निकट गृहनिर्माण के लिये यह पत्थर ठीक नहीं होता। बनावट और अन्य गुणों की विभिन्नता के कारण चूना पत्थर की दृढ़ता विभिन्न होती है। इसलिये गृहनिर्माण के पूर्व पत्थर की परीक्षा कर लेनी चाहिए। बहुत बड़ी मात्रा में चूना पत्थर का चूने के निर्माण में उपयोग होता है। १०० किलोग्राम चूने के पत्थर से लगभग ६५ किलोग्राम चूना प्राप्त होता है। शुद्ध चूना पत्थर या खड़िया से, जिसमें छ: प्रतिशत से अधिक सिलिका, ऐल्यूमिना तथा अन्य अपद्रव्य न हों, उत्कृष्ट चूना प्राप्त होता है। चार से सात प्रतिशत संयुक्त सिलिका ऐल्यूमिना वाले मिट्टीयुक्त चूना पत्थर से मध्यम श्रेणी का जलचूना और ११-२५ प्रतिशत संयुक्त सिलिकावाले चूनापत्थर से सर्वोत्कृष्ट श्रेणी का जलचूना प्राप्त होता है। .

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तबाशीर

तबाशीर बाँस से आता है सन् १९१५ में छपी एक पुस्तक में तबाशीर के कुछ टुकड़ों का चित्र तबाशीर या बंसलोचन बांस की कुछ नस्लों के जोड़ों से मिलने वाला एक पारभासी (ट्रांसलूसॅन्ट) सफ़ेद पदार्थ होता है। यह मुख्य रूप से सिलिका और पानी और कम मात्रा में खार (पोटैश) और चूने का बना होता है। भारतीय उपमहाद्वीप की आयुर्वेद और यूनानी चिकित्सा प्रणालियों की दवा-सूचियों में इसका अहम स्थान है। पारम्परिक चीनी चिकित्सा के कई नुस्ख़ों में भी इसका प्रयोग होता है। .

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प्राचीन मिस्र

गीज़ा के पिरामिड, प्राचीन मिस्र की सभ्यता के सबसे ज़्यादा पहचाने जाने वाले प्रतीकों में से एक हैं। प्राचीन मिस्र का मानचित्र, प्रमुख शहरों और राजवंशीय अवधि के स्थलों को दर्शाता हुआ। (करीब 3150 ईसा पूर्व से 30 ई.पू.) प्राचीन मिस्र, नील नदी के निचले हिस्से के किनारे केन्द्रित पूर्व उत्तरी अफ्रीका की एक प्राचीन सभ्यता थी, जो अब आधुनिक देश मिस्र है। यह सभ्यता 3150 ई.पू.

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पृथ्वी

पृथ्वी, (अंग्रेज़ी: "अर्थ"(Earth), लातिन:"टेरा"(Terra)) जिसे विश्व (The World) भी कहा जाता है, सूर्य से तीसरा ग्रह और ज्ञात ब्रह्माण्ड में एकमात्र ग्रह है जहाँ जीवन उपस्थित है। यह सौर मंडल में सबसे घना और चार स्थलीय ग्रहों में सबसे बड़ा ग्रह है। रेडियोधर्मी डेटिंग और साक्ष्य के अन्य स्रोतों के अनुसार, पृथ्वी की आयु लगभग 4.54 बिलियन साल हैं। पृथ्वी की गुरुत्वाकर्षण, अंतरिक्ष में अन्य पिण्ड के साथ परस्पर प्रभावित रहती है, विशेष रूप से सूर्य और चंद्रमा से, जोकि पृथ्वी का एकमात्र प्राकृतिक उपग्रह हैं। सूर्य के चारों ओर परिक्रमण के दौरान, पृथ्वी अपनी कक्षा में 365 बार घूमती है; इस प्रकार, पृथ्वी का एक वर्ष लगभग 365.26 दिन लंबा होता है। पृथ्वी के परिक्रमण के दौरान इसके धुरी में झुकाव होता है, जिसके कारण ही ग्रह की सतह पर मौसमी विविधताये (ऋतुएँ) पाई जाती हैं। पृथ्वी और चंद्रमा के बीच गुरुत्वाकर्षण के कारण समुद्र में ज्वार-भाटे आते है, यह पृथ्वी को इसकी अपनी अक्ष पर स्थिर करता है, तथा इसकी परिक्रमण को धीमा कर देता है। पृथ्वी न केवल मानव (human) का अपितु अन्य लाखों प्रजातियों (species) का भी घर है और साथ ही ब्रह्मांड में एकमात्र वह स्थान है जहाँ जीवन (life) का अस्तित्व पाया जाता है। इसकी सतह पर जीवन का प्रस्फुटन लगभग एक अरब वर्ष पहले प्रकट हुआ। पृथ्वी पर जीवन की उत्पत्ति के लिये आदर्श दशाएँ (जैसे सूर्य से सटीक दूरी इत्यादि) न केवल पहले से उपलब्ध थी बल्कि जीवन की उत्पत्ति के बाद से विकास क्रम में जीवधारियों ने इस ग्रह के वायुमंडल (the atmosphere) और अन्य अजैवकीय (abiotic) परिस्थितियों को भी बदला है और इसके पर्यावरण को वर्तमान रूप दिया है। पृथ्वी के वायुमंडल में आक्सीजन की वर्तमान प्रचुरता वस्तुतः जीवन की उत्पत्ति का कारण नहीं बल्कि परिणाम भी है। जीवधारी और वायुमंडल दोनों अन्योन्याश्रय के संबंध द्वारा विकसित हुए हैं। पृथ्वी पर श्वशनजीवी जीवों (aerobic organisms) के प्रसारण के साथ ओजोन परत (ozone layer) का निर्माण हुआ जो पृथ्वी के चुम्बकीय क्षेत्र (Earth's magnetic field) के साथ हानिकारक विकिरण को रोकने वाली दूसरी परत बनती है और इस प्रकार पृथ्वी पर जीवन की अनुमति देता है। पृथ्वी का भूपटल (outer surface) कई कठोर खंडों या विवर्तनिक प्लेटों में विभाजित है जो भूगर्भिक इतिहास (geological history) के दौरान एक स्थान से दूसरे स्थान को विस्थापित हुए हैं। क्षेत्रफल की दृष्टि से धरातल का करीब ७१% नमकीन जल (salt-water) के सागर से आच्छादित है, शेष में महाद्वीप और द्वीप; तथा मीठे पानी की झीलें इत्यादि अवस्थित हैं। पानी सभी ज्ञात जीवन के लिए आवश्यक है जिसका अन्य किसी ब्रह्मांडीय पिण्ड के सतह पर अस्तित्व ज्ञात नही है। पृथ्वी की आतंरिक रचना तीन प्रमुख परतों में हुई है भूपटल, भूप्रावार और क्रोड। इसमें से बाह्य क्रोड तरल अवस्था में है और एक ठोस लोहे और निकल के आतंरिक कोर (inner core) के साथ क्रिया करके पृथ्वी मे चुंबकत्व या चुंबकीय क्षेत्र को पैदा करता है। पृथ्वी बाह्य अंतरिक्ष (outer space), में सूर्य और चंद्रमा समेत अन्य वस्तुओं के साथ क्रिया करता है वर्तमान में, पृथ्वी मोटे तौर पर अपनी धुरी का करीब ३६६.२६ बार चक्कर काटती है यह समय की लंबाई एक नाक्षत्र वर्ष (sidereal year) है जो ३६५.२६ सौर दिवस (solar day) के बराबर है पृथ्वी की घूर्णन की धुरी इसके कक्षीय समतल (orbital plane) से लम्बवत (perpendicular) २३.४ की दूरी पर झुका (tilted) है जो एक उष्णकटिबंधीय वर्ष (tropical year) (३६५.२४ सौर दिनों में) की अवधी में ग्रह की सतह पर मौसमी विविधता पैदा करता है। पृथ्वी का एकमात्र प्राकृतिक उपग्रह चंद्रमा (natural satellite) है, जिसने इसकी परिक्रमा ४.५३ बिलियन साल पहले शुरू की। यह अपनी आकर्षण शक्ति द्वारा समुद्री ज्वार पैदा करता है, धुरिय झुकाव को स्थिर रखता है और धीरे-धीरे पृथ्वी के घूर्णन को धीमा करता है। ग्रह के प्रारंभिक इतिहास के दौरान एक धूमकेतु की बमबारी ने महासागरों के गठन में भूमिका निभाया। बाद में छुद्रग्रह (asteroid) के प्रभाव ने सतह के पर्यावरण पर महत्वपूर्ण बदलाव किया। .

