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विद्युत आवेश

सूची विद्युत आवेश

विद्युत आवेश कुछ उपपरमाणवीय कणों में एक मूल गुण है जो विद्युतचुम्बकत्व का महत्व है। आवेशित पदार्थ को विद्युत क्षेत्र का असर पड़ता है और वह ख़ुद एक विद्युत क्षेत्र का स्रोत हो सकता है। आवेश पदार्थ का एक गुण है! पदार्थो को आपस में रगड़ दिया जाये तो उनमें परस्पर इलेक्ट्रोनों के आदान प्रदान के फलस्वरूप आकर्षण का गुण आ जाता है। .

64 संबंधों: चुम्बकीय क्षेत्र, चुंबकत्व, एम्पियर, ऐम्पियर घंटा, डेल्टा बेरिऑन, दाबविद्युतिकी, दुर्बल हाइपर आवेश, द्रव्यमान वर्णक्रममाप, द्विध्रुव, धारिता, परमाणु, परिवहन परिघटना, प्रति-कण, प्रक्षेप धारामापी, प्लाज़्मा पटल, फैराडे स्थिरांक, फैराडे का विद्युत अपघटन का नियम, बल (भौतिकी), बेरिऑन संख्या, भौतिक विज्ञानी, भौतिक गुण, भौतिकी के मूलभूत सिद्धान्तों के खोज का इतिहास, मापन एवं जाँच के एलेक्ट्रानिक उपकरण, मापन प्रणालियाँ, मकोतो कोबायाशी (भौतिकी), रसायन विज्ञान का इतिहास, रासायनिक ध्रुवीयता, रैंडम एक्सैस मैमोरी, लाल, शास्त्रीय विद्युत्चुम्बकत्व, सातत्य समीकरण, साइमन्स (इकाई), सिलिकेट, संधारित्र, स्थिरवैद्युतिकी, हिन्दी पुस्तकों की सूची/अ, जेनरेटर, विद्युत चालकता, विद्युत द्विध्रुव आघूर्ण, विद्युत धारा, विद्युत स्थितिज ऊर्जा, विद्युत विभव, विद्युतदर्शी, विद्युत्मापी, वैद्युत अवयव, गाउस का नियम, ऑक्सो-ऐनायन, आयन, आवेश संरक्षण, आवेश घनत्व, ..., आवेशित कण-पुंज, आइनस्टाइन क्षेत्र समीकरण, इलैक्ट्रॉनिक्स, इलेक्ट्रॉन, कण पुंज, कण भौतिकी, कणाभ, कहरुवा, क्वार्क, कूलम्ब, कूलॉम-नियम, अबाधित विद्युत आपूर्ति, अशोक आत्रेय, सूचकांक विस्तार (14 अधिक) »

चुम्बकीय क्षेत्र

किसी चालक में प्रवाहित विद्युत धारा '''I''', उस चालक के चारों ओर एक चुम्बकीय क्षेत्र '''B''' उत्पन्न करती है। चुंबकीय क्षेत्र विद्युत धाराओं और चुंबकीय सामग्री का चुंबकीय प्रभाव है। किसी भी बिंदु पर चुंबकीय क्षेत्र दोनों, दिशा और परिमाण (या शक्ति) द्वारा निर्दिष्ट किया जाता है; इसलिये यह एक सदिश क्षेत्र है। चुंबकीय क्षेत्र घूमते विद्युत आवेश और मूलकण के आंतरिक चुंबकीय क्षणों द्वारा उत्पादित होता हैं जो एक प्रमात्रा गुण के साथ जुड़ा होता है। 'चुम्बकीय क्षेत्र' शब्द का प्रयोग दो क्षेत्रों के लिये किया जाता है जिनका आपस में निकट सम्बन्ध है, किन्तु दोनों अलग-अलग हैं। इन दो क्षेत्रों को तथा, द्वारा निरूपित किया जाता है। की ईकाई अम्पीयर प्रति मीटर (संकेत: A·m−1 or A/m) है और की ईकाई टेस्ला (प्रतीक: T) है। चुम्बकीय क्षेत्र दो प्रकार से उत्पन्न (स्थापित) किया जा सकता है- (१) गतिमान आवेशों के द्वारा (अर्थात, विद्युत धारा के द्वारा) तथा (२) मूलभूत कणों में निहित चुम्बकीय आघूर्ण के द्वारा विशिष्ट आपेक्षिकता में, विद्युत क्षेत्र और चुम्बकीय क्षेत्र, एक ही वस्तु के दो पक्ष हैं जो परस्पर सम्बन्धित होते हैं। चुम्बकीय क्षेत्र दो रूपों में देखने को मिलता है, (१) स्थायी चुम्बकों द्वारा लोहा, कोबाल्ट आदि से निर्मित वस्तुओं पर लगने वाला बल, तथा (२) मोटर आदि में उत्पन्न बलाघूर्ण जिससे मोटर घूमती है। आधुनिक प्रौद्योगिकी में चुम्बकीय क्षेत्रों का बहुतायत में उपयोग होता है (विशेषतः वैद्युत इंजीनियरी तथा विद्युतचुम्बकत्व में)। धरती का चुम्बकीय क्षेत्र, चुम्बकीय सुई के माध्यम से दिशा ज्ञान कराने में उपयोगी है। विद्युत मोटर और विद्युत जनित्र में चुम्बकीय क्षेत्र का उपयोग होता है। .

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चुंबकत्व

चुंबकत्व प्रायोगिक चुंबकीय क्षेत्र के परमाणु या उप-परमाणु स्तर पर प्रतिक्रिया करने वाले तत्वों का गुण है। उदाहरण के लिए, चुंबकत्व का ज्ञात रूप है जो की लौह चुंबकत्व है, जहां कुछ लौह-चुंबकीय तत्व स्वयं अपना निरंतर चुंबकीय क्षेत्र उत्पन्न करते रहते हैं। हालांकि, सभी तत्व चुंबकीय क्षेत्र की उपस्थिति से कम या अधिक स्तर तक प्रभावित होते हैं। कुछ चुंबकीय क्षेत्र (अणुचंबकत्व) के प्रति आकर्षित होते हैं; अन्य चुंबकीय क्षेत्र (प्रति-चुंबकत्व) से विकर्षित होते हैं; जब कि दूसरों का प्रायोगिक चुंबकीय क्षेत्र के साथ और अधिक जटिल संबंध होता है। पदार्थ है कि चुंबकीय क्षेत्रों द्वारा नगण्य रूप से प्रभावित पदार्थ ग़ैर-चुंबकीय पदार्थ के रूप में जाने जाते हैं। इनमें शामिल हैं तांबा, एल्यूमिनियम, गैस और प्लास्टिक.

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एम्पियर

विद्युत धारा को गैल्वैनोमीटर के द्वारा मापा जा सकता है। वैसे इसको मापने का सही उपकरण है एम्मीटर एम्पीयर, लघु रूप में amp, (चिन्ह: A) विद्युत धारा, या विद्युत आवेश की मात्रा प्रति सैकण्ड; की इकाई है। एम्पीयर SI मूल इकाई है और इसका नाम विद्युतचुम्बकत्व को खोजने वाले वैज्ञानिक आंद्रे-मैरी एम्पीयर के नाम पर्रखा गया है। .

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ऐम्पियर घंटा

ऐम्पियर-घंटा (ampere-hour या amp-hour; संकेत Ah, AHr, A·h, A h) विद्युत आवेश की इकाई है। एक एम्पीयर-घण्टा 3600 कूमॉम्ब के बराबर होता है। एम्पीयर-घंटा का उपयोग विद्युतरासायनिक मापनों में प्रायः होता है (जैसे बैटरी की क्षमता, विद्युत लेपन आदि)। एम्पीयर-घंटा का हजारवाँ भाग मिलीऐम्पीयर-घंटा (mAh या mA·h) कहलाता है जो प्रायः प्रयुक्त होते हुए देखने को मिलता है। मिलीऐम्पीयर-सेकेण्ड (mAs or mA·s) का प्रयोग एक्स-किरणिमेजिंग में होता है। श्रेणी:मापन श्रेणी:इकाई.

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डेल्टा बेरिऑन

डेल्टा बेरिऑन (जिन्हें डेल्टा अनुनाद भी कहा जाता है) अपरमाणविक हैड्रॉन कणों का एक परिवार है जिसके प्रतीक चिह्न,, और तथा विद्युत आवेश क्रमशः +2, +1, 0 और −1 मूल आवेश होता है। न्यूक्लिऑनों की तरह ये भी अप (u) और डाउन (d) क्वार्कों से बने और आपेक्षित रूप से हल्के बेरिऑन होते हैं लेकिन न्यूक्लिऑनों से भिन्न इनका प्रचक्रण एवं समभारिक प्रचक्रण दोनों होते हैं। .

