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भारतीय अंक प्रणाली

सूची भारतीय अंक प्रणाली

भारतीय अंक प्रणाली को पश्चिम के देशों में हिंदू-अरबी अंक प्रणाली के नाम से जाना जाता है क्योंकि यूरोपीय देशों को इस अंक प्रणाली का ज्ञान अरब देश से प्राप्त हुआ था। जबकि अरबों को यह ज्ञान भारत से मिला था। भारतीय अंक प्रणाली में 0 को मिला कर कुल 10 अंक होते हैं। संसार के अधिकतम 10 अंकों वाली अंक प्रणाली भारतीय अंक प्रणाली पर ही आधारित हैं। फ्रांस के प्रसिद्ध गणितज्ञ पियरे साइमन लाप्लास के अनुसार, .

16 संबंधों: थाई लिपि, दशमलव पद्धति, देवनागरी, देवनागरी अंक, भारतीय संख्या प्रणाली, भारतीय वाहन पंजीकरण पट्ट, भारतीय गणित, भास्कर प्रथम, मुहम्मद इब्न मूसा अल-ख़्वारिज़्मी, रोमन संख्यांक, श्रीनिवास रामानुजन्, सिक्का, हिन्दू-अरबी अंक पद्धति का इतिहास, हिन्दी की गिनती, खान अल-उमदान, अंतर्राष्ट्रीय संख्या पद्धति

थाई लिपि

थाई लिपि में बौद्ध सूत्र थाई लिपि (थाई भाषा: อักษรไทย, अक्षरथय, àksǒn thai), थाई भाषा के अलावा थाईलैण्ड की अन्य अल्पसंख्यक भाषाएँ लिखने के लिये प्रयुक्त होती है। थाई लिपि में ४४ व्यंजन (थाई: พยัญชนะ, बयञचन) और १५ स्वर (थाई: สระ, सर) हैं। थाई स्वरों के कम से कम २८ रूप होते हैं तथा चार टोन-मार्क (थाई: วรรณยุกต์ या วรรณยุต, वन्नयुक/वन्नयुत) होते हैं। देवनागरी की तरह थाई लिपि भी बाएँ से दाएँ लिखी जाती है। इसमें भी मात्राएँ व्यंजन के उपर, नीचे, पहले या बाद में लगाई जाती हैं। थाई लिपि के अपने अंक भी हैं जो हिन्दू अंक प्रणाली पर आधारित है। किन्तु अन्तर्राष्ट्रीय हिन्दू अंक प्रणाली का भी प्रायः उपयोग किया जाता है। .

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दशमलव पद्धति

दशमलव पद्धति या दाशमिक संख्या पद्धति या दशाधारी संख्या पद्धति (decimal system, "base ten" or "denary") वह संख्या पद्धति है जिसमें गिनती/गणना के लिये कुल दस संख्याओं (0, 1, 2, 3, 4, 5, 6, 7, 8, 9) का सहारा लिया जाता है। यह मानव द्वारा सर्वाधिक प्रयुक्त संख्यापद्धति है। उदाहरण के लिये 645.7 दशमलव पद्धति में लिखी एक संख्या है। (गलतफहमी से बचने के लिये यहाँ दशमलव बिन्दु के स्थान पर 'कॉमा' का प्रयोग किया गया है।) इस पद्धति की सफलता के बहुत से कारण हैं-.

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देवनागरी

'''देवनागरी''' में लिखी ऋग्वेद की पाण्डुलिपि देवनागरी एक लिपि है जिसमें अनेक भारतीय भाषाएँ तथा कई विदेशी भाषाएं लिखीं जाती हैं। यह बायें से दायें लिखी जाती है। इसकी पहचान एक क्षैतिज रेखा से है जिसे 'शिरिरेखा' कहते हैं। संस्कृत, पालि, हिन्दी, मराठी, कोंकणी, सिन्धी, कश्मीरी, डोगरी, नेपाली, नेपाल भाषा (तथा अन्य नेपाली उपभाषाएँ), तामाङ भाषा, गढ़वाली, बोडो, अंगिका, मगही, भोजपुरी, मैथिली, संथाली आदि भाषाएँ देवनागरी में लिखी जाती हैं। इसके अतिरिक्त कुछ स्थितियों में गुजराती, पंजाबी, बिष्णुपुरिया मणिपुरी, रोमानी और उर्दू भाषाएं भी देवनागरी में लिखी जाती हैं। देवनागरी विश्व में सर्वाधिक प्रयुक्त लिपियों में से एक है। मेलबर्न ऑस्ट्रेलिया की एक ट्राम पर देवनागरी लिपि .