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पोज़ोलान

पोज़ोलान (अंग्रेजी: Pozzolan), एक कांचसम सिलिकामय (सिलिसियस) सामग्री है जो जल की उपस्थिति में कैल्शियम हाइड्रोक्साइड के साथ मिलाने पर उससे क्रिया कर कैल्शियम सिलिकेट की रचना करता है, जिसके परिणामस्वरूप यह सीमेंटकारक (जोड़ने वाले) गुण प्रदर्शित करता है। पोज़ोलान को आमतौर पर पोर्टलैंड सीमेंट कंक्रीट मे एक सीमेंट विस्तारक के रूप में मिलाया जाता है जो प्राप्त कंक्रीट को लंबे समय में सामर्थ्य और अतिरिक्त गुण प्रदान करता है, साथ ही इसके मिलाने से पोर्टलैंड सीमेंट कंक्रीट की लागत में भी कमी आती है। .

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फोरामिनिफेरा

जीवित अमोनियाटेपिडा फोरामिनिफेरा (Foraminifera; /fəˌræməˈnɪfərə/ लैटिन अर्थ- hole bearers, informally called "forams")) अथवा पेट्रोलियम उद्योग का तेल मत्कुण (oil bug), प्रोटोज़ोआ संघ के वर्ग सार्कोडिन के उपवर्ग राइज़ोपोडा का एक गण है। इस गण के अधिकांश प्राणी प्राय: सभी महासागरों और समुद्र में सभी गहराइयों में पाए जाते हैं। इस गण की कुछ जातियाँ अलवण जल में और बहुत कम जातियाँ नम मिट्टी में पाई जाती हैं। अधिकांश फ़ोरैमिनाफ़ेरा के शरीर पर एक आवरण होता है, जिसे चोल या कवच (test or shell) कहते हैं। ये कवच कैल्सीभूत, सिलिकामय, जिलेटिनी अथवा काइटिनी (chitinous) होते हैं, या बालू के कणों, स्पंज कंटिकाओं (spongespicules), त्यक्त कवचों, या अन्य मलवों (debris) के बने होते हैं। कवच का व्यास.०१ मिमी. से लेकर १९० मिमी. तक होता है तथा वे गेंदाकार, अंडाकार, शंक्वाकार, नलीदार, सर्पिल (spiral), या अन्य आकार के होते हैं। कवच के अंदर जीवद्रव्यी पिंड (protoplasmic mass) होता है, जिसमें एक या अनेक केंद्रक होते हैं। कवच एककोष्ठी (unilocular or monothalamus), अथवा श्रेणीबद्ध बहुकोष्ठी (multilocular or polythalmus) और किसी किसी में द्विरूपी (dimorphic) होते हैं। कवच में अनेक सक्षम रध्रों के अतिरिक्त बड़े रंध्र, जिन्हें फ़ोरैमिना (Foramina) कहते हैं, पाए जाते हैं। इन्हीं फोरैमिना के कारण इस गण का नाम फ़ोरैमिनीफ़ेरा (Foraminifera) पड़ा है। फ़ोरैमिनीफ़ेरा प्राणी की जीवित अवस्था में फ़ोरैमिना से होकर लंबे धागे के सदृश पतले और बहुत ही कोमल पादाभ (pseudopoda), जो कभी कभी शाखावत और प्राय: जाल या झिल्ली (web) के समान उलझे होते हैं, बाहर निकलते हैं। वेलापवर्ती (pelagic) फ़ोरैमिनीफ़ेरा के कवच समुद्रतल में जाकर एकत्र हो जाते हैं और हरितकीचड़ की परत, जिसे सिंधुपंक (ooze) कहते हैं, बन जाती है। वर्तमान समुद्री तल का ४,८०,००,००० वर्ग मील क्षेत्र सिंधुपंक से आच्छादित है। बाली द्वीप के सानोर (Sanoer) नामक स्थान में बड़े किस्म के फ़ोरैमिनीफ़ेरा के कवच पगडंडियों और सड़कों पर बिछाने के काम आते हैं। .

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बलुआ पत्थर

बलुआ पत्थर का शैल बालुकाश्म या बलुआ पत्थर (सैण्डस्टोन) ऐसी दृढ़ शिला है जो मुख्यतया बालू के कणों का दबाव पाकर जम जाने से बनती है और किसी योजक पदार्थ से जुड़ी होती है। बालू के समान इसकी रचना में भी अनेक पदार्थ विभिन्न मात्रा में हो सकते हैं, किंतु इसमें अधिकांश स्फटिक ही होता है। जिस शिला में बालू के बहुत बड़े बड़े दाने मिलते हैं, उसे मिश्रपिंडाश्म और जिसमें छोटे छोटे दाने होते हैं उसे बालुमय शैल या मृण्मय शैल कहते हैं। .

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बैसिलेरिएसी

बैसिलेरिएसी(Bacillariaceae) काई वर्ग का एक कुल है, जिसके अंतर्गत डायटम (diatoms) आते हैं। इसके प्रतिनिधि एककोशिकीय, अनेक आकार प्रकार तथा रूप के होते हैं। जैसे सामान्य बहुमूर्तिदर्शी (kaleidoscope) में काच के छोटे छोटे टुकड़े अनेक रूप के दिखाई देते हैं उन्हीं रूपों के सदृश से डायटम समूह भी होते हैं। प्रत्येक डायटम की कोशिका प्रचुर सिलिकायुक्त तथा इस बनावट की होती है मानो दो पेट्री डिश एक दूसरे में सटकर बंद रखे हों। प्रत्येक डायटम की जब ऊपरी तह से परीक्षा की जाती है, तो इसकी द्विपार्श्विक (bilateral), या अरीय सममिति (radial symmetry) के चिह्न स्पष्ट प्रतीत होते हैं। कोशिका के भीतर एक अथवा अनेक, विविध आकार के भूरे पीले से वर्णकीलवक (chromatophores) होते हैं। कोशिका के बाह्य तक्षण (sculpturing) के आधार पर डायटमों का वर्गीकरण होता है। प्रत्येक डायटम की दोनों कोशिकाभित्तियाँ, आंतरिक प्ररस सहित, फ्रसट्यूल (frustule) कहलाती हैं। ऊपरी कोशिका भित्ति एपीथीका तथा भीतरी हाइपोथीका कहलाती है और दोनों का सिलिकामय भाग लगभग चौड़े बाल्व का होता है, जिसके फ्लैंज (flange) सदृश उपांत (margin) संयोजी बैंड (connecting band) या सिंगुलम (cingulum) से लगे होते हैं। यह संयोजी बैंड वाल्ब के साथ प्राय: अच्छे प्रकार से जुड़ा होता है। कभी कभी एक से अधिक भी संयोजी बैंड होते हैं। ये आंतरीय बैंड कहलाते हैं। फ्रस्ट्यूल को वाल्व की छोर से देखने पर वाल्व तल (valve view) तथा संयोजी बैंड की ओर से देखने पर वलयीतल (girdle view) दिखाई देता है। कुपिन (Coupin) के मतानुसार वह पदार्थ जिसके द्वारा फ्रसट्यूल सिलिकामय हो जाता है, ऐल्यूमिनियम सिलिकेट है। पियरसाल (Pearsall सन् १९२३) के मतानुसार जल माध्यम में सिलिकेट लवणों की प्रचुरता से प्रजनन में सहायता होती है। वाल्व में जो सिलिकीय पदार्थ एकत्रित होता है, वह केंद्रिक डायटम में एक केंद्रीय बिंदु के चारों ओर अरीय सममित होता है। पिन्नेट डायटमों में अक्षीय पट्टिका (axial strip) से यह द्विपार्श्व सममित या असममित (asymmetrical) हो सकता है। कुछ समुद्री केंद्रिक डायटमों में तक्षण पर्याप्त खुरदुरा सा होता है। यह विशेषत: यत्र तत्र गर्तरोम (areoles) के कारण होता है। इन गर्तरोमों में बारीक खड़ी नाल रूपी (vertical canals) छिद्र (pores) होते हैं। कुछ पिन्नेलीज़ (Pennales) डायटमों में एक या अधिक सत्य छिद्र (perforations) हो सकते हैं, जो गेमाइनहार्ट (Gemeinhardt, सन् १९२६) के अनुसार मध्य (median) अथवा ध्रुवीय होते हैं। ये पतले स्थल, जिन्हें पंकटी (Punctae) कहते हैं, कतारों में विन्यसत तथा वाल्व की लंबाई के साथ जाती हुई लंबायमान पट्टिका, जिसे अक्षीय क्षेत्र (Axial field) कह सकते हैं, द्विपार्श्विक रूप में होते हैं। यह अक्षीय क्षेत्र बनावट में सम हो सकते हैं, अथवा इनमें एक लंबी झिरी, राफे (Raphe), हो सकती है। लंबी झिरी से रहित अक्षीय क्षेत्र कूट राफे (Pseudornaphe) कहलाता है। एक फ्रस्ट्यूल के दोनों वाल्व के अक्षीय क्षेत्र प्राय: समान होते हैं, यद्यपि कुछ जेनेरा में एक में राफे हो सकता है तथा दूसरे में कूट राफे। प्रत्येक राफे के मध्य में भित्ति के स्थूलन से एक केंद्रीय ग्रंथि (central nodule) बन जाती है और दोनों सिरों पर प्राय: ध्रुवग्रंथियाँ (polar nodules) भी होती हैं। फ्रस्ट्यूल के भीतर प्रोटोप्लास्ट (protoplast) में सर्वप्रथम साइटोप्लाज़्म (cytoplasm) की एक तह होती है, जिसमें एक या अनेक वर्णकण होते हैं। साइटोप्लाज़्म के और भीतर एक स्पष्ट रिक्तिका के मध्यभाग के कुछ साइटोप्लाज़्म में एक गोल सा नाभिक स्थित रहता है। वर्णकण अनेक प्रकार के हो सकते हैं। इन्हीं में पाइरीनाएड मौजूद होते हैं, अथवा नहीं भी होते। वर्णकण प्राय: सुनहरे रंग के होते हैं। सुरक्षित भोज्य सामग्री प्राय: वसा है। राफे से युक्त डायटम गतिशील होते हैं। इनकी गति लंबे अक्ष पर झटके से होती है। ये झटके एक के बाद एक होते हैं। कुछ आगे बढ़ जाने पर वैसे ही एक झटके से डायटम रुक जाता है और पुन: पीछे की ओर आता है। मुलर (१८८९, १८९६ ई.) के मतानुसार डायटम की यह गति साइटोप्लाज़्म में धाराओं (streaming cytoplasm) के कारण होती है। डायटम में कोशिकाविभाजन भी होता है। इस क्रिया में दो संतति-कोशिकाएँ (daughter cells) निर्मित हो जाती हैं, जो आपस में स्वभावत: छोटी बड़ी होती हैं। नाभिकविभाजन के साथ ही वर्णकण भी विभाजित होते हैं। कोशिका विभाजन के फलस्वरूप एक अनुजात प्रोटोप्लास्ट का अंश इपीथिका के भीतर रहता है और दूसरा हाइपोथीका में। इसके उपरांत प्रत्येक संतति अंश में दूसरी ओर की कोशिकाभित्ति निर्मित होकर, दो नए डायटम तैयार हो जाते हैं। अनुमान किया जा सकता है कि नवनिर्मित आधा भाग सदैव हाइपोथीका होगा तथा पुराना अवशिष्ट भाग चाहे वह पहले एपीथिका रहा हो या हाइपोथीका, इस नए डायटम में सदैव एपीथीका होगा। इससे एक कल्पना यह भी की जा सकती है कि इस प्रकार प्रत्येक विभाजन के फलस्वरूप कोशिकाएँ धीरे धीरे आकार में छोटी होती जाएँगी (इसे मैकडानल्ड-फित्जर नियम भी कहते हैं) परंतु असल में आगे चलकर छोटे आकर की नवीन कोशिकाएँ ऑक्सोस्पोर (auxospores) बनकर, पुन: प्रारंभिक आकार की कोशिकाओं को उत्पन्न कर देती है। पिन्नेलीज़ र्व में ये ऑक्सोस्पोर दो कोशिकाओं के संयुग्मन से बनते हैं। दो कोशिकाओं के संयुग्मन से दो आक्सोंस्पोर बन जाएँ, या दो कोशिकाएँ आपस में एक चोल में सट जाएँ और प्रत्येक बिना संयुग्मन के ही एक एक आक्सोस्पोर निर्मित कर दे, अथवा केवल एक कोशिका से एक आक्सोस्पोर बन जाए, या एक कोशिका से दो आक्सोस्पोर भी बन जा सकते हैं। सेंट्रेलीज़ वर्ग में लघु वीजाणु (microspers) भी उत्पन्न होते हैं। इनकी संख्या एक कोशिका के भीतर ४, ८, १६ के क्रम से १२८ तक हो जाती है। कार्सटेन (१९०४ ई.) एवं श्मिट (१९२३ ई.) के अनुसार इन लघु बीजाणुओं का निर्माण साइटोप्लाज़्म में खचन और फिर विभाजन के फलस्वरूप होता है। गाइटलर (१९५२ ई.) के मतानुसार यह क्रिया अर्धसूत्रण (meiosis) पर आधारित है। इन लघु बीजाणुओं में कशाभ (flagella) भी होते हैं। अनेक केंद्रिक डायटमों में मोटी भित्तियुक्त एक और प्रकार के बीजाणु होते हैं, जिन्हें स्टैटोस्पोर (statospores) कहते हैं। डायटमों का वर्गीकरण मुख्यत: शुट (Schutt, १८६६ ई.) के वर्गीकरण के आधार पर ही हुआ है। इसमें मुख्य तथ्य कोशिकातक्षण की विभिन्नता है। फॉसिल रूप में डायटम बहुसंख्या में प्राप्त होते हैं, यहाँ तक कि इस पुंज को डायटम मृत्तिका (diatomaceous earth) की संज्ञा दी गई है। इन फॉसिल डायटमों के लिए भी यह वर्गीकरण उपयुक्त है। अधिकांश फॉसिल डायटम क्रिटेशस युग के पूर्व के नहीं हैं। इनकी प्रचुर संख्या एवं मात्रा सेंटामैरिया ऑएल फील्ड्स, कैलिफॉर्निया में प्राप्त हुई है। ये फॉसिल ७०० फुट मोटी तहों में व्याप्त हैं, जो मीलों लंबी चली गई हैं। फॉसिल डायटमों की मिट्टी व्यावसायिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है। चाँदी की पॉलिश करने में यह उपयोगी है एवं द्रव नाइट्रोग्लिसरिन को सोखने के लिए भी उपयुक्त है, जिससे डायनेमाइट अधिक सुरक्षा से स्थानांतरित किया जा सकता है। आज लगभग ६०% डायटम मृत्तिका चीनी परिष्करणशालाओं में द्रवों को छानने के काम में आती है। इसके अतिरिक्त इस मृत्तिका का उपयोग किसी अंश तक पेंट तथा वारनिश आदि के निर्माण में भी होता है। वात्या भट्ठियों में, जहाँ ताप अत्यधिक होता है, डायटम मृत्तिका ऊष्मारोधी के रूप में भी प्रयुक्त की जाती है। सामान्य ताप तो क्या ६०० डिग्री सें.

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बोरोसिलिकेट काँच

बोरोसिलिकेट काँच से बनी एक वस्तु बोरोसिलिकेट काँच एक प्रकार का काँच होता है, जो सिलिका और बोरॉन ट्राईऑक्साइड से मिल कर बना एक यौगिक है। .

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भूगोल शब्दावली

कोई विवरण नहीं।

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मंगल ग्रह

मंगल सौरमंडल में सूर्य से चौथा ग्रह है। पृथ्वी से इसकी आभा रक्तिम दिखती है, जिस वजह से इसे "लाल ग्रह" के नाम से भी जाना जाता है। सौरमंडल के ग्रह दो तरह के होते हैं - "स्थलीय ग्रह" जिनमें ज़मीन होती है और "गैसीय ग्रह" जिनमें अधिकतर गैस ही गैस है। पृथ्वी की तरह, मंगल भी एक स्थलीय धरातल वाला ग्रह है। इसका वातावरण विरल है। इसकी सतह देखने पर चंद्रमा के गर्त और पृथ्वी के ज्वालामुखियों, घाटियों, रेगिस्तान और ध्रुवीय बर्फीली चोटियों की याद दिलाती है। हमारे सौरमंडल का सबसे अधिक ऊँचा पर्वत, ओलम्पस मोन्स मंगल पर ही स्थित है। साथ ही विशालतम कैन्यन वैलेस मैरीनेरिस भी यहीं पर स्थित है। अपनी भौगोलिक विशेषताओं के अलावा, मंगल का घूर्णन काल और मौसमी चक्र पृथ्वी के समान हैं। इस गृह पर जीवन होने की संभावना है। 1965 में मेरिनर ४ के द्वारा की पहली मंगल उडान से पहले तक यह माना जाता था कि ग्रह की सतह पर तरल अवस्था में जल हो सकता है। यह हल्के और गहरे रंग के धब्बों की आवर्तिक सूचनाओं पर आधारित था विशेष तौर पर, ध्रुवीय अक्षांशों, जो लंबे होने पर समुद्र और महाद्वीपों की तरह दिखते हैं, काले striations की व्याख्या कुछ प्रेक्षकों द्वारा पानी की सिंचाई नहरों के रूप में की गयी है। इन् सीधी रेखाओं की मौजूदगी बाद में सिद्ध नहीं हो पायी और ये माना गया कि ये रेखायें मात्र प्रकाशीय भ्रम के अलावा कुछ और नहीं हैं। फिर भी, सौर मंडल के सभी ग्रहों में हमारी पृथ्वी के अलावा, मंगल ग्रह पर जीवन और पानी होने की संभावना सबसे अधिक है। वर्तमान में मंगल ग्रह की परिक्रमा तीन कार्यशील अंतरिक्ष यान मार्स ओडिसी, मार्स एक्सप्रेस और टोही मार्स ओर्बिटर है, यह सौर मंडल में पृथ्वी को छोड़कर किसी भी अन्य ग्रह से अधिक है। मंगल पर दो अन्वेषण रोवर्स (स्पिरिट और् ओप्रुच्युनिटी), लैंडर फ़ीनिक्स, के साथ ही कई निष्क्रिय रोवर्स और लैंडर हैं जो या तो असफल हो गये हैं या उनका अभियान पूरा हो गया है। इनके या इनके पूर्ववर्ती अभियानो द्वारा जुटाये गये भूवैज्ञानिक सबूत इस ओर इंगित करते हैं कि कभी मंगल ग्रह पर बडे़ पैमाने पर पानी की उपस्थिति थी साथ ही इन्होने ये संकेत भी दिये हैं कि हाल के वर्षों में छोटे गर्म पानी के फव्वारे यहाँ फूटे हैं। नासा के मार्स ग्लोबल सर्वेयर की खोजों द्वारा इस बात के प्रमाण मिले हैं कि दक्षिणी ध्रुवीय बर्फीली चोटियाँ घट रही हैं। मंगल के दो चन्द्रमा, फो़बोस और डिमोज़ हैं, जो छोटे और अनियमित आकार के हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि यह 5261 यूरेका के समान, क्षुद्रग्रह है जो मंगल के गुरुत्व के कारण यहाँ फंस गये हैं। मंगल को पृथ्वी से नंगी आँखों से देखा जा सकता है। इसका आभासी परिमाण -2.9, तक पहुँच सकता है और यह् चमक सिर्फ शुक्र, चन्द्रमा और सूर्य के द्वारा ही पार की जा सकती है, यद्यपि अधिकांश समय बृहस्पति, मंगल की तुलना में नंगी आँखों को अधिक उज्जवल दिखाई देता है। .

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मृदा विज्ञान

विभिन्न प्रकार की मृदा के नमूने मृदा विज्ञान (Soil science) में मृदा का अध्ययन एक प्राकृतिक संसाधन के रूप में किया जाता है। इसके अन्तर्गत मृदानिर्माण, मृदा का वर्गीकरण, मृदा के भौतिक, रासायनिक तथा जैविक गुणों का अध्ययन, उर्वरकता का अध्ययन आदि किया जाता है। मृदा वैज्ञानिक इस बात को लेकर चिन्तित हैं कि विश्व की जनसंख्या-वृद्धि के साथ मृदा तथा खेती योग्य भूमि का सरक्षण कैसे किया जाय। .

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यूनियन कार्बाइड

यूनियन कार्बाइड कॉर्पोरेशन (यूनियन कार्बाइड) संयुक्त राज्य अमेरिका की रसायन और बहुलक बनाने वाली सबसे बड़ी कंपनियों में से एक है और वर्तमान में कम्पनी में 3,800 से अधिक कर्मचारी कार्यरत हैं। 1984 में कम्पनी के भारत के राज्य मध्य प्रदेश के शहर भोपाल स्थित संयंत्र से मिथाइल आइसोसाइनेट नामक गैस के रिसाव को अब तक की सबसे बड़ी औद्योगिक दुर्घटना माना जाता है, जिसने कम्पनी को इसकी अब तक की सबसे बड़ी बदनामी दी है। यूनियन कार्बाइड को इस त्रासदी के लिए जिम्मेदार पाया गया, लेकिन कम्पनी ने इस त्रासदी के लिए खुद को जिम्मेदार मानने से साफ इंकार कर दिया जिसके परिणामस्वरूप लगभग 15000 लोगों की मृत्यु हो गयी और लगभग 500000 व्यक्ति इससे प्रभावित हुए। 6 फ़रवरी 2001 को यूनियन कार्बाइड, डाउ केमिकल कंपनी की एक पूर्ण स्वामित्व वाली सहायक कंपनी बन गयी। इसी वर्ष कम्पनी के गैस पीड़ितों के साथ हुए एक समझौते और भोपाल मेमोरियल हॉस्पिटल एंड रिसर्च सेंटर के शुरुआत के साथ भारत में इसका अध्याय समाप्त हो गया। यूनियन कार्बाइड अपने उत्पादों का अधिकांश डाउ केमिकल को बेचती है। यह डाउ जोन्स इंडस्ट्रियल एवरेज का एक पूर्व घटक भी है। सन 1920 में, इसके शोधकर्ताओं ने प्राकृतिक गैस द्रवों जैसे कि इथेन और प्रोपेन से इथिलीन बनाने की एक किफायती विधि विकसित की जिसने आधुनिक पेट्रोरसायन उद्योग को जन्म दिया। आज, यूनियन कार्बाइड के पास इस उद्योग से जुड़ी सबसे उन्नत प्रक्रियायें और उत्प्रेरक प्रौद्योगिकियां हैं और यह विश्व की कुछ सबसे किफायती और बड़े पैमाने की उत्पादन सुविधाओं का प्रचालन करती है। विनिवेश से पहले विभिन्न उत्पाद जैसे कि एवरेडी और एनर्जाइज़र बैटरीज़, ग्लैड बैग्स एंड रैप्स, सिमोनिज़ कार वैक्स और प्रेस्टोन एंटीफ्रीज़ आदि कम्पनी के स्वामित्व के आधीन थे। डाउ केमिकल कंपनी द्वारा कम्पनी के अधिगहण से पहले इसके इलेक्ट्रॉनिक रसायन, पॉलीयूरेथेन इंटरमीडिएट औद्योगिक गैसों और कार्बन उत्पादों जैसे व्यवसायों का विनिवेश किया गया। .