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दाबविद्युतिकी

दाब-विद्युत का सिद्धान्त: दबाने पर वोल्टेज पैदा होता है, और खींचने पर भी दाब-विद्युत बज़र: जिस आवृत्ति का वोल्टेज इसे दिया जाता है, उसी आवृत्ति पर कम्पन पैदा करता है। कुछ ठोस पदार्थों (जैसे क्रिस्टल, सिरैमिक्स, अस्थि, डीएनए और विभिन्न प्रकार के प्रोटीन आदि जैविक पदार्थ) पर यांत्रिक प्रतिबल (स्ट्रेस) लगाने पर उन पर आवेश एकत्र हो जाता है। इसी को दाबविद्युत (Piezoelectricity) कहते हैं तथा इस प्रभाव का नाम दाबविद्युत प्रभाव (पिजोएलेक्ट्रिक इफेक्ट) है। दाबविद्युत के बहुत से उपयोग हैं जैसे ध्वनि के अस्तित्व का पता करना या ध्वनि उत्पन्न करना, उच्च विभव उत्पन्न करना, सूक्ष्मतुला (मामिक्रोबैलेंस), एलेक्ट्रॉनिक आवृत्ति जनित्र, गैस लाइटर आदि। .

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दुर्बल हाइपर आवेश

दुर्बल हाइपर कण भौतिकी में दुर्बल हाइपर आवेश एक संरक्षित क्वांटम संख्या है जो विद्युत आवेश और दुर्बल समभारिक प्रचक्रण के तृतीय घटक में संबंध स्थापित करता है तथा प्रबल अन्योन्य क्रियाओं के समभारिक प्रचक्रण के लिए गेल-मान-निशिजमा सूत्र (Gell-Mann–Nishijima formula) के समान होता है (जो संरक्षित नहीं रहता)। इसे अक्सर YW द्वारा निरूपित किया जाता है और यह गेज सममिति (gauge symmetry) U(1) के समान होत है। .

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द्रव्यमान वर्णक्रममाप

द्रव्यमान वर्णक्रममाप (Mass spectrometry) एक विश्लेषणात्मक तकनीक है जिस के द्वारा किसी मिश्रण में उपस्थित पृथक रासायनिक जातियों को पहले आयनित कर के विद्युत आवेश दिया जाता है और फिर उनके द्रव्यमान-से-आवेश अनुपात (mass to charge ratio) के आधार पर अलग-अलग करा जाता है। इस तकनीक के द्वारा किसी भी मिश्रित सामग्री में मौजूद अलग-अलग रासायनों का पता लगाया जा सकता है। .

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द्विध्रुव

पृथ्वी का चुम्बकीय क्षेत्र लगभग एक चुम्बकीय द्विध्रुव जैसा समझा जा सकता है। भौतिकी में कई प्रकार के द्विध्रुव (डाइपोल / dipole) आते हैं.

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धारिता

thumb किसी चालक की वैद्युत धारिता (कैपेसिटी या कैपेसिटेंस), उस चालक की वैद्युत आवेश का संग्रहण करने की क्षमता की माप होती है। जब किसी चालक को आवेश दिया जाता है तो उसका वैद्युत विभव आवेश के अनुपात में बढता जाता है। यदि किसी चालक को q आवेश देने पर उसके विभव में V वृद्धि हो, तो जहाँ C एक नियतांक है जिसका मान चालक के आकार, समीपवर्ती माध्यम तथा पास में अन्य चालकोँ की उपस्थिति पर निर्भर करता है। इस नियतांक को 'वैद्युत धारिता' कहते हैँ। ऊपर के समीकरण q .

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परमाणु

एक परमाणु किसी भी साधारण से पदार्थ की सबसे छोटी घटक इकाई है जिसमे एक रासायनिक तत्व के गुण होते हैं। हर ठोस, तरल, गैस, और प्लाज्मा तटस्थ या आयनन परमाणुओं से बना है। परमाणुओं बहुत छोटे हैं; विशिष्ट आकार लगभग 100 pm (एक मीटर का एक दस अरबवें) हैं। हालांकि, परमाणुओं में अच्छी तरह परिभाषित सीमा नहीं होते है, और उनके आकार को परिभाषित करने के लिए अलग अलग तरीके होते हैं जोकि अलग लेकिन काफी करीब मूल्य देते हैं। परमाणुओं इतने छोटे है कि शास्त्रीय भौतिकी इसका काफ़ी गलत परिणाम देते हैं। हर परमाणु नाभिक से बना है और नाभिक एक या एक से अधिक इलेक्ट्रॉन्स से सीमित है। नाभिक आम तौर पर एक या एक से अधिक न्यूट्रॉन और प्रोटॉन की एक समान संख्या से बना है। प्रोटान और न्यूट्रान न्यूक्लिऑन कहलाता है। परमाणु के द्रव्यमान का 99.94% से अधिक भाग नाभिक में होता है। प्रोटॉन पर सकारात्मक विद्युत आवेश होता है, इलेक्ट्रॉन्स पर नकारात्मक विद्युत आवेश होता है और न्यूट्रान पर कोई भी विद्युत आवेश नहीं होता है। एक परमाणु के इलेक्ट्रॉन्स इस विद्युत चुम्बकीय बल द्वारा एक परमाणु के नाभिक में प्रोटॉन की ओर आकर्षित होता है। नाभिक में प्रोटॉन और न्यूट्रॉन एक अलग बल, यानि परमाणु बल के द्वारा एक दूसरे को आकर्षित करते है, जोकि विद्युत चुम्बकीय बल जिसमे सकारात्मक आवेशित प्रोटॉन एक दूसरे से पीछे हट रहे हैं, की तुलना में आम तौर पर शक्तिशाली है। परमाणु के केन्द्र में नाभिक (न्यूक्लिअस) होता है जिसका घनत्व बहुत अधिक होता है। नाभिक के चारो ओर ऋणात्मक आवेश वाले एलेक्ट्रान चक्कर लगाते रहते हैं जिसको एलेक्ट्रान घन (एलेक्ट्रान क्लाउड) कहते हैं। नाभिक, धनात्मक आवेश वाले प्रोटानों एवं अनावेशित (न्यूट्रल) न्यूट्रानों से बना होता है। जब किसी परमाणु में एलेक्ट्रानों की संख्या उसके नाभिक में स्थित प्रोटानों की संख्या के समान होती है तब परमाणु वैद्युकीय दृष्टि से अनावेशित होता है; अन्यथा परमाणु धनावेशित या ऋणावेशित ऑयन के रूप में होता है। आधुनिक रसायनशास्त्र में शताधिक मूल भूत माने गए हैं, जिनमें से कुछ तो धातुएँ हैं जैसे ताँबा, सोना, लोहा, सीसा, चाँदी, राँगा, जस्ता; कुछ और खनिज हैं, जैसे, गंधक, फासफरस, पोटासियम, अंजन, पारा, हड़ताल, तथा कुछ गैस हैं, जैसे, आक्सीजन, नाइट्रोजन, हाइड्रोजन आदि। इन्हीं मूल भूतों के अनुसार परमाणु आधुनिक रसायन में माने जाते हैं। पहले समझा जाता था कि ये अविभाज्य हैं। अब इनके भी टुकड़े कर दिए गए हैं। नाभिक में प्रोटॉन की संख्या किसी रासायनिक तत्व को परिभाषित करता है: जैसे सभी तांबा के परमाणु में 29 प्रोटॉन होते हैं। न्यूट्रॉन की संख्या तत्व के समस्थानिक को परिभाषित करता है। इलेक्ट्रॉनों की संख्या एक परमाणु के चुंबकीय गुण को प्रभावित करता है। परमाणु अणु के रूप में रासायनिक यौगिक बनाने के लिए रासायनिक आबंध द्वारा एक या अधिक अन्य परमाणुओं को संलग्न कर सकते हैं। परमाणु की संघटित और असंघटित करने की क्षमता प्रकृति में हुए बहुत से भौतिक परिवर्तन के लिए जिम्मेदार है, और रसायन शास्त्र के अनुशासन का विषय है। .

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परिवहन परिघटना

अभियान्त्रिकी, भौतिकी और रसायनिकी में परिवहन परिघटना (transport phenomena) किन्ही दो या दो से अधिक भौतिक तंत्रों के बीच में द्रव्यमान, ऊर्जा, आवेश, संवेग या कोणीय संवेग के आदान-प्रदान को कहते हैं। द्रव्यमान, ताप, ऊर्जा और संवेग के गणितीय विश्लेषण में बहुत-सी समानताएँ होती हैं जिनका परिवहन परिघटनाओं के अध्ययन में व्यवस्थित रूप से लाभ उठाया जाता है। .

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प्रति-कण

कण (बायें) और प्रति-कण (दायें) के आकार और विद्युत आवेश का चित्रण। ऊपर से नीचे इलेक्ट्रॉन/पोजीट्रॉन,प्रोटॉन/प्रतिप्रोटोन, न्यूट्रॉन/प्रतिन्यूट्रॉन. किसी भी कण से संबद्ध प्रतिकण भी होता है जिसका द्रव्यमान अभिन्न होता है लेकिन विद्युत आवेश विपरीत होता है। उदाहरण के लिये इलेक्ट्रॉन का प्रति-कण प्रति-इलेक्ट्रॉन एक धनावेशित कण जिसे पोजीट्रॉन कहते हैं, सामान्यतः इसे रेडियोधर्मी पदार्थों के क्षय से बनाया जाता है। प्रकृति के नियम कणों और प्रतिकणो के लिये लगभग सममितीय होते हैं। उदाहरण के लिये एक प्रतिप्रोटोन और पोजीट्रॉन से प्रति-हाइड्रोजन परमाणु का निर्माण होता है, जिसके गुणधर्म भी हाइड्रोजन परमाणु के समान ही हैं। .

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प्रक्षेप धारामापी

प्रक्षेप धारामापी (Ballistic galvanometer) एक प्रकार का दर्पण धारामापी है जो धारा के मापन के लिये उपयोग नहीं किया जाता बल्कि इससे होकर प्रवाहित आवेश की मात्रा मापने के काम आता है। वस्तुतः यह चल कुण्डली धारामापी या चल लौह धारामापी ही होता है किन्तु इसका जड़त्वाघूर्ण बहुत अधिक होता है (जबकि सामान्य धारामापी का जड़त्वाघूर्ण कम से कम रखने की कोशिश की जाती है।) .

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प्लाज़्मा पटल

सं.अ.अमी. द्वारा विक्रय किया जाता है। प्लाज्मा टीवी एक प्रकार का हाईडेफिनेशन टीवी (एचडीटीवी) होता है, जो कि प्रायः प्रचलित कैथोड किरण दूरदर्शी का विकल्प हैं। प्लाज्मा एक वैज्ञानिक शब्द है, जिसको कि निऑन और ज़ेनॉन आदि अक्रिय (इनर्ट) गैसों के सन्दर्भ में प्रयोग किया जाता है।। हिन्दुस्तान लाइव। १८ अक्टूबर २००९द्रव्य, गैस और ठोस के अलावा प्लाज्मा को पदार्थ की चतुर्थ अवस्था के रूप में प्रयोग किया जाता है। टेलीविजन में हजारों की संख्या में छोटे-छोटे घटक होते हैं, जिन्हें पिक्सल कहते हैं। रंगीन टेलीविजनों में तीन वर्ण मिलकर एक पिक्सल का निर्माण करते हैं। इनमें सामान्यत: प्रकाश के तीन प्राथमिक रंग लाल, हरा और नीला का प्रयोग किया जाता है। वहीं प्लाज्मा टीवी में प्रत्येक पिक्सल अक्रिय गैस जैसे कि निऑन और जीनॉन के छोटे-छोटे पात्रों से मिलकर बना होता है। प्लाज्मा टीवी में अनुमानित हजारों की संख्या में ऐसे छोटे-छोटे टय़ूब उपस्थित होते हैं। प्रत्येक पिक्सल को दो वैद्युत आवेशित प्लेटों के बीच में रखा जाता है। विद्युत धारा का प्रवाह करने पर प्लाज्मा चमकता है। टीवी में लगा छोटा सा कंप्यूटर विद्युत क्षेत्र को नियंत्रित करता है, जिससे विभिन्न रंगों का मिश्रण बनता है जो कि दृश्य-पटल पर दिखाई देते हैं। इस टेलीवीज़न का लाभ ये हैं कि इसका दृश्य पट्ल यानि मॉनीटर, एकदम सपाट यानि फ्लैट होता है, जिसको कि आप सीधे दीवार पर लगा सकते हैं। इसमें चित्र और रंग दूसरे टीवी की तुलना में बेहतर दिखती है। इसका भार अन्य समान आकार के स्क्रीन वाले टीवी की तुलना में बहुत कम होता है। प्लाज़्मा टीवी या पटल के प्रमुख निर्माताओं में एल.जी इलेक्ट्रॉनिक्स, सोनी, सैमसंग, पैनासॉनिक, हिटैची आदि हैं।। नवभारत टाइम्स। १६ जुलाई २००८ .

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फैराडे स्थिरांक

भौतिकी और रसायन विज्ञान में, एक मोल इलेक्ट्रानों पर स्थित कुलआवेश की मात्रा को फैराडे स्थितांक (Faraday constant) कहते हैं। इसका प्रतीक है। वर्तमान समय में फैराडे स्थिरांक का स्वीकृत मान फैराडे स्थिरांक का दो अन्य भौतिक स्थिरांको से सरल सम्बन्ध है- जहाँ NA अवोगाद्रो संख्या है और e इलेक्ट्रानिक आवेश है। .

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फैराडे का विद्युत अपघटन का नियम

सन् १८३४ में फैराडे ने विद्युतरसायन से सम्बन्धित अपने कुछ संख्यात्मक प्रेक्षणों को प्रकाशित किया। इन्हें फैराडे के विद्युत अपघटन के नियम (Faraday's laws of electrolysis) कहते हैं। इसके अन्तर्गत दो नियम हैं। पाठ्यपुस्तकों और वैज्ञानिक साहित्य में में इन नियमों को अलग-अलग तरीके से प्रस्तुत किया जाता है लेकिन वहुधा प्रचलित रूप कुछ इस प्रकार है-; फैराडे का विद्युत अपघटन का प्रथम नियम विद्युत अपघटन में विद्युताग्रों (एलेक्ट्रोड्स) पर जमा हुए पदार्थ की मात्रा धारा की मात्रा समानुपाती होती है। 'धारा की मात्रा' का अर्थ आवेश से है न कि विद्युत धारा से।; फैराडे का विद्युत अपघटन का द्वितीय नियम 'धारा की मात्रा' समान होने पर विद्युताग्रों पर जमा/हटाये गये पदार्थ की मात्रा उस तत्व के तुल्यांकी भार के समानुपाती होती है। (किसी पदार्थ का तुल्यांकी भार उसके मोलर द्रव्यमान को एक पूर्णांक से भाग देने पर मिलता है। यह पूर्णांक इस बात पर निर्भर करता है कि वह पदार्थ किस तरह की रासायनिक अभिक्रिया करता है।) .

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बल (भौतिकी)

बल अनेक प्रकार के होते हैं जैसे- गुरुत्वीय बल, विद्युत बल, चुम्बकीय बल, पेशीय बल (धकेलना/खींचना) आदि। भौतिकी में, बल एक सदिश राशि है जिससे किसी पिण्ड का वेग बदल सकता है। न्यूटन के गति के द्वितीय नियम के अनुसार, बल संवेग परिवर्तन की दर के अनुपाती है। बल से त्रिविम पिण्ड का विरूपण या घूर्णन भी हो सकता है, या दाब में बदलाव हो सकता है। जब बल से कोणीय वेग में बदलाव होता है, उसे बल आघूर्ण कहा जाता है। प्राचीन काल से लोग बल का अध्ययन कर रहे हैं। आर्किमिडीज़ और अरस्तू की कुछ धारणाएँ थीं जो न्यूटन ने सत्रहवी सदी में ग़लत साबित की। बीसवी सदी में अल्बर्ट आइंस्टीन ने उनके सापेक्षता सिद्धांत द्वारा बल की आधुनिक अवधारणा दी। प्रकृति में चार मूल बल ज्ञात हैं: गुरुत्वाकर्षण बल, विद्युत चुम्बकीय बल, प्रबल नाभकीय बल और दुर्बल नाभकीय बल। बल की गणितीय परिभाषा है: जहाँ \vec बल, \vec संवेग और t समय हैं। एक ज़्यादा सरल परिभाषा है: जहाँ m द्रव्यमान है और \vec त्वरण है। .

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बेरिऑन संख्या

कण भौतिकी में बेरिऑन संख्या निकाय की लगभग संरक्षित क्वान्टम संख्या है। जहाँ nq क्वार्क की एक संख्या है और n प्रतिक्वार्क की एक संख्या है। बेरिऑनों (तीन क्वार्क) की बेरिऑन संख्या +1, मेसॉनों (एक क्वार्क, एक प्रतिक्वार्क) की बेरिऑन संख्या 0 (शून्य) और प्रतिबेरिऑनों (तीन प्रतिक्वार्क) की बेरिऑन संख्या −1 होती है। इतर हैड्रॉन जैसे पेन्टाक्वार्क (चार क्वार्क, एक प्रति क्वार्क) और चतुष्क्वार्क (दो क्वार्क, दो प्रतिक्वार्क) को भी उनकी बेरिऑन संख्या के आधार पर बेरिऑनों एवं मेसॉनों के रूप में वर्गीकृत किया जाता है। .

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भौतिक विज्ञानी

अल्बर्ट आइंस्टीन, जिन्होने सामान्य आपेक्षिकता का सिद्धान्त दिया भौतिक विज्ञानी अथवा भौतिक शास्त्री अथवा भौतिकीविद् वो वैज्ञानिक कहलाते हैं जो अपना शोध कार्य भौतिक विज्ञान के क्षेत्र में करते हैं। उप-परवमाणविक कणों (कण भौतिकी) से लेकर सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड तक सभी परिघटनाओं का अध्ययन करने वाले लोग इस श्रेणी में माने जाते हैं। .

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भौतिक गुण

किसी भौतिक प्रणाली के किसी भी मापने योग्य गुण को भौतिक गुण (physical property) कहते हैं जो उस प्रणाली की बहुतिक अवस्था का सूचक है। इसके विपरीत वे गुण जो यह बताते हैं कि कोई वस्तु किसी रासायनिक अभिक्रिया में कैसा व्यवहार करती है, उसका रासायनिक गुण कहलाती है। .

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भौतिकी के मूलभूत सिद्धान्तों के खोज का इतिहास

प्रकाश वैद्युत प्रभाव, आइंस्टाइन ब्राउनी गति, आइंस्टाइन नाभिक की खोज अतिचालकता द्रव्य तरंगें (Matter waves) मंदाकिनी Galaxies फोटॉनों के कण-प्रकृति की पुष्टि न्यूट्रॉन की खोज तारों में ऊर्जा-उत्पादन की प्रक्रिया समझी गई म्यूआन न्यूट्रिनो पाया गया सौर न्यूट्रिनो प्रश्न (problem) मिला पल्सर (Pulsars या neutron stars) की खोज चार्म्ड क्वार्क (Charmed quark) का पता चला श्रेणी:भौतिकी श्रेणी:इतिहास ru:Хронология открытий человечества.

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मापन एवं जाँच के एलेक्ट्रानिक उपकरण

एक डिजिटल ऑसिलोस्कोप विद्युत एवं एलेक्ट्रानिक कार्य के लिये बहुत से उपकरण लगते हैं जो मापन, जाँच, सिगनल पैदा करने (संकेत-जनक), सिगनल का स्वरूप देखने आदि के काम आते हैं। .

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मापन प्रणालियाँ

मापन प्रणाली एक इकाइयों का समूह है, जो कि प्रत्येक उस वस्तु के परिमाण को दर्शाने हेतु प्रयोग होता है, जिसे मापा जा सकता है। क्योंकि यह व्यापार और आंतरिक वाणिज्य हेतु महत्वपूर्ण थीं, इसलिये, इन्हें इन्हें संशोधित, नियमित कर मानकीकृत किया गया था। वैज्ञानिक दृष्टि से, जब शोध किये गये, तो पता चला, कि कुछ इकाइयां मानक होतीं हैं, जिनसे कि अन्य सभी को व्युत्पन्न किया जा सकता है। पूर्व में यह राज्यों के शासकों द्वारा निर्धारित कर लागू किये जाती थीं। इसलिये ये आवश्यक रूप से सर्वानुकूल, या आपस में सामन्जस्य रखने वाली नहीं होती थीं। चाहे हम यह राय बनायें, कि मिस्र निवासियों ने मापन कला की खोज की थी; परन्तु वे यूनानी ही थे, जिन्होंने मापन कला खोजी थी। यूनानियों की ज्यामिती का ज्ञान और उनके आरम्भिक भार एवं मापों के प्रयोग, जल्दी ही वैज्ञानिक स्तर पर उनकी मापन प्रणाली को स्थान देने लगे.

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मकोतो कोबायाशी (भौतिकी)

मकोतो कोबायाशी (जापानी:小林 誠) (जन्म 7 अप्रैल 1944, नागोया-सी, जापान में) एक जापानी भौतिक विज्ञानी हैं उन्हें मुख्यतः आवेश-समता उल्लंघन पर किये गये उनके कार्य के लिए जाना जाता है, इस कार्य के लिए उन्हें 2008 भौतिकी में नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया। .

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रसायन विज्ञान का इतिहास

रसायन विज्ञान का इतिहास बहुत पुराना है। १००० ईसापूर्व में प्राचीन सभ्यताओं के लोग ऐसी प्राविधियों काo.

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रासायनिक ध्रुवीयता

रसायनशास्त्र में रासायनिक ध्रुवीयता (chemical polarity) किसी अणु (मोलिक्यूल) या उसके अंशों में विद्युत आवेशों (चार्जों) में होने वाले अलगाव को कहते हैं जिसके कारण अणु के कुछ भागों में ऋणात्मक (निगेटिव) आवेश और कुछ में धनात्मक (पोज़िटिव) अवेश देखा जा सकता है। इस से अणु में विद्युत द्विध्रुव आघूर्ण (electric dipole moment) या बहुध्रुव आघूर्ण (multipole moment) देखा जाता है। जब ऐसे द्विध्रुव या बहुध्रुव वाले कई अणु एकत्रित हों तो इन ध्रुवों के आकर्ष्ण या अपकर्षण से उनमें आपसी व्यवस्था बनती है। बर्फ़ के क्रिस्टल का ढांचा जल अणुओं में ध्रुवीयता के कारण ही होता है। रासायनिक ध्रुवीयता का प्रभाव रसायनों के कई अन्य भौतिक लक्षणों पर भी पड़ता है, मसलन पृष्ठ तनाव, विलेयता, पिघलाव तापमान और उबलाव तापमान। .

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रैंडम एक्सैस मैमोरी

राइटेबल अस्थिर यादृच्छिक अभिगम मेमोरी का उदाहरण: तुल्यकालिक गतिशील रैम (RAM) मॉड्यूल, जो शुरू में व्यक्तिगत कंप्यूटरों, कार्यस्थलों और सर्वरों में मुख्य मेमोरी के रूप प्रयुक्त होता था। यादृच्छिक-अभिगम स्मृति (याभिस्मृति) (आमतौर पर अपने आदिवर्णिक शब्द, रैम (RAM) द्वारा जानी जाती है), कंप्यूटर डाटा संग्रहण का एक रूप है। आज यह एकीकृत परिपथ का रूप धारण करती है जो संग्रहीत डाटा को किसी भी क्रम में, अर्थात् जो इच्छा हो, यादृच्छिक) अभिगमित होने की अनुमति प्रदान करता है। शब्द यादृच्छिक इस प्रकार इस तथ्य को संदर्भित करता है कि डाटा का कोई भी हिस्सा अपनी भौतिक स्थिति और चाहे यह डाटा के पिछले हिस्से से संबंधित हो या न हो, इन सबकी परवाह किए बगैर निर्धारित समय में वापस आ सकता है। यह सिस्टम बस के साथ की आवृति पर काम करती है तो SDRAM कहलाती है जो आजकल कम्पयूटरों में सबसे अधिक प्रयुक्त होती है। इसकी इसके विपरीत, भंडारण उपकरण जैसे चुंबकीय डिस्क और प्रकाशीय डिस्क, रिकॉर्डिंग माध्यम या पठनीय सिरे की भौतिक गति पर निर्भर करते हैं। इन उपकरणों में, गति में डाटा स्थानांतरण से अधिक समय लगता है और अगली विषय-वस्तु की भौतिक स्थिति के आधार पर पुनर्प्राप्ति समय बदलता रहता है। शब्द रैम (RAM) अक्सर अस्थिर या वोलाटाइल प्रकार की मेमोरी (जैसे डीरैम (DRAM) मेमोरी मॉड्यूल) से संबंधित होता है जहां बिजली का संचालन बंद हो जाने पर सूचना खो जाती है। अधिकतर रोम (ROM) और नोर-फ़्लैश (NOR-Flash) कहे जाने वाले एक प्रकार के फ़्लैश मेमोरी सहित कई अन्य प्रकार की मेमोरी रैम (RAM) भी है। RAM दो प्रकार की होती है। static RAM aur daynemic RAM होती है। .

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लाल

लाल वर्ण को रक्त वर्ण भी कहा जाता है, कारण इसका रक्त के रंग का होना। लाल वर्ण प्रकाश की सर्वाधिक लम्बी तरंग दैर्घ्य वाली रोशनी या प्रकाश किरण को कहते हैं, जो कि मानवीय आँख द्वारा दृश्य हो। इसका तरंग दैर्घ्य लगभग625–740 nm तक होता है। इससे लम्बी तरंग को अधोरक्त कहते हैं, जो कि मानवीय चक्षु द्वारा दृश्य नहीं है। लाल रंग प्रकाश का संयोजी प्राथमिक रंग है, जो कि क्याना रंग का सम्पूरक है। लाल रंग सब्ट्रेक्टिव प्राथमिक रंग भी है RYB वर्ण व्योम में, परंतु CMYK वर्ण व्योम में नहीं। मानवीय रंग मनोविज्ञान में, लाल रंग जुडा़ है ऊष्मा, ऊर्जा एवं रक्त से, साथ ही वे भावनाएं जो कि रक्त से जुडी़ हैं। जैसे कि क्रोध, आवेश, प्रेम। .

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शास्त्रीय विद्युत्चुम्बकत्व

शास्त्रीय विद्युत्चुम्बकत्व (Classical electromagnetism) सैद्धान्तिक भौतिकी की वह शाखा है जिसमें न्यूटनवादी भौतिकी के आधार पर विद्युत आवेशों (चार्ज) और विद्युत धाराओं (करंट) के एक-दूसरे के ऊपर हुए प्रभावों का अध्ययन किया जाता है। यह आधुनिक विद्युत्चुम्बकत्व से ज़रा भिन्न है क्योंकि शास्त्रीय विद्युत्चुम्बकत्व में केवल क्वान्टम भौतिकी को पूरी तरह से नज़र-अंदाज़ किया जाता है। क्वान्टम प्रभावों को उपेक्षित करने के कारण शास्त्रीय विद्युत्चुम्बकत्व केवल बड़ी वस्तुओं और विद्युत धाराओं को ही समझने में सक्षम है। ऐसे बड़े पैमानों पर शास्त्रीय विद्युत्चुम्बकत्व से बहुत लाभ उठाया जा सकता है। .

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सातत्य समीकरण

भौतिकी में सातत्य समीकरण (continuity equation) एक समीकरण है जो किसी 'संरक्षित राशि' के परिवहन को अभिव्यक्त करता है। चूँकि द्रव्यमान, ऊर्जा, संवेग, विद्युत आवेश, तथा अन्य प्राकृतिक राशियाँ अपनी-अपनी विशिष्ट दशाओं में संरक्षित रहतीं हैं, इसलिये सातत्य समीकरण का उपयोग करते हुए कई प्रकार की भौतिक परिघटनाओं को अभिव्यक्त किया जा सकता है। उदाहरण के लिये, A1 v1 .

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साइमन्स (इकाई)

साइमन्स (चिन्ह: S) विद्युत चालकता की SI व्युत्पन्न इकाई है। यह ओह्म का प्रतिलोम है। इसका नाम जर्मन वैज्ञानिक खोजक और उद्योगपति अर्न्स्ट वर्नर वान साइमन्स के नाम पर है। पूर्व में इसे ओह्म का उलटा यानि म्हो कहा जाता था। 1971 में 14वें CIPM में इसका SI व्युत्पन्न इकाई के रूप में प्रयोग अनुमोदित हुआ था। .

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सिलिकेट

सिलिकेट (silicate) ऐसे रासायनिक यौगिकों (कम्पाउंड) की श्रेणी है जिनमें सिलिकॉन व ऑक्सीजन तत्वों के साथ बने ऋणायन (ऋणात्मक या निगेटिव विद्युत आवेश वाले आयन) हों। यह ऋणायन अक्सर ऑक्साइड होते हैं हालाँकि कुछ हेक्साफ्लोरोसिलिकेट (hexafluorosilicate, 2−) जैसे अन्य तत्वों को सम्मिलित करने वाले ऋणायन भी हो सकते हैं। .

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संधारित्र

विभिन्न प्रकार के आधुनिक संधारित्र समान्तर प्लेट संधारित्र का एक सरल रूप संधारित्र या कैपेसिटर (Capacitor), विद्युत परिपथ में प्रयुक्त होने वाला दो सिरों वाला एक प्रमुख अवयव है। यदि दो या दो से अधिक चालकों को एक विद्युत्रोधी माध्यम द्वारा अलग करके समीप रखा जाए, तो यह व्यवस्था संधारित्र कहलाती है। इन चालकों पर बराबर तथा विपरीत आवेश होते हैं। यदि संधारित्र को एक बैटरी से जोड़ा जाए, तो इसमें से धारा का प्रवाह नहीं होगा, परंतु इसकी प्लेटों पर बराबर मात्रा में घनात्मक एवं ऋणात्मक आवेश संचय हो जाएँगे। विद्युत् संधारित्र का उपयोग विद्युत् आवेश, अथवा स्थिर वैद्युत उर्जा, का संचय करने के लिए तथा वैद्युत फिल्टर, स्नबर (शक्ति इलेक्ट्रॉनिकी) आदि में होता है। संधारित्र में धातु की दो प्लेटें होतीं हैं जिनके बीच के स्थान में कोई कुचालक डाइएलेक्ट्रिक पदार्थ (जैसे कागज, पॉलीथीन, माइका आदि) भरा होता है। संधारित्र के प्लेटों के बीच धारा का प्रवाह तभी होता है जब इसके दोनों प्लेटों के बीच का विभवान्तर समय के साथ बदले। इस कारण नियत डीसी विभवान्तर लगाने पर स्थायी अवस्था में संधारित्र में कोई धारा नहीं बहती। किन्तु संधारित्र के दोनो सिरों के बीच प्रत्यावर्ती विभवान्तर लगाने पर उसके प्लेटों पर संचित आवेश कम या अधिक होता रहता है जिसके कारण वाह्य परिपथ में धारा बहती है। संधारित्र से होकर डीसी धारा नही बह सकती। संधारित्र की धारा और उसके प्लेटों के बीच में विभवान्तर का सम्बन्ध निम्नांकित समीकरण से दिया जाता है- जहाँ: .

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स्थिरवैद्युतिकी

स्थिरवैद्युतिकी भौतिकी की एक शाखा है जो स्थिर या धीमी गति (अत्वरित) वाले वैद्युत आवेशों से जुड़े परिघटनाओ और गुणों से सम्बंधित है।.

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हिन्दी पुस्तकों की सूची/अ

कोई विवरण नहीं।

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जेनरेटर

बीसवीं शताब्दी के आरम्भिक दिनों का अल्टरनेटर, जो बुडापेस्ट में बना हुआ है। विद्युत जनित्र (एलेक्ट्रिक जनरेटर) एक ऐसी युक्ति है जो यांत्रिक उर्जा को विद्युत उर्जा में बदलने के काम आती है। इसके लिये यह प्रायः माईकल फैराडे के विद्युतचुम्बकीय प्रेरण (electromagnetic induction) के सिद्धान्त का प्रयोग करती है। विद्युत मोटर इसके विपरीत विद्युत उर्जा को यांत्रिक उर्जा में बदलने का कार्य करती है। विद्युत मोटर एवं विद्युत जनित्र में बौत कुछ समान होता है और कई बार एक ही मशीन बिना किसी परिवर्तन के दोनो की तरह कार्य कर सकती है। विद्युत जनित्र, विद्युत आवेश को एक वाह्य परिपथ से होकर प्रवाहित होने के लिये वाध्य करता है। लेकिन यह आवेश का सृजन नहीं करता। यह जल-पम्प की तरह है जो केवल जल-को प्रवाहित करने का कार्य करती है, जल पैदा नहीं करती। विद्युत जनित्र द्वारा विद्युत उत्पादन के लिये आवश्यक है कि जनित्र के रोटर को किसी बाहरी शक्ति-स्रित की सहायता से घुमाया जाय। इसके लिये रेसिप्रोकेटिंग इंजन, टर्बाइन, वाष्प इंजन, किसी टर्बाइन या जल-चक्र (वाटर्-ह्वील) पर गिरते हुए जल, किसी अन्तर्दहन इंजन, पवन टर्बाइन या आदमी या जानवर की शक्ति का प्रयोग किया जा सकता है। किसी भी स्रोत से की गई यांत्रिक ऊर्जा को विद्युत् ऊर्जा में परिवर्तित करना संभव है। यह ऊर्जा, जलप्रपात के गिरते हुए पानी से अथवा कोयला जलाकर उत्पन्न की गई ऊष्मा द्वारा भाव से, या किसी पेट्रोल अथवा डीज़ल इंजन से प्राप्त की जा सकती है। ऊर्जा के नए नए स्रोत उपयोग में लाए जा रहे हैं। मुख्यत:, पिछले कुछ वर्षों में परमाणुशक्ति का प्रयोग भी विद्युत्शक्ति के लिए बड़े पैमाने पर किया गया है और बहुत से देशों में परमाणुशक्ति द्वारा संचालित बिजलीघर बनाए गए हैं। ज्वार भाटों एवं ज्वालामुखियों में निहित असीम ऊर्जा का उपयोग भी विद्युत्शक्ति के जनन के लिए किया गया है। विद्युत्शक्ति के उत्पादन के लिए इन सब शक्ति साधनों का उपयोग, विशालकाय विद्युत् जनित्रों द्वारा ही हाता है, जो मूलत: फैराडे के 'चुंबकीय क्षेत्र में घूमते हुए चालक पर वेल्टता प्रेरण सिद्धांत पर आधारित है। .

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विद्युत चालकता

पदार्थों द्वारा विद्युत धारा संचालित करने की क्षमता के माप को विद्युत चालकता (Electrical conductivity) या विशिष्ट चालकता (specific conductance) कहते हैं। जब किसी पदार्थ से बने किसी 'चालक' के दो सिरों के बीच विभवान्तर आरोपित किया जाता है तो इसमें विद्यमान घूम सकने योग्य आवेश प्रवाहित होने लगते हैं जिसे विद्युत धारा कहते हैं। आंकिक रूप से धारा घनत्व \mathbf तथा विद्युत क्षेत्र की तीव्रता \mathbf के अनुपात को चालकता (σ) कहते हैं। अर्थात - विद्युत चालकता के व्युत्क्रम (reciprocal) राशि को विद्युत प्रतिरोधकता (ρ) कहते हैं जिसकी SI इकाई सिमेन्स प्रति मीटर (S·m-1) होती है। विद्युत चालकता के आधार पर पदार्थों को कुचालक, अर्धचालक, सुचालक तथा अतिचालक आदि कई वर्गों में बांटा जाता है जिनका अपना-अपना महत्व एवं उपयोग होता है चालकता ___(Conductance) जिस प्रकार प्रतिरोध, विधुत धारा प्रवाह का विरोध करता है उसी प्रकार चालकता प्रतिरोध के प्रभाव के विपरीत है, परंतु चालकता विधुत धारा प्रवाह को सुगमता प्रदान करती है। .

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विद्युत द्विध्रुव आघूर्ण

विद्युत द्विध्रुव आघूर्ण (electric dipole moment) किसी मंडल में ऋणात्मक (नेगाटिव) और धनात्मक (पोज़िटिव) विद्युत आवेशों (चार्ज) की दूरी के मापन को कहते हैं। यह उस मंडल में हुए आवेशों के ध्रुविकरण को मापता है और अन्तर्राष्ट्रीय इकाई प्रणाली में इस की इकाई कूलम्ब-मीटर (Coulomb-meter) में लिखी जाती है। .

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विद्युत धारा

आवेशों के प्रवाह की दिशा से धारा की दिशा निर्धारित होती है। विद्युत आवेश के गति या प्रवाह में होने पर उसे विद्युत धारा (इलेक्ट्रिक करेण्ट) कहते हैं। इसकी SI इकाई एम्पीयर है। एक कूलांम प्रति सेकेण्ड की दर से प्रवाहित विद्युत आवेश को एक एम्पीयर धारा कहेंगे। .

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विद्युत स्थितिज ऊर्जा

किसी निकाय में विद्युत आवेशों के विन्यास के कारण एक स्थितिज ऊर्जा होती है जिसे विद्युत स्थितिज ऊर्जा (Elecric Potential energy या Electrostatic Potential Energy) कहते हैं। किसी वस्तु में दो कारणों से विद्युत स्थितिज ऊर्जा हो सकती है- अपने स्वयं के आवेशों के कारण तथा अन्य आवेशित वस्तुओं के सापेक्ष इसकी स्थिति के कारण। उदाहरण के लिए दो बिन्दु आवेश एक-दूसरे से r दूरी पर हों (और अन्य कोई आवेश दूर-दूर तक न हों) तो इस निकाय की विद्युत स्थितिज ऊर्जा k.q1.q2/r2 के बराबर होती है। .

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विद्युत विभव

किसी ईकाई धनावेश को अनन्त से किसी बिन्दु तक लाने में जितना कार्य करना पड़ता है उसे उस बिन्दु का विद्युत विभव (electric potential) कहते हैं। दूसरे शब्दों में, किसी बिन्दु पर स्थित ईकाई बिन्दुवत धनावेश में संग्रहित वैद्युत स्थितिज ऊर्जा, उस बिन्दु के विद्युत विभव के बराबर होती है। विद्युत विभव को Φ, ΦE या V के द्वारा दर्शाया जाता है। विद्युत विभव की अन्तर्राष्ट्रीय इकाई वोल्ट है। .

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विद्युतदर्शी

विद्युत्दर्शी (Electroscopoe) का प्रयोग विद्युत आवेश के संसूचन और मापन में होता है। विद्युत्दर्शी सबसे प्राचीन विद्युत उपकरण है। सन् १७८७ के पहले कई प्रकार के विद्युत्दर्शी बने जो मुख्यत: आवेशित पिथ गुट का (सरकंडे के गूदे की गोली) के प्रतिकर्षण का उपयोग करते थे। .

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विद्युत्मापी

विद्युत्मापी विद्युत आवेश या विभवान्तर मापने वाला विद्युत उपकरण है। यह कई तरह का होता है। आधुनिक विद्युत्मापी निर्वात नलिका पर या ठोस अवस्था एलेक्ट्रॉनिक युक्तियों पर आधारित होते हैं और १ फेम्टोअम्पीयर तक की धारा भी मापने में सक्षम हैं। विद्युत्दर्शी भी समान सिद्धान्तों पर कार्य करता है किन्तु अधिक सरल उपकरण है किन्तु यह केवल आवेश या विभवान्तर के सापेक्ष परिमाण का ज्ञान देता है।by .

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वैद्युत अवयव

वैद्युत अवयव (Electrical components) वैद्युत अवयवयों (electrical elements) की संकल्पना (कांसेप्ट) वैद्युत नेटवर्कों के विश्लेषण में प्रयुक्त होती है। इसको वास्तविक 'वैद्युत अवयव' अथवा वास्तविक एलेक्ट्रॉनिक अवयव के बजाय 'आदर्श वैद्युत अवयव' समझना चाहिये। किसी भी वैद्युत नेटवर्क को मॉडल करने के लिये उसे विद्युत के सरलतम् अवयव के नेटवर्क के रूप में अभिव्यक्त किया जा सकता है। ध्यान देने की बात है कि व्यावहारिक/भौतिक रूप से 'विद्युत अवयवों' का कोई अस्तित्व नहीं है। इनकी संकल्पना कुछ विद्युत के आदर्श, सरलीकृत अवयवों के रूप में की गयी है। एक या कुछ वैद्युत अवयवों की सहायता से किसी भी भौतिक (फिजिकल) एलेक्ट्रॉनिक अवयव को निरुपित किया जा सकता है। .

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गाउस का नियम

भौतिकी में गाउस का नियम (Gauss's law) वह नियम है जो विद्युत आवेश के वितरण एवं उनके कारण उत्पन्न विद्युत क्षेत्र में संबंध स्थापित करता है। इस नियम के अनुसार, इस नियम का प्रतिपादन सन् १८३५ में कार्ल फ्रेडरिक गाउस (Carl Friedrich Gauss) ने किया था किन्तु इसका प्रकाशन सन् १८६७ तक नहीं कर सके। यह नियम मैक्सवेल के चार समीकरणों में से एक है। गाउस का नियम, कूलाम्ब के नियम से निष्पादित (derive) किया जा सकता है। (इसका उलटा भी सत्य है - कुलाम्ब का नियम, गाउस के नियम से निकाला जा सकता है।) .

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ऑक्सो-ऐनायन

ऑक्सी-ऋणायन या ऑक्सी-ऐनायन (oxyanion) या ऑक्सो-ऐनायन (oxoanion) ऐसे आयन को कहते हैं जो ऑक्सीजन तत्व पर आधारित हो। यह आम तौर पर ऋणात्मक (निगेटिव) विद्युत आवेश (चार्ज) रखता है इसलिए यह एक ऋणायन (anion, ऐनायन) कहलाता है। इन आयनों का रासायनिक सूत्र AxOyz− के रूप का होता है, जहाँ O तो ऑक्सीजन है और A कोई अन्य तत्व है। ऑक्सी-ऋणायन की कई मिसालें हैं, जैसे कि सल्फेट (SO42&minus), नाइट्रेट (NO3&minus) और कार्बोनेट (CO32&minus)। .

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आयन

आयन (ion) ऐसे परमाणु या अणु है जिसमें इलेक्ट्रानों और प्रोटोनों की संख्या असामान होती है। इस से आयन में विद्युत आवेश (चार्ज) होता है। अगर इलेक्ट्रॉन की तादाद प्रोटोन से अधिक हो तो आयन में ऋणात्मक (नेगेटिव) आवेश होता है और उसे ऋणायन (anion, ऐनायन) भी कहते हैं। इसके विपरीत अगर इलेक्ट्रॉन की तादाद प्रोटोन से कम हो तो आयन में धनात्मक (पोज़िटिव) आवेश होता है और उसे धनायन (cation, कैटायन) भी कहते हैं। .

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आवेश संरक्षण

आवेश संरक्षण का सिद्धांत बेंजामिन फ्रैंकलिन ने खोजा था। इसके अनुसार विद्युत आवेश को न तो उत्पन्न किया जा सकता है और न ही उसे नष्ट किया जा सकता है। अतः विद्युत् आवेश ब्रह्माण्ड में सदैव ही संरक्षित रहता है। अभ्यास रूप में, आवेश संरक्षण एक भौतिक नियम है जिसके अनुसार एक निश्चित आयतन में विद्युत आवेश में कुल अंतर, उन आयतन में आगम आवेश और उस आयतन से निर्गत आवेश के अन्तर के एकदम बराबर होता है। गणित के अनुसार, इस सिद्धांत को निरंतरता समीकरण के रूप में लिख सकते हैं: Q(t) विद्युत आवेश की मात्रा है, जो एक निश्चित आयतन में t समय में होता है, QIN उस आयतन में आने वाली आवेश की मात्रा समय t1 एवं t2 के बीच और QOUT उस आयतन से बाहर जाने वाले आवेश की उसी समय में मात्रा है। .

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आवेश घनत्व

विद्युतचुम्बकत्व में,.

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आवेशित कण-पुंज

किसी अवकास (स्पेस) में गतिमान आवशों के समूह को आवेशित कण-पुंज (charged particle beam) कहते हैं। आवेशित कण-पुंज के सभी कणों की स्थिति, गतिज ऊर्जा एवं दिशा लगभग समान होती है। ध्यातव्य है कि इन कणों की गतिज ऊर्जा उनकी साधारण अवस्था की ऊर्जा की अपेक्षा बहुत अधिक होती है। अपनी उच्च ऊर्जा एवं अत्यधिक एकदिशता के कारण ये आवेशित कण-पुंज अनेक कार्यों के लिये बहुत उपयोगी सिद्ध होते हैं। (कण-पुंज के उपयोग (Particle Beam Usage), देखें) .

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आइनस्टाइन क्षेत्र समीकरण

वस्तुओं के द्रव्यमान और गति से उनके आसपास के दिक्-काल (स्पेसटाइम) में मरोड़ आती है और आइनस्टाइन​ क्षेत्र समीकरण इसका विवरण देते हैं आइनस्टाइन​ क्षेत्र समीकरण (Einstein field equations) भौतिकी में ऐल्बर्ट आइनस्टाइन​ के सामान्य सापेक्षता सिद्धांत में दस समीकरणों (इक्वेशनों) का एक समूह है जो पदार्थ और ऊर्जा द्वारा दिक्-काल (स्पेसटाइम) में पैदा की गई मरोड़ से होने वाले गुरुत्वाकर्षण के प्रभाव का वर्णन करता है। इसे आइनस्टाइन​ ने सन् १९१५ में आतानक विश्लेषण (टेन्सर अनैलिसिस) के रूप में छापा था। जिस तरह मैक्सवेल के समीकरण आवेश (चार्ज) और विद्युत धारा से उत्पन्न होने वाले विद्युतचुम्बकीय क्षेत्र की विवरण देते हैं उसी तरह आइनस्टाइन​ क्षेत्र समीकरण ऊर्जा, द्रव्यमान और चाल (गति) से दिक्-काल में उत्पन्न होने वाले बदलावों का बखान करते हैं।, Norman K. Glendenning, pp.

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इलैक्ट्रॉनिक्स

तल पर जुड़ने वाले (सरफेस माउंट) एलेक्ट्रानिक अवयव विज्ञान के अन्तर्गत इलेक्ट्रॉनिक्स या इलेक्ट्रॉनिकी विज्ञान और प्रौद्योगिकी का वह क्षेत्र है जो विभिन्न प्रकार के माध्यमों (निर्वात, गैस, धातु, अर्धचालक, नैनो-संरचना आदि) से होकर आवेश (मुख्यतः इलेक्ट्रॉन) के प्रवाह एवं उन पर आधारित युक्तिओं का अध्ययन करता है। प्रौद्योगिकी के रूप में इलेक्ट्रॉनिकी वह क्षेत्र है जो विभिन्न इलेक्ट्रॉनिक युक्तियों (प्रतिरोध, संधारित्र, इन्डक्टर, इलेक्ट्रॉन ट्यूब, डायोड, ट्रान्जिस्टर, एकीकृत परिपथ (IC) आदि) का प्रयोग करके उपयुक्त विद्युत परिपथ का निर्माण करने एवं उनके द्वारा विद्युत संकेतों को वांछित तरीके से बदलने (manipulation) से संबंधित है। इसमें तरह-तरह की युक्तियों का अध्ययन, उनमें सुधार तथा नयी युक्तियों का निर्माण आदि भी शामिल है। ऐतिहासिक रूप से इलेक्ट्रॉनिकी एवं वैद्युत प्रौद्योगिकी का क्षेत्र समान रहा है और दोनो को एक दूसरे से अलग नही माना जाता था। किन्तु अब नयी-नयी युक्तियों, परिपथों एवं उनके द्वारा सम्पादित कार्यों में अत्यधिक विस्तार हो जाने से एलेक्ट्रानिक्स को वैद्युत प्रौद्योगिकी से अलग शाखा के रूप में पढाया जाने लगा है। इस दृष्टि से अधिक विद्युत-शक्ति से सम्बन्धित क्षेत्रों (पावर सिस्टम, विद्युत मशीनरी, पावर इलेक्ट्रॉनिकी आदि) को विद्युत प्रौद्योगिकी के अन्तर्गत माना जाता है जबकि कम विद्युत शक्ति एवं विद्युत संकेतों के भांति-भातिं के परिवर्तनों (प्रवर्धन, फिल्टरिंग, मॉड्युलेश, एनालाग से डिजिटल कन्वर्शन आदि) से सम्बन्धित क्षेत्र को इलेक्ट्रॉनिकी कहा जाता है। .

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इलेक्ट्रॉन

इलेक्ट्रॉन या विद्युदणु (प्राचीन यूनानी भाषा: ἤλεκτρον, लैटिन, अंग्रेज़ी, फ्रेंच, स्पेनिश: Electron, जर्मन: Elektron) ऋणात्मक वैद्युत आवेश युक्त मूलभूत उपपरमाणविक कण है। यह परमाणु में नाभिक के चारो ओर चक्कर लगाता हैं। इसका द्रव्यमान सबसे छोटे परमाणु (हाइड्रोजन) से भी हजारगुना कम होता है। परम्परागत रूप से इसके आवेश को ऋणात्मक माना जाता है और इसका मान -१ परमाणु इकाई (e) निर्धारित किया गया है। इस पर 1.6E-19 कूलाम्ब परिमाण का ऋण आवेश होता है। इसका द्रव्यमान 9.11E−31 किग्रा होता है जो प्रोटॉन के द्रव्यमान का लगभग १८३७ वां भाग है। किसी उदासीन परमाणु में विद्युदणुओं की संख्या और प्रोटानों की संख्या समान होती है। इनकी आंतरिक संरचना ज्ञात नहीं है इसलिए इसे प्राय:मूलभूत कण माना जाता है। इनकी आंतरिक प्रचक्रण १/२ होती है, अतः यह फर्मीय होते हैं। इलेक्ट्रॉन का प्रतिकणपोजीट्रॉन कहलाता है। द्रव्यमान के अलावा पोजीट्रॉन के सारे गुण यथा आवेश इत्यादि इलेक्ट्रॉन के बिलकुल विपरीत होते हैं। जब इलेक्ट्रॉन और पोजीट्रॉन की टक्कर होती है तो दोंनो पूर्णतः नष्ट हो जाते हैं एवं दो फोटॉन उत्पन्न होती है। इलेक्ट्रॉन, लेप्टॉन परिवार के प्रथम पीढी का सदस्य है, जो कि गुरुत्वाकर्षण, विद्युत चुम्बकत्व एवं दुर्बल प्रभाव सभी में भूमिका निभाता है। इलेक्ट्रॉन कण एवं तरंग दोनो तरह के व्यवहार प्रदर्शित करता है। बीटा-क्षय के रूप में यह कण जैसा व्यवहार करता है, जबकि यंग का डबल स्लिट प्रयोग (Young's double slit experiment) में इसका किरण जैसा व्यवहार सिद्ध हुआ। चूंकि इसका सांख्यिकीय व्यवहार फर्मिऑन होता है और यह पॉली एक्सक्ल्युसन सिध्दांत का पालन करता है। आइरिस भौतिकविद जॉर्ज जॉनस्टोन स्टोनी (George Johnstone Stoney) ने १८९४ में एलेक्ट्रों नाम का सुझाव दिया था। विद्युदणु की कण के रूप में पहचान १८९७ में जे जे थॉमसन (J J Thomson) और उनकी विलायती भौतिकविद दल ने की थी। कइ भौतिकीय घटनाएं जैसे-विध्युत, चुम्बकत्व, उष्मा चालकता में विद्युदणु की अहम भूमिका होती है। जब विद्युदणु त्वरित होता है तो यह फोटान के रूप मेंऊर्जा का अवशोषण या उत्सर्जन करता है।प्रोटॉन व न्यूट्रॉन के साथ मिलकर यह्परमाणु का निर्माण करता है।परमाणु के कुल द्रव्यमान में विद्युदणु का हिस्सा कम से कम् 0.0६ प्रतिशत होता है। विद्युदणु और प्रोटॉन के बीच लगने वाले कुलाम्ब बल (coulomb force) के कारण विद्युदणु परमाणु से बंधा होता है। दो या दो से अधिक परमाणुओं के विद्युदणुओं के आपसी आदान-प्रदान या साझेदारी के कारण रासायनिक बंध बनते हैं। ब्रह्माण्ड में अधिकतर विद्युदणुओं का निर्माण बिग-बैंग के दौरान हुआ है, इनका निर्माण रेडियोधर्मी समस्थानिक (radioactive isotope) से बीटा-क्षय और अंतरिक्षीय किरणो (cosmic ray) के वायुमंडल में प्रवेश के दौरान उच्च ऊर्जा टक्कर के कारण भी होता है।.

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कण पुंज

आवेशित या अनावेशित कणों के प्रवाह को कण पुंज (particle beam) कहते हैं। बहुत से कण पुंज प्रकाश के वेग के लगभग बराबर वेग से गति करते हैं। .

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कण भौतिकी

कण भौतिकी, भौतिकी की एक शाखा है जिसमें मूलभूत उप परमाणविक कणो के पारस्परिक संबन्धो तथा उनके अस्तित्व का अध्ययन किया जाता है, जिनसे पदार्थ तथा विकिरण निर्मित हैं। हमारी अब तक कि समझ के अनुसार कण क्वांटम क्षेत्रों के उत्तेजन (excitations) हैं। दूसरे कणों के साथ इनकी अन्तःक्रिया की अपनी गतिकी है। कण भौतिकी के क्षेत्र में अधिकांश रुचि मूलभूत क्षेत्रों (fundamental fields) में है। मौलिक क्षेत्रों और उनकी गतिशीलताओ के सार को सिद्धान्त के रूप में प्रस्तुत किया गया है। इसिलिये कण भौतिकी में अधिकतर स्टैंडर्ड मॉडल (Standard Model) के मूल कणों तथा उनके सम्भावित विस्तार के बारे में अध्यन किया जाता है। .

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कणाभ

भौतिकी में कणाभ (Quasiparticle) उन्मज्जी संवृति है जो स्थूल रूप से एक जटिल प्रणाली है जैसे एक ठोस का व्यवहार जिसमें कि मुक्त आकाश में दुर्बल अन्योन्य क्रिया करने वाले भिन्न कण हों। उदाहरण के लिए इलेक्ट्रॉन किसी अर्धचालक में गति करता है तो अन्य इलेक्ट्रोनों और नाभिक से टक्करों के कारण इसकी गति जटिल रूप से पथित होती है लेकिन यह लगभग उसी तरह व्यवहार करता है जैसे भिन्न द्रव्यमान का कोई इलेक्ट्रॉन व्यवधान रहित मुक्त आकाश में गति करता है। भिन्न द्रव्यमान के इस "इलेक्ट्रॉन" को "इलेक्ट्रॉन कणाभ" कहते हैं। .

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कहरुवा

मालाओं में लगे कहरुवे कहरुवा या तृणमणि (जर्मन: Bernstein, फ्रेंच: ambre, स्पेनिश: ámbar, अंग्रेज़ी: amber, ऐम्बर) वृक्ष की ऐसी गोंद (सम्ख़ या रेज़िन) को कहते हैं जो समय के साथ सख़्त होकर पत्थर बन गई हो। दूसरे शब्दों में, यह जीवाश्म रेजिन है। यह देखने में एक कीमती पत्थर की तरह लगता है और प्राचीनकाल से इसका प्रयोग आभूषणों में किया जाता रहा है। इसका इस्तेमाल सुगन्धित धूपबत्तियों और दवाइयों में भी होता है। क्योंकि यह आरम्भ में एक पेड़ से निकला गोंदनुमा सम्ख़ होता है, इसलिए इसमें अक्सर छोटे से कीट या पत्ते-टहनियों के अंश भी रह जाते हैं। जब कहरुवे ज़मीन से निकाले जाते हैं जो वह हलके पत्थर के डले से लगते हैं। फिर इनको तराशकर इनकी मालिश की जाती है जिस से इनका रंग और चमक उभर आती है और इनके अन्दर झाँककर देखा जा सकता है। क्योंकि कहरुवे किसी भी सम्ख़ की तरह हाइड्रोकार्बन के बने होते हैं, इन्हें जलाया जा सकता है।, Faya Causey, Getty Publications, 2012, ISBN 978-1-60606-082-7,...

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क्वार्क

प्रोटॉन क्वार्क एक प्राथमिक कण है तथा यह पदार्थ का मूल घटक है। क्वार्क एकजुट होकर सम्मिश्र कण हेड्रॉन बनाते है, परमाणु नाभिक के मुख्य अवयव प्रोटॉन व न्यूट्रॉन इनमें से सर्वाधिक स्थिर हैं। नैसर्गिक घटना रंग बंधन के कारण, क्वार्क ना कभी सीधे प्रेक्षित हुआ या एकांत में पाया गया; वे केवल हेड्रॉनों के भीतर पाये जा सकते है, जैसे कि बेरिऑनों (उदाहरणार्थ: प्रोटान और न्यूट्रान) और मेसॉनों के रूप में। क्वार्क के अनेक आंतरिक गुण है, जिनमे विद्युत आवेश, द्रव्यमान, रंग आवेश और स्पिन सम्मिलित है। कण भौतिकी के मानक मॉडल में क्वार्क एकमात्र प्राथमिक कण है जो सभी चार मूलभूत अंतःक्रिया या मौलिक बलों (विद्युत चुंबकत्व, गुरुत्वाकर्षण, प्रबल अंतःक्रिया और दुर्बल अंतःक्रिया) को महसूस करता है, साथ ही यह मात्र ज्ञात कण है जिसका विद्युत आवेश प्राथमिक आवेश का पूर्णांक गुणनफल नहीं है। क्वार्क के छह प्रकार है, जो जाने जाते है फ्लेवर से: अप, डाउन, स्ट्रेन्ज, चार्म, टॉप और बॉटम। अप व डाउन क्वार्क के द्रव्यमान सभी क्वार्को में सबसे कम है। अपेक्षाकृत भारी क्वार्क कणिका क्षय की प्रक्रिया के माध्यम से तीव्रता से अप व डाउन क्वार्क में बदल जाते हैं। कणिका क्षय, एक उच्च द्रव्य अवस्था का एक निम्न द्रव्य अवस्था में परिवर्तन है। इस वजह से, अप व डाउन क्वार्क आम तौर पर स्थिर होते है और ब्रह्मांड में सबसे आम हैं, वहीं स्ट्रेन्ज, चार्म, बॉटम और टॉप क्वार्क केवल उच्च ऊर्जा टक्करों में उत्पन्न किए जा सकते है। हर क्वार्क फ्लेवर के प्रतिकण होते है जिनके परिमाण तो क्वार्क के बराबर होते है परंतु चिन्ह विपरीत रखते है तथा यह एंटीक्वार्क के रूप में जाने जाते है। क्वार्क मॉडल स्वतंत्र रूप से भौतिकविदों मरे गेल-मन और जॉर्ज वाइग द्वारा 1964 में प्रस्तावित किया गया था। क्वार्क हेड्रॉनों के अंग के रूप में पेश किए गए थे। 1968 में स्टैनफोर्ड रैखिक त्वरक केंद्र पर प्रयोग होने तक उनके भौतिक अस्तित्व के बहुत कम प्रमाण थे। त्वरक प्रयोगों ने सभी छह फ्लेवरों के लिए प्रमाण प्रदान किए। टॉप क्वार्क सबसे अंत में फर्मीलैब पर 1995 में खोजा गया। .

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कूलम्ब

कूलाम्ब आवेश मापने का SI मात्रक है। इसे जिसे C से दर्शाते हैं। कूलाम्ब टॉर्सन संतुलक (तराजू) .

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कूलॉम-नियम

कूलॉम्ब के नियम की मूल संकल्पना को समझाने वाला चित्र कूलॉम-नियम (Coulomb's law) विद्युत आवेशों के बीच लगने वाले स्थिरविद्युत बल के बारे में एक नियम है जिसे कूलम्ब नामक फ्रांसीसी वैज्ञानिक ने १७८० के दशक में प्रतिपादित किया था। यह नियम विद्युतचुम्बकत्व के सिद्धान्त के विकास के लिये आधार का काम किया। यह नियम अदिश रूप में या सदिश रूप में व्यक्त किया जा सकता है। अदिश रूप में यह नियम निम्नलिखित रूप में है- .

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अबाधित विद्युत आपूर्ति

अबाधित विद्युत आपूर्ति (अंग्रेज़ी:Uninterruptible power supply) या यूपीएस एक ऐसा उपकरण होता है जो विद्युत से चलने वाले किसी उपकरण को उस स्थिति में भी सीमित समय के लिये विद्युत की समुचित आपूर्ति सुनिश्चित करता है जब आपूर्ति के मुख्य स्रोत (मेन्स) से विद्युत आपूति उपलब्ध नहीं होती। यूपीएस कई प्रकार के बनाये जाते हैं और सीमित समय के लिये आपूर्ति उपलब्ध कराने के अलावा ये कुछ और भी काम कर सकते हैं - जैसे वोल्टता-नियंत्रण, आवृत्ति-नियंत्रण, शक्ति गुणांक वर्धन एवं उसकी गुणवत्ता को बेहतर करके उपकरण को देना, आदि। यूपीएस में उर्जा-संचय करने का कोई एक साधन होता है, जैसे बैटरी, तेज गति से चालित फ्लाईह्वील, आवेशित किया हुआ संधारित्र या एक अतिचालक कुण्डली में प्रवाहित अत्यधिक धारा। यूपीएस, सहायक ऊर्जा-स्रोत जैसे- स्टैण्ड-बाई जनरेटर आदि से इस मामले में भिन्न हैं कि विद्युत जाने पर वे सम्बन्धित उपकरण को मिलने वाली विद्युत में नगण्य समय के लिये व्यवधान करते हैं जिससे उस उपकरण के काम में बाधा या रूकावट नहीं आती।|हिन्दुस्तान लाइव। २७ जनवरी २०१०। पूनम जैन यूपीएस का उपयोग कम्प्यूटरों, आंकड़ा केन्द्र, संचार उपकरणों, आदि के साथ प्राय: किया जाता है जहाँ कि विद्युत जाने से कोई दुर्घटना हो सकती है; महत्त्वपूर्ण आंकड़े नष्ट होने का डर हो; व्यापार का नुकसान आदि हो सकता हो। .

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अशोक आत्रेय

अशोक आत्रेय बहुमुखी प्रतिभा के संस्कृतिकर्मी सातवें दशक के जाने माने वरिष्ठ हिन्दी-कथाकार और (सेवानिवृत्त) पत्रकार हैं | मूलतः कहानीकार होने के अलावा यह कवि, चित्रकार, कला-समीक्षक, रंगकर्मी-निर्देशक, नाटककार, फिल्म-निर्माता, उपन्यासकार और स्तम्भ-लेखक भी हें| .

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१ एक संख्या, संख्यांक और ग्लिफ़ है। इसको एक कहते है। अंग्रेज़ी भाषा में इसे वन (One) या 1 लिखते है। वह प्राकृतिक संख्याओं के अनंत अनुक्रम में पहला आता है, और उसके बाद २ आता है। .

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