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मंड

सूची मंड

मंड (स्टार्च) कैस # 9005-25-8, रासायनिक सूत्र (C6H10O5), एक पॉली सैकेराइडकार्बोहाइड्रेट है, जिसका निर्माण ग्लूकोज मोनोसैकेराइड की इकाइयों की एक बड़ी संख्या के आपस में ग्लाइकोसिडिक बंधों द्वारा जुड़ने के कारण होता है। यह सिर्फ पादपों में पाया जाता है। सभी पादपों के बीजों और फलियों मे मंड अमाइलोज या अमाइलोपेप्सिन के रूप मे उपस्थित होता है। मंड मे पादप की प्रकृति के अनुसार, आमतौर पर 20 से 25 प्रतिशत अमाइलोज और 75 से 80 प्रतिशत अमाइलोपेप्सिन उपस्थित होता हैं। इसे आम भाषा मे मांड (जैसे चावल का मांड) कहा जाता है। जब इसका उपयोग कपडोँ पर किया जाता है तब यह कलफ कहलाता है। .

23 संबंधों: चयापचय, एमिलेज़, प्रकाश-संश्लेषण, बायोप्लास्टिक (जैवप्लास्टिक), मानव का पाचक तंत्र, माल्ट, रक्तशर्कराल्पता, लार, लाला ग्रंथि, सर्पगन्धा, सूप, सूजी, सेवई, जैव-अवकर्षण प्लास्टिक, विष प्रतिकारक, वोदका, आटा, इथेनॉल, कसावा, कार्बोहाइड्रेट, कोशिकीय श्वसन, अचलताकारक कशेरूकाशोथ, अरारोट

चयापचय

कोएन्ज़ाइम एडीनोसाइन ट्रायफ़ोस्फेट का संरचना, उर्जा मेटाबॉलिज़्म में एक केंद्र मध्यवर्ती चयापचय (metabolism) जीवों में जीवनयापन के लिये होने वाली रसायनिक प्रतिक्रियाओं को कहते हैं। ये प्रक्रियाएं जीवों को बढ़ने और प्रजनन करने, अपनी रचना को बनाए रखने और उनके पर्यावरण के प्रति सजग रहने में मदद करती हैं। साधारणतः चयापचय को दो प्रकारों में बांटा गया है। अपचय कार्बनिक पदार्थों का विघटन करता है, उदा.

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एमिलेज़

एमिलेज या एमिलेस (amylase) एक एंजाइम है जो स्टार्च को ग्लूकोज और माल्टोज में तोड़ देता है। मानव तथा कुछ अन्य स्तनपोषियों के लार में एमिलेज पाया जाता है जो पाचन में सहायक होता है। श्रेणी:प्रकिण्व श्रेणी:रासायनिक विकृतिविज्ञान.

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प्रकाश-संश्लेषण

हरी पत्तियाँ, प्रकाश संश्लेषण के लिये प्रधान अंग हैं। सजीव कोशिकाओं के द्वारा प्रकाशीय उर्जा को रासायनिक ऊर्जा में परिवर्तित करने की क्रिया को प्रकाश संश्लेषण (फोटोसिन्थेसिस) कहते है। प्रकाश संश्लेषण वह क्रिया है जिसमें पौधे अपने हरे रंग वाले अंगो जैसे पत्ती, द्वारा सूर्य के प्रकाश की उपस्थिति में वायु से कार्बनडाइऑक्साइड तथा भूमि से जल लेकर जटिल कार्बनिक खाद्य पदार्थों जैसे कार्बोहाइड्रेट्स का निर्माण करते हैं तथा आक्सीजन गैस (O2) बाहर निकालते हैं। प्रकाश संश्लेषण की प्रक्रिया में सूर्य के प्रकाश की उपस्थिति में पौधों की हरी पत्तियों की कोंशिकाओं के अन्दर कार्बन डाइआक्साइड और पानी के संयोग से पहले साधारण कार्बोहाइड्रेट और बाद में जटिल काबोहाइड्रेट का निर्माण होता है। इस प्रक्रिया में आक्सीजन एवं ऊर्जा से भरपूर कार्बोहाइड्रेट (सूक्रोज, ग्लूकोज, स्टार्च (मंड) आदि) का निर्माण होता है तथा आक्सीजन गैस बाहर निकलती है। जल, कार्बनडाइऑक्साइड, सूर्य का प्रकाश तथा क्लोरोफिल (पर्णहरित) को प्रकाश संश्लेषण का अवयव कहते हैं। इसमें से जल तथा कार्बनडाइऑक्साइड को प्रकाश संश्लेषण का कच्चा माल कहा जाता है। प्रकाश संश्लेषण की प्रक्रिया सबसे महत्वपूर्ण जैवरासायनिक अभिक्रियाओं में से एक है। सीधे या परोक्ष रूप से दुनिया के सभी सजीव इस पर आश्रित हैं। प्रकाश संश्वेषण करने वाले सजीवों को स्वपोषी कहते हैं। .

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बायोप्लास्टिक (जैवप्लास्टिक)

जैव अवक्रमित प्लास्टिक से बने बर्तन. जैवप्लास्टिक, या जैविक प्लास्टिक प्लास्टिक का एक प्रकार है जिसे पेट्रोलियम से प्रात होने वाले जीवाश्म ईंधन प्लास्टिक की बजाय शाकाहारी तेल, मक्का स्टार्च, मटर स्टार्च या माइक्रोबायोटा जैसे नवीकरणीय जैव ईंधन स्रोतों से प्राप्त किया जाता है.

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मानव का पाचक तंत्र

मानव का पाचन-तन्त्र मानव के पाचन तंत्र में एक आहार-नाल और सहयोगी ग्रंथियाँ (यकृत, अग्न्याशय आदि) होती हैं। आहार-नाल, मुखगुहा, ग्रसनी, ग्रसिका, आमाशय, छोटी आंत, बड़ी आंत, मलाशय और मलद्वार से बनी होती है। सहायक पाचन ग्रंथियों में लार ग्रंथि, यकृत, पित्ताशय और अग्नाशय हैं। .

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माल्ट

माल्ट ह्विस्की की माल्ट किसी अन्न (जौ आदि) को अंकुरित कराकर, फिर उसे गरम हवा की सहायता से सुखाने प्राप्त उत्पाद माल्ट (Malt) कहलाती है। अन्नों के माल्टन (Malting) से उनमें एक एंजाइम पैदा होती है जो मूल अन्न के स्टार्च को शर्करा में बदल देती है। इसके अलावा माल्टन से प्रोटिआसेस (proteases) आदि अन्य एंजाइम भी पैदा होते हैं जो अन्न के अन्दर स्थित प्रोटीनों को तोड़कर ऐसे रूप में बदल देते हैं जिसका उपयोग खमीरों द्वारा किया जा सकता है। .

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रक्तशर्कराल्पता

रक्तशर्कराल्पता या हाइपोग्लाइसेमिया सामान्य से नीचे स्तर में रक्त-शर्करा की बनने की अवस्था के लिए चिकित्सकीय शब्दावली है। शब्दावली का शाब्दिक अर्थ है, "अन्तः रक्त शर्करा" (ग्रीक में, हाइपो-, ग्लिकिस, हेमिया).

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लार

लार (राल, थूक, ड्रूल अथवा स्लौबर नाम से भी निर्दिष्ट) मानव तथा अधिकांश जानवरों के मुंह में उत्पादित पानी-जैसा और आमतौर पर एक झागदार पदार्थ है। लार मौखिक द्रव का एक घटक है। लार उत्पादन और स्त्राव तीन में से एक लार ग्रंथियों से होता है। मानव लार 98% पानी से बना है, जबकि इसका शेष 2% अन्य यौगिक जैसे इलेक्ट्रोलाईट, बलगम, जीवाणुरोधी यौगिकों तथा एंजाइम होता है। भोजन पाचन की प्रक्रिया के प्रारंभिक भाग के रूप में, लार के एंजाइम भोजन के कुछ स्टार्च और वसा को आणविक स्तर पर तोड़ते हैं। लार दांतों के बीच फंसे खाने को भी तोड़ती है और उन्हें उस बैक्टीरिया से बचाती है जो क्षय का कारण होते हैं। इसके अलावा, लार दांतों, जीभ और मुंह के अंदर कोमल ऊतकों को चिकनाई देती है और उनकी रक्षा करती है। लार मुंह में रहने वाले वात निरपेक्ष बैक्टीरिया के द्वारा गंध-मुक्त भोजन यौगिकों से उत्पादित थायोल्स (thiols) को फंसा कर भोजन का स्वाद चखने की महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। विभिन्न प्रजातियों ने लार के विशेष उपयोग विकसित किये हैं, जो पूर्वपाचन से परे हैं। कुछ अबाबील अपने चिपचिपे लार का उपयोग घोंसले का निर्माण करने के लिए करती हैं। चिड़िया के घोंसले के सूप के लिए छोटी हिमालयन अबाबील का घोंसला बेशकीमती है।मार्कोन, एम्.

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लाला ग्रंथि

स्तनधारियों की लाला गर्ंथियाँ या लार ग्रंथिया (salivary glands) लाला (लार) उत्पन्न करने वाली बहिःस्रावी ग्रंथियाँ है। लार में बहुत से पदार्थ होते हैं जैसे, एमाइलेज (amylase) जो स्टार्च को माल्टोज और ग्लूकोज में तोड़ देता है। श्रेणी:मुख की ग्रंथियाँ श्रेणी:बहिःस्रावी तंत्र.

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सर्पगन्धा

सर्पगन्धा एपोसाइनेसी परिवार का द्विबीजपत्री, बहुवर्षीय झाड़ीदार सपुष्पक और महत्वपूर्ण औषधीय पौधा है। इस पौधे का पता सर्वप्रथम लियोनार्ड राल्फ ने १५८२ ई. में लगाया था। भारत तथा चीन के पारंपरिक औषधियों में सर्पगन्धा एक प्रमुख औषधि है। भारत में तो इसके प्रयोग का इतिहास ३००० वर्ष पुराना है। सर्पगन्धा के पौधे की ऊँचाई ६ इंच से २ फुट तक होती है। इसकी प्रधान जड़ प्रायः २० से.

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सूप

फ़्रांसिसी प्याज सूप का एक कटोरा रोटी के साथ घर में बना हुआ चिकन नूडल सूप सूप या शोरबा एक प्रकार का खाद्य पदार्थ है जो मीट और सब्जियों जैसी सामग्रियों को, स्टॉक, जूस, पानी या किसी अन्य तरल पदार्थ में मिलाकर बनाया जाता है। इसके अतिरिक्त गर्म सूप की अन्य विशेषता यह है कि इनमें एक पात्र में तरल पदार्थ में ठोस सामग्रियों को तब तक उबाला जाता है जब तक कि स्वाद उनसे निकलर तरल पदार्थ में न समा जाए और वह एक शोरबे जैसा हो जाये.

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सूजी

सूजी का चित्र दुरुम गेहूं के दानेदार, शुद्धिकृत गेहूं के टुकड़े को सूजी कहते हैं जिसका उपयोग पास्ता बनाने के लिये और नाश्ते के अनाज और हलवे के लिये भी किया जाता है। .

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सेवई

सेवई या संथकई दक्षिण भारत में बहुत प्रसिद्ध हैं, खासकर तमिलनाडु (कोंगुनाडु क्षेत्र) और कर्नाटक में, ये एक प्रकार के चावल से बने नूडल होते हैं। अन्य अनाजों की बनी हुई संथकई का प्रचालन भी धीरे-धीरे बढ़ता जा रहा है, जैसे गेंहू, रागी आदि। सेवई/संथकई अपनी ही शैली के एक अन्य खाद्य पदार्थ इडियप्पम से विशेष रूप से अलग है, यह अंतर इनके बनाने में प्रयोग की जाने वाली सामग्रियों, बनाने की विधि और उत्सारण के बाद इनके द्वारा बनाये गए पकवानों के फलस्वरूप है। सेवई सुबह के नाशेत/ रात के भोजन के रूप में प्रचलित है और यह माना जाता है कि यह सरलतापूर्वक पाच्य होती है क्योंकि यह बिना तेल के या बहुत ही कम तेल में बनायी जा सकती है और इसे भाप द्वारा भी पकाया जा सकता है। ताज़ा निकाली गयी सेवई .

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जैव-अवकर्षण प्लास्टिक

बाइओडिग्रेड्डबल प्लास्टिक से बनाया हुआ बर्तन. जैव-निम्नीकारक प्लास्टिक ऐसे प्लास्टिक होते हैं, जो पर्यावरण में प्राकृतिक वायुजीवी (खाद) तथा अवायुजीवी (कचरा) के रूप में अपघटित हो जाते हैं। प्लास्टिक का जैव-निम्नीकरण, पर्यावरण में सूक्ष्मजीवों को सक्रिय कर संपन्न किया जा सकता है, जो प्लास्टिक झिल्लियों की आण्विक संरचना के उपापचय द्वारा एक खाद सदृश मिट्टी वाले अक्रिय पदार्थ का निर्माण करते हैं और पर्यावरण के लिए कम हानिकारक होते हैं। वे जैव-प्लास्टिक अथवा ऐसे प्लास्टिक से बने होते हैं, जिनके घटक नवीकरणीय कच्ची सामग्रियों, या किसी अतिरिक्त पदार्थ के मिश्रण वाले पेट्रोलियम-आधारित प्लास्टिक से निर्मित होते हैं। फैलाव वाले कारकों के मिश्रणयुक्त जैव-सक्रिय यौगिक के प्रयोग से यह सुनिश्चित होता है कि जब वे ताप तथा नमी के संपर्क में आते हैं तो प्लास्टिक अणुओं की संरचना को प्रसारित कर देते हैं और जैव-सक्रिय यौगिकों को प्लास्टिक के उपापचय तथा उदासीनीकरण के लिए प्रेरित कर देते हैं। जैव-निम्नीकारक प्लास्टिक विशेष रूप से दो रूपों में निर्मित किए जाते हैं: इंजेक्शन मोल्डेड (ठोस, 3D आकार), जो इस्तेमाल के बाद फेंक दी जाने वाली खाद्य सेवा वस्तुओं में होते हैं, तथा झिल्ली (फ़िल्म), जो विशेषकर जैविक (ऑर्गेनिक) फल पैकेजिंग तथा पत्तियां और घास के कतरनों के लिए संग्रह करने वाले थैलों एवं अधसड़ी कृषि घास-फूसों में इस्तेमाल होते हैं। .

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विष प्रतिकारक

विष कष्टकारक और घातक होते हैं। इनके प्रभाव के निराकरण के लिए कुछ औषधियाँ और उपचार प्रयुक्त होते हैं। इन्हें विषप्रतिकारक (Antidote) कहते हैं। विष के खाने के अनेक कारण हो सकते हैं। कुछ लोग आत्महत्या के लिए विष खाते हैं। कुछ लोग दूसरे का धनमाल हड़पने के लिए विष खिलाकर बेहोश कर, धनमाल लेकर चंपत हो जाना चाहते हैं। ऐसी बातें रेलयात्रियों के संबंध में बहुधा सुनी जाती हैं। कुछ लोग अनजान में विष खा लेते हैं और उसके अहितकर प्रभाव का शिकार बनते हैं। विषों के लाभकारी उपयोग भी हैं। कष्टकारक कीड़ों मकोड़ों, जैसे मच्छर और खटमल और रोगोत्पादक जंतुओं, जैसे चूहों आदि, के नाश करने में विषों का प्रयोग होता है। .

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वोदका

रूस के मंद्रोगी का वोडका संग्रहालय वोडका (रूसी शब्द водка, вода + ка से) http://www.britannica.com/EBchecked/topic/631781/vodka, एक साफ़ द्रव है जिसका अधिकांश भाग जल और इथेनॉल है जिसे अनाज (आम तौर पर राई या गेहूं), आलू या मीठे चुकंदर के शीरे जैसे किसी किण्वित पदार्थ से आसवन की प्रक्रिया — प्रायः एकाधिक आसवन की प्रक्रिया — द्वारा शुद्ध किया जाता है। इसमें अन्य प्रकार के पदार्थ जैसे अनचाही अशुद्धता या स्वाद की मामूली मात्रा भी शामिल रह सकती है। आमतौर पर वोडका में अल्कोहोल की मात्रा 35% से 50% आयतन के अनुपात में रहती है। क्लासिक रूसी, लिथुआनिया और पोलिश वोडका में 40% (80 प्रूफ) है। वोडका का उत्पादन अलेक्जेंडर III द्वारा 1894 में शुरू किया गया था जिसके लिए रूसी मानकों को श्रेय दिया जा सकता है।मास्को में वोडका संग्रहालय के अनुसार, रूसी रसायनज्ञ दमित्री मेनडिलिव (आवर्त सारणी (periodic table) के विकास में अपने कार्य के लिए अधिक प्रसिद्ध) ने सही प्रतिशत 38% बताया था। हालांकि, उस समय अल्कोहोल की उग्रता शक्ति के आधार पर कर (टैक्स) लगता था परन्तु कर की सरल गणना करने के लिए इस प्रतिशत को पूर्णांक बनाते हुए 40 कर दिया गया। कुछ सरकारों ने अल्कोहोल के लिए मद्यसार की एक न्यूनतम सीमा तय की जिसे 'वोडका' कहा जाने लगा.

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आटा

आटा, अनाज के दानो को पीस कर प्राप्त हुआ एक पाउडर या चूर्ण है। यह रोटी बनाने के काम आता है, जो कि कई सभ्यताओं में एक प्रधान भोजन है। इतिहास में विभिन्न समय पर आटे की पर्याप्त आपूर्ति एक प्रमुख आर्थिक और राजनीतिक मुद्दा रहा है। गेहूं का आटा उत्तर भारत, यूरोप और उत्तर अमेरिकी संस्कृति में सबसे महत्वपूर्ण खाद्य पदार्थों में से एक है और यह नाना प्रकार की रोटी, डबल रोटी (ब्रेड) और अधिकांश यूरोपीय शैलियों की ब्रेड और पेस्ट्री बनाने का प्रमुख संघटक है। मक्का का आटा प्राचीन काल से लैटिन अमेरिकी भोजन का एक प्रधान अंग है। आटे में बड़े अनुपात में मंड उपस्थित होता है जो कि एक जटिल कार्बोहाइड्रेट है और जिसे पॉलीसैक्राइड भी कहते हैं। आटे को प्राप्त करने के लिए अनाज को चक्की से पीसा जाता है। यह चक्की आम घरेलू पत्थर की चक्की से लेकर हवा की चक्की, पानी की चक्की या बिजली की चक्की भी हो सकती है। आटा को प्रयोग से पहले एक चलनी के माध्यम छाना जाता है, जिससे इसमे मौजूद भूसी या चोकर इससे अलग हो जाती है। .

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इथेनॉल

एथेनॉल (Ethanol) एक प्रसिद्ध अल्कोहल है। इसे एथिल अल्कोहल भी कहते हैं। .

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कसावा

कसावा (cassava) पृथ्वी के उष्णकटिबंधीय और उप-उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में उगाया जाने वाला एक क्षुप है जिसकी मोटी जड़ आलू की तरह मंड (स्टार्च) से युक्त होती है। चावल और मक्के के बाद, मानव-आहार में यह यह विश्व में तीसरा सबसे बड़ा कार्बोहाइड्रेट का स्रोत है। कसावा मूल-रूप से दक्षिण अमेरिका का वनस्पति था लेकिन अब विश्व-भर के गरम क्षेत्रों में मिलता है। जब इसको पीसकर पाउडर या मोती-आकार के कणों में बनाया जाय तो यह टैपियोका (tapioca) भी कहलाता है। कसावा सूखे की परिस्थिति में और कम-ऊपजाऊ धरती पर भी उग सकने वाला पौधा है। कसावा मीठी और कड़वी नसलों में मिलता है। अन्य कन्द-जड़ों की तरह इसमें भी कुछ वषैले पदार्थ उपस्थित होते है, जिनकी मात्रा कड़वी नसलों में मीठी नसलों से कई अधिक होती है। खाने से पहले इसे सही प्रकार से तैयार करना आवश्यक है वरना इससे साइनाइड विष-प्रभाव हो सकता है, जिससे घेंघा रोग, गतिभंग और लकवा होने की सम्भावना है।Food and Agriculture Organization of the United Nations, Roots, tubers, plantains and bananas in human nutrition, Rome, 1990, Ch.

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कार्बोहाइड्रेट

रासायनिक रुप से ‘‘कार्बोहाइड्रेट्स पालिहाइड्राक्सी एल्डिहाइड या पालिहाइड्राक्सी कीटोन्स होते हैं तथा स्वयं के जलीय अपघटन के फलस्वरुप पालिहाइड्राक्सी एल्डिहाइड या पालिहाइड्राक्सी कीटोन्स देते हैं।’’ कार्बोहाइड्रेट्स, कार्बनिक पदार्थ हैं जिसमें कार्बन, हाइड्रोजन व आक्सीजन होते है। इसमें हाइड्रोजन व आक्सीजन का अनुपात जल के समान होता है। कुछ कार्बोहाइड्रेट्स सजीवों के शरीर के रचनात्मक तत्वों का निर्माण करते हैं जैसे कि सेल्यूलोज, हेमीसेल्यूलोज, काइटिन तथा पेक्टिन। जबकि कुछ कार्बोहाइड्रेट्स उर्जा प्रदान करते हैं, जैसे कि मण्ड, शर्करा, ग्लूकोज़, ग्लाइकोजेन.

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कोशिकीय श्वसन

सजीव कोशिकाओं में भोजन के आक्सीकरण के फलस्वरूप ऊर्जा उत्पन्न होने की क्रिया को कोशिकीय श्वसन कहते हैं। यह एक केटाबोलिक क्रिया है जो आक्सीजन की उपस्थिति या अनुपस्थिति दोनों ही अवस्थाओं में सम्पन्न हो सकती है। इस क्रिया के दौरान मुक्त होने वाली ऊर्जा को एटीपी नामक जैव अणु में संग्रहित करके रख लिया जाता है जिसका उपयोग सजीव अपनी विभिन्न जैविक क्रियाओं में करते हैं। यह जैव-रासायनिक क्रिया पौधों एवं जन्तुओं दोनों की ही कोशिकाओं में दिन-रात हर समय होती रहती है। कोशिकाएँ भोज्य पदार्थ के रूप में ग्लूकोज, अमीनो अम्ल तथा वसीय अम्ल का प्रयोग करती हैं जिनको आक्सीकृत करने के लिए आक्सीजन का परमाणु इलेक्ट्रान ग्रहण करने का कार्य करता है। कोशिकीय श्वसन एवं श्वास क्रिया में अभिन्न सम्बंध है एवं ये दोनों क्रियाएँ एक-दूसरे की पूरक हैं। श्वांस क्रिया सजीव के श्वसन अंगों एवं उनके वातावरण के बीच होती है। इसके दौरान सजीव एवं उनके वातावरण के बीच आक्सीजन एवं कार्बन डाईऑक्साइड गैस का आदान-प्रदान होता है तथा इस क्रिया द्वारा आक्सीजन गैस वातावरण से सजीवों के श्वसन अंगों में पहुँचती है। आक्सीजन गैस श्वसन अंगों से विसरण द्वारा रक्त में प्रवेश कर जाती है। रक्त परिवहन का माध्यम है जो इस आक्सीजन को शरीर के विभिन्न भागों की कोशिकाओं में पहुँचा देता है। वहाँ इसका उपयोग कोशिकाएँ अपने कोशिकीय श्वसन में करती हैं। श्वसन की क्रिया प्रत्येक जीवित कोशिका के कोशिका द्रव्य (साइटोप्लाज्म) एवं माइटोकाण्ड्रिया में सम्पन्न होती है। श्वसन सम्बन्धित प्रारम्भिक क्रियाएँ साइटोप्लाज्म में होती है तथा शेष क्रियाएँ माइटोकाण्ड्रियाओं में होती हैं। चूँकि क्रिया के अंतिम चरण में ही अधिकांश ऊर्जा उत्पन्न होती हैं। इसलिए माइटोकाण्ड्रिया को कोशिका का श्वसनांग या शक्ति-गृह (पावर हाउस) कहा जाता है। .

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अचलताकारक कशेरूकाशोथ

अचलताकारक कशेरूकाशोथ (ए.एस., ग्रीक एंकिलॉज़, मुड़ा हुआ; स्पॉन्डिलॉज़, कशेरूका), जिसे पहले बेक्ट्रू के रोग, बेक्ट्रू रोगसमूह, और एक प्रकार के कशेरूकासंधिशोथ, मारी-स्ट्रम्पेल रोग के नाम से जाना जाता था, एक दीर्घकालिक संधिशोथ और स्वक्षम रोग है। यह रोग मुख्यतया मेरू-दण्ड या रीढ़ के जोड़ों और श्रोणि में त्रिकश्रोणिफलक को प्रभावित करता है। यह सशक्त आनुवंशिक प्रवृत्तियुक्त कशेरूकासंधिरोगों के समूह का एक सदस्य है। संपूर्ण संयोजन के परिणामस्वरूप रीढ़ की हड्डी पूरी तरह से अकड़ जाती है, जिसे बांस जैसी रीढ़ (बैंबू स्पाइन) का नाम दिया गया है। .

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अरारोट

अरारोट, (अंग्रेज़ी:ऍरोरूट) जिसका वैज्ञानिक नाम 'मैरेंटा अरुंडिनेशी' (Maranta arundinacea) होता है, एक बहुवर्षी पौधा होता है। यह वर्षा वन का आवासी है। इसके राइज़ोम से प्राप्त होने वाले खाद्य मंड (स्टार्च) को भी अरारोट ही कहा जाता है। आयुर्वेद के अनुसार अरारोट सही पोषणकर्ता, शान्तिदायक, सुपाच्य, स्नेहजनक, सौम्य, विबन्ध (कब्ज) नाशक, दस्तावर होता है। पित्तजन्य रोग, आंखों के रोग, जलन, सिरदर्द, खूनी बवासीर और रक्तपिक्त आदि रोगों मे सेवन किया जाता है। कमजोर रोगियों और बालकों के लिए यह काफी लाभदायक है यह आंत्र और मूत्राशय सम्बन्धी रोगों के बाद की कमजोरी में यह आराम पहुंचाता है। विभिन्न भाषाओं में इसके कई नाम हैं। हिन्दी में अरारोट, बिलायती तीखुर, मराठी में आरारूट, बंगला में ओरारूट, तवक्षीर,गुजराती में तवखार, अरारोट; अंग्रेज़ी में ऍरोरूट, वेस्ट इण्डियन ऍरोरूट कहते हैं। अरारूट अथवा अरारोट (अंग्रेजी में ऐरोरूट) एक प्रकार का स्टार्च या मंड है जो कुछ पौधों की कंदिल (ट्यूबरस) जड़ों से प्राप्त होता है। इनमें मरेंटसी कुल का सामान्य शिशुमूल (मरंटा अरंडिनेसिया) नामक पौधा मुख्य है। यह दीर्घजीवी शाकीय पौधा है जो मुख्यत: उष्ण देशों में पाया जाता है। इसकी जड़ों में स्टार्च के रूप में खाद्य पदार्थ संचित रहता है। १० से १२ महीने तक के, पूर्ण वृद्धिप्राप्त पौधे की जड़ में प्राय: २६ प्रतिशत स्टार्च, ६५ प्रतिशत जल और शेष ९ प्रतिशत में अन्य खनिज लवण, रेशे इत्यादि होते हैं। मरंटा अरंडिनेसिया के अतिरिक्त, मैनीहार युटिलिस्मा, कुरकुमा अंगुस्टीफोलिया, लेसिया पिनेटीफ़िडा और ऐरम मैकुलेटम से भी अरारूट प्राप्त होता है। .

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