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लैटेराइट मृदा

भारत के अंगदिपुरम में लैटेराइट की खुली खान लैटेराइट मृदा या 'लैटेराइट मिट्टी'(Laterite) का निर्माण ऐसे भागों में हुआ है, जहाँ शुष्क व तर मौसम बार-बारी से होता है। यह लेटेराइट चट्टानों की टूट-फूट से बनती है। यह मिट्टी चौरस उच्च भूमियों पर मिलती है। इस मिट्टी में लोहा, ऐल्युमिनियम और चूना अधिक होता है। गहरी लेटेराइट मिट्टी में लोहा ऑक्साइड और पोटाश की मात्रा अधिक होती है। लौह आक्साइड की उपस्थिति के कारण प्रायः सभी लैटराइट मृदाएँ जंग के रंग की या लालापन लिए हुए होती हैं। लैटराइट मिट्टी चावल, कपास, गेहूँ, दाल, मोटे अनाज, सिनकोना, चाय, कहवा आदि फसलों के लिए उपयोगी है। लैटराइट मिट्टी वाले क्षेत्र अधिकांशतः कर्क रेखा तथा मकर रेखा के बीच में स्थित हैं। भारत में लैटेराइट मिट्टी तमिलनाडु के पहाड़ी भागों और निचले क्षेत्रों, कर्नाटक के कुर्ग जिले, केरल राज्य के चौडे समुद्री तट, महाराष्ट्र के रत्नागिरि जिले, पश्चिमी बंगाल के बेसाइट और ग्रेनाइट पहाड़ियों के बीच तथा उड़ीसा के पठार के ऊपरी भागों में मिलती है। .

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सिलिकन कार्बाइड

सिलिकॉन कार्बाइड सिलिकन कार्बाइड (Silicon Carbide, SiC) अथवा कार्बोरंडम (Carborundum), सिलिकन तथा कार्बन का यौगिक है। इसकी खोज सन् 1891 में एडवर्ड ऑचेसन (Edward Acheson) ने की थी। .

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सिलिका जेल

सिलिका जेल सिलिका जेल (Silica gel) सिलिका का एक विशेष रूप है जो कणिकामय, काचाभ (vitreous), सरंध्र (porous) होता है। यह सोडियम सिलिकेट से संश्लेषण द्वारा बनाया जाता है। यह टफ (tough) और कठोर होता है तथा घरों में प्रयुक्त अन्य जेलों जैसे जिलेटिन और अगार (agar) से अधिक ठोस होता है। यह प्राकृतिक रूप से पाया जाने वाला खनिज है जिसको शोधन करके कणिकामय या बीड (beaded) के रूप में बना दिया जाता है। इसके रन्ध्रों का औसत आकार 2.4 नैनोमीटर होता है। यह जल कणों के प्रति प्रबल बन्धुता (affinity) प्रदर्शित करता है। दैनिक जीवन में इसके छोटे-छोटे बीड (प्रायः 2 x 3 cm) कागज के पैकेटों में देखने को मिलते हैं जो जलवाष्प के शोषण के लिए प्रयुक्त होता है ताकि किसी स्थान विशेष पर अधिक आर्द्रता के कारण कोई चीज खराब न हो जाय। इसमें कुछ विषैली अशुद्धियाँ (dopants) होतीं हैं तथा इसके अत्यधिक जलशोषी होने के कारण ही इसके पुड़ियों पर चेतावनी लिखी रहती है कि इस पुड़िया के अन्दर रखी चीज को न खाएँ। .

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सिलिकोन

यह लेख सिलिकोन नामक यौगिक के बारे में है। कृपया इसे सिलिकॉन तत्व न समझें। ---- मोबाइल फोन का कवर जो '''सिलिकोन''' से बना है। सिलिकोन (Silicone) अक्रिय, संश्लेषित यौगिक हैं जिनके तरह-तरह के रूप हैं और तरह-तरह के उपयोग हैं। ये प्राय: रबर जैसे एवं उष्मारोधी (heat-resistant) होते हैं। ये भोजन के बर्तनों में, चिकित्सकीय उपकरणों में, चूवन के छेद आदि बन्द करने के लिये (सीलैन्ट), चिपकाने के लिये (अधेसिव), स्नेहक (lubricants), इंसुलेशन एवं स्तन-प्रत्यारोपण (breast implants) में काम आते हैं। नौटिंघम निवासी एफ.एस.

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सोडियम

सोडियम (Sodium; संकेत, Na) एक रासायनिक तत्त्व है। यह आवर्त सारणी के प्रथम मुख्य समूह का दूसरा तत्व है। इस समूह में में धातुगण विद्यमान हैं। इसके एक स्थिर समस्थानिक (द्रव्यमान संख्या २३) और चार रेडियोसक्रिय समस्थानिक (द्रव्यमन संख्या २१, २२, २४, २४) ज्ञात हैं। .

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सीमेंट

सीमेंट का उपयोग। सीमेंट आधुनिक भवन निर्माण मे प्रयुक्त होने वाली एक प्राथमिक सामग्री है। सीमेंट मुख्यतः कैल्शियम के सिलिकेट और एलुमिनेट यौगिकों का मिश्रण होता है, जो कैल्शियम ऑक्साइड, सिलिका, एल्यूमीनियम ऑक्साइड और लौह आक्साइड से निर्मित होते हैं। सीमेंट बनाने कि लिये चूना पत्थर और मृत्तिका (क्ले) के मिश्रण को एक भट्ठी में उच्च तापमान पर जलाया जाता है और तत्पश्चात इस प्रक्रिया के फल:स्वरूप बने खंगर (क्लिंकर) को जिप्सम के साथ मिलाकर महीन पीसा जाता है और इस प्रकार जो अंतिम उत्पाद प्राप्त होता है उसे साधारण पोर्टलैंड सीमेंट (सा.पो.सी.) कहा जाता है। भारत में, सा.पो.सी.

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जल (अणु)

जल पृथ्वी की सतह पर सर्वाधिक मात्रा में पाया जाने वाला अणु है, जो इस ग्रह की सतह के 70% का गठन करता है। प्रकृति में यह तरल, ठोस और गैसीय अवस्था में मौजूद है। मानक दबावों और तापमान पर यह तरल और गैस अवस्थाओं के बीच गतिशील संतुलन में रहता है। घरेलू तापमान पर, यह तरल रूप में हल्की नीली छटा वाला बेरंग, बेस्वाद और बिना गंध का होता है। कई पदार्थ, जल में घुल जाते हैं और इसे सामान्यतः सार्वभौमिक विलायक के रूप में सन्दर्भित किया जाता है। इस वजह से, प्रकृति में मौजूद जल और प्रयोग में आने वाला जल शायद ही कभी शुद्ध होता है और उसके कुछ गुण, शुद्ध पदार्थ से थोड़ा भिन्न हो सकते हैं। हालांकि, ऐसे कई यौगिक हैं जो कि अनिवार्य रूप से, अगर पूरी तरह नहीं, जल में अघुलनशील है। जल ही ऐसी एकमात्र चीज़ है जो पदार्थ की सामान्य तीन अवस्थाओं में स्वाभाविक रूप से पाया जाता है - अन्य चीज़ों के लिए रासायनिक गुण देखें. पृथ्वी पर जीवन के लिए जल आवश्यक है। जल आम तौर पर, मानव शरीर के 55% से लेकर 78% तक का निर्माण करता है। .

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विशिष्ट ऊष्मा धारिता

यह एक सामान्य अनुभव है कि किसी वस्तु का ताप बढ़ाने के लिये उसे उष्मा देनी पड़ती है। किन्तु अलग-अलग पदार्थों की समान मात्रा का ताप समान मात्रा से बढ़ाने के लिये अलग-अलग मात्रा में उष्मा की जरूरत होती है। किसी पदार्थ की इकाई मात्रा का ताप एक डिग्री सेल्सियस बढ़ाने के लिये आवश्यक उष्मा की मात्रा को उस पदार्थ का विशिष्ट उष्मा धारिता (Specific heat capacity) या केवल विशिष्ट उष्मा कहा जाता है। इससे स्पष्ट है कि जिस पदार्थ की विशिष्ट उष्मा अधिक होगी उसे गर्म करने के लिये अधिक उष्मा की आवश्यकता होगी। उदाहरण के लिये, शीशा (लेड) का ताप १ डिग्री सेल्सियस बढ़ाने के लिये जितनी उष्मा लगती है उससे आठ गुना उष्मा एक किलोग्राम मग्नीशियम का ताप १ डिग्री सेल्सियस बढ़ाने के लिये आवश्यक होती है। किसी भी पदार्थ की विशिष्ट उष्मा मापी जा सकती है। .

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काच निर्माण

काच मुख्यतः सिलिका (रेत), चूना तथा सोडा-लाईम से बनाया जाता है। निर्माण के लिए काच का अर्ध द्रवित अवस्था में होना आवश्यक है, क्योंकि इसी अवस्था में काच का कर्षण, बेलन, पीडन एवं धमन (फूँकना) हो सकता है। उपयुक्त मात्रा और गुण के विविध कच्चे मालों को मिलाकर मिश्रण को विशेष भट्ठी में उच्च ताप (१३००-१५०० डिग्री सें.) पर द्रवित किया जाता है। .

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कांच

स्वच्छ पारदर्शी कांच का बना प्रकाश बल्ब काच, काँच या कांच (glass) एक अक्रिस्टलीय ठोस पदार्थ है। कांच आमतौर भंगुर और अक्सर प्रकाशीय रूप से पारदर्शी होते हैं। काच अथव शीशा अकार्बनिक पदार्थों से बना हुआ वह पारदर्शक अथवा अपारदर्शक पदार्थ है जिससे शीशी बोतल आदि बनती हैं। काच का आविष्कार संसार के लिए बहुत बड़ी घटना थी और आज की वैज्ञानिक उन्नति में काच का बहुत अधिक महत्व है। किन्तु विज्ञान की दृष्टि से 'कांच' की परिभाषा बहुत व्यापक है। इस दृष्टि से उन सभी ठोसों को कांच कहते हैं जो द्रव अवस्था से ठण्डा होकर ठोस अवस्था में आने पर क्रिस्टलीय संरचना नहीं प्राप्त करते। सबसे आम काच सोडा-लाइम काच है जो शताब्दियों से खिड़कियाँ और गिलास आदि बनाने के काम में आ रहा है। सोडा-लाइम कांच में लगभग 75% सिलिका (SiO2), सोडियम आक्साइड (Na2O) और चूना (CaO) और अनेकों अन्य चीजें कम मात्रा में मिली होती हैं। काँच यानी SiO2 जो कि रेत का अभिन्न अंग है। रेत और कुछ अन्य सामग्री को एक भट्टी में लगभग 1500 डिग्री सैल्सियस पर पिघलाया जाता है और फिर इस पिघले काँच को उन खाँचों में बूंद-बूंद करके उंडेला जाता है जिससे मनचाही चीज़ बनाई जा सके। मान लीजिए, बोतल बनाई जा रही है तो खाँचे में पिघला काँच डालने के बाद बोतल की सतह पर और काम किया जाता है और उसे फिर एक भट्टी से गुज़ारा जाता है। .

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क्रॉनिक ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिसीस

क्रॉनिक ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिसीस (सीओपीडी), जिसे क्रॉनिक ऑब्सट्रक्टिव लंग्स डिसीस (सीओएलडी), तथा क्रॉनिक ऑब्सट्रक्टिव एयरवे डिसीस (सीओएडी) तथा अन्य भी कहा जाता है यह एक प्रकार का प्रतिरोधी फेफड़े का रोग कहा जाता है जिसे जीर्ण रूप से खराब वायु प्रवाह से पहचाना जाता है। --> आम तौर पर यह समय के साथ बिगड़ता जाता है। --> इसके मुख्य लक्षणों में श्वसन में कमी, खांसी, और कफ उत्पादन शामिल हैं। क्रॉनिक ब्रॉन्काइटिस से पीड़ित अधिकांश लोगों को सीओपीडी होता है। तंबाकू धूम्रपान सीओपीडी का एक आम कारण है, जिसमें कई अन्य कारक जैसे वायु प्रदूषण और आनुवांशिक समान भूमिका निभाते हैं। विकासशील देश में वायु प्रदूषण का आम स्रोत खराब वातायन वाली भोजन पकाने की व्यवस्था और गर्मी के लिए आग जलाने से संबंधित है। इन परेशानी पैदा करने वाले कारणों से दीर्घ कालीन अनावरण के कारण फेफड़ों में सूजन की प्रतिक्रिया होती है जिसके कारण वायुमार्ग छोटे हो जाते हैं और एम्फीसेमा नामक फेफड़ों के ऊतकों की टूटफूट जन्म लेती है। इसका निदान खराब वायुप्रवाह पर आधारित है जिसकी गणना फेफड़ों के कार्यक्षमता परीक्षणों से की जाती है। अस्थामा के विपरीत, दवा दिए जाने से वायुप्रवाह में कमी महत्वपूर्ण रूप से बेहतर नहीं होती है। ज्ञात कारणों से अनावरण को कम करके सीओपीडी की रोकथाम की जा सकती है। इसमें धूम्रपान की दर घटाने के प्रयास तथा घर के भीतर व बाहर की वायु गुणवत्ता का सुधार शामिल है। सीओपीडी उपचार में:धूम्रपान छोड़ना, टीकाकरण, पुनर्वास और अक्सर श्वसन वाले ब्रांकोडायलेटर और स्टीरॉएड शामिल होते हैं। कुछ लोगों को दीर्घअवधि ऑक्सीजन उपचार या फेफड़ों के प्रत्यारोपण की जरूरत पड़ती है। वे लोग जिनमें those who have periods of गंभीर खराबी के लक्षण हों उनके लिए दवाओं का बढ़ा हुआ उपयोग और अस्पताल में उपचार की जरूरत पड़ सकती है। पूरी दुनिया में सीओपीडी 329 मिलियन लोगों या जनसंख्या के लगभग 5% लोगों को प्रभावित करती है। 2012 में इस विश्वव्यापी मौतों के कारणों में तीसरा स्थान हासिल था क्योंकि इससे 3 मिलियन लोगों की मौत हुई थी। धूम्रपान की अधिक दर और अनेक देशों में जनसंख्या के बुजुर्ग होने से, होने वाली मौतों की संख्या में वृद्धि का अनुमान है। 2010 में इसके चलते $2.1 ट्रिलियन की राशि का व्यय हुआ। .

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क्षुद्रग्रह वर्णक्रम श्रेणियाँ

क्षुद्रग्रहों की वर्णक्रम-श्रेणियाँ (Asteroid spectral types) उनके उत्सर्जन वर्णक्रम (एमिशन स्पेक्ट्रम), रंग और कभी-कभी ऐल्बीडो (चमकीलेपन) के आधार पर निर्धारित होती हैं। बहुत हद तक यह क्षुद्रग्रहों की सतहों पर मौजूद सामग्रियों का भी संकेत देती हैं। छोटे क्षुद्रग्रहों में क्षुद्रग्रह की ऊपर की सतह और अंदरूनी रचना में कोई अंतर नहीं होता जबकि ४ वेस्टा जैसे बड़े क्षुद्रग्रहों की भीतरी संरचना बाहरी परत से काफ़ी भिन्न हो सकती है। .

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४३३ इरोस

नियर शूमेकर यान द्वारा खींची गई ४३३ इरोस की तस्वीरें ४३३ इरोस (433 Eros) एक पत्थरीला पृथ्वी-समीप क्षुद्रग्रह है। क्षुद्रग्रह वर्णक्रम श्रेणियों में यह एक S-श्रेणी क्षुद्रग्रह है, यानि पत्थरीला और सिलिका-युक्त। इसका आकार ३४.४×११.२×११.२ किमी है और १०३६ गैनिमीड (1036 Ganymed) के बाद यह दूसरा सबसे बड़ा पृथ्वी-समीप क्षुद्रग्रह है। इसकी खोज सन् १८९८ में हुई थी और मानवीय अंतरिक्ष यान द्वारा परिक्रमित होने वाला यह पहला क्षुद्रग्रह था। नियर शूमेकर नामक अमेरिकी यान पहले १९९८ में इसके पास से गुज़रा और फिर २००० में इसी यान ने ४३३ इरोस के इर्द-गिर्द कक्षा (ओरबिट) में प्रवेश किया। वैज्ञानिक​ इसकी नज़दीकी से छानबीन कर रहें हैं क्योंकि सम्भव है कि यह दूर-भविष्य में पृथ्वी से टकराये। आकार में यह उस क्षुद्रग्रह से तुलनात्मक है जिसके आज से ६.६ करोड़ साल पहले के प्रहार से हुए बदलावों के कारण डायनासोर विलुप्त हो गये। .

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S-श्रेणी क्षुद्रग्रह

S-श्रेणी क्षुद्रग्रह (S-type asteroid) ऐसे क्षुद्रग्रहों की श्रेणी होती हैं जिनमें सिलिका की मात्रा अधिक हो, यानि यह पत्थरीले क्षुद्रग्रह होते हैं। सारे क्षुद्रग्रहों में से लगभग १७% इस श्रेणी के होते हैं और, C-श्रेणी क्षुद्रग्रहों के बाद यह दूसरी सबसे बड़ी श्रेणी है। .

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132524 एपीएल

132524 एपीएल (जो कि पहले इसके अस्थायी उपाधि) से जाना जाता था एक छोटा क्षुद्रग्रह है। यह क्षुद्रग्रह (एस्टेरॉएड) जिसका व्यास लगभग २.३ किलोमीटर है। १३ जून २००६ को न्यू होराइज़न्स नामक अंतरिक्ष यान जो कि प्लूटो ग्रह की अपनी निर्धारित यात्रा पर था इससे लगभग १०१,८६७ कि॰मी॰ की दूरी पर ०४:०५ यूटीसी पर गुज़रा था। यान द्वारा लिए गये चित्र और आँकणे यह बताते हैं कि एपीएल एक एस-श्रेणी का क्षुद्रग्रह है जो कि मुख्यत: सिलिका जैसे पदार्थ से बनी हुई चट्टान है। न्यू होराइज़न्स के प्राथमिक निरीक्षक एलन स्टर्न ने इस क्षुद्रग्रह का जॉन्स हॉप्किन्स एप्लाइड फ़िजिक्स लैबोरेट्री जो कि इस मिशन को चला रही है के सदंर्भ में नामकरण किया। .

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यहां पुनर्निर्देश करता है:

सिलिकॉन डाईऑक्साइड

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