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वाद्य यन्त्र

सूची वाद्य यन्त्र

एक वाद्य यंत्र का निर्माण या प्रयोग, संगीत की ध्वनि निकालने के प्रयोजन के लिए होता है। सिद्धांत रूप से, कोई भी वस्तु जो ध्वनि पैदा करती है, वाद्य यंत्र कही जा सकती है। वाद्ययंत्र का इतिहास, मानव संस्कृति की शुरुआत से प्रारंभ होता है। वाद्ययंत्र का शैक्षणिक अध्ययन, अंग्रेज़ी में ओर्गेनोलोजी कहलाता है। केवल वाद्य यंत्र के उपयोग से की गई संगीत रचना वाद्य संगीत कहलाती है। संगीत वाद्य के रूप में एक विवादित यंत्र की तिथि और उत्पत्ति 67,000 साल पुरानी मानी जाती है; कलाकृतियां जिन्हें सामान्यतः प्रारंभिक बांसुरी माना जाता है करीब 37,000 साल पुरानी हैं। हालांकि, अधिकांश इतिहासकारों का मानना है कि वाद्य यंत्र के आविष्कार का एक विशिष्ट समय निर्धारित कर पाना, परिभाषा के व्यक्तिपरक होने के कारण असंभव है। वाद्ययंत्र, दुनिया के कई आबादी वाले क्षेत्रों में स्वतंत्र रूप से विकसित हुए.

32 संबंधों: चन्द्रशेखर वेंकटरमन, ए॰ पी॰ जे॰ अब्दुल कलाम, झांझ, झिल्लीस्वरी, डमरु, डिजरीडू, ड्रम, तालवाद्य, तंतुस्वरी, द हू, ध्वनि, नट, नायलॉन, प्रयोगात्मक वाद्य यंत्र, बाँस गीत, बार्तोलोमियो क्रिस्टोफोरी, बिरहा, बैगपाइप, मुस्तफ़ा क़न्दराली, स्वरित्र, हारमोनियम, होर्नबोस्तेल-साक्स, वाद्य संगीत, वाद्यशास्त्र, वायुस्वरी, वायुवाद्य, विद्युतस्वरी, गन्धर्व वेद, गायन, गिटार, गजनी (2008 फ़िल्म), कम्पनस्वरी

चन्द्रशेखर वेंकटरमन

सीवी रमन (तमिल: சந்திரசேகர வெங்கடராமன்) (७ नवंबर, १८८८ - २१ नवंबर, १९७०) भारतीय भौतिक-शास्त्री थे। प्रकाश के प्रकीर्णन पर उत्कृष्ट कार्य के लिये वर्ष १९३० में उन्हें भौतिकी का प्रतिष्ठित नोबेल पुरस्कार दिया गया। उनका आविष्कार उनके ही नाम पर रामन प्रभाव के नाम से जाना जाता है। १९५४ ई. में उन्हें भारत सरकार द्वारा भारत रत्न की उपाधि से विभूषित किया गया तथा १९५७ में लेनिन शान्ति पुरस्कार प्रदान किया था। .

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ए॰ पी॰ जे॰ अब्दुल कलाम

अबुल पकिर जैनुलाअबदीन अब्दुल कलाम अथवा ए॰ पी॰ जे॰ अब्दुल कलाम (A P J Abdul Kalam), (15 अक्टूबर 1931 - 27 जुलाई 2015) जिन्हें मिसाइल मैन और जनता के राष्ट्रपति के नाम से जाना जाता है, भारतीय गणतंत्र के ग्यारहवें निर्वाचित राष्ट्रपति थे। वे भारत के पूर्व राष्ट्रपति, जानेमाने वैज्ञानिक और अभियंता (इंजीनियर) के रूप में विख्यात थे। इन्होंने मुख्य रूप से एक वैज्ञानिक और विज्ञान के व्यवस्थापक के रूप में चार दशकों तक रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) और भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) संभाला व भारत के नागरिक अंतरिक्ष कार्यक्रम और सैन्य मिसाइल के विकास के प्रयासों में भी शामिल रहे। इन्हें बैलेस्टिक मिसाइल और प्रक्षेपण यान प्रौद्योगिकी के विकास के कार्यों के लिए भारत में मिसाइल मैन के रूप में जाना जाने लगा। इन्होंने 1974 में भारत द्वारा पहले मूल परमाणु परीक्षण के बाद से दूसरी बार 1998 में भारत के पोखरान-द्वितीय परमाणु परीक्षण में एक निर्णायक, संगठनात्मक, तकनीकी और राजनैतिक भूमिका निभाई। कलाम सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी व विपक्षी भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस दोनों के समर्थन के साथ 2002 में भारत के राष्ट्रपति चुने गए। पांच वर्ष की अवधि की सेवा के बाद, वह शिक्षा, लेखन और सार्वजनिक सेवा के अपने नागरिक जीवन में लौट आए। इन्होंने भारत रत्न, भारत के सर्वोच्च नागरिक सम्मान सहित कई प्रतिष्ठित पुरस्कार प्राप्त किये। .