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देवनागरी अंक

देवनागरी लिपि में गिनती के लिए दस अंकों वाली दशमलव आधारित गणना पद्धति का प्रयोग किया जाता है। ये दस अंक भारतीय अंकों के अंतर्राष्ट्रीय रूप के समानांतर प्रचलित हैं। देवनागरी लिपि का प्रयोग करने वाली विभिन्न भाषाओं में ये अंक आम तौर पर प्रयुक्त होते हैं। प्राचीन काल से ही प्रयुक्त इन अंकों को 19वीं सदी के उत्तरार्ध में आधिकारीक दर्जा दिलाने की कोशिश शुरु हुई। भारतीय संविधान ने अनुच्छेद 351 में देवनागरी लिपि में लिखी हिन्दी को तो संघ की राजभाषा घोषित कर दिया किंतु अंक अंतर्राष्ट्रीय ही रखा। 1954 में तत्कालीन राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद ने अपने संविधान प्रदत्त अधिकार का प्रयोग करते हुए देवनागरी अंक के प्रयोग का अध्यादेश जारी किया। तब से देवनागरी लिपि अंतर्राष्ट्रीय एवं देवनागरी अंकों के साथ भी लिखी जाने लगी। .

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भारतीय संख्या प्रणाली

भारतीय संख्या प्रणाली भारतीय उपमहाद्वीप की परम्परागत गिनने की प्रणाली है जो भारत, पाकिस्तान, बंगलादेश और नेपाल में आम इस्तेमाल होती है। जहाँ पश्चिमी प्रणाली में दशमलव के तीन स्थानों पर समूह बनते हैं वहाँ भारतीय प्रणाली में दो स्थानों पर बनते हैं। .

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भारतीय वाहन पंजीकरण पट्ट

भारत के द्वि-वर्ण राज्य कूट भारत में सभी मोटरचालित वाहनों को एक पंजीकरण संख्या (या लाइसेंस नम्बर) दिया जाता है। लाइसेंस पट्ट को नामपट्ट भी कहते हैं। यह संख्या सभी प्रदेशों में जिला स्तर के क्षेत्रीय परिवहन कार्यालय (RTO) द्वारा दिया जाता है। यह चालन अनुज्ञप्‍ति पट्ट वाहन के आगे और पश्च दिशा में लगाया जाता है। नियमानुसार सभी पट्टियाँ लातिन वर्णों सहित आधुनिक भारतीय अंक प्रणाली में होने चाहिए। .

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भारतीय गणित

गणितीय गवेषणा का महत्वपूर्ण भाग भारतीय उपमहाद्वीप में उत्पन्न हुआ है। संख्या, शून्य, स्थानीय मान, अंकगणित, ज्यामिति, बीजगणित, कैलकुलस आदि का प्रारम्भिक कार्य भारत में सम्पन्न हुआ। गणित-विज्ञान न केवल औद्योगिक क्रांति का बल्कि परवर्ती काल में हुई वैज्ञानिक उन्नति का भी केंद्र बिन्दु रहा है। बिना गणित के विज्ञान की कोई भी शाखा पूर्ण नहीं हो सकती। भारत ने औद्योगिक क्रांति के लिए न केवल आर्थिक पूँजी प्रदान की वरन् विज्ञान की नींव के जीवंत तत्व भी प्रदान किये जिसके बिना मानवता विज्ञान और उच्च तकनीकी के इस आधुनिक दौर में प्रवेश नहीं कर पाती। विदेशी विद्वानों ने भी गणित के क्षेत्र में भारत के योगदान की मुक्तकंठ से सराहना की है। .

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भास्कर प्रथम

भास्कर प्रथम (600 ई – 680 ईसवी) भारत के सातवीं शताब्दी के गणितज्ञ थे। संभवतः उन्होने ही सबसे पहले संख्याओं को हिन्दू दाशमिक पद्धति में लिखना आरम्भ किया। उन्होने आर्यभट्ट की कृतियों पर टीका लिखी और उसी सन्दर्भ में ज्या य (sin x) का परिमेय मान बताया जो अनन्य एवं अत्यन्त उल्लेखनीय है। आर्यभटीय पर उन्होने सन् ६२९ में आर्यभटीयभाष्य नामक टीका लिखी जो संस्कृत गद्य में लिखी गणित एवं खगोलशास्त्र की प्रथम पुस्तक है। आर्यभट की परिपाटी में ही उन्होने महाभास्करीय एवं लघुभास्करीय नामक दो खगोलशास्त्रीय ग्रंथ भी लिखे। .

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मुहम्मद इब्न मूसा अल-ख़्वारिज़्मी

अबू अब्दल्लाह मुहम्मद इब्न मूसा अल-ख़्वारिज़्मी (अरबी:, अंग्रेज़ी: Muḥammad ibn Mūsā al-Khwārizmī; जन्म: लगभग ७८० ई; देहांत: लगभग ८५० ई), जिन्हें पश्चिमी देशों में ग़लती से अल्गोरित्मी (Algoritmi) और अलगौरिज़िन​ (Algaurizin) भी कहा जाता था, एक ईरानी-मूल के गणितज्ञ, खगोलशास्त्री और भूगोलवेत्ता थे।, Cristopher Moore, Stephan Mertens, pp.

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रोमन संख्यांक

रोमन संख्यांक द्वारा दर्शायी गयी संख्यांक पद्धत्ति का प्राचीन रोम में उद्गम हुआ और भली भांति उत्तर मध्य युग में पूर्ण यूरोप में संख्याओं को लिखना का सामान्य तरीका बना रहा। ऑस्ट्रिया के लोफ़र नामक शहर में एक गिरजे के ऊपर उसके निर्माण की तिथि रोमन अंकों में तराशी हुई है - MDCLXXVIII का अर्थ सन् १६७८ है रोमन अंक प्राचीन रोम की संख्या प्रणाली है, जिसमें लातिनी भाषा के अक्षरों को जोड़कर संख्याएँ लिखी जाती थीं। पहले दस रोमन अंक इस प्रकार हैं - .

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श्रीनिवास रामानुजन्

श्रीनिवास रामानुजन् इयंगर (तमिल ஸ்ரீனிவாஸ ராமானுஜன் ஐயங்கார்) (22 दिसम्बर 1887 – 26 अप्रैल 1920) एक महान भारतीय गणितज्ञ थे। इन्हें आधुनिक काल के महानतम गणित विचारकों में गिना जाता है। इन्हें गणित में कोई विशेष प्रशिक्षण नहीं मिला, फिर भी इन्होंने विश्लेषण एवं संख्या सिद्धांत के क्षेत्रों में गहन योगदान दिए। इन्होंने अपने प्रतिभा और लगन से न केवल गणित के क्षेत्र में अद्भुत अविष्कार किए वरन भारत को अतुलनीय गौरव भी प्रदान किया। ये बचपन से ही विलक्षण प्रतिभावान थे। इन्होंने खुद से गणित सीखा और अपने जीवनभर में गणित के 3,884 प्रमेयों का संकलन किया। इनमें से अधिकांश प्रमेय सही सिद्ध किये जा चुके हैं। इन्होंने गणित के सहज ज्ञान और बीजगणित प्रकलन की अद्वितीय प्रतिभा के बल पर बहुत से मौलिक और अपारम्परिक परिणाम निकाले जिनसे प्रेरित शोध आज तक हो रहा है, यद्यपि इनकी कुछ खोजों को गणित मुख्यधारा में अब तक नहीं अपनाया गया है। हाल में इनके सूत्रों को क्रिस्टल-विज्ञान में प्रयुक्त किया गया है। इनके कार्य से प्रभावित गणित के क्षेत्रों में हो रहे काम के लिये रामानुजन जर्नल की स्थापना की गई है। .

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सिक्का

एक सिक्का धातु का एक ठोस टुकड़ा है जो वजन में मानकीकृत होता है, जिसे व्यापार की सुविधाओं के लिए बहुत बड़ी मात्रा में उत्पादित किया जाता है और मुख्य रूप से देश, प्रदेश या क्षेत्र में एक निविदा कानूनी वाणिज्य के लिए नामित टोकन के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। आमतौर पर सिक्के को धातु या एक धातु सदृश सामग्री और कभी कभी सिंथेटिक सामग्री से बनाया जाता है, सामान्यतः जिसकी बनावट गोल चिपटी होती है और यह अक्सर सरकार द्वारा जारी की जाती हैं। प्रतिदिन के सिक्के के संचरण से लेकर बड़ी संख्या में बुलियन सिक्के के भंडारण के लिए, विभिन्न प्रकार के लेनदेन में सिक्के का प्रयोग पैसे के रूप में होता है। आजकल के मौजूदा लेनेदेन में आधुनिक पैसे की प्रणाली में सिक्के और बैंकनोट नकद के रूप में उपयोग किए जाते हैं। सिक्के का उपयोग बिलों के भुगतान के लिए किया जाता है और सामान्यतः इसे कम इकाइयों के मूल्यों के लिए और बैंकनोट को उच्च मूल्य के लिए मुद्रीकृत किया जाता है; कई पैसों की प्रणाली में उच्चतम-मूल्य के सिक्के का मूल्य न्यूनतम-मूल्य के बैंकनोट से भी कम होता है। पिछले सौ वर्षों में, परिसंचरण सिक्के का अंकित मूल्य आमतौर पर उन्हें बनाने में इस्तेमाल धातु के कुल मूल्य से अधिक होता है, लेकिन आम तौर पर सिक्के के परिसंचरण के इतिहास में ऐसा हमेशा नहीं हुआ है, कई बार परिसंचरण सिक्के कीमती धातुओं से बनाए गए हैं। इस अपवाद से कि सिक्के का अंकित मूल्य इस्तेमाल धातु के कुल मूल्य से अधिक हो, कई बार "बुलियन सिक्कों" को चादीं और सोने (और, कदाचित, अन्य धातु जैसे प्लैटिनम या पैलेडियम), मूल्यवान धातुओं में संग्राहक या निवेशक के उद्दिष्ट से बनाए जाते हैं। आधुनिक सोने के संग्राहक/निवेशक सिक्कों के उदाहरण में संयुक्त राज्य अमेरिका द्वारा मुद्रित किए गए अमेरिकन गोल्ड ईगल, कनाडा द्वारा मुद्रित किए गए कनाडा गोल्ड मेपल लीफ, दक्षिण अफ्रीका द्वारा मुद्रित किए गए क्रुगेरांड शामिल हैं। अमेरिकन गोल्ड ईगल का अंकित मूल्य अमेरिकन $50 है और कनाडा गोल्ड मेपल लीफ सिक्के का (विशुद्ध प्रतीकात्मक) अंकित मूल्य नाममात्र ही है (उदाहरणार्थ, C$50 1 ऑउंस के लिए); लेकिन क्रुगेर्रंद का नहीं है। ऐतिहासिक दृष्टि से, कई सिक्के के धातु (मिश्रित धातु सहित) और अन्य सामग्री व्यावहारिक, कलात्मक और प्रायोगिक रूप से उत्पादित परिसंचरण, संग्रह और धातु निवेश के लिए इस्तेमाल किए जाते हैं, जहां बुलियन सिक्के अन्य बुलियन की तुलना बुलियन सिक्के धातु की मात्रा और शुद्धता के लिए अक्सर अधिक सुविधाजनक तरीके से संग्रह किए जाते हैं। लंबे समय से सिक्के पैसे की अवधारणा से जुड़े हुए हैं, जैसा कि यह तथ्य परिलक्षित है कि "सिक्का" और "मुद्रा" शब्द समानार्थक है। काल्पनिक मुद्राओं में भी सिक्कों के नाम होते हैं (जैसे, किसी वस्तु के लिए कहा जा सकता है जो 123 सिक्का या 123 सिक्कों के बराबर हो सकता है).

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हिन्दू-अरबी अंक पद्धति का इतिहास

यूरोप में बारहवीं शताब्दी तक रोमन अंकों का प्रयोग होता था। रोमन अंक प्रणाली में केवल सात अंक हैं, जो अक्षरों द्वारा व्यक्त किए जाते हैं। ये अक्षरांक हैं- I (एक), V (पांच), L (पचास), C (सौ), D (पांच सौ) तथा M (एक हजार)। इन्हीं अंको के जोड़ ने घटाने से कोई भी संख्या लिखी जाती है। उदाहरण के लिए अगर तीन लिखना है तो एक का चिन्ह तीन बार लिख दिया III। आठ लिखना है तो पांच के दायीं तरफ तीन एक-एक के चिन्ह लिखकर जोड़ दिए और VIII (आठ) हो गया। यह प्रणाली इतनी कठिन और उलझी हुई है कि जब बारहवीं शताब्दी में यूरोप का भारतीय अंक प्रणाली से परिचय हुआ तो उसने उसे स्वीकार ही नहीं किया, अपितु एकदम अपना लिया। यूरोप में कुछ शताब्दियों बाद जो वैज्ञानिक औद्योगिक क्रान्ति हुई, उसके मूल में भारतीय अंक गणना का ही योगदान है। .

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हिन्दी की गिनती

हिन्दी की गिनती, संस्कृत की गिनती से अपभ्रंश होकर पैदा हुई है। उदाहरण के लिये हिन्दी का 'साठ' संस्कृत के 'षष्ठि' से उत्पन्न है; 'अस्सी' संस्कृत के 'असीति' से। इसी प्रकार देख सकते हैं कि हिन्दी की गिनती के सभी शब्द संस्कृत से व्युत्पन्न हैं। ० - शून्य १ - एक २ - दो ३ - तीन ४ - चार ५ - पाँच ६ - छः / छह ७ - सात ८ - आठ ९ - नौ १० - दस ११ - ग्यारह १२ - बारह १३ - तेरह १४ - चौदह १५ - पन्द्रह १६ - सोलह १७ - सत्रह १८ - अट्ठारह १९ - उन्नीस २० - बीस २१ - इक्कीस २२ - बाइस २३ - तेइस २४ - चौबीस २५ - पच्चीस २६ - छब्बीस २७ - सत्ताइस २८ - अट्ठाइस २९ - उनतीस ३० - तीस ३१ - इकत्तीस ३२ - बत्तीस ३३ - तैंतीस ३४ - चौंतीस ३५ - पैंतीस ३६ - छत्तीस ३७ - सैंतीस ३८ - अड़तीस ३९ - उन्तालीस ४० - चालीस ४१ - इकतालीस ४२ - बयालीस ४३ - तिरालीस/तैंतालीस ४४ - चवालीस ४५ - पैंतालीस ४६ - छियालीस ४७ - सैंतालीस ४८ - अड़तालीस ४९ - उन्चास ५० - पचास ५१ - इक्यावन ५२ - बावन ५३ - तिरपन ५४ - चौवन ५५ - पचपन ५६ - छप्पन ५७ - सत्तावन ५८ - अट्ठावन ५९ - उनसठ ६० - साठ ६१ - इकसठ ६२ - बासठ ६३ - तिरसठ ६४ - चौंसठ ६५ - पैंसठ ६६ - छाछठ/छियासठ ६७ - सड़सठ ६८ - अड़सठ ६९ - उन्हत्तर ७० - सत्तर ७१ - इकहत्तर ७२ - बहत्तर ७३ - तिहत्तर ७४ - चौहत्तर ७५ - पचहत्तर ७६ - छिहत्तर ७७ - सतहत्तर ७८ - अठहत्तर ७९ - उन्यासी ८० - अस्सी ८१ - इक्यासी ८२ - बयासी ८३ - तिरासी ८४ - चौरासी ८५ - पचासी/पिच्यासी ८६ - छियासी ८७ - सतासी ८८ - अट्ठासी ८९ - नवासी ९० - नब्बे ९१ - इक्यानबे ९२ - बानबे ९३ - तिरानबे ९४ - चौरानबे ९५ - पनचानबे/पिच्यानबे ९६ - छियानबे ९७ - सनतानबे/सत्तानबे ९८ - अट्ठानबे ९९ - निन्यान्बे १०० - सौ (एक सौ) १२० - एक सौ बीस १००० - एक हजार १३४० - एक हजार तीन सौ चालीस १०००० - दस हजार १००००० - एक लाख १०००००० - दस लाख १००००००० - एक करोड १०००००००० - दस करोड १००००००००० - एक अरब १०००००००००० - दस अरब १००००००००००० - एक खरब १०००००००००००० - दस खरब १००००००००००००० - एक नील १०००००००००००००० - दस नील १००००००००००००००० - एक पदम १०००००००००००००००० - दस पदम १००००००००००००००००० - एक शंख १०००००००००००००००००० - दस शंख अनन्त - infinite, infinty असंख्य, अनगिनत - innuberable, uncountable नगण्य - negligible १/२ - एक बटा दो; आधा १/३ - एक बटा तीन; तिहाई; एक तिहाई १/४ - एक बटा चार; चौथाई; एक चौथाई; एक पाव ३/४ - तीन बटा चार; तीन चौथाई; पौन २/३ - दो तिहाई क/ख - क बटा ख १०% - दस प्रतिशत १+१/४ - सवा (सवा एक, नहीं) १+१/२ - डेढ (साढे एक, नहीं) १+३/४ - पौने दो २+१/४ - सवा दो २+१/२ - ढाई (साढे दो, नहीं) ३+१/२ - साढे (सार्ध) तीन ४+१/२ - सार्ध चार १२.५७ - बारह दशमलव पाँच सात ५८७.७५९ पाँच सौ सत्तासी दशमलव सात पाँच नौ .

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खान अल-उमदान

खान अल-उमदान इज़राइल देश के आकेर के पुराने शहर में स्थित एक "खान", यीने कारवां सराय है। इसका निर्माण अहमद पाशा अल जज्जर के शासन के दौरान उस्मान साम्राज्य में हुआ था। ये खान-ए-अवामीद के नाम से भी जानी जाती है। इस नाम का शाब्दिक अर्थ "खंबोंकी सराय" होता है। इस दो मंजिला इमारत का निर्माण सन् १७८४ में पुर्ण हुआ। .

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अंतर्राष्ट्रीय संख्या पद्धति

अन्तरराष्ट्रीय संख्या पद्धति (International System of Numeration) संख्यांकन की दशमलव पद्धति पर आधारित प्रणाली है जिसमें संख्याओं को तीन-तीन अंकों के समूह में लिखा और व्यक्त किया जाता है। यह भारतीय संख्या पद्धति से भिन्न है जिसमें 9,999 से अधिक बड़ी संख्याओं में बायें के अंको को दो के समूह में (अल्पविराम द्वारा) अलग करके लिखा जाता है। अन्तर्राष्ट्रीय पद्धति में इसी तीन अंकों के समूह में समूहन के कारण इन संख्याओं का परिमाण (magnitude) भाषा में व्यक्त करने के लिये दिए गये नाम मिलियन, ट्रिलियन, डेसिलियन इत्यादि का प्रयोग होता है जबकि भारतीय पद्धति में लाख, करोड़, अरब, खरब इत्यादि नाम प्रचलित हैं जो दो-दो अंकों में समूहन का परिणाम हैं। अन्तर्राष्ट्रीय मापन पद्धति भी इसी अंतर्राष्ट्रीय संख्या पद्धति का अनुसरण करती है और बड़ी संख्याओं वाले मानों को व्यक्त करने के लिये किलो, मेगा, गीगा, टेरा, पेटा इत्यादि का उपसर्ग की तरह जोड़ा जाना इसी संख्या पद्धति के अनुसार है। यह प्रणालियाँ संख्याओं के लिखने और उनके भाषाई नामों के साथ बेहतर तालमेल वाली हैं। माना जाता है कि जिन पद्धतियों में यह तालमेल बहुत स्पष्ट नहीं होता, संख्याओं को सीखने में अधिक कठिनाई आती है। उदाहरण के लिये फ्रेंच और जर्मन संख्या पद्धतियों में संख्याओं के दस के गुणकों में व्यवहार में आने वाले नाम इकाई संख्याओं के नामों से थोड़े भिन्न होते हैं .

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यहां पुनर्निर्देश करता है:

भारतीय अंक, हिन्दू अंक प्रणाली, हिन्दू-अरबी अंक प्रणाली

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