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मकरान

सूची मकरान

अंतरिक्ष से लिए गए इस चित्र में मकरान अरब सागर से लगी ज़मीन की अर्ध-रेगिस्तानी पट्टी है - यह दक्षिणी पाकिस्तान और ईरान में पड़ती है ग्वादर में मकरान का तटीय क्षेत्र मकरान तटीय राजमार्ग पर चलता ट्रक मकरान (फ़ारसी:, अंग्रेज़ी: Makran) पाकिस्तान के सिंध और बलोचिस्तान प्रान्तों के दक्षिणतम भाग में और ईरान के सिस्तान व बलोचिस्तान प्रान्त के दक्षिणतम भाग में अरब सागर से लगा एक शुष्क, अर्ध-रेगिस्तानी क्षेत्र है। इस इलाक़े से भारतीय उपमहाद्वीप और ईरान के बीच का एक महत्वपूर्ण मार्ग गुज़रता है जिस से कई तीर्थयात्री, खोजयात्री, व्यापारी और आक्रामक इन दोनों भूभागों के बीच आते-जाते थे। Mecran region in the Map of Persia by Bowen 1747 .

21 संबंधों: चन्द्रगुप, एक इकाई व्यवस्था, झालावान, तुर्बत, देबल, पाकिस्तान अधिराज्य, फ़ारस की खाड़ी नाम से सम्बंधित दस्तावेज़ें: एक प्राचीन व अनन्त विरासत, फ़ारस की खाड़ी का राष्ट्रीय दिवस, मध्य मकरान पर्वतमाला, मुहम्मद बिन क़ासिम, राय वंश, लसबेला ज़िला, सिंधु घाटी सभ्यता, हिंगलाज, हिंगलाज भवानी शक्तिपीठ, ग्वादर, ओमान की खाड़ी, कलात, अब्द अल-मालिक बिन मरवान, अलोर का चच, अस्तोला द्वीप

चन्द्रगुप

अंतरिक्ष से चन्द्रगुप और उसके आसपास के गारामुखियों का दृश्य चन्द्रगुप (उर्दू:, अंग्रेज़ी: Chandragup), जिसे कभी-कभी चन्द्रकुप (Chandrakup) भी कहा जाता है, पाकिस्तान के पश्चिमी बलोचिस्तान प्रान्त के तटीय मकरान क्षेत्र में स्थित एक गारामुखी (लावा के स्थान पर मिट्टी-कीचड़ उगलने वाला ज्वालामुखी) है। ५८ मीटर ऊँचा यह गारामुखी एक शुद्ध शंकु (कोन) का आकार रखता है। इस क्षेत्र में कई सारे गारामुखी मिलते हैं और चन्द्रगुप इनमें से एक है।, pp.

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एक इकाई व्यवस्था

एक इकाई व्यवस्था या नीति, (अथवा वन-यूनिट् सिस्टम्), पाकिस्तान की एक पुर्वतः परवर्तित प्रशासनिक व्यवस्था थी, जिसके अंतर्गत, तत्कालीन पाकिस्तानी भूमि के दोनों भिन्न टुकड़ों को "एक प्रशासनिक इकाई" के रूप में ही शासित किये जाने की योजना रखी गई थी। इस तरह की प्रशासनिक नीति को अपनाने का मुख्य कारण, सर्कार द्वारा, पाकिस्तानी अधिराज्य के दो विभक्त एवं पृथक भौगोलिक आंचलों की एक ही केंद्रीय व्यवस्था के अंतर्गत शासन में आने वाली घोर प्रशासनिक असुविधाएँ, एवं भौगोलिक कठिनाईयाँ बताई गई थी। अतः इस भौगोलिक व प्रशासनिक विषय के समाधान के रूप में, सरकार ने इन दो भौगोलीय हिस्सों को ही, एक महासंघीय ढांचे के अंतर्गत, पाकिस्तान के दो वाहिद प्रशासनिक इकाइयों के रूप में स्थापित करने की नीति बनाई गई। इस्के तहत, तत्कालीन मुमलिकात-ए-पाकिस्तान के, पूर्वी भाग में मौजूद स्थिति के अनुसार ही, पश्चिमी भाग के पाँचों प्रांतों व उनकी प्रांतीय सरकारों को भंग कर, एक प्रांत, पश्चिमी पाकिस्तान गठित किया गया, वहीं पूर्वी भाग (जो अब बांग्लादेश है) को पूर्वी पाकिस्तान कह कर गठित किया गया। तत्प्रकार, पाकिस्तान, एक इकाई योजना के तहत, महज दो प्रांतों में विभाजित एक राज्य बन गया। वन यूनिट योजना की घोषणा प्रधानमंत्री मोहम्मद अली बोगरा के शासनकाल के दौरान 22 नवंबर 1954 को की गई, और 14 अक्टूबर 1955 को देश के पश्चिमी भाग के सभी प्रांतों को एकीकृत कर, पश्चिमी पाकिस्तान प्रांत गठित किया गया, जिसमें, सभी प्रांतों के अलावा तत्कालीन, राजशाहियों और कबाइली इलाके भी शामिल थे। इस प्रांत में 12 प्रमंडल थे, और इसकी राजधानी लाहौर थी। दूसरी ओर पूर्वी बंगाल के प्रांत को पूर्वी पाकिस्तान का नाम दिया गया, जिसकी राजधानी ढाका थी। संघीय राजधानी(कार्यपालिका) को वर्ष 1959 में कराँची से रावलपिंडी स्थानांतरित किया गया, जहां सेना मुख्यालय था, और नई राजधानी, इस्लामाबाद के पूरा होने तक यहां मौजूद रहा जबकि संघीय विधानपालिका को ढाका में स्थापित किया गया। इस नीति का उद्देश्य बज़ाहिर प्रशासनिक सुधार लाना था लेकिन कई लिहाज से यह बहुत विनाशकारी कदम था। पश्चिमी पाकिस्तान में मौजूद बहुत सारी राज्यों ने इस आश्वासन पर विभाजन के समय पाकिस्तान में शामिल हो गए थे कि उनकी स्वायत्तता कायम रखी जाएगी लेकिन वन इकाई बना देने के फैसले से सभी स्थानीय राज्यों का अंत हो गया। इस संबंध में बहावलपुर, खीरिपोर और कलात के राज्य विशेषकर उल्लेखनीय हैं। मामले इस समय अधिक गंभीर समय 1958 ई। के तख्तापलट के बाद मुख्यमंत्री का पद समाप्त कर दिया गया और राष्ट्रपति ने पश्चिमी पाकिस्तान के विकल्प अपने पास रख लिए। राजनीतिक विशेषज्ञों यह भी समझते हैं कि पश्चिमी पाकिस्तान के सभी प्रांतों को एकजुट करने के उद्देश्य पूर्वी पाकिस्तान की भाषाई और राजनीतिक इकाई का जोर तोड़ना था। अंततः एक जुलाई 1970 को राष्ट्रपति याह्या खान ने एक इकाई का सफाया करते हुए पश्चिमी पाकिस्तान के सभी प्रांतों बहाल कर दिया। .

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झालावान

झालावान (बलोच: جھالاوان‎, अंग्रेज़ी: Jhalawan) भारतीय उपमहाद्वीप के पश्चिमोत्तरी बलोचिस्तान क्षेत्र में स्थित कलात ख़ानत का एक प्रशासनिक भाग था और यह क्षेत्र आज भी इस पारम्परिक नाम से जाना जाता है। इसकी स्थापना १७वीं शताब्दी में हुई और सिन्ध के साथ लगी इसकी पूर्वी सीमा १८५३ में निर्धारित हुई। यह कलात राज्य के दक्षिण-पश्चिमी भाग में स्थित था। इस से दक्षिण में लस बेला की रियासत, पूर्व में सिन्ध और पश्चिम में ख़ारान और मकरान थे। झालावान में बलोचिस्तान की कुछ महत्वपूर्ण घाटियाँ हैं, जिनमें कलात, गिदर, बाग़बाना, मोला, ज़ेहरी, फ़िरोज़ाबाद, नाल, सरूना, वध, जउ और मश्कई शामिल हैं। ख़ुज़दार झालावान का सबसे बड़ा शहर है और क्वेटा के बाद यह बलोचिस्तान प्रान्त का दूसरा सबसे बड़ा नगर भी है। .

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तुर्बत

तुर्बत (बलोच: تُربت, अंग्रेज़ी: Turbat) बलोचिस्तान के दक्षिणपश्चिम में स्थित केच ज़िले में स्थित एक नगर है जो उस ज़िले का केन्द्रालय भी है। यह केच नदी के बाएँ किनारे पर मकरान पहाड़ियों से दक्षिण में बसा हुआ है। .

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देबल

देबल (अरबी:, अंग्रेज़ी: Debal) एक प्राचीन भारतीय बंदरगाह थी जो आधुनिक पाकिस्तान के सिंध प्रान्त की राजधानी कराची के पास स्थित थी। यह मनोड़ा प्रायद्वीप के पास थी। इसका नाम पास के एक महान मंदिर पर 'देवल' पड़ा था जो बिगड़कर 'देबल' बन गया। यह मकरान के तटवर्ती रेगिस्तान के पूर्वी छोर पर था।, Sir Henry Miers Elliot and John Dowson, pp.

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पाकिस्तान अधिराज्य

पाकिस्तानी अधिराज्य (ﻣﻤﻠﮑﺖِ ﭘﺎﮐﺴﺘﺎﻥ., मुम्लिक़ात्'ए पाकिस्तान; পাকিস্তান অধিরাজ্য, पाकिस्तान ओधिराज्जो) नवनिर्मित देश, पाकिस्तान की स्वायत्त्योपनिवेशिय अवस्था थी। इस शासनप्रणाली के तहत पाकिस्तान को भारत विभाजन के बाद, ब्रिटिश साम्राज्य का एक स्वशासित व स्वतंत्र इकाइ(अधिराज्य) के रूप मे स्थापित किया गया था। पाकिस्तानी अधिराज्य की स्थापना भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम १९४७ के तहत ब्रिटिश भारत के विभाजन के बाद तथाकथित तौर पर भारतिय उपमहाद्वीप की मुस्लिम आबादी के लिए हुआ था। एसकी कुल भूभाग मौजूदा इस्लामिक गणराज्य पाकिस्तान व बांग्लादेश के बराबर थी। 1956 में पाकिस्तान का पहला संविधान के लागू होने के साथ ही "पाकिस्तान अधिराज्य" की विस्थापना हो गई जब अधिराजकिय राजतांत्रिक व्यवस्था को इस्लामिक गणराज्य से बदल दिया गया। इस व्यवस्था के तहत पाकिस्तान ब्रिटिश हुक़ूमत से स्वतंत्र हो गया एवं ब्रिटिश राष्ट्रमंडल का हिस्सा होने के नाते अन्य ब्रिटिश स्वायत्त्योपनिवेशों की ही तरह, ब्रिटेन के राजा(ततकालीन जार्ज षष्ठम) को पाकिस्तान के राजा का प्रभार भी सौंप दिया गया, हालांकी, (तथ्यस्वरूप) पाकिस्तान के राजा का लग-भग सारा संवैधानिक व कार्याधिकार पाकिस्तान में उनके प्रतिनिधी पाकिस्तान के महाराज्यपाल (गवर्नर-जनरल) के अधिकार में था। ऐसी व्यवस्था सारे ब्रिटिश-स्वायत्त्योपनिवेशों में रहती है। पाकिस्तान अधिराज्य कुल 9 सालों तक, १९४७ से १९५६ तक अस्तित्व में रहा था, जिस बीच 4 महाराज्यपालों की नियुक्ती हुई थी। भारत विभाजन व स्वतंत्रता के बाद संयुक्त राष्ट्र में ब्रिटिश भारत की सदस्यता भारतीय अधिराज्य को दे दी गई जबकी पाकिस्तान ने नई सदस्यता प्राप्त की। .

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फ़ारस की खाड़ी नाम से सम्बंधित दस्तावेज़ें: एक प्राचीन व अनन्त विरासत

फ़ारस की खाड़ी नाम से सम्बंधित दस्तावेज़ें: एक प्राचीन व अनन्त विरासत ‘मोहम्मद अजम’ द्वारा लिखी और संकलित की गई किताब और एटलस है। पहली बार साल 2004 में प्रकाशित इस किताब का दूसरा संस्करण साल 2008 में डाक्टर पीरोज़ मुजतहिदज़ादेह और डाक्टर मोहम्मद हसन गंजी की निगरानी में प्रकाशित किया गया। वर्ष 2010 में यह किताब सर्वश्रेष्ठ किताब का उम्मीदवार बनी थी। यह फ़ारस की खाड़ी के नाम से संबंधित विवाद के बारे में ईरान में पिछले पचास वर्षों में प्रकाशित की गई श्रेष्ठ किताबों में से एक मानी जाती है। इस किताब का पहला अध्याय ‘’फ़ारस की खाड़ी ’’ के नाम से संबंधित राजनीतिक व भौगोलिक विवादों, फ़ारस का खाड़ी के नाम से संबंधित ऐतिहासिक दस्तावेजों और फ़ारस की खाड़ी के नामकरण के बारे में कुछ दिनों पहले उठने वाले विवाद पर आधारित है।.

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फ़ारस की खाड़ी का राष्ट्रीय दिवस

ईरान में 30 अप्रैल का दिन फ़ारस की खाड़ी का राष्ट्रीय दिवस के तौर पर मनाया जाता है। इस दिन पूरे ईरान में विभिन्न प्रकार के कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है। फारस की खाड़ी, मध्य पूर्व एशिया क्षेत्र में हिन्द महासागर का एक विस्तार है, जो ईरान और अरब प्रायद्वीप के बीच तक गया हुआ है।Working Paper No.

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मध्य मकरान पर्वतमाला

मध्य मकरान पर्वतमाला (Central Makran Range) पाकिस्तान के बलोचिस्तान प्रान्त के दक्षिणपश्चिमी भाग के मकरान क्षेत्र में स्थित एक पर्वतमाला है। .

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मुहम्मद बिन क़ासिम

मुहम्मद बिन क़ासिम के तहत भारतीय उपमहाद्वीप में उमय्यद ख़िलाफ़त का विस्तार अपने चरम पर उमय्यद ख़िलाफ़त मुहम्मद बिन क़ासिम (अरबी:, अंग्रेज़ी: Muhammad bin Qasim) इस्लाम के शुरूआती काल में उमय्यद ख़िलाफ़त का एक अरब सिपहसालार था। उसने १७ साल की उम्र में भारतीय उपमहाद्वीप के पश्चिमी इलाक़ों पर हमला बोला और सिन्धु नदी के साथ लगे सिंध और पंजाब क्षेत्रों पर क़ब्ज़ा कर लिया। यह अभियान भारतीय उपमहाद्वीप में आने वाले मुस्लिम राज का एक बुनियादी घटना-क्रम माना जाता है। .

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राय वंश

राय राजवंश (416 ई–644 ई) सिन्ध का एक हिन्दू राजवंश था जिसने भारतीय उपमहाद्वीप के उत्तरी-पश्चिमी भाग पर शासन किया। इनका प्रभाव पूरब में कश्मीर से लेकर, पश्चिम में मकरान और देबल बन्दरगाह (आधुनिक कराची) तक, दक्षिण में सूरत बन्दरगाह तक और उत्तर में कान्धार, सुलैमान, फरदान और किकानान पहाड़ियों तक था। .

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लसबेला ज़िला

लसबेला या लस बेला (उर्दू व बलोच:, अंग्रेज़ी: Lasbela) पाकिस्तान के बलोचिस्तान प्रान्त का एक तटवर्ती ज़िला है। इसे सिन्धी लहजे में लस बेलो कहते हैं। यह ३० जून १९५४ को उस समय के कलात विभाग के अन्दर एक अलग ज़िले के रूप में गठित किया गया था। इस ज़िले में ९ तहसीलें और २१ संघीय काउंसिल​ आती हैं। .

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सिंधु घाटी सभ्यता

सिंधु घाटी सभ्यता अपने शुरुआती काल में, 3250-2750 ईसापूर्व सिंधु घाटी सभ्यता (3300 ईसापूर्व से 1700 ईसापूर्व तक,परिपक्व काल: 2600 ई.पू. से 1900 ई.पू.) विश्व की प्राचीन नदी घाटी सभ्यताओं में से एक प्रमुख सभ्यता है। जो मुख्य रूप से दक्षिण एशिया के उत्तर-पश्चिमी क्षेत्रों में, जो आज तक उत्तर पूर्व अफगानिस्तान,पाकिस्तान के उत्तर-पश्चिम और उत्तर भारत में फैली है। प्राचीन मिस्र और मेसोपोटामिया की प्राचीन सभ्यता के साथ, यह प्राचीन दुनिया की सभ्यताओं के तीन शुरुआती कालक्रमों में से एक थी, और इन तीन में से, सबसे व्यापक तथा सबसे चर्चित। सम्मानित पत्रिका नेचर में प्रकाशित शोध के अनुसार यह सभ्यता कम से कम 8000 वर्ष पुरानी है। यह हड़प्पा सभ्यता और 'सिंधु-सरस्वती सभ्यता' के नाम से भी जानी जाती है। इसका विकास सिंधु और घघ्घर/हकड़ा (प्राचीन सरस्वती) के किनारे हुआ। मोहनजोदड़ो, कालीबंगा, लोथल, धोलावीरा, राखीगढ़ी और हड़प्पा इसके प्रमुख केन्द्र थे। दिसम्बर २०१४ में भिर्दाना को सिंधु घाटी सभ्यता का अब तक का खोजा गया सबसे प्राचीन नगर माना गया है। ब्रिटिश काल में हुई खुदाइयों के आधार पर पुरातत्ववेत्ता और इतिहासकारों का अनुमान है कि यह अत्यंत विकसित सभ्यता थी और ये शहर अनेक बार बसे और उजड़े हैं। 7वी शताब्दी में पहली बार जब लोगो ने पंजाब प्रांत में ईटो के लिए मिट्टी की खुदाई की तब उन्हें वहां से बनी बनाई इटे मिली जिसे लोगो ने भगवान का चमत्कार माना और उनका उपयोग घर बनाने में किया उसके बाद 1826 में चार्ल्स मैसेन ने पहली बार इस पुरानी सभ्यता को खोजा। कनिंघम ने 1856 में इस सभ्यता के बारे में सर्वेक्षण किया। 1856 में कराची से लाहौर के मध्य रेलवे लाइन के निर्माण के दौरान बर्टन बंधुओं द्वारा हड़प्पा स्थल की सूचना सरकार को दी। इसी क्रम में 1861 में एलेक्जेंडर कनिंघम के निर्देशन में भारतीय पुरातत्व विभाग की स्थापना की। 1904 में लार्ड कर्जन द्वारा जॉन मार्शल को भारतीय पुरातात्विक विभाग (ASI) का महानिदेशक बनाया गया। फ्लीट ने इस पुरानी सभ्यता के बारे में एक लेख लिखा। १९२१ में दयाराम साहनी ने हड़प्पा का उत्खनन किया। इस प्रकार इस सभ्यता का नाम हड़प्पा सभ्यता रखा गया व दयाराम साहनी को इसका खोजकर्ता माना गया। यह सभ्यता सिन्धु नदी घाटी में फैली हुई थी इसलिए इसका नाम सिन्धु घाटी सभ्यता रखा गया। प्रथम बार नगरों के उदय के कारण इसे प्रथम नगरीकरण भी कहा जाता है। प्रथम बार कांस्य के प्रयोग के कारण इसे कांस्य सभ्यता भी कहा जाता है। सिन्धु घाटी सभ्यता के १४०० केन्द्रों को खोजा जा सका है जिसमें से ९२५ केन्द्र भारत में है। ८० प्रतिशत स्थल सरस्वती नदी और उसकी सहायक नदियों के आस-पास है। अभी तक कुल खोजों में से ३ प्रतिशत स्थलों का ही उत्खनन हो पाया है। .

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हिंगलाज

हिंगलाज पाकिस्तान के बलोचिस्तान प्रदेश के दक्षिण में मकरान मरुभूमित में स्थित एक महत्वपूर्ण तीर्थ-स्थल है। यहाँ हिंगलाज माता का मन्दिर है, इसको ५६ में से एक शक्तिपीठों में गिना जाता है। देवी का नाम बांग्ला, असमिया और सस्कृत में इसी नाम से जाना जाता है। आय़ुर्वेद शास्त्र में भी यह नाम आता है। कराची के यह कोई २५० किलोमीटर उत्तर पश्चिम में आता है। अधिकतर श्रद्धालु सिन्ध से आते हैं। इसके पास ही एक राष्ट्रीय उद्यान भी है। इसी नाम से (हिंगलाज देवी) भारत में एक और मन्दिर मध्यप्रदेश के रायसेन जिले की बरेली तहसील में बारी में है। इस जगह को स्थानीय रूप से छोटी काशी कहा जाता है। .

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हिंगलाज भवानी शक्तिपीठ

हिंजलगढ़ की हिंगलाज माता हिंगलाज माता मंदिर, पाकिस्तान के बलूचिस्तान प्रांत में सिंध राज्य की राजधानी कराची से १२० कि॰मी॰ उत्तर-पश्चिम में हिंगोल नदी के तट पर ल्यारी तहसील के मकराना के तटीय क्षेत्र में हिंगलाज में स्थित एक हिन्दू मंदिर है। यह इक्यावन शक्तिपीठ में से एक माना जाता है और कहते हैं कि यहां सती माता के शव को भगवान विष्णु के सुदर्शन चक्र से काटे जाने पर यहां उनका ब्रह्मरंध्र (सिर) गिरा था। .

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ग्वादर

ग्वादर शहर ग्वादर बंदरगाह ग्वादर (बलोच व उर्दु) पाकिस्तान से सुदूर दक्षिण-पश्चिमी भाग में बलोचिस्तान प्रान्त में अरब सागर के किनारे पर स्थित एक बंदरगाही शहर है। यह ग्वादर ज़िले का केंद्र है और सन् २०११ में इसे बलोचिस्तान की शीतकालीन राजधानी घोषित कर दिया गया था। ग्वादर शहर एक ६० किमी चौड़ी तटवर्ती पट्टी पर स्थित है जिसे अक्सर मकरान कहा जाता है। ईरान तथा फ़ारस की खाड़ी के देशों के बहुत पास होने के कारण इस शहर का बहुत सैन्य और राजनैतिक महत्व है। पाकिस्तान प्रयास कर रहा है कि इस बंदरगाह के ज़रिये न केवल पाकिस्तान बल्कि चीन, अफ़ग़ानिस्तान व मध्य एशिया के देशों का भी आयात-निर्यात चले। .

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ओमान की खाड़ी

ओमान की खाड़ी (अंग्रेज़ी: Gulf of Oman), जिसे अरबी में ख़लीज उमान और फ़ारसी में ख़लीज-ए-मकरान कहते हैं, अरब सागर और होरमुज़ जलसन्धि के बीच स्थित एक जलडमरू है। यह होरमुज़ जलसन्धि के पार फ़ारस की खाड़ी से जुड़ता है। हालांकि इसे खाड़ी बुलाया जाता है, भौगोलिक रूप से यह वास्तव में एक जलडमरू है। इसके उत्तर में ईरान और पाकिस्तान का मकरान क्षेत्र है जबकि इसके दक्षिण में संयुक्त अरब अमीरात और ओमान स्थित हैं। फ़ारस की खाड़ी की तुलना में इसकी गहराई काफी अधिक है।, John E. Randall, pp.

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कलात

कलात (उर्दू: قلات‎), बलोची: Kalát,قلات) पाकिस्तान के बलुचिस्तान प्रान्त के कलात जिले में स्थित एक ऐतिहासिक नगर एवं मुख्यालय है। इस नगर पर अंग्रेजों ने १९३९ ई. में अपना अधिकार जमाया था। यह पहले ब्रिटिश भारत का और इसके उपरान्त पाकिस्तान का एक स्वतंत्र राज्य था, जो १२ अप्रैल, १९५२ ई. से बलूचिस्तान के अन्य स्वतंत्र राज्य, लास बेला, खुरान और मकरान के साथ पाकिस्तान में सम्मिलित कर लिया गया। १९४७ ई. में पाकिस्तान के निर्माण के उपरान्त भी कलात एक स्वतंत्र राज्य था और बलूचिस्तान के उपर्युक्त तीनों स्वतंत्र राज्यों पर भी सामान्यत: कलात का ख़ान ही राज्य करता था। पाकिस्तान में सम्मिलित होने पर एक आज्ञा द्वारा पाकिस्तान सरकार ने कलात के वर्तमान खान को, अपने अंतिम समय तक के लिए, उपर्युक्त राज्यों के अध्यक्ष पद पर रहने की स्वीकृति दे दी है। उसके बाद अध्यक्ष का चुनाव शासकों की एक सभा द्वारा हुआ करेगा। कलात है जो क्वेटा से १३५ किमी दक्षिण में समुद्रतल से ६,७८० फुट की ऊँचाई पर स्थित है। यह नगर दीवारों से घिरा है, परंतु अब इनके बाहर भी आबादी का विस्तार हो गया है। कलात के खान का राजभवन एक दर्शनीय गढ़ के भीतर स्थित है, परंतु नगर के अधिकांश गृह मिट्टी द्वारा निर्मित हैं। उपर्युक्त गढ़ के चारों ओर स्थित घाटियाँ घनी बसी हैं जिनमें ऊँचाई की अधिकता तथा तापक्रम की विषमता होते हुए भी खेती खूब होती है। यह नगर कुज़दर, गंडावा, नुश्की, क्वेटा और अन्य नगरों को जानेवाले यात्रीमार्गो का केंद्र है। श्रेणी:पाकिस्तान के शहर श्रेणी:बलोचिस्तान, पाकिस्तान के आबाद स्थान श्रेणी:कलात ज़िला.

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अब्द अल-मालिक बिन मरवान

अब्द अल-मलिक बिन मरवान (अरबी:, अंग्रेज़ी: ‘Abd al-Malik ibn Marwān) इस्लाम के शुरूआती काल में उमय्यद ख़िलाफ़त का एक ख़लीफ़ा था। वह अपने पिता मरवान प्रथम के देहांत होने पर ख़लीफ़ा बना। अब्द अल-मलिक एक शिक्षित और निपुण शासक था, हालांकि उसके दौर में बहुत सी राजनीतिक मुश्किलें बनी रहीं। १४वीं सदी के मुस्लिम इतिहासकार इब्न ख़लदून के अनुसार 'अब्द अल-मलिक बिन मरवान सबसे महान अरब और मुस्लिम ख़लीफाओं में से एक है। राजकीय मामलों को सुव्यवस्थित करने के लिए वह मोमिनों के सरदार उमर बिन अल-ख़त्ताब के नक़्श-ए-क़दम पर चला।' .

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अलोर का चच

चच (लगभग 610-671 ईसवी) सातवीं शताब्दी के मध्य में सिंध पर राज करने वाला एक ब्राम्हण वंश का शाशक था। वह एक भूतपूर्व मंत्री और राजा राय साहसी (दूसरे) का प्रमुख सलाहकारा था। राजा के मरने के बाद उनकी विधवा रानी से शादी कर के वह सत्तासीन हो गया। उसने अपने साम्राज्य को सिंध तक फैलाया। उसके आसपास के छोटे-२ राज्यों, कबीलों और सिंधु घाटी के अन्य स्वतन्त्र गुटों को अपने साम्राज्य में मिलाने के साहसिक व सफल प्रयासों की दास्तान चचनामा में लिखी हुई है। .

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अस्तोला द्वीप

अस्तोला (استولا) या सतदीप (अर्थ: सात पहाड़ियों वाला द्वीप) या हफ़्त तलार (ہفت تلار) पाकिस्तान के बलोचिस्तान प्रान्त के मकरान तट से २५ किमी (१६ मील) दूर अरब सागर में स्थित एक द्वीप है। इस पर कोई स्थाई आबादी नहीं है और यह पास के पसनी नामक क़स्बे व बंदरगाह से लगभग ५ घंटों में पहुँचा जा सकता है। प्रशासनिक नज़र से यह बलोचिस्तान के ग्वादर ज़िले में पड़ता है। आबादी न होने के कारण यहाँ प्रकृति का राज है और कई पक्षी व जानवर यहाँ रहते हैं। .

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