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झांझ

झांझ (Cymbal) एक वाद्य यन्त्र है। गोलाकार समतल या उत्तलाकार धातु की तश्तरी जैसा ताल वाद्य, जिसे ढोल बजाने की लकड़ी से या इसके जोड़े को एक-दूसरे से रगड़ते हुए टकराकर बजाया जाता है। तांबे, कलई (टीन) और कभी-कभी जस्ते के मिश्रण से बने दो चक्राकार चपटे टुकड़ों के मध्य भाग में छेद होता है। मध्य भाग के गड्ढे के छेद में डोरी लगी रहती है। डोरी में लगे कपड़ों के गुटकों को हाथ में पकड़कर परस्पर आघात करके वादन किया जाता है। यह गायन व नृत्य के साथ बजायी जाती है। यह प्रसिद्ध लोकवाद्य हॅ। कुछ क्षेत्रों में इसे करताल भी कहते हैं। हालांकि करताल तत, काँसा अथवा पीतलनिर्मित झाँझ का एक छोटा संस्करण है। .

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झिल्लीस्वरी

संगीत वाद्य यंत्रों के होर्नबोस्तेल-साक्स वर्गीकरण में, झिल्लीस्वरी या मेम्ब्रेनोफ़ोन (Membranophone) वे वाद्य हैं जिनमें झिल्लियाँ होती हैं जिनके कांपने से ध्वनी उत्पन्न होती है। इसका उदाहरण तबला है। .

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डमरु

डमरु या डुगडुगी एक छोटा संगीत वाद्य यन्त्र होता है। इसमें एक-दूसरे से जुड़े हुए दो छोटे शंकुनुमा हिस्से होते हैं जिनके चौड़े मुखों पर चमड़ा या ख़ाल कसकर तनी हुई होती है। डमरू के तंग बिचौले भाग में एक रस्सी बंधी होती है जिसके दूसरे अन्त पर एक पत्थर या कांसे का डला या भारी चमड़े का टुकड़ा बंधा होता है। हाथ एक-फिर-दूसरी तरफ़ हिलाने पर यह डला पहले एक मुख की ख़ाल पर प्रहार करता है और फिर उलटकर दूसरे मुख पर, जिस से 'डुग-डुग' की आवाज़ उत्पन्न होती है। तेज़ी से हाथ हिलाने पर इस 'डुग-डुग' की गति और ध्वनि-शक्ति काफ़ी बढ़ाई जा सकती है। .

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डिजरीडू

डिजरीडू (didgeridoo) ऑस्ट्रेलियाई आदिवासी समुदाय द्वारा विकसित एक वायुवाद्य (श्वास या वायु द्वारा ध्वनि उत्पन्न करने वाला संगीत वाद्य यंत्र) है। अनुमान लगाया जाता है कि इसका विकास उत्तरी ऑस्ट्रेलिया में पिछले १५०० वर्षों में कभी हुआ था। वाद्य यंत्रों के होर्नबोस्तेल-साक्स वर्गीकरण में यह एक वायुवाद्य है। आधुनिक डिजरीडू 1 से 3 मीटर (3 से 10 फ़ुट) लम्बे होते हैं और बेलन या शंकु का आकार रखते हैं। .

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ड्रम

ड्रम, संगीत वाद्ययंत्रों के एक ऐसे तालवाद्य (परकशन) समूह का एक सदस्य है जिन्हें तकनीकी दृष्टि से झिल्लीयुक्त वाद्ययंत्र के रूप में वर्गीकृत किया जाता है। ड्रम में कम से कम एक झिल्ली होती है जिसे ड्रम का सिर या ड्रम की त्वचा या खाल कहते हैं जो एक खोल पर फैला हुआ होता है और ध्वनि उत्पन्न करने के लिए इस पर या तो सीधे बजाने वाले के हाथों से या ड्रम बजाने की छड़ी से प्रहार किया जाता है। ड्रम के नीचे की तरफ आम तौर पर एक "प्रतिध्वनि सिर" होता है। ड्रम से ध्वनि उत्पन्न करने के लिए अन्य तकनीकों का भी इस्तेमाल किया जाता है जैसे थम्ब रोल (अंगूठे को घुमाना).

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तालवाद्य

तालवाद्य (percussion instrument) संगीत में ऐसा वाद्य यन्त्र जिस से ध्वनी उसपर हाथ या अन्य किसी उपकरण से प्रहार द्बारा या रगड़कर उत्पन्न हो। इसके उदाहरण तबला, डमरु, झांझ और मृदंग हैं। झांझ जैसे तालवाद्यों में दो एक-समान भाग होते हैं जिन्हें आपस में टकराकर संगीत बनाया जाता है। इतिहासकार मानते हैं कि मानव स्वर के बाद तालवाद्य ही सबसे पहले आविष्कृत संगीत वाद्य थे।The Oxford Companion to Music, 10th edition, p.775, ISBN 0-19-866212-2 .

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तंतुस्वरी

संगीत वाद्य यंत्रों के होर्नबोस्तेल-साक्स वर्गीकरण में, तंतुस्वरी या कोर्डोफ़ोन (Chordophone) ऐसे वाद्य होते हैं जिनमें एक या अनेक तंतु (तार) होते हैं जिनमें कम्पन से ध्वनी उत्पन्न होती है। इसका उदाहरण सितार है। .

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द हू

द हू एक अंग्रेजी रॉक बैंड है, जिसका गठन 1964 में गायक रोजर डाल्ट्रे, गिटारवादक पीट टाउनशेंड, बासवादक जॉन एंटविसल और ड्रम वादक कीथ मून ने मिलकर किया था। वे अपने ऊर्जावान लाइव प्रदर्शन के जरिये मशहूर हुए जिसमें अक्सर वाद्य यंत्रों की क्षति होती थी। द हू 100 मिलियन रिकॉर्ड बेच चुका है और ब्रिटेन में शीर्ष 27 चालीस एकल एलबम तथा संयुक्त राज्य अमेरिका में 17 टॉप टेन (शीर्ष दस) एलबम ला चुका है, जिनमें 18 स्वर्ण, 12 प्लेटिनम और 5 मल्टी प्लेटिनम एलबम पुरस्कार सिर्फ संयुक्त राज्य अमेरिका में शामिल हैं.

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ध्वनि

ड्रम की झिल्ली में कंपन पैदा होता होता जो जो हवा के सम्पर्क में आकर ध्वनि तरंगें पैदा करती है मानव एवं अन्य जन्तु ध्वनि को कैसे सुनते हैं? -- ('''नीला''': ध्वनि तरंग, '''लाल''': कान का पर्दा, '''पीला''': कान की वह मेकेनिज्म जो ध्वनि को संकेतों में बदल देती है। '''हरा''': श्रवण तंत्रिकाएँ, '''नीललोहित''' (पर्पल): ध्वनि संकेत का आवृति स्पेक्ट्रम, '''नारंगी''': तंत्रिका में गया संकेत) ध्वनि (Sound) एक प्रकार का कम्पन या विक्षोभ है जो किसी ठोस, द्रव या गैस से होकर संचारित होती है। किन्तु मुख्य रूप से उन कम्पनों को ही ध्वनि कहते हैं जो मानव के कान (Ear) से सुनायी पडती हैं। .

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नट

नट (अंग्रेजी: Nat caste) उत्तर भारत में हिन्दू धर्म को मानने वाली एक जाति है जिसके पुरुष लोग प्राय: बाज़ीगरी या कलाबाज़ी और गाने-बजाने का कार्य करते हैं तथा उनकी स्त्रियाँ नाचने व गाने का कार्य करती हैं। इस जाति को भारत सरकार ने संविधान में अनुसूचित जाति के अन्तर्गत शामिल कर लिया है ताकि समाज के अन्दर उन्हें शिक्षा आदि के विशेष अधिकार देकर आगे बढाया जा सके। नट शब्द का एक अर्थ नृत्य या नाटक (अभिनय) करना भी है। सम्भवत: इस जाति के लोगों की इसी विशेषता के कारण उन्हें समाज में यह नाम दिया गया होगा। कहीं कहीं इन्हें बाज़ीगर या कलाबाज़ भी कहते हैं। शरीर के अंग-प्रत्यंग को लचीला बनाकर भिन्न मुद्राओं में प्रदर्शित करते हुए जनता का मनोरंजन करना ही इनका मुख्य पेशा है। इनकी स्त्रियाँ खूबसूरत होने के साथ साथ हाव-भाव प्रदर्शन करके नृत्य व गायन में काफी प्रवीण होती हैं। नटों में प्रमुख रूप से दो उपजातियाँ हैं-बजनिया नट और ब्रजवासी नट। बजनिया नट प्राय: बाज़ीगरी या कलाबाज़ी और गाने-बजाने का कार्य करते हैं जबकि ब्रजवासी नटों में स्त्रियाँ नर्तकी के रूप में नाचने-गाने का कार्य करती हैं और उनके पुरुष या पति उनके साथ साजिन्दे (वाद्य यन्त्र बजाने) का कार्य करते हैं। .

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नायलॉन

नायलॉन (nylon) कुछ ऐलिफ़ैटिक यौगिकों पर आधारित कृत्रिम पॉलीमरों का सामूहिक नाम है। यह एक रेश्मी थर्मोप्लास्टिक सामग्री होती है जिसे रेशों, परतों और अन्य आकारों में ढाला जा सकता है। नायलॉन आर्थिक रूप से महत्वपूर्ण है और इसका प्रयोग दाँत के बुरुशों, वस्त्रों, मोज़ों, इत्यादि में होता है। अन्य थर्मोप्लास्टिकों की तरह यह अधिक तापमान पर पिघल जाता है इसलिए इसके वस्त्र आग से सम्पर्क में आने पर बहुत संकटमय होते हैं क्योंकि वह पिघलकर त्वचा से चिपक जाते है और फिर आग पकड़ लेते हैं, जिस कारणवश अब इसका प्रयोग अन्य वस्तुओं में अधिक देखा जाने लगा है, जैसे कि इलेक्ट्रॉनिक्स (जिसमें इसके परावैद्युत गुण काम आते हैं), संगीत वाद्यों के तंतुओं, इत्यादि में। .

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प्रयोगात्मक वाद्य यंत्र

प्रयोगात्मक वाद्य यंत्र (experimental musical instrument या custom-made instrument) उन वाद्य यन्त्रों को कहते हैं जो किसी प्रचलित वाद्य यन्त्र में परिवर्तन/परिवर्धन करके बनाए जाते हैं, या कोई बिलकुल ही नया वाद्ययन्त्र बनाया या पारिभाषित किया गया हो। श्रेणी:वाद्य यंत्र.

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बाँस गीत

बाँस गीत, छत्तीसगढ़ की यादव जातियों द्वारा बाँस के बने हुए वाद्य यन्त्र के साथ गाये जाने वाला लोकगीत है। बाँस गीत के गायक मुख्यत: रावत या अहीर जाति के लोग हैं। छत्तीसगढ़ में राउतों की संख्या बहुत है। राउत जाति यदूवंशी माना जाता है। अर्थात इनका पूर्वज कृष्ण को माना जाता है। ऐसा लगता है कि गाय को जब जगंलों में ले जाते थे चखने के लिए, उसी वक्त वे बाँस को धीरे धीरे वाद्य के रूप में इस्तमाल करने लगे थे। शुरुआत शायद इस प्रकार हुई थी - गाय घास खाने में मस्त रहती थी और राउत युवक या शायद लड़का बाँस के टुकड़े को उठा कर कोशिश करता कि उसमें से कोई धुन निकले, और फिर अचानक एक दिन वह सृजनशील लड़का बजाने लग गया उस बाँस को बड़ी मस्ती से। छत्तीसगढ़ी लोक गीतों में बाँस गीत बहुत महत्वपुर्ण एक शैली है। यह बाँस का टुकड़ा करीब चार फुट लम्बा होता है। यह बाँस अपनी विशेष धुन से लोगों को मोहित कर देता है। बाँस गीत में एक गायक होता है। उनके साथ दो बाँस बजाने वाले होते हैं। गायक के साथ और दो व्यक्ति होते हैं जिसे कहते हैं "रागी" और "डेही"। सबसे पहले वादक बाँस को बजाता है, और जँहा पर वह रुकता है अपनी साँस छोड़ता है, वही से दूसरा वादक उस स्वर को आगे बड़ाता है। और इसके बाद ही गायक का स्वर हम सुनते हैं। गायक लोक कथाओं को गीत के माध्यम से प्रस्तुत करता है। सिर्फ गायक को ही उस लोक कथा की शब्दावली आती है। "रागी" वह व्यक्ति है जिसे शब्दावली नहीं मालूम है शायद पूरी तरह पर जो गायक के स्वर में साथ देता है। "डेही" है वह व्यक्ति जो गायक को तथा रागी को प्रोत्साहित करता है। जैसे "धन्य हो" "अच्छा" "वाह वाह"। उस गीत के राग को जानने वाला है "रागी"। छत्तीसगढ़ में मालिन जाति का बाँस को सबसे अच्छा माना जाता है। इस बाँस में स्वर भंग नहीं होता है। बीच से बाँस को पोला कर के उस में चार सुराख बनाया जाता है, जैसे बाँसुरी वादक की उंगलिया सुराखों पर नाचती है, उसी तरह बाँस वादक को उंगलिया भी सुराखों पर नाचती है और वह विशेष धुन निकलने लगती है। रावत लोग बहुत मेहनती होते हैं। सुबह 4 बजे से पहले उठकर जानवरों को लेकर निकल जाते हैं चराने के लिए। संध्या के पहले कभी भी घर वापस नहीं लौटते। और घर लौटकर भी बकरी, भे, गाय को देखभाल करते हैं, करनी पड़ती है। पति को निरन्तर व्यस्त देखकर रवताईन कभी कभी नाराज़ हो जाती है और अपने पति से जानवरों को बेच देने को कहती है। इस सन्दर्भ में एक बाँस गीत इस प्रकार गाए जाते हैं - रावत और रवताईन के वार्तालाप - रवताईन: छेरी ला बेचव, भेंड़ी ला बेचँव, बेचव करिया धन गायक गोठन ल बेचव धनि मोर, सोवव गोड़ लमाय रावत: छेरी ला बेचव, न भेड़ी ला बेचव, नइ बेचव करिया धन जादा कहिबे तो तोला बेचँव, इ कोरी खन खन रवताईन: कोन करही तौर राम रसोइया, कोन करही जेवनास कोन करही तौर पलंग बिछौना, कोन जोही तौर बाट रावत: दाई करही राम रसोइया, बहिनी हा जेवनास सुलरवी चेरिया, पंलग बिछाही, बँसी जोही बाट रवताईन: दाई बेचारी तौर मर हर जाही, बहिनी पठोह ससुरार सुलखी चेरिया ल हाट मा बेचँव, बसी ढीलवँ मंझधार रावत: दाई राखें व अमर खवा के बहिनी राखेंव छे मास सुलखी बेरिया ल छाँव के राखेंव, बँसी जीव के साथ सभी प्रकार के लोक गीत जैसे सुवा, डंडा, करमा, ददरिया - बाँस गीत में गाते हैं। परन्तु मौलिकता के आधार पर देखा जाये तो बाँस गीत को मौलिकता है लोक कथाओं में। बहुत सारे लोक कथाएँ हैं जिन में से है शीत बसन्त, भैंस सोन सागर, चन्दा ग्वालिन की कहानी, अहिरा रुपईचंद, चन्दा लोरिक की कहानी। रावत जाति के लोग ही बाँस गीत गाया करते हैं इसीलिये गीत के पात्र, गीत का नायक नायिका रावत, अहीर ही होते हैं। गाय भैंस पर आधारित कथाओं की संख्या अधिक है। बाँस गीतों में कहानी होने के कारण एक ही कहानी पूरी रात तक चलती है। कभी कभी तो कई रातों तक चलती है। बाँस गीत के गायक शुरु करता है प्रार्थना से, प्रार्थना करते हैं जिन देव देवीयों से वे है सरस्वती, भैरव, महामाया, बूढ़ा, महादेव, गणेश, चौसंठ योगिनी बेताल गुरु इत्यादि। रावत लोग एक भैंस की कहानी को गाते हैं जिसका नाम है "भैंस सोन सागर"। कहानी इस प्रकार है: राजा महर सिंह के पास लाख के करीब मवेशियों की झुंड थी। उनमें से एक थी सोन सागर नाम की भैंस, सोन सागर हर साल जन्मष्टमी के दिन सोने का बच्चा पैदा करती थी। परन्तु वह सोने का बच्चा किसी को भी दिखाई नहीं देता था। राजा महर सिंह ने एक बार घोषण की कि अगर कोई व्यक्ति उन्हें सोने का बच्चा को दिखा दे, तो उसको अपना आधा राज्य, आधी मवेशिया दे देगा और अपनी बहन खोइलन के साथ शादी भी करा देगा। किन्तु जो व्यक्ति को असफलता मिलेगी, उसे कारागार में डाल दिया जायेगा। न जाने कितने रावत अहीरों आये पर किसी को भी सफलता नहीं मिली। सभी का कारागार में बन्द कर दिया गया। अन्त में आये तीन भाई-तीन भाईयों जो थे बहुत कम वर्ष के: बड़ा कठैता - 12 वर्ष का था, सेल्हन 9 साल का और सबसे छोटा कौबिया जो सिर्फ 6 साल का था। राजा को बड़ा दु:ख हुआ, उन्होने तीनों भाईयों को समझाने की कोशिश की "तुम तीनों भाईयों क्यों कारागार में जाना चाहते हो?" पर तीनों ने कहा कि वे कौशिश करेंगे कि उन्हें कारागार में न जाना पड़े। इसके बाद तीनों भाईयों सोन सागर भैंस को दूसरे जानवरों के साथ चराने लगे। देखते ही देखते जन्माष्टमी की रात आ गई। तीनों भाईयों ने क्या किया पता है, सोन सागर भैंस के गले में घंटी बाँध दी। रात बढ़ती गई। भैंस एक डबरे के अन्दर चली गई। बड़ा भाई कठैता भैंस पर न रखा और सेल्हन और कौबिया वहीं पर सो गए। पर जैसे रात बढ़ती गई, कठैता को भी बड़ी ज़ोर की नींद लगी और वह भी सो गया। सोन सागर भैंस उसी वक्त डबरे से निकलकर शिव मन्दिर में चली गई। हर साल जन्माष्टमी की रात में राजकुमारी खौइलन उसी मन्दिर में पूजा करने आती थी। और जैसे ही सोन सागर सोने का बच्चे को जनम देती, राजकुमारी खौइलन उसे कलश की तरह चढ़ाती थी। उसे भगवान शंकर ने आशीर्वाद दिया था कि जन्माष्टमी में उसे अपना पति मिलेगा। राजकुमारी नहाने जा रही थी। सोन सागर भैंस जैसे ही सोने का बच्चे को जन्म दिया, राजकुमारी खौइलन तुरन्त उसे अपनी साड़ी में छिपा ली और फिर नहाने चली गई। सोने सागर भैंस उसी डबेर में वापस चली गई। कठैती की सबसे पहले नींद खुल गई - वह तुरन्त डबरे भीतर गया और फिर हैरान खड़ा रह गया। सेलहन और कोबिया भी नींद खुलते ही अन्दर गया और कठैता को हैरान देख ही समझ गया। अब क्या होगो? तीनों भाईयों बड़े दु:खी होकर खड़े रह गये - इसके बाद कठैता नेें बुद्धिमत्ता का परिचय दिया - उसने ध्यान से जंमीन की और देखने लगा - ये तो सोन सागर के पाव का निशान - तो इसका मतलब है कि वह कहीं बाहर गई थी। सेल्हन और कोबिया उस डबरे के भीतर ही ढूंड रहे थे अगर सोने का बच्चा उन्हें वही कही मिल जाये। इधर कठैता सोन सागर के पांव के निशान के साथ चलता गया, चलता गया - जब वह शिव मन्दिर तक पहुँच गया तो देखा कि राजकुमारी खौइलन नहाके आ रही थी। कठैता को लगा कि राजकुमारी कुछ छिपा कर ले जा रही थी। उसने पुछ राजकुमारी से, तो राजकुमारी बहुत नाराज़ हो गई। दोनों जैसे झगड़ ही रहे थे कि अचानक सोने का बच्चा गिर गया। राजकुमारी को अचानक याद आई कि भगवान शंकर ने तो मुझे वरदान दी थी कि मुझे मेरा पति यँही मिलेगा। उसने कठैता को पूरी बात बता दी। कठैता बड़ा खुश होकर सोने के बच्चे को लेकर राजा के पास पहुँचा। राजा पहले तो आश्चर्य चकित रह गये - उसके बाद अपना वचन पूरा किया। इसी तरह कठैता और खोइलन की शादी हो गई। श्रेणी:लोकगीत श्रेणी:छत्तीसगढ़ के लोकगीत.

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बार्तोलोमियो क्रिस्टोफोरी

बार्तोलोमियो क्रिस्टोफोरी डि फ्राँसेस्को (४ मई १६५५– २७ जनवरी १७३१) इटली के रहने वाले व संगीत वाद्ययंत्रों के निर्माता थे। इन्हें पियानो वाद्य यंत्र के आविश्कारक के रूप में जाना जाता है। इनका जन्म वेनिस गणराज्य के वादुआ नामक शहर में हुआ था। .

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बिरहा

बिरहा लोकगायन की एक विधा है जो पूर्वी उत्तर प्रदेश तथा पश्चिमी बिहार के भोजपुरीभाषी क्षेत्र में प्रचलित है। बिरहा प्रायः अहीर लोग गाते हैं । इसका अतिम शब्द प्रायः बहुत खींचकर कहा जाता है । जैसे,—बेद, हकीम बुलाओ कोई गोइयाँ कोई लेओ री खबरिया मोर । खिरकी से खिरकी ज्यों फिरकी फिरति दुओ पिरकी उठल बड़ जोर ॥ बिरहा, 'विरह' से उत्‍पन्‍न हुई है जिसमें लोग सामाजिक वेदना को आसानी से कह लेते हैं और श्रोता मनोरजंन के साथ-साथ छन्‍द, काव्‍य, गीत व अन्‍य रसों का आनन्‍द भी ले पाते हैं। बिरहा अहीरों, जाटों, गुजरों, खेतिहर मजदूरों, शहर में दूध बेचने वाले दुधियों, लकड़हारों, चरवाहों, इक्का, ठेला वालों का लोकप्रिय हृदय गीत है। पूर्वांचल की यह लोकगायकी मनोरंजन के अलावा थकावट मिटाने के साथ ही एकरसता की ऊब मिटाने का उत्तम साधन है। बिरहा गाने वालों में पुरुषों के साथ ही महिलाओं की दिनों-दिन बढ़ती संख्या इसकी लोकप्रियता और प्रसार का स्पष्ट प्रमाण है। आजकल पारम्परिक गीतों के तर्ज और धुनों को आधार बनाकर बिरहा काव्य तैयार किया जाता है। ‘पूर्वी’, ‘कहरवा’, ‘खेमटा’, ‘सोहर’, ‘पचरा’, ‘जटावर’, ‘जटसार’, ‘तिलक गीत’, ‘बिरहा गीत’, ‘विदाई गीत’, ‘निर्गुण’, ‘छपरहिया’, ‘टेरी’, ‘उठान’, ‘टेक’, ‘गजल’, ‘शेर’, ‘विदेशिया’, ‘पहपट’, ‘आल्हा’, और खड़ी खड़ी और फिल्मी धुनों पर अन्य स्थानीय लोक गीतों का बिरहा में समावेश होता है। बिरहा के शुरूआती दौर के कवि ‘जतिरा’, ‘अधर’, ‘हफ्तेजूबान’, ‘शीसा पलट’, ‘कैदबन्द’, ‘सारंगी’, ‘शब्दसोरबा’, ‘डमरू’, ‘छन्द’, ‘कैद बन्द’, ‘चित्रकॉफ’ और ‘अनुप्राश अलंकार’ का प्रयोग करते थे। यह विधा भारत के बाहर मॉरीसस, मेडागास्कर और आस-पास के भोजपुरी क्षेत्रों की बोली वाले क्षेत्र में अपनी पैठ बढ़ाकर दिनों-दिन और लोकप्रिय हो रही है। .

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बैगपाइप

''द बैगपाइपर'', १७वीं शताब्दी, नीदरलैण्ड का एक चित्र। बैगपाइप एक पश्चिमी वाद्य यन्त्र है। यह मूल रूप से स्कॉटलैण्ड का वाद्य यन्त्र है। बैगपाइप भारत के उत्तरांचल प्रान्त में काफी प्रचलित है। यह वहाँ के विभिन्न पारम्परिक समारोहों तथा आयोजनों में बजाया जाता है। स्थानीय बोली में इसका प्रचलित नाम "पाइप" अथवा "बीन-बाजा" है, यह अन्य स्थानीय वाद्य यन्त्रों "ढोल-दमों" के साथ बजाया जाता है। उत्तरांचल में इसके प्रचलन के पीछे अनुमान लगाया जाता है कि ब्रिटिश सेना में शामिल गढ़वाली, कुमाऊंनी सैनिकों ने इसे प्रचलित किया। श्रेणी:संगीत श्रेणी:वाद्य यन्त्र lmo:Baghèt.

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मुस्तफ़ा क़न्दराली

मुस्तफ़ा क़न्दराली (जन्म 1930, कन्दरा, कोजाएली, तुर्की) तुर्क क्लारिनेट (संगीत यंत्र) के लिए प्रसिद्ध थे। वे तुर्क और जिप्सी संगीत में रुचि रखते थे। .

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स्वरित्र

अनुनादी बक्से के उपर स्थापित '''स्वरित्र''' स्वरित्र (tuning fork) एक सरल युक्ति है जो मानक आवृत्ति की ध्वनि पैदा करने के काम आती है। संगीत के क्षेत्र में इसका उपयोग एक मानक पिच (pitch) उत्पादक के रूप में अन्य वाद्य यंत्रों को ट्यून करने में होती है। यह देखने में अंग्रेजी के यू आकार वाले फोर्क की तरह होता है। यह प्रायः इस्पात या किसी अन्य प्रत्यास्थ धातु का बना होता है। इसे किसी वस्तु के उपर ठोकने पर एक निश्चित आवृत्ति की ध्वनि उत्पन्न होती है। इसके द्वारा उत्पन्न ध्वनि की आवृत्ति इसके फोर्कों की लम्बाई तथा फोर्कों के प्रत्यास्थता पर निर्भर करती है। .

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हारमोनियम

भारत-पाकिस्तान-अफ़्ग़ानिस्तान में लोकप्रीय हस्त-चालित शैली का एक हारमोनियम हारमोनियम (Harmonium) एक संगीत वाद्य यंत्र है जिसमें वायु प्रवाह किया जाता है और भिन्न चपटी स्वर पटलों को दबाने से अलग-अलग सुर की ध्वनियाँ निकलती हैं। इसमें हवा का बहाव पैरों, घुटनों या हाथों के ज़रिये किया जाता है, हालाँकि भारतीय उपमहाद्वीप में इस्तेमाल होने वाले हरमोनियमों में हाथों का प्रयोग ही ज़्यादा होता है। हारमोनियम का आविष्कार यूरोप में किया गया था और १९वीं सदी के बीच में इसे कुछ फ़्रांसिसी लोग भारत-पाकिस्तान क्षेत्र में लाए जहाँ यह सीखने की आसानी और भारतीय संगीत के लिए अनुकूल होने की वजह से जड़ पकड़ गया। हारमोनियम मुख्यतः तीन प्रकार के होते हैं। ये विभाजन संभवता उनके निर्माण स्थान अथवा निर्माण में पर्युक्त सामिग्री की गुणवत्ता के आधार पर होता है। इसके प्रकार है - १.ब्रिटिश २.जर्मन ३.खरज। अपने निर्माण की शैली या स्थान के अनुसार इनके स्वरों की मिठास में अंतर होता है जिसे योग्य संगीतज्ञ ही पहचान सकता है। हारमोनियम भारतीय शास्त्रीय संगीत का अभिन्न हिस्सा है। हारमोनियम को सरल शब्दों में "पेटी बाजा" भी कहा जाता है। .

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होर्नबोस्तेल-साक्स

होर्नबोस्तेल-साक्स (Hornbostel–Sachs) संगीत वाद्य यंत्रों को वर्गीकृत करने की एक प्रणाली है। इसका संगठन एरिख़ मोरित्ज़ फ़ोन होर्नबोस्तेल और कर्ट साक्स ने किया था और इसका प्रथम प्रकाशन सन् १९१४ में "ज़ाइट्श्रिफ़्ट फ़्युएर एत्नोलोजी" (Zeitschrift für Ethnologie) में हुआ था। .

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वाद्य संगीत

वाद्य संगीत ऐसी संगीत रचना होती है जिसमें बोल और गायन नहीं होते हैं। ऐसे संगीत की रचना पूर्ण रूप से वाद्य यन्त्र पर की जाती है। ऐसी रचना संगीत रचयिता स्वयं अपने किसी प्रदर्शन के लिये कर सकता है। वाद्य संगीत की परम्परा पश्चिमी संस्कृति और भारत में बहुत प्राचीन है। भारत में बहुत पहले समय से वीणा के उपयोग से वाद्य संगीत की रचना की जाती थी। .

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वाद्यशास्त्र

वाद्यशास्त्र (Organology) संगीत वाद्य यंत्रों व उनके वर्गीकरण के अध्ययन को कहते हैं। इसमें वाद्यों के इतिहास, विकास, अलग-अलग संस्कृतियों में प्रयोग, ध्वनी-उत्पत्ति के तकनीकी पहलू सभी शामिल हैं। .

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वायुस्वरी

संगीत वाद्य यंत्रों के होर्नबोस्तेल-साक्स वर्गीकरण में, वायुस्वरी या एरोफ़ोन (Aerophone) ऐसे वाद्य हैं जिनमें ध्वनी किसी वायु-समूह में कम्पन पैदा करने से होती है। इसका उदाहरण बाँसुरी है। .

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वायुवाद्य

वायुवाद्य या सुषिर वाद्य (wind instrument) संगीत में ऐसा वाद्य यंत्र होता है जो एक या एक से अधिक अनुनादक (रेज़ोनेटर) में उपस्थित वायु में कम्पन पैदा करने से धवनि उत्पन्न करे। इसमें आमतौर में एक मुहनाल बनी होती है जिस से बजाने वाला मुँह लगाकर श्वास द्वारा वाद्य को बजाता है। शहनाई, बाँसुरी, इत्यादि वायुवाद्यों की श्रेणी में आते हैं। .

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विद्युतस्वरी

संगीत वाद्य यंत्रों के होर्नबोस्तेल-साक्स वर्गीकरण में, विद्युतस्वरी या इलेक्ट्रोफ़ोन (Electrophone) ऐसे वाद्य होते हैं जिनमें ध्वनी विद्युत के प्रयोग से होती है। इसका उदाहरण थेरेमिन है। .

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गन्धर्व वेद

गंधर्व वेद चार उपवेदों में से एक उपवेद है। अन्य तीन उपवेद हैं - आयुर्वेद, शिल्पवेद और धनुर्वेद। गन्धर्ववेद के अन्तर्गत भारतीय संगीत, शास्त्रीय संगीत, राग, सुर, गायन तथा वाद्य यन्त्र आते हैं। .

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गायन

हैरी बेलाफोन्ट 1954 गायन एक ऐसी क्रिया है जिससे स्वर की सहायता से संगीतमय ध्वनि उत्पन्न की जाती है और जो सामान्य बोलचाल की गुणवत्ता को राग और ताल दोनों के प्रयोग से बढाती है। जो व्यक्ति गाता है उसे गायक या गवैया कहा जाता है। गायक गीत गाते हैं जो एकल हो सकते हैं यानी बिना किसी और साज या संगीत के साथ या फिर संगीतज्ञों व एक साज से लेकर पूरे आर्केस्ट्रा या बड़े बैंड के साथ गाए जा सकते हैं। गायन अकसर अन्य संगीतकारों के समूह में किया जाता है, जैसे भिन्न प्रकार के स्वरों वाले कई गायकों के साथ या विभिन्न प्रकार के साज बजाने वाले कलाकारों के साथ, जैसे किसी रॉक समूह या बैरोक संगठन के साथ। हर वह व्यक्ति जो बोल सकता है वह गा भी सकता है, क्योंकि गायन बोली का ही एक परिष्कृत रूप है। गायन अनौपचारिक हो सकता है और संतोष या खुशी के लिये किया जा सकता है, जैसे नहाते समय या कैराओके में; या यह बहुत औपचारिक भी हो सकता है जैसे किसी धार्मिक अनुष्ठान के समय या मंच पर या रिकार्डिंग के स्टुडियो में पेशेवर गायन के समय। ऊंचे दर्जे के पेशेवर या नौसीखिये गायन के लिये सामान्यतः निर्देशन और नियमित अभ्यास आवश्यकता होती है। पेशेवर गायक सामान्यतः किसी एक प्रकार के संगीत में अपने पेशे का निर्माण करते हैं जैसे शास्त्रीय या रॉक और आदर्श रूप से वे अपने सारे करियर के दौरान किसी स्वर-अध्यापक या स्वर-प्रशिक्षक की सहायता से स्वर-प्रशिक्षण लेते हैं। .

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गिटार

एक क्लासीकल गिटार गिटार (अंग्रेज़ी: Guitar) एक लोकप्रिय वाद्य यन्त्र जिसमें तार (जो कि आमतौर पर छह होते हैं) के बजाने से ध्वनि उत्पन्न होती है। इलेक्ट्रिक गिटार में विद्युत प्रवर्धन (इलेक्ट्रिकल एम्पलीफिकेशन) की मदद से ध्वनि उत्पन्न होती है। .

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गजनी (2008 फ़िल्म)

ग़जनी (घजनी) गीता आर्ट्स के बैनर तले बनी ए.आर. मुरुगाडोस द्वारा निर्देशित एवं निर्मित 2008 की एक बॉलीवुड फिल्म है। तमिल फिल्म जो मुरुगाडोस द्वारा ही निर्देशित थी, इसी नाम से बनी ग़जनी की पटकथा क्रिस्टोफ़र नोलन द्वारा लिखित तथा निर्देशित हॉलीवुड की फिल्म "मेमेंटो" पर आधारित है। इसकी मुख्य भूमिका में आमिर खान और असिन है जबकि जिया खान, प्रदीप रावत और रियाज़ खान सहायक भूमिकाओं में हैं। आमिर खान ने इस भूमिका के लिए अपने निजी प्रशिक्षक के साथ लगातार एक साल अपनी निजी व्यायामशाला में प्रशिक्षण के लिए बिताया। यह फिल्म मारधाड़ वाली अपने रोमांटिक तत्वों के साथ एक्शन-थ्रिलर फिल्म है जो कि उच्च प्रकृति के पूर्व स्मृति लोप (एंटीरोग्रेड एम्नेसिया) रोग से ग्रस्त एक अमीर व्यापारी की जिंदगी की छानबीन करती है, जिसे यह रोग अपनी प्रेयसी मॉडल कल्पना की एक हिंसक मुठभेड़ में हत्या के कारण हो जाता है। वह पोलोरोयड इंस्टैंट कैमरा के फोटोग्राफ्स एवं चिरस्थायी टैटूज के जरिये हत्या का बदला लेने की कोशिश करता है। आमिर खान का चरित्र ग़जनी द गेम शीर्षक वाले 3-डी वीडियो गेम में, जो इसी फिल्म पर आधारित है, विशेष स्थान पाएगा. .

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कम्पनस्वरी

संगीत वाद्य यंत्रों के होर्नबोस्तेल-साक्स वर्गीकरण में, कम्पनस्वरी या इडियोफ़ोन (Idiophone) वे वाद्य हैं जिनका पूरा शरीर बिना झिल्ली या तंतु (तार) के प्रयोग के कांपता है और उस कम्पन से ध्वनी उत्पन्न करता है। इसका उदाहरण झांझ है। .

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