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प्लेट विवर्तनिकी

सूची प्लेट विवर्तनिकी

प्लेट विवर्तनिकी (Plate tectonics) एक वैज्ञानिक सिद्धान्त है जो पृथ्वी के स्थलमण्डल में बड़े पैमाने पर होने वाली गतियों की व्याख्या प्रस्तुत करता है। साथ ही महाद्वीपों, महासागरों और पर्वतों के रूप में धरातलीय उच्चावच के निर्माण तथा भूकम्प और ज्वालामुखी जैसी घटनाओं के भौगोलिक वितरण की व्याख्या प्रस्तुत करने का प्रयास करता है। यह सिद्धान्त बीसवीं शताब्दी के प्रथम दशक में अभिकल्पित महाद्वीपीय विस्थापन नामक संकल्पना से विकसित हुआ जब 1960 के दशक में ऐसे नवीन साक्ष्यों की खोज हुई जिनसे महाद्वीपों के स्थिर होने की बजाय गतिशील होने की अवधारणा को बल मिला। इन साक्ष्यों में सबसे महत्वपूर्ण हैं पुराचुम्बकत्व से सम्बन्धित साक्ष्य जिनसे सागर नितल प्रसरण की पुष्टि हुई। हैरी हेस के द्वारा सागर नितल प्रसरण की खोज से इस सिद्धान्त का प्रतिपादन आरंभ माना जाता है और विल्सन, मॉर्गन, मैकेंज़ी, ओलिवर, पार्कर इत्यादि विद्वानों ने इसके पक्ष में प्रमाण उपलब्ध कराते हुए इसके संवर्धन में योगदान किया। इस सिद्धान्त अनुसार पृथ्वी की ऊपरी लगभग 80 से 100 कि॰मी॰ मोटी परत, जिसे स्थलमण्डल कहा जाता है, और जिसमें भूपर्पटी और भूप्रावार के ऊपरी हिस्से का भाग शामिल हैं, कई टुकड़ों में टूटी हुई है जिन्हें प्लेट कहा जाता है। ये प्लेटें नीचे स्थित एस्थेनोस्फीयर की अर्धपिघलित परत पर तैर रहीं हैं और सामान्यतया लगभग 10-40 मिमी/वर्ष की गति से गतिशील हैं हालाँकि इनमें कुछ की गति 160 मिमी/वर्ष भी है। इन्ही प्लेटों के गतिशील होने से पृथ्वी के वर्तमान धरातलीय स्वरूप की उत्पत्ति और पर्वत निर्माण की व्याख्या प्रस्तुत की जाती है और यह भी देखा गया है कि प्रायः भूकम्प इन प्लेटों की सीमाओं पर ही आते हैं और ज्वालामुखी भी इन्हीं प्लेट सीमाओं के सहारे पाए जाते हैं। प्लेट विवर्तनिकी में विवर्तनिकी (लातीन:tectonicus) शब्द यूनानी भाषा के τεκτονικός से बना है जिसका अर्थ निर्माण से सम्बंधित है। छोटी प्लेट्स की संख्या में भी कई मतान्तर हैं परन्तु सामान्यतः इनकी संख्या 100 से भी अधिक स्वीकार की जाती है। .

82 संबंधों: टेथीज सागर, डब्ल्यू॰ जे॰ मॉर्गन, डिएगो गार्सिया, दिसम्बर २०१५ हिंदू कुश भूकंप, दक्षिण अमेरिकी प्लेट, द्वीप चाप, द्वीपसमूह, नाज़का प्लेट, निम्नस्खलन, नेचर (पत्रिका), पर्यटन भूगोल, पुराचुम्बकत्व, पुंजक, प्रशांत प्लेट, पृथ्वी, पृथ्वी का इतिहास, पृथ्वी की आतंरिक संरचना, पैंजिया, फ़ारालोन प्लेट, फ़िलिपीन सागर, फ़िलिपीन सागर प्लेट, फ़िलिपीन गर्त, बंगाल की खाड़ी, भारतीय प्लेट, भ्रंश (भूविज्ञान), भू-आकृति विज्ञान, भूतापीय प्रवणता, भूप्रावार पिच्छक, भूसन्नति, भूसंचलन, भूगतिकी, भूगोल शब्दावली, भूकम्प, मध्य-महासागर पर्वतमाला, महाद्वीपीय भूपर्पटी, महाद्वीपीय विस्थापन, महासागरीय भूपर्पटी, मंगल ग्रह, यूरेशियाई प्लेट, रिफ़्ट (भूविज्ञान), रिफ़्ट घाटी, लघुतर सुन्दा द्वीपसमूह, लंबाई के आधार पर नदियों की सूची, शुक्र, समुद्र तल, सागर नितल प्रसरण, सागरगत ज्वालामुखी, सिएर्रा मोरेना, सिनाबंग पर्वत, संमिलन सीमा, ..., सुलु द्वीपसमूह, स्थलमण्डल, स्कोश्या प्लेट, हिन्द-ऑस्ट्रेलियाई प्लेट, हिमालय, हिमालयी भूगर्भशास्त्र, हुआन दे फ़ूका प्लेट, हैरी हेस, जलतापीय छिद्र, ज़मीनी पुल, ज्वालामुखी, ज्वालामुखीय चाप, जैक ओलिवर, जॉन टूज़ो विल्सन, वलन, वलित पर्वत, आनातोलियाई प्लेट, काकेशस पर्वत शृंखला, क्यूशू, क्रांतिकारी बदलाव, कैरीबियाई प्लेट, कॅरीबियाई सागर, कोकोस प्लेट, कीनिया, अप्रैल 2015 नेपाल भूकम्प, अफ़ार द्रोणी, अफ़्रीकी प्लेट, अरबी प्लेट, अंटार्कटिक प्लेट, अक्टूबर २०१५ हिन्दू कुश भूकंप, उत्तर अमेरिकी प्लेट, २००५ कश्मीर भूकम्प सूचकांक विस्तार (32 अधिक) »

टेथीज सागर

टेथीज सागर गोंडवाना लैण्ड और लौरेशिया के मध्य स्थित एक सागर के रूप में कल्पित किया जाता है जो एक छिछला और संकरा सागर था और इसी में जमा अवसादों के प्लेट विवर्तनिकी के परिणामस्वरूप अफ्रीकी और भारतीय प्लेटों के यूरेशियन प्लेट से टकराने के कारण हिमालय और आल्प्स जैसे पहाड़ों की रचना हुई। .

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डब्ल्यू॰ जे॰ मॉर्गन

विल्लियम जेसन मॉर्गन (अंग्रेज़ी: William Jason Morgan; जन्म:अक्तूबर 10, 1935) एक अमेरिकी भूवैज्ञानिक हैं जिन्होंने प्लेट विवर्तनिकी के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान दिया। वे प्रिंस्टन विश्विद्यालय से सेवानिवृत हुए और वर्तमान में हार्वर्ड विश्विद्यालय में विजिटिंग स्कॉलर के रूप में कार्यरत हैं। .

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डिएगो गार्सिया

डिएगो गार्सिया एक उष्णकटिबंधीय, पदचिह्न-आकार का मूंगे का प्रवालद्वीप (एटोल) है जो भूमध्य रेखा के दक्षिण में मध्य हिंद महासागर में सात डिग्री, छब्बीस मिनट दक्षिण अक्षांश (भूमध्य रेखा के दक्षिण में) पर स्थित है। यह ब्रिटिश हिंद महासागरीय क्षेत्र का हिस्सा है और इसकी अवस्थिति 72°23' पूर्व देशांतर में है। यह एटोल अफ्रीकी तट के लगभग पूर्व में और भारत के दक्षिण सिरे से दक्षिण में है (चित्र 2.3).

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दिसम्बर २०१५ हिंदू कुश भूकंप

२५ दिसंबर २०१५ को हिंदू कुश के क्षेत्र में एक 6.3 परिमाण के भूकंप ने दक्षिण एशिया को प्रभावित किया। पाकिस्तान में एक महिला की मृत्यु हो गई। पाकिस्तान और अफगानिस्तान में कम से कम 100 लोग घायल हो गए। भूकंप को ज्यादातर ताजिकिस्तान और भारत में महसूस किया गया था। अफगानिस्तान-तजाकिस्तान के सीमा क्षेत्र में भूकंप का केंद्र 203.4 किलोमीटर की गहराई पर होने की सूचना मिली थी। .

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दक्षिण अमेरिकी प्लेट

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द्वीप चाप

द्वीप चाप (island arc) एक ऐसा द्वीप समूह होता है जिसमें द्वीप, ज्वालामुखी व समुद्र के नीचे उभरी चट्टानें एक चाप (arc) के आकार में सुसज्जित होती हैं। यह द्वीप चाप अक्सर दो भौगोलिक प्लेटों की सीमा पर स्थित होते हैं और उस सीमा पर एक प्लेट के दूसरी प्लेट के नीचे दब जाने से निर्मित होते हैं। चढ़ी हुई प्लेट उठने से द्वीप बनते हैं और दबी हुई प्लेट की तरफ़ एक गहरी समुद्री खाई भी अक्सर अस्तित्व में होती है। प्लेटों की इस जूझन से मैग्मा भी उभरता है और अक्सर ज्वालामुखी भी द्वीप चापों में मिलते हैं। .

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द्वीपसमूह

भारत के पड़ौसी देश बर्मा में स्थित मेरगुई द्वीपसमूह द्वीपसमूह किसी सागर, महासागर या झील में स्थित द्वीपों की शृंखला को कहते हैं। भारत के अण्डमान, निकोबार और लक्षद्वीप द्वीपसमूहों के उदहारण हैं। .

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नाज़का प्लेट

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निम्नस्खलन

भूविज्ञान में निम्नस्खलन या सबडक्शन (subduction) उस प्रक्रिया को कहते हैं जिसमें दो भौगोलिक तख़्तों की संमिलन सीमा पर एक तख़्ता दूसरे के नीचे फिसलकर दबने लगता है, यानि कि उसका दूसरे तख़्ते के नीचे स्खलन होने लगता है। निम्नस्खलन क्षेत्र (सबडक्शन ज़ोन, subduction zone) पृथ्वी के वे इलाक़े होते हैं जहाँ यह निम्नस्खलन चल रहा हो। अक्सर इन निम्नस्खलन क्षेत्रों में ज्वालामुखी, पर्वतमालाएँ, या (यदि यह समुद्री क्षेत्र में हो) महासागरीय गर्त (खाईयाँ या ट्रेन्च) बन जाते हैं। निम्नस्खलन की प्रक्रिया की गति चंद सेन्टीमीटर प्रति वर्ष ही होती है। एक तख़्ता दूसरे तख़्ते के नीचे दो से आठ सेमी प्रति वर्ष के औसत दर से खिसकता है। भारतीय उपमहाद्वीप में भारतीय प्लेट के यूरेशियाई प्लेट की संमिलन सीमा पर भारतीय प्लेट के निम्नस्खलन से ही हिमालय व तिब्बत के पठार की उच्चभूमि का निर्माण हुआ है। .

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नेचर (पत्रिका)

नेचर - यह ब्रिटिश की एक प्रमुख वैज्ञानिक पत्रिका है जो पहली बार 4 नवम्बर 1869 को प्रकाशित की गयी थी। दुनिया की अंतर्विषय वैज्ञानिक पत्रिकाओं में इस पत्रिका का उल्लेख सबसे उच्च स्थान पर किया जाता है। अब तो अधिकांश वैज्ञानिक पत्रिकाएं अति-विशिष्ट हो गयीं हैं और नेचर उन गिनी-चुनी पत्रिकाओं में से है जो आज भी, वैज्ञानिक क्षेत्र की विशाल श्रेणी के मूल अनुसंधान लेख प्रकाशित करती है। वैज्ञानिक अनुसंधान के ऐसे अनेक क्षेत्र हैं जिनमें किये जाने वाले नए व महत्वपूर्ण विकासों की जानकारी तथा शोध-सम्बन्धी मूल-लेख या पत्र नेचर ' में प्रकाशित किये जाते हैं। हालांकि इस पत्रिका के प्रमुख पाठकगण अनुसंधान करने वाले वैज्ञानिक हैं, पर आम जनता और अन्य क्षेत्र के वैज्ञानिकों को भी अधिकांश महत्वपूर्ण लेखों के सारांश और उप-लेखन आसानी से समझ आते हैं। हर अंक के आरम्भ में सम्पादकीय, वैज्ञानिकों की सामान्य दिलचस्पी वाले मुद्दों पर लेख व समाचार, ताज़ा खबरों सहित विज्ञान-निधिकरण, व्यापार, वैज्ञानिक नैतिकता और अनुसंधानों में हुए नए-नए शोध सम्बन्धी लेख छापे जाते हैं। पुस्तकों और कला सम्बन्धी लेखों के लिए भी अलग-अलग विभाग हैं। पत्रिका के शेष भाग में ज़्यादातर अनुसंधान-सम्बन्धी लेख छापे जाते हैं, जो अक्सर काफ़ी गहरे और तकनीकी होते हैं। चूंकि लेखों की लम्बाई पर एक सीमा निर्धारित है, अतः पत्रिका में अक्सर अनेक लेखों का सारांश ही छापा जाता है और अन्य विवरणों को पत्रिका के वेबसाइट पर supplementary material (पूरक सामग्री) के तहत प्रकाशित किया जाता है। 2007 में, नेचर ' और सायंस ' - दोनों पत्रिकाओं को संचार व मानवता के लिए प्रिंस ऑफ़ अस्तुरियास अवार्ड प्रदान किया गया। .

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पर्यटन भूगोल

वास्को डि गामा कालीकट, भारत के तट पर 20 मई 1498। पर्यटन भूगोल या भू-पर्यटन, मानव भूगोल की एक प्रमुख शाखा हैं। इस शाखा में पर्यटन एवं यात्राओं से सम्बन्धित तत्वों का अध्ययन, भौगोलिक पहलुओं को ध्यान में रखकर किया जाता है। नेशनल जियोग्रेफ़िक की एक परिभाषा के अनुसार किसी स्थान और उसके निवासियों की संस्कृति, सुरुचि, परंपरा, जलवायु, पर्यावरण और विकास के स्वरूप का विस्तृत ज्ञान प्राप्त करने और उसके विकास में सहयोग करने वाले पर्यटन को "पर्यटन भूगोल" कहा जाता है। भू पर्यटन के अनेक लाभ हैं। किसी स्थल का साक्षात्कार होने के कारण तथा उससे संबंधित जानकारी अनुभव द्वारा प्राप्त होने के कारण पर्यटक और निवासी दोनों का अनेक प्रकार से विकास होता हैं। पर्यटन स्थल पर अनेक प्रकार के सामाजिक तथा व्यापारिक समूह मिलकर काम करते हैं जिससे पर्यटक और निवासी दोनों के अनुभव अधिक प्रामाणिक और महत्त्वपूर्ण बन जाते है। भू पर्यटन परस्पर एक दूसरे को सूचना, ज्ञान, संस्कार और परंपराओं के आदान-प्रदान में सहायक होता है, इससे दोनों को ही व्यापार और आर्थिक विकास के अवसर मिलते हैं, स्थानीय वस्तुओं कलाओं और उत्पाद को नए बाज़ार मिलते हैं और मानवता के विकास की दिशाएँ खुलती हैं साथ ही बच्चों और परिजनों के लिए सच्ची कहानियाँ, चित्र और फिल्में भी मिलती हैं जो पर्यटक अपनी यात्रा के दौरान बनाते हैं। पर्यटन भूगोल के विकास या क्षय में पर्यटन स्थल के राजनैतिक, सामाजिक और प्राकृतिक कारणों का बहुत महत्त्व होता है और इसके विषय में जानकारी के मानचित्र आदि कुछ उपकरणों की आवश्यकता होती है। .

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पुराचुम्बकत्व

पुराचुम्बकत्व अध्ययन की वह शाखा है जो चट्टानों, अवसादों या अन्य ऐसी चीजों में उनके निर्माण के समय संरक्षित चुम्बकीय गुणों का अध्ययन करती है। इस प्रकार विज्ञान की यह शाखा प्राचीन भूवैज्ञानिक घटनाओं के अध्ययन में सहायक होती है। समुद्री क्रस्ट की चट्टानों के पुराचुम्बकत्व के अध्ययन से इनके निर्माण के समय का पता चलता है और सागर नितल प्रसरण की पुष्टि हुई थी तथा प्लेट विवर्तनिकी का सिद्धान्त मजबूती से स्थापित हुआ (चित्र देखें)। .

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पुंजक

भूविज्ञान में पुंजक या मैसिफ़ (massif) किसी ग्रह की भूपर्पटी (क्रस्ट) का ऐसा अंश होता है जिसकी सीमाएँ भ्रंशों या मुड़ावों से स्पष्ट बन गई हों। भूपर्पटी के हिलने पर पुंजक का आंतरिक ढांचा ज्यों-का-त्यों रहता है हालांकि पूरा पूंजक अपने स्थान का बदलाव कर सकता है। कई बड़े पर्वत और पर्वतमालाएँ ऐसे पूंजकों से बनी हुई हैं जो पूरी-की-पूरी पृथ्वी में विवर्तनिकी प्रक्रियाओं में उभर जाती हैं। .

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प्रशांत प्लेट

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पृथ्वी

पृथ्वी, (अंग्रेज़ी: "अर्थ"(Earth), लातिन:"टेरा"(Terra)) जिसे विश्व (The World) भी कहा जाता है, सूर्य से तीसरा ग्रह और ज्ञात ब्रह्माण्ड में एकमात्र ग्रह है जहाँ जीवन उपस्थित है। यह सौर मंडल में सबसे घना और चार स्थलीय ग्रहों में सबसे बड़ा ग्रह है। रेडियोधर्मी डेटिंग और साक्ष्य के अन्य स्रोतों के अनुसार, पृथ्वी की आयु लगभग 4.54 बिलियन साल हैं। पृथ्वी की गुरुत्वाकर्षण, अंतरिक्ष में अन्य पिण्ड के साथ परस्पर प्रभावित रहती है, विशेष रूप से सूर्य और चंद्रमा से, जोकि पृथ्वी का एकमात्र प्राकृतिक उपग्रह हैं। सूर्य के चारों ओर परिक्रमण के दौरान, पृथ्वी अपनी कक्षा में 365 बार घूमती है; इस प्रकार, पृथ्वी का एक वर्ष लगभग 365.26 दिन लंबा होता है। पृथ्वी के परिक्रमण के दौरान इसके धुरी में झुकाव होता है, जिसके कारण ही ग्रह की सतह पर मौसमी विविधताये (ऋतुएँ) पाई जाती हैं। पृथ्वी और चंद्रमा के बीच गुरुत्वाकर्षण के कारण समुद्र में ज्वार-भाटे आते है, यह पृथ्वी को इसकी अपनी अक्ष पर स्थिर करता है, तथा इसकी परिक्रमण को धीमा कर देता है। पृथ्वी न केवल मानव (human) का अपितु अन्य लाखों प्रजातियों (species) का भी घर है और साथ ही ब्रह्मांड में एकमात्र वह स्थान है जहाँ जीवन (life) का अस्तित्व पाया जाता है। इसकी सतह पर जीवन का प्रस्फुटन लगभग एक अरब वर्ष पहले प्रकट हुआ। पृथ्वी पर जीवन की उत्पत्ति के लिये आदर्श दशाएँ (जैसे सूर्य से सटीक दूरी इत्यादि) न केवल पहले से उपलब्ध थी बल्कि जीवन की उत्पत्ति के बाद से विकास क्रम में जीवधारियों ने इस ग्रह के वायुमंडल (the atmosphere) और अन्य अजैवकीय (abiotic) परिस्थितियों को भी बदला है और इसके पर्यावरण को वर्तमान रूप दिया है। पृथ्वी के वायुमंडल में आक्सीजन की वर्तमान प्रचुरता वस्तुतः जीवन की उत्पत्ति का कारण नहीं बल्कि परिणाम भी है। जीवधारी और वायुमंडल दोनों अन्योन्याश्रय के संबंध द्वारा विकसित हुए हैं। पृथ्वी पर श्वशनजीवी जीवों (aerobic organisms) के प्रसारण के साथ ओजोन परत (ozone layer) का निर्माण हुआ जो पृथ्वी के चुम्बकीय क्षेत्र (Earth's magnetic field) के साथ हानिकारक विकिरण को रोकने वाली दूसरी परत बनती है और इस प्रकार पृथ्वी पर जीवन की अनुमति देता है। पृथ्वी का भूपटल (outer surface) कई कठोर खंडों या विवर्तनिक प्लेटों में विभाजित है जो भूगर्भिक इतिहास (geological history) के दौरान एक स्थान से दूसरे स्थान को विस्थापित हुए हैं। क्षेत्रफल की दृष्टि से धरातल का करीब ७१% नमकीन जल (salt-water) के सागर से आच्छादित है, शेष में महाद्वीप और द्वीप; तथा मीठे पानी की झीलें इत्यादि अवस्थित हैं। पानी सभी ज्ञात जीवन के लिए आवश्यक है जिसका अन्य किसी ब्रह्मांडीय पिण्ड के सतह पर अस्तित्व ज्ञात नही है। पृथ्वी की आतंरिक रचना तीन प्रमुख परतों में हुई है भूपटल, भूप्रावार और क्रोड। इसमें से बाह्य क्रोड तरल अवस्था में है और एक ठोस लोहे और निकल के आतंरिक कोर (inner core) के साथ क्रिया करके पृथ्वी मे चुंबकत्व या चुंबकीय क्षेत्र को पैदा करता है। पृथ्वी बाह्य अंतरिक्ष (outer space), में सूर्य और चंद्रमा समेत अन्य वस्तुओं के साथ क्रिया करता है वर्तमान में, पृथ्वी मोटे तौर पर अपनी धुरी का करीब ३६६.२६ बार चक्कर काटती है यह समय की लंबाई एक नाक्षत्र वर्ष (sidereal year) है जो ३६५.२६ सौर दिवस (solar day) के बराबर है पृथ्वी की घूर्णन की धुरी इसके कक्षीय समतल (orbital plane) से लम्बवत (perpendicular) २३.४ की दूरी पर झुका (tilted) है जो एक उष्णकटिबंधीय वर्ष (tropical year) (३६५.२४ सौर दिनों में) की अवधी में ग्रह की सतह पर मौसमी विविधता पैदा करता है। पृथ्वी का एकमात्र प्राकृतिक उपग्रह चंद्रमा (natural satellite) है, जिसने इसकी परिक्रमा ४.५३ बिलियन साल पहले शुरू की। यह अपनी आकर्षण शक्ति द्वारा समुद्री ज्वार पैदा करता है, धुरिय झुकाव को स्थिर रखता है और धीरे-धीरे पृथ्वी के घूर्णन को धीमा करता है। ग्रह के प्रारंभिक इतिहास के दौरान एक धूमकेतु की बमबारी ने महासागरों के गठन में भूमिका निभाया। बाद में छुद्रग्रह (asteroid) के प्रभाव ने सतह के पर्यावरण पर महत्वपूर्ण बदलाव किया। .

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पृथ्वी का इतिहास

पृथ्वी के इतिहास के युगों की सापेक्ष लंबाइयां प्रदर्शित करने वाले, भूगर्भीय घड़ी नामक एक चित्र में डाला गया भूवैज्ञानिक समय. पृथ्वी का इतिहास 4.6 बिलियन वर्ष पूर्व पृथ्वी ग्रह के निर्माण से लेकर आज तक के इसके विकास की सबसे महत्वपूर्ण घटनाओं और बुनियादी चरणों का वर्णन करता है। प्राकृतिक विज्ञान की लगभग सभी शाखाओं ने पृथ्वी के इतिहास की प्रमुख घटनाओं को स्पष्ट करने में अपना योगदान दिया है। पृथ्वी की आयु ब्रह्माण्ड की आयु की लगभग एक-तिहाई है। उस काल-खण्ड के दौरान व्यापक भूगर्भीय तथा जैविक परिवर्तन हुए हैं। .

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पृथ्वी की आतंरिक संरचना

पृथ्वी की आतंरिक संरचना शल्कीय अर्थात परतों के रूप में है, जैसे प्याज के छिलके परतों के रूप में होते हैं। इन परतों की मोटाई का सीमांकन रासायनिक अथवा यांत्रिक विशेषताओं के आधार पर किया जा सकता है। की सबसे ऊपरी परत एक ठोस परत है, मध्यवर्ती अत्यधिक गाढ़ी परत है और बाह्य तरल तथा आतंरिक ठोस अवस्था में है। की आतंरिक संरचना के बारे में जानकारी के स्रोतों को दो हिस्सों में विभक्त किया जा सकता है। प्रत्यक्ष स्रोत, जैसे से निकले पदार्थो का अध्ययन, से प्राप्त आंकड़े इत्यादि, कम गहराई तक ही जानकारी उपलब्ध करा पाते हैं। दूसरी ओर अप्रत्यक्ष स्रोत के रूप में का अध्ययन अधिक गहराई की विशेषताओं के बारे में जानकारी देता है। .

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पैंजिया

पैंजिया का मानचित्र पैंजिया, पैन्जेया या पैंजी (प्राचीन यूनानी πᾶν पैन "संपूर्ण" और Γαῖα गैया "पृथ्वी", लैटिन भाषा में जेया से), एक विशाल एकीकृत महाद्वीप (सुपरकॉन्टीनेंट) था जिसका अस्तित्व लगभग 250 मिलियन वर्ष पहले पेलियोजोइक और मिजोजोइक युग के दौरान था; मौजूदा महाद्वीप अपने वर्तमान स्वरूप में इसी में से निकल कर आये हैं। यह नाम अल्फ्रेड वेजेनर के महाद्वीपीय प्रवाह के सिद्धांत की वैज्ञानिक चर्चा में गढ़ा गया था। अपनी पुस्तक "द ओरिजिन ऑफ कॉन्टिनेंट्स एंड ओशंस" (डाई एंटस्टेहंग डर कोंटिनेंट एंड ओजियेन) में उन्होंने माना था कि सभी महाद्वीप बाद में विखंडित होने और प्रवाहित होकर अपने वर्तमान स्थानों पर पहुँचने से पहले एक समय में एक विशाल महाद्वीप का हिस्सा थे जिसे उन्होंने "उरकॉन्टिनेंट" कहा था। पैंजिया शब्द 1928 में अल्फ्रेड वेजेनर के सिद्धांत पर चर्चा के लिए आयोजित एक संगोष्ठी के दौरान प्रकाश में आया। एक विशाल महासागर जो पैंजिया को चारों ओर से घेरे हुए था, तदनुसार उसका नाम पैंथालासा रखा गया। .

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फ़ारालोन प्लेट

फ़ारालोन प्लेट का एक बड़ा-सा टुकड़ा (नीले रंग में) पूर्वी उत्तर अमेरिका के नीचे बहुत गहराई पर मिला है फ़ारालोन प्लेट एक प्राचीन भौगोलिक प्लेट था जो उत्तर अमेरिकी प्लेट की पश्चिमी सीमा से टकराकर उसके नीचे धंसने लगा। इसका मध्य भाग तो पूरा उत्तर अमेरिकी प्लेट के नीचे दब चुका है और अब इसके सिर्फ़ तीन अंश बचे हैं - हुआन दे फ़ूका प्लेट, कोकोस प्लेट और नाज़का प्लेट। नीचे दबी हुए प्लेट का एक बड़ा टुकड़ा पूर्वी उत्तर अमेरिका के नीचे बहुत गहराई पर स्थित है। .

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फ़िलिपीन सागर

फ़िलिपीन सागर (Philippine Sea) फ़िलिपीन्ज़ से पूर्वोत्तर में स्थित एक सीमांत समुद्र है। इसका अनुमानित ५० लाख वर्ग किमी का क्षेत्रफल उत्तर प्रशान्त महासागर के पश्चिमी भाग का हिस्सा है। दक्षिणपश्चिम में इसकी सीमा फ़िलिपीन द्वीपसमूह (लूज़ोन, कतंदुआनेस, सामार, लेयते और मिन्दनाओ); दक्षिणपूर्व में हालमाहेरा, मोरोताइ, पालाउ, याप और उलिथि; पूर्व में गुआम, साइपैन और तीनियन; पूर्वोत्तर में बोनिन और इवो जीमा; पश्चिमोत्तर में जापान के होन्शू, शिकोकु और क्युशु द्वीप; तथा पश्चिम में ताइवान पड़ती हैं। इस सागर का फ़र्श एक द्रोणी (बेसिन) है जो भिन्न प्रकार की भूआकृतियों के लिए जानी जाती है, जिसमें भ्रंश उपस्थित हैं। प्लेट विवर्तनिकी के कारण इसकी उत्तरी, पूर्वी और दक्षिणी सीमाओं पर समुद्रसतह से ऊपर उभरी हुई महान चट्टानों द्वीप चापों के रूप में बनी हुई हैं जो इन सीमाओं पर सागर को घेरती हैं। फ़िलिपीन द्वीपसमूह, रयुक्यु द्वीपसमूह और मारियाना द्वीपसमूह इन द्वीप चापों के उदाहरण हैं। फ़िलिपीन सागर की एक और विशेषता बहुत ही गहरी महासागरीय गर्तों की उपस्थिति है, जिनमें फ़िलिपीन गर्त और पृथ्वी का सबसे गहरा स्थान मारियाना गर्त शामिल हैं। .

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फ़िलिपीन सागर प्लेट

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फ़िलिपीन गर्त

फ़िलिपीन गर्त (Philippine Trench), जो कभी-कभी मिन्दनाओ गर्त (Mindanao Trench) भी कहलाता है, पश्चिमी प्रशांत महासागर के फ़िलिपीन सागर भाग में स्थित एक १,३२० किमी तक चलने वाला एक महासागरीय गर्त है। इस गर्त की चौड़ाई लगभग ३० किमी है और इसका सबसे गहरा बिन्दु (जो गालाथेआ गहराई कहलाता है) समुद्रतल से लगभग १०,५४० मीटर (३४,५८० फ़ुट) नीचे है। यह पृथ्वी का तीसरा सबसे निचला स्थान है। .

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बंगाल की खाड़ी

बंगाल की खाड़ी विश्व की सबसे बड़ी खाड़ी है और हिंद महासागर का पूर्वोत्तर भाग है। यह मोटे रूप में त्रिभुजाकार खाड़ी है जो पश्चिमी ओर से अधिकांशतः भारत एवं शेष श्रीलंका, उत्तर से बांग्लादेश एवं पूर्वी ओर से बर्मा (म्यांमार) तथा अंडमान एवं निकोबार द्वीपसमूह से घिरी है। बंगाल की खाड़ी का क्षेत्रफल 2,172,000 किमी² है। प्राचीन हिन्दू ग्रन्थों के अन्सुआर इसे महोदधि कहा जाता था। बंगाल की खाड़ी 2,172,000 किमी² के क्षेत्रफ़ल में विस्तृत है, जिसमें सबसे बड़ी नदी गंगा तथा उसकी सहायक पद्मा एवं हुगली, ब्रह्मपुत्र एवं उसकी सहायक नदी जमुना एवं मेघना के अलावा अन्य नदियाँ जैसे इरावती, गोदावरी, महानदी, कृष्णा, कावेरी आदि नदियां सागर से संगम करती हैं। इसमें स्थित मुख्य बंदरगाहों में चेन्नई, चटगाँव, कोलकाता, मोंगला, पारादीप, तूतीकोरिन, विशाखापट्टनम एवं यानगॉन हैं। .

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भारतीय प्लेट

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भ्रंश (भूविज्ञान)

सान ऐड्रियास भ्रंश (कैलिफोर्निया) का पर से लिया गया दृष्य भूपटल के भौगोलिक प्लेटें दबाव या तनाव के कारण संतुलन की अवस्था में नहीं रहती। जब भी प्लेटों में खिंचाव अधिक बढ़ जाता है, अथवा शिलाओं पर दोनों पार्श्व से पड़ा दबाव उनकी सहन शक्ति के बाहर होता है, तब शिलाएँ अनके प्रभाव से विस्थापित हो जाती हैं अथवा टूट जाती हैं। एक ओर की शिलाएँ दूसरी ओर की शिलाओं की अपेक्षा नीचे या ऊपर चली जाती हैं। इसे ही भ्रंश (Fault) कहते हैं। .

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भू-आकृति विज्ञान

धरती की सतह भू-आकृति विज्ञान (Geomorphology) (ग्रीक: γῆ, ge, "पृथ्वी"; μορφή, morfé, "आकृति"; और λόγος, लोगोस, "अध्ययन") भू-आकृतियों और उनको आकार देने वाली प्रक्रियाओं का वैज्ञानिक अध्ययन है; तथा अधिक व्यापक रूप में, उन प्रक्रियाओं का अध्ययन है जो किसी भी ग्रह के उच्चावच और स्थलरूपों को नियंत्रित करती हैं। भू-आकृति वैज्ञानिक यह समझने की कोशिश करते हैं कि भू-दृश्य जैसे दिखते हैं वैसा दिखने के पीछे कारण क्या है, वे भू-आकृतियों के इतिहास और उनकी गतिकी को जानने का प्रयास करते हैं और भूमि अवलोकन, भौतिक परीक्षण और संख्यात्मक मॉडलिंग के एक संयोजन के माध्यम से भविष्य के बदलावों का पूर्वानुमान करते हैं। भू-आकृति विज्ञान का अध्ययन भूगोल, भूविज्ञान, भूगणित, इंजीनियरिंग भूविज्ञान, पुरातत्व और भू-तकनीकी इंजीनियरिंग में किया जाता है और रूचि का यह व्यापक आधार इस विषय के तहत अनुसंधान शैली और रुचियों की व्यापक विविधता को उत्पन्न करता है। पृथ्वी की सतह, प्राकृतिक और मानवोद्भव विज्ञान सम्बन्धी प्रक्रियाओं के संयोजन की प्रतिक्रिया स्वरूप विकास करती है और सामग्री जोड़ने वाली और उसे हटाने वाली प्रक्रियाओं के बीच संतुलन के साथ जवाब देती है। ऐसी प्रक्रियाएं स्थान और समय के विभिन्न पैमानों पर कार्य कर सकती हैं। सर्वाधिक व्यापक पैमाने पर, भू-दृश्य का निर्माण विवर्तनिक उत्थान और ज्वालामुखी के माध्यम से होता है। अनाच्छादन, कटाव और व्यापक बर्बादी से होता है, जो ऐसे तलछट का निर्माण करता है जिसका परिवहन और जमाव भू-दृश्य के भीतर या तट से दूर कहीं अन्य स्थान पर हो जाता है। उत्तरोत्तर छोटे पैमाने पर, इसी तरह की अवधारणा लागू होती है, जहां इकाई भू-आकृतियां योगशील (विवर्तनिक या तलछटी) और घटाव प्रक्रियाओं (कटाव) के संतुलन के जवाब में विकसित होती हैं। आधुनिक भू-आकृति विज्ञान, किसी ग्रह के सतह पर सामग्री के प्रवाह के अपसरण का अध्ययन है और इसलिए तलछट विज्ञान के साथ निकट रूप से संबद्ध है, जिसे समान रूप से उस प्रवाह के अभिसरण के रूप में देखा जा सकता है। भू-आकृतिक प्रक्रियाएं विवर्तनिकी, जलवायु, पारिस्थितिकी, और मानव गतिविधियों से प्रभावित होती हैं और समान रूप से इनमें से कई कारक धरती की सतह पर चल रहे विकास से प्रभावित हो सकते हैं, उदाहरण के लिए, आइसोस्टेसी या पर्वतीय वर्षण के माध्यम से। कई भू-आकृति विज्ञानी, भू-आकृतिक प्रक्रियाओं की मध्यस्थता वाले जलवायु और विवर्तनिकी के बीच प्रतिपुष्टि की संभावना में विशेष रुचि लेते हैं। भू-आकृति विज्ञान के व्यावहारिक अनुप्रयोग में शामिल है संकट आकलन जिसमें शामिल है भूस्खलन पूर्वानुमान और शमन, नदी नियंत्रण और पुनर्स्थापना और तटीय संरक्षण। .

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भूतापीय प्रवणता

भूतापीय प्रवणता (Geothermal gradient) पृथ्वी में बढ़ती गहराई के साथ बढ़ते तापमान की प्रवणता (rate) को कहते हैं। भौगोलिक तख़्तों की सीमाओं से दूर और पृथ्वी की सतह के पास, हर किमी गहराई के साथ तापमान लगभग २५° सेंटीग्रेड बढ़ता है। .

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भूप्रावार पिच्छक

भूप्रावार पिच्छक अथवा भूप्रावार पिच्छ (अंग्रेज़ी: Mantle plume) एक ऊष्मा के संकेन्द्रण द्वारा उत्पन्न अनियमितता है जो पृथ्वी के अन्दर भूप्रावार-क्रोड सीमा पर धटित होती है और इसके कारण चट्टानी पदार्थ गरम लपक के रूप में ऊपर उठता है। इसके होने की कल्पना सत्तर के दशक में की गयी जब प्लेट सीमाओं से इतर भागों में ज्वालामुखी के वितरण की व्याख्या की आवश्यकता पड़ी। श्रेणी:भूविज्ञान श्रेणी:भूगतिकी.

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भूसन्नति

भूसन्नति भूविज्ञान तथा भूआकृतिविज्ञान की एक अपेक्षाकृत पुरानी संकल्पना और शब्द है जिसका व्यवहार अभी भी कभी-कभी ऐसे छिछले सागरों अथवा सागरीय द्रोणियों के लिए किया जाता है जिनमें अवसाद जमा होने और तली के धँसाव की प्रक्रिया चल रही हो। सर्वप्रथम इस तरह का विचार अमेरिकी भूवैज्ञानिक जेम्स हाल और जेम्स डी डाना द्वारा प्रस्तुत किया गया था और इसके द्वारा पर्वतों की उत्पत्ति की व्याख्या करने वाले सिद्धांत का प्रतिपादन किया गया था। हालाँकि, प्लेट टेक्टॉनिक्स सिद्धांत के बाद यह परिकल्पना अब पुरानी पड़ चुकी है। हाल और डाना ने भूसन्नतियों की परिकल्पना एप्लेशियन पर्वत की उत्पत्ति की व्याख्या प्रस्तुत करने के लिए की थी और बाद में जर्मन भूवैज्ञानिक कोबर ने अपना पर्वत निर्माण का "भूसन्नति सिद्धांत" भी प्रस्तुत किया और अल्पाइन पर्वतों (ऍटलस, ऐल्प्स और हिमालय इत्यादि) के निर्माण की व्यख्या दी। .

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भूसंचलन

धरती के कुछ भाग दूसरे भागों के सापेक्ष धीमी किन्तु लगातार विस्थापित हो रहे हैं। इन्हें ही भूसंचलन (Earth's movements) कहते हैं। ये संचलन, धरती को अपरूपित (deform) करते हैं। भूसंचलन के निम्नलिखित कारक हैं-.

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भूगतिकी

भूगतिकी (Geodynamics) भूभौतिकी की वह शाखा है जो पृथ्वी पर केन्द्रित गति विज्ञान का अध्ययन करती है। इसमें भौतिकी, रसायनिकी और गणित के सिद्धांतों से पृथ्वी की कई प्रक्रियाओं को समझा जाता है। इनमें भूप्रावार (मैंटल) में संवहन (कन्वेक्शन) द्वारा प्लेट विवर्तनिकी का चलन शामिल है। सागर नितल प्रसरण, पर्वत निर्माण, ज्वालामुखी, भूकम्प, भ्रंशण जैसी भूवैज्ञानिक परिघटनाएँ भी इसमें सम्मिलित हैं। भूगतिकी में चुम्बकीय क्षेत्रों, गुरुत्वाकर्षण और भूकम्पी तरंगों का मापन तथा खनिज विज्ञान की तकनीकों के प्रयोग से पत्थरों और उनमें उपस्थित समस्थानिकों (आइसोटोपों) का मापन भूगतिकी में ज्ञानवर्धन की महत्वपूर्ण विधियाँ हैं। पृथ्वी के अलावा अन्य ग्रहों पर अनुसंधान में भी भूगतिकी का प्रयोग होता है। .

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भूगोल शब्दावली

कोई विवरण नहीं।

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भूकम्प

भूकम्प या भूचाल पृथ्वी की सतह के हिलने को कहते हैं। यह पृथ्वी के स्थलमण्डल (लिथोस्फ़ीयर) में ऊर्जा के अचानक मुक्त हो जाने के कारण उत्पन्न होने वाली भूकम्पीय तरंगों की वजह से होता है। भूकम्प बहुत हिंसात्मक हो सकते हैं और कुछ ही क्षणों में लोगों को गिराकर चोट पहुँचाने से लेकर पूरे नगर को ध्वस्त कर सकने की इसमें क्षमता होती है। भूकंप का मापन भूकम्पमापी यंत्रों (सीस्मोमीटर) के साथ करा जाता है, जो सीस्मोग्राफ भी कहलाता है। एक भूकंप का आघूर्ण परिमाण मापक्रम पारंपरिक रूप से नापा जाता है, या सम्बंधित और अप्रचलित रिक्टर परिमाण लिया जाता है। ३ या उस से कम रिक्टर परिमाण की तीव्रता का भूकंप अक्सर अगोचर होता है, जबकि ७ रिक्टर की तीव्रता का भूकंप बड़े क्षेत्रों में गंभीर क्षति का कारण होता है। झटकों की तीव्रता का मापन विकसित मरकैली पैमाने पर किया जाता है। पृथ्वी की सतह पर, भूकंप अपने आप को, भूमि को हिलाकर या विस्थापित कर के प्रकट करता है। जब एक बड़ा भूकंप उपरिकेंद्र अपतटीय स्थति में होता है, यह समुद्र के किनारे पर पर्याप्त मात्रा में विस्थापन का कारण बनता है, जो सूनामी का कारण है। भूकंप के झटके कभी-कभी भूस्खलन और ज्वालामुखी गतिविधियों को भी पैदा कर सकते हैं। सर्वाधिक सामान्य अर्थ में, किसी भी सीस्मिक घटना का वर्णन करने के लिए भूकंप शब्द का प्रयोग किया जाता है, एक प्राकृतिक घटना) या मनुष्यों के कारण हुई कोई घटना -जो सीस्मिक तरंगों) को उत्पन्न करती है। अक्सर भूकंप भूगर्भीय दोषों के कारण आते हैं, भारी मात्रा में गैस प्रवास, पृथ्वी के भीतर मुख्यतः गहरी मीथेन, ज्वालामुखी, भूस्खलन और नाभिकीय परिक्षण ऐसे मुख्य दोष हैं। भूकंप के उत्पन्न होने का प्रारंभिक बिन्दु केन्द्र या हाईपो सेंटर कहलाता है। शब्द उपरिकेंद्र का अर्थ है, भूमि के स्तर पर ठीक इसके ऊपर का बिन्दु। San Andreas faultके मामले में, बहुत से भूकंप प्लेट सीमा से दूर उत्पन्न होते हैं और विरूपण के व्यापक क्षेत्र में विकसित तनाव से सम्बंधित होते हैं, यह विरूपण दोष क्षेत्र (उदा. “बिग बंद ” क्षेत्र) में प्रमुख अनियमितताओं के कारण होते हैं। Northridge भूकंप ऐसे ही एक क्षेत्र में अंध दबाव गति से सम्बंधित था। एक अन्य उदाहरण है अरब और यूरेशियन प्लेट के बीच तिर्यक अभिकेंद्रित प्लेट सीमा जहाँ यह ज़ाग्रोस पहाड़ों के पश्चिमोत्तर हिस्से से होकर जाती है। इस प्लेट सीमा से सम्बंधित विरूपण, एक बड़े पश्चिम-दक्षिण सीमा के लम्बवत लगभग शुद्ध दबाव गति तथा वास्तविक प्लेट सीमा के नजदीक हाल ही में हुए मुख्य दोष के किनारे हुए लगभग शुद्ध स्ट्रीक-स्लिप गति में विभाजित है। इसका प्रदर्शन भूकंप की केन्द्रीय क्रियाविधि के द्वारा किया जाता है। सभी टेक्टोनिक प्लेट्स में आंतरिक दबाव क्षेत्र होते हैं जो अपनी पड़ोसी प्लेटों के साथ अंतर्क्रिया के कारण या तलछटी लदान या उतराई के कारण होते हैं। (जैसे deglaciation).ये तनाव उपस्थित दोष सतहों के किनारे विफलता का पर्याप्त कारण हो सकते हैं, ये अन्तःप्लेट भूकंप को जन्म देते हैं। .

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मध्य-महासागर पर्वतमाला

मध्य-महासागर पर्वतमाला (mid-ocean ridge) किसी महासागर के जल के अंदर प्लेट विवर्तनिकी द्वारा बनी एक पर्वतमाला होती है। सामान्यतः इसमें कई पहाड़ शृंखलाओं में आयोजित होते हैं और इनके बीच में एक लम्बी रिफ़्ट नामक घाटी चलती है। इस रिफ़्ट के नीचे दो भौगोलिक तख़्तों की संमिलन सीमा होती है जहाँ दबाव और रगड़ के कारण भूप्रावार (मैन्टल) से पिघला हुआ मैग्मा उगलकर लावा के रूप में ऊपर आता है और नया सागर का फ़र्श बनाता है - इसे प्रक्रिया को सागर नितल प्रसरण (seafloor spreading) कहते हैं। .

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महाद्वीपीय भूपर्पटी

महाद्वीपीय भूपर्पटी (continental crust) आग्नेय (इगनियस), अवसादी (सेडिमेन्टरी) और कायांतरित पत्थरों की बनी उस परत को कहते हैं जिसके महाद्वीप और उनसे जुड़े हुए लेकिन महासागरों में डूबे महाद्वीपीय ताक बने होते हैं। क्योंकि यह सामग्री सिलिकन व अल्युमिनियम से भरपूर खनिजों की बनी होती है इसलिये इस परत को कभी-कभी सिअल (sial) भी कहते हैं, जबकि महासागरीय भूपर्पटी (oceanic crust) में सिलिकन और मैग्नीसियम के खनिज अधिक होने से उसे सिमा (sima) कहा जाता है। .

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महाद्वीपीय विस्थापन

करोड़ों वर्षों तक चल रहे महाद्वीपीय प्रवाह से अंध महासागर खुलकर विस्तृत हो गया महाद्वीपीय विस्थापन (Continental drift) पृथ्वी के महाद्वीपों के एक-दूसरे के सम्बन्ध में हिलने को कहते हैं। यदि करोड़ों वर्षों के भौगोलिक युगों में देखा जाए तो प्रतीत होता है कि महाद्वीप और उनके अंश समुद्र के फ़र्श पर टिके हुए हैं और किसी-न-किसी दिशा में बह रहे हैं। महाद्वीपों के बहने की अवधारणा सबसे पहले १५९६ में डच वैज्ञानिक अब्राहम ओरटेलियस​ ने प्रकट की थी लेकिन १९१२ में जर्मन भूवैज्ञानिक ऐल्फ़्रेड वेगेनर​ ने स्वतन्त्र अध्ययन से इसका विकसित रूप प्रस्तुत किया। आगे चलकर प्लेट विवर्तनिकी का सिद्धांत विकसित हुआ जो महाद्वीपों की चाल को महाद्वीपीय प्रवाह से अधिक अच्छी तरह समझा पाया।, Wallace Gary Ernst, pp.

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महासागरीय भूपर्पटी

महासागरीय भूपर्पटी (Oceanic crust) किसी महासागरीय भौगोलिक तख़्ते की सबसे ऊपरी परत को कहते हैं। इसके विपरीत महाद्वीपीय भौगोलिक तख़्ते की सबसे ऊपरी परत को महाद्वीपीय भूपर्पटी कहते हैं। .

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मंगल ग्रह

मंगल सौरमंडल में सूर्य से चौथा ग्रह है। पृथ्वी से इसकी आभा रक्तिम दिखती है, जिस वजह से इसे "लाल ग्रह" के नाम से भी जाना जाता है। सौरमंडल के ग्रह दो तरह के होते हैं - "स्थलीय ग्रह" जिनमें ज़मीन होती है और "गैसीय ग्रह" जिनमें अधिकतर गैस ही गैस है। पृथ्वी की तरह, मंगल भी एक स्थलीय धरातल वाला ग्रह है। इसका वातावरण विरल है। इसकी सतह देखने पर चंद्रमा के गर्त और पृथ्वी के ज्वालामुखियों, घाटियों, रेगिस्तान और ध्रुवीय बर्फीली चोटियों की याद दिलाती है। हमारे सौरमंडल का सबसे अधिक ऊँचा पर्वत, ओलम्पस मोन्स मंगल पर ही स्थित है। साथ ही विशालतम कैन्यन वैलेस मैरीनेरिस भी यहीं पर स्थित है। अपनी भौगोलिक विशेषताओं के अलावा, मंगल का घूर्णन काल और मौसमी चक्र पृथ्वी के समान हैं। इस गृह पर जीवन होने की संभावना है। 1965 में मेरिनर ४ के द्वारा की पहली मंगल उडान से पहले तक यह माना जाता था कि ग्रह की सतह पर तरल अवस्था में जल हो सकता है। यह हल्के और गहरे रंग के धब्बों की आवर्तिक सूचनाओं पर आधारित था विशेष तौर पर, ध्रुवीय अक्षांशों, जो लंबे होने पर समुद्र और महाद्वीपों की तरह दिखते हैं, काले striations की व्याख्या कुछ प्रेक्षकों द्वारा पानी की सिंचाई नहरों के रूप में की गयी है। इन् सीधी रेखाओं की मौजूदगी बाद में सिद्ध नहीं हो पायी और ये माना गया कि ये रेखायें मात्र प्रकाशीय भ्रम के अलावा कुछ और नहीं हैं। फिर भी, सौर मंडल के सभी ग्रहों में हमारी पृथ्वी के अलावा, मंगल ग्रह पर जीवन और पानी होने की संभावना सबसे अधिक है। वर्तमान में मंगल ग्रह की परिक्रमा तीन कार्यशील अंतरिक्ष यान मार्स ओडिसी, मार्स एक्सप्रेस और टोही मार्स ओर्बिटर है, यह सौर मंडल में पृथ्वी को छोड़कर किसी भी अन्य ग्रह से अधिक है। मंगल पर दो अन्वेषण रोवर्स (स्पिरिट और् ओप्रुच्युनिटी), लैंडर फ़ीनिक्स, के साथ ही कई निष्क्रिय रोवर्स और लैंडर हैं जो या तो असफल हो गये हैं या उनका अभियान पूरा हो गया है। इनके या इनके पूर्ववर्ती अभियानो द्वारा जुटाये गये भूवैज्ञानिक सबूत इस ओर इंगित करते हैं कि कभी मंगल ग्रह पर बडे़ पैमाने पर पानी की उपस्थिति थी साथ ही इन्होने ये संकेत भी दिये हैं कि हाल के वर्षों में छोटे गर्म पानी के फव्वारे यहाँ फूटे हैं। नासा के मार्स ग्लोबल सर्वेयर की खोजों द्वारा इस बात के प्रमाण मिले हैं कि दक्षिणी ध्रुवीय बर्फीली चोटियाँ घट रही हैं। मंगल के दो चन्द्रमा, फो़बोस और डिमोज़ हैं, जो छोटे और अनियमित आकार के हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि यह 5261 यूरेका के समान, क्षुद्रग्रह है जो मंगल के गुरुत्व के कारण यहाँ फंस गये हैं। मंगल को पृथ्वी से नंगी आँखों से देखा जा सकता है। इसका आभासी परिमाण -2.9, तक पहुँच सकता है और यह् चमक सिर्फ शुक्र, चन्द्रमा और सूर्य के द्वारा ही पार की जा सकती है, यद्यपि अधिकांश समय बृहस्पति, मंगल की तुलना में नंगी आँखों को अधिक उज्जवल दिखाई देता है। .

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यूरेशियाई प्लेट

यूरेशियाई प्लेट, हरे रंग में यूरेशियाई प्लेट एक भौगोलिक प्लेट है जिसपर यूरेशिया (जिसमें यूरोप और एशिया के महाद्वीप आते हैं) का ज़्यादातर भूभाग और उसके इर्द-गिर्द के समुद्र का कुछ क्षेत्र स्थित है। इसके पश्चिम में उत्तर अमेरिकी प्लेट, दक्षिण-पश्चिम में अफ़्रीकी प्लेट, दक्षिण में अरबी प्लेट और हिन्द-ऑस्ट्रेलियाई प्लेट और पूर्व में फिर उत्तर अमेरिकी प्लेट है। .

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रिफ़्ट (भूविज्ञान)

रिफ़्ट (अंग्रेज़ी: rift) भूविज्ञान में ऐसे क्षेत्र को कहते हैं जहाँ प्लेट विवर्तनिकी (भौगोलिक प्लेटों की चाल) के कारण पृथ्वी के भूपटल (क्रस्ट) और स्थलमंडल (लिथोस्फ़ेयर) खिचने से फटकर अलग हो रहा हो। इस से अक्सर धरती पर वहाँ भ्रंश बनते हैं और रिफ्ट घाटियाँ बन जाती हैं। इनमें अफ़्रीका व मध्य पूर्व की ग्रेट रिफ़्ट घाटी एक उदाहरण है जो अफ़्रीकी प्लेट के दो भागों में टूटकर अलग होने की प्रक्रिया से बन गई है।, pp.

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रिफ़्ट घाटी

अपसारी प्लेट किनारे के सहारे एक रिफ़्ट घाटी, आइसलैंड में रिफ़्ट घाटी (अंग्रेजी:Rift valley) एक स्थलरूप है जिसका निर्माण विवर्तनिक हलचल के परिणामस्वरूप होने वाले भ्रंशन के कारण होता है। ये सामान्यतया पर्वत श्रेणियों अथवा उच्चभूमियों के बीच स्थित लम्बी आकृति वाली घाटियाँ होती हैं जिनमें अक्सर झीलें भी निर्मित हो जाती है। .

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लघुतर सुन्दा द्वीपसमूह

लघुतर सुन्दा द्वीपसमूह (Lesser Sunda Islands) दक्षिणपूर्व एशिया में ऑस्ट्रेलिया से उत्तर में स्थित द्वीपों का एक समूह है। बृहत्तर सुन्दा द्वीपसमूह के साथ यह सुन्दा द्वीपसमूह बनाते हैं। लघुतर सुन्दा द्वीप सुन्दा चाप नामक एक ज्वालामुखीय चाप का भाग हैं जो जावा सागर में एक भौगोलिक तख़्ते के दूसरे के नीचे निम्नस्खलन (सबडक्शन) द्वारा बना है। .

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लंबाई के आधार पर नदियों की सूची

एक जलपोत से नील नदी का दृश्य, मिस्र में लक्सर और असवान के बीच. यह पृथ्वी पर सबसे लंबी नदियों की सूची है। इसमें 1,000 किलोमीटर से अधिक वाले नदी तंत्र शामिल हैं। .

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शुक्र

शुक्र (Venus), सूर्य से दूसरा ग्रह है और प्रत्येक 224.7 पृथ्वी दिनों मे सूर्य परिक्रमा करता है। ग्रह का नामकरण प्रेम और सौंदर्य की रोमन देवी पर हुआ है। चंद्रमा के बाद यह रात्रि आकाश में सबसे चमकीली प्राकृतिक वस्तु है। इसका आभासी परिमाण -4.6 के स्तर तक पहुँच जाता है और यह छाया डालने के लिए पर्याप्त उज्जवलता है। चूँकि शुक्र एक अवर ग्रह है इसलिए पृथ्वी से देखने पर यह कभी सूर्य से दूर नज़र नहीं आता है: इसका प्रसरकोण 47.8 डिग्री के अधिकतम तक पहुँचता है। शुक्र सूर्योदय से पहले या सूर्यास्त के बाद केवल थोड़ी देर के लए ही अपनी अधिकतम चमक पर पहुँचता है। यहीं कारण है जिसके लिए यह प्राचीन संस्कृतियों के द्वारा सुबह का तारा या शाम का तारा के रूप में संदर्भित किया गया है। शुक्र एक स्थलीय ग्रह के रूप में वर्गीकृत है और समान आकार, गुरुत्वाकर्षण और संरचना के कारण कभी कभी उसे पृथ्वी का "बहन ग्रह" कहा गया है। शुक्र आकार और दूरी दोनों मे पृथ्वी के निकटतम है। हालांकि अन्य मामलों में यह पृथ्वी से एकदम अलग नज़र आता है। शुक्र सल्फ्यूरिक एसिड युक्त अत्यधिक परावर्तक बादलों की एक अपारदर्शी परत से ढँका हुआ है। जिसने इसकी सतह को दृश्य प्रकाश में अंतरिक्ष से निहारने से बचा रखा है। इसका वायुमंडल चार स्थलीय ग्रहों मे सघनतम है और अधिकाँशतः कार्बन डाईऑक्साइड से बना है। ग्रह की सतह पर वायुमंडलीय दबाव पृथ्वी की तुलना मे 92 गुना है। 735° K (462°C,863°F) के औसत सतही तापमान के साथ शुक्र सौर मंडल मे अब तक का सबसे तप्त ग्रह है। कार्बन को चट्टानों और सतही भूआकृतियों में वापस जकड़ने के लिए यहाँ कोई कार्बन चक्र मौजूद नही है और ना ही ज़ीवद्रव्य को इसमे अवशोषित करने के लिए कोई कार्बनिक जीवन यहाँ नज़र आता है। शुक्र पर अतीत में महासागर हो सकते हैलेकिन अनवरत ग्रीनहाउस प्रभाव के कारण बढ़ते तापमान के साथ वह वाष्पीकृत होते गये होंगे |B.M. Jakosky, "Atmospheres of the Terrestrial Planets", in Beatty, Petersen and Chaikin (eds), The New Solar System, 4th edition 1999, Sky Publishing Company (Boston) and Cambridge University Press (Cambridge), pp.

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समुद्र तल

समुद्र तल से ऊँचाई दिखाता एक बोर्ड समुद्र तल या औसत समुद्र तल (अंग्रेज़ी:Mean sea level) समुद्र के जल के उपरी सतह की औसत ऊँचाई का मान होता है। इसकी गणना ज्वार-भाटे के कारण होने वाले समुद्री सतह के उतार चढ़ाव का लंबे समय तक प्रेक्षण करके उसका औसत निकाल कर की जाती है। इसे समुद्र तल से ऊँचाई (MSL-Metres above sea level) में व्यक्त किया जाता है। इसका प्रयोग धरातल पर स्थित बिंदुओं की ऊँचाई मापने के लिये सन्दर्भ तल के रूप में किया जाता है। इसका उपयोग उड्डयन में भी होता है। उड्डयन में समुद्र की सतह पर वायुमण्डलीय दाब को वायुयानों के उड़ान की उँचाई के सन्दर्भ (डैटम) के रूप में उपयोग किया जाता है। .

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सागर नितल प्रसरण

सागर नितल प्रसरण (अंग्रेज़ी:Seafloor spreading) एक भूवैज्ञानिक संकल्पना है जिसमें यह अभिकल्पित किया गया है कि स्थलमण्डल समुद्री कटकों से सहारे प्लेटों में टूट कर इस कटकीय अक्ष के सहारे सरकता है और इसके टुकड़े एक दूसरे से दूर हटते हैं तथा यहाँ नीचे से मैग्मा ऊपर आकार नए स्थलमण्डल (प्लेट) का निर्माण करता है। .

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सागरगत ज्वालामुखी

सागरगत ज्वालामुखी (submarine volcanoes) सागर और महासागरों में पृथ्वी की सतह पर स्थित में चीर, दरार या मुख होते हैं जिनसे मैग्मा उगल सकता है। बहुत से सागरगत ज्वालामुखी भौगोलिक तख़्तों के हिलने वाले क्षेत्रों में होते हैं, जिन्हें मध्य-महासागर पर्वतमालाओं के रूप में देखा जाता है। अनुमान लगाया गया है कि पृथ्वी पर उगला जाने वाला 75% मैग्मा इन्हीं मध्य-महासागर पर्वतमालाओं में स्थित सागरगत ज्वालामुखियों से आता है।Martin R. Speight, Peter A. Henderson, "Marine Ecology: Concepts and Applications", John Wiley & Sons, 2013.

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सिएर्रा मोरेना

सिएर्रा मोरेना पहाड़ियों की शृंखला इस नक़्शे में लाल लक़ीर से दर्शाई गयी है सिएर्रा मोरेना (स्पैनिश: Sierra Morena) स्पेन की एक प्रमुख पहाड़ी शृंखला है। यह दक्षिणी स्पेन में पूर्व-पश्चिम दिशा में चलती है और आइबेरियाई प्रायद्वीप के मेसेटा सेंत्राल नामक पठार की दक्षिणी सीमा है। सिएर्रा मोरेना की शृंखला अपने उत्तर की ओर स्थित गुआदिआना घाटी और दक्षिण की ओर स्थित गुआदालकिविर घाटी के दोनों जलसम्भरों को पानी प्रदान करती है। .

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सिनाबंग पर्वत

सिनाबंग इण्डोनेशिया के सुमात्रा द्वीप के उत्तरी हिस्से में कारू पठार पर स्थित एक ज्वालामुखी पर्वत है। यह प्लीस्टोसीन-होलोसीन युग में निर्मित एक स्तरित ज्वालामुखी है। इसका पिछला उद्भेदन 1600 ई के आसपास हुआ माना जाता है जिसके बाद लगभग 400 वर्षों तक शांत रहने के बाद सन् 2010 में अचानक सक्रिय हो उठा और अब सक्रिय ज्वालामुखियों में गिना जाने लगा है। इसमें हालिया विस्फोट 26 जून 2015 को हुआ था जिसकी वजह से कम से कम 10,000 लोगों को अपना घर ख़ाली कर के सुरक्षित स्थानों की ओर जाना पड़ा। .

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संमिलन सीमा

भूवैज्ञानिक प्लेट विवर्तनिकी में संमिलन सीमा (convergent boundary) वह सीमा होती है जहाँ पृथ्वी के स्थलमण्डल (लिथोस्फ़ीयर) के दो भौगोलिक तख़्ते (प्लेटें) एक दूसरे की ओर आकर टकराते हैं या आपस में घिसते हैं। ऐसे क्षेत्रों में दबाव और रगड़ से भूप्रावार (मैन्टल) का पत्थर पिघलने लगता है और ज्वालामुखी तथा भूकम्पन घटनाओं में से एक या दोनों मौजूद रहते हैं। संमिलन सीमाओं पर या तो एक तख़्ते का छोर दूसरे तख़्ते के नीचे दबने लगता है (इसे निम्नस्खलन या सबडक्शन कहते हैं) या फिर महाद्वीपीय टकराव होता है।Butler, Rob (October 2001).

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सुलु द्वीपसमूह

सुलु द्वीपसमूह (Sulu Archipelago) प्रशांत महासागर में दक्षिणपश्चिमी फ़िलिपीन्ज़ में स्थित एक द्वीपसमूह है। यह सुलावेसी सागर की उत्तरी सीमा और सुलु सागर की दक्षिणी सीमा है। प्रशासनिक रूप से यह मिन्दनाओ द्वीप दल का भाग है। यहाँ ताउसुग और अन्य स्थानीय जनजातियाँ रहती हैं। यह मुस्लिम मिन्दनाओ में स्वशासित क्षेत्र नामक प्रशासनिक क्षेत्र में आता है लेकिन यहाँ के स्थानीय निवासियों द्वारा स्थानीय स्वशासन की मांगे उठाई जाती रही हैं। भौगोलिक रूप से यह बोर्नियो और मिन्दनाओ के बीच विस्तृत है लेकिन यह कभी-भी एक ज़मीनी पुल नहीं था बल्कि समुद्र-फ़र्श में प्लेट विवर्तनिकी द्वारा हुई उथल-पुथल में उठी चट्टानों का उभरा हुआ हिस्सा हैं। यह मौसमी पक्षी प्रवास के लिए एक महत्वपूर्ण ठहराव है। .

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स्थलमण्डल

स्थलमंडल या स्थलमण्डल (अंग्रेज़ी: lithosphere) भूगोल और भूविज्ञान में किसी पथरीले ग्रह या प्राकृतिक उपग्रह की सबसे ऊपरी पथरीली या चट्टान निर्मित परत को कहते हैं। पृथ्वी पर इसमें भूपटल (क्रस्ट) और भूप्रावार (मैन्टल) की सबसे ऊपर की परत शामिल हैं जो कई टुकड़ों में विभक्त है और इन टुकड़ों को प्लेट कहा जाता है।, Brian J. Skinner, Stephen C. Porter & Jeffrey Park, pp.

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स्कोश्या प्लेट

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हिन्द-ऑस्ट्रेलियाई प्लेट

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हिमालय

हिमालय पर्वत की अवस्थिति का एक सरलीकृत निरूपण हिमालय एक पर्वत तन्त्र है जो भारतीय उपमहाद्वीप को मध्य एशिया और तिब्बत से अलग करता है। यह पर्वत तन्त्र मुख्य रूप से तीन समानांतर श्रेणियों- महान हिमालय, मध्य हिमालय और शिवालिक से मिलकर बना है जो पश्चिम से पूर्व की ओर एक चाप की आकृति में लगभग 2400 कि॰मी॰ की लम्बाई में फैली हैं। इस चाप का उभार दक्षिण की ओर अर्थात उत्तरी भारत के मैदान की ओर है और केन्द्र तिब्बत के पठार की ओर। इन तीन मुख्य श्रेणियों के आलावा चौथी और सबसे उत्तरी श्रेणी को परा हिमालय या ट्रांस हिमालय कहा जाता है जिसमें कराकोरम तथा कैलाश श्रेणियाँ शामिल है। हिमालय पर्वत पाँच देशों की सीमाओं में फैला हैं। ये देश हैं- पाकिस्तान, भारत, नेपाल, भूटान और चीन। अन्तरिक्ष से लिया गया हिमालय का चित्र संसार की अधिकांश ऊँची पर्वत चोटियाँ हिमालय में ही स्थित हैं। विश्व के 100 सर्वोच्च शिखरों में हिमालय की अनेक चोटियाँ हैं। विश्व का सर्वोच्च शिखर माउंट एवरेस्ट हिमालय का ही एक शिखर है। हिमालय में 100 से ज्यादा पर्वत शिखर हैं जो 7200 मीटर से ऊँचे हैं। हिमालय के कुछ प्रमुख शिखरों में सबसे महत्वपूर्ण सागरमाथा हिमाल, अन्नपूर्णा, गणेय, लांगतंग, मानसलू, रॊलवालिंग, जुगल, गौरीशंकर, कुंभू, धौलागिरी और कंचनजंघा है। हिमालय श्रेणी में 15 हजार से ज्यादा हिमनद हैं जो 12 हजार वर्ग किलॊमीटर में फैले हुए हैं। 72 किलोमीटर लंबा सियाचिन हिमनद विश्व का दूसरा सबसे लंबा हिमनद है। हिमालय की कुछ प्रमुख नदियों में शामिल हैं - सिंधु, गंगा, ब्रह्मपुत्र और यांगतेज। भूनिर्माण के सिद्धांतों के अनुसार यह भारत-आस्ट्र प्लेटों के एशियाई प्लेट में टकराने से बना है। हिमालय के निर्माण में प्रथम उत्थान 650 लाख वर्ष पूर्व हुआ था और मध्य हिमालय का उत्थान 450 लाख वर्ष पूर्व हिमालय में कुछ महत्त्वपूर्ण धार्मिक स्थल भी है। इनमें हरिद्वार, बद्रीनाथ, केदारनाथ, गोमुख, देव प्रयाग, ऋषिकेश, कैलाश, मानसरोवर तथा अमरनाथ प्रमुख हैं। भारतीय ग्रंथ गीता में भी इसका उल्लेख मिलता है (गीता:10.25)। .

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हिमालयी भूगर्भशास्त्र

हिमालयी भूगर्भशास्त्र (अंग्रेज़ी: Geology of the Himalaya) हिमालय पर्वत तंत्र की भूगर्भशास्त्रीय व्याख्या करता है। इसके अन्तर्गत हिमालय पर्वत के उद्भव और विकास की, तथा इसकी भूगर्भिक संरचना और यहाँ पायी जाने वाली शैल समूहों और क्रमों की व्याख्या की जाती है। .

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हुआन दे फ़ूका प्लेट

हुआन दे फ़ूका प्लेट का नक़्शा - लाल बिंदु इस प्लेट से सम्बंधित भूकंप हैं हुआन दे फ़ूका प्लेट एक भौगोलिक प्लेट है जिसके ऊपर उत्तरपूर्वी प्रशांत महासागर का छोटा सा हिस्सा और उत्तर अमेरिका के महाद्वीप के सुदूर पश्चिमी भाग का कुछ हिस्सा स्थित है। यह पृथ्वी के सारे भौगोलिक तख़्तों में सब से छोटा है। करोड़ों वर्ष पूर्व एक बहुत बड़ा फारालोन प्लेट हुआ करता था जो उत्तर अमेरिकी प्लेट से टकराया और धीरे-धीरे उसके नीचे धंस गया। अब उसके कुछ बचेकुचे हिस्से हैं जिसमें से एक हुआन दे फ़ूका प्लेट है और दूसरा कोकोस प्लेट है। हुआन दे फ़ूका प्लेट के ख़ुद तीन हिस्से बन रहें हैं - जिनके उत्तरी हिस्से को "ऍक्स्प्लोरर प्लेट" और दक्षिणी हिस्से को "गोर्दा प्लेट" कहा जाता है। .

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हैरी हेस

हैरी हैमंड हेस (अंग्रेज़ी: Harry Hammond Hess, मई 24, 1906 – अगस्त 25, 1969) एक अमेरिकी भूविज्ञानी और नौसेना में रियर एडमिरल के पद से सेवानिवृत्त होने वाले नौसैनिक थे। उन्हें सागर नितल प्रसरण की खोज के लिये जाना जाता है जो प्लेट विवर्तनिकी सिद्धान्त की आधारशिला बना। इसीलिए कुछ लोग उन्हें प्लेट विवर्तनिकी सिद्धान्त का जनक भी मानते हैं। .

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जलतापीय छिद्र

जलतापीय छिद्र (hydrothermal vents) पृथ्वी या अन्य किसी ग्रह पर उपस्थित ऐसा विदर छिद्र होता है जिस से भूतापीय स्रोतों से गरम किया गया जल उगलता है। यह अक्सर सक्रीय ज्वालामुखीय क्षेत्रों, भौगोलिक तख़्तो के अलग होने वाले स्थानों और महासागर द्रोणियों जैसे स्थानों पर मिलते हैं। जलतापीय छिद्रों के अस्तित्व का मूल कारण पृथ्वी की भूवैज्ञानिक सक्रीयता और उसकी सतह व भीतरी भागों में पानी की भारी मात्रा में उपस्थिति है। जब जलतापीय छिद्र भूमि पर होते हैं तो उन्हें गरम चश्मों, फ़ूमारोलों और उष्णोत्सों के रूप में देखा जाता है। जब वे महासागरों के फ़र्श पर होते हैं तो उन्हें काले धुआँदारी (black smokers) और श्वेत धुआँदारी (white smokers) के रूप में पाया जाता है। गहरे समुद्र के बाक़ि क्षेत्र की तुलना में काले धुआँदारियों के आसपास अक्सर बैक्टीरिया और आर्किया जैसे सूक्ष्मजीवों की भरमार होती है। यह जीव इन छिद्रों में से निकल रहे रसायनों को खाकर ऊर्जा बनाते हैं और जीवित रहते हैं और फिर आगे ऐसे जीवों को ग्रास बनाने वाले अन्य जीवों के समूह भी यहाँ पनपते हैं। माना जाता है कि बृहस्पति ग्रह के यूरोपा चंद्रमा और शनि ग्रह के एनसेलेडस चंद्रमा पर भी सक्रीय जलतापीय छिद्र मौजूद हैं और अति-प्राचीनकाल में यह सम्भवतः मंगल ग्रह पर भी रहे हों। .

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ज़मीनी पुल

बेरिंग ज़मीनी पुल साइबेरिया और अलास्का को जोड़ता था और उसपर चलकर मानव एशिया से उत्तर अमेरिका पहुँच गए - हिमयुग की समाप्ति पर यह क्षेत्र समुद्र के नीचे डूब गया ज़मीनी पुल (अंग्रेज़ी: land bridge, लैंड ब्रिज) ऐसे भूडमरू (इस्थमस) या उस से चौड़े धरती के अंश को कहते हैं जिसके ज़रिये समुद्र द्वारा अलग किये हुए धरती के दो बड़े क्षेत्रों के बीच में जानवर आ-जा सकें और वृक्ष-पौधे फैल सकें। हिमयुगों (आइस एज) के दौरान ऐसे ज़मीनी पुल अक्सर उभर आते हैं क्योंकि तब समुद्र के पानी का कुछ अंश बर्फ़ में जमा हुआ होने से समुद्र-तल थोड़ा नीचे होता है। इसका एक बड़ा उदाहरण भारत को श्रीलंका से जोड़ने वाला रामसेतु है। यह हिमयुगों में पूरी तरह समुद्र-तल के ऊपर उभरी हुई ज़मीन की एक पट्टी होती थी जिसपर इतिहास में जानवर चलकर भारत से श्रीलंका पहुँचे थे और भारत से बहुत से पेड़-पौधे भी श्रीलंका में विस्तृत हुए थे। माना जाता है कि आज से लगभग २०,००० साल पहले श्रीलंका के वैदा आदिवासियों के पूर्वज भी इसी ज़मीनी पुल पर चलकर भारत से श्रीलंका पैदल पहुँचे। आधुनिक युग में भारत और श्रीलंका के बीच ४० मील का खुला समुद्र है, John C. Avise, Cambridge University Press, 2006, ISBN 978-0-521-85753-6,...

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ज्वालामुखी

तवुर्वुर का एक सक्रिय ज्वालामुखी फटते हुए, राबाउल, पापुआ न्यू गिनिया ज्वालामुखी पृथ्वी की सतह पर उपस्थित ऐसी दरार या मुख होता है जिससे पृथ्वी के भीतर का गर्म लावा, गैस, राख आदि बाहर आते हैं। वस्तुतः यह पृथ्वी की ऊपरी परत में एक विभंग (rupture) होता है जिसके द्वारा अन्दर के पदार्थ बाहर निकलते हैं। ज्वालामुखी द्वारा निःसृत इन पदार्थों के जमा हो जाने से निर्मित शंक्वाकार स्थलरूप को ज्वालामुखी पर्वत कहा जाता है। ज्वालामुखी का सम्बंध प्लेट विवर्तनिकी से है क्योंकि यह पाया गया है कि बहुधा ये प्लेटों की सीमाओं के सहारे पाए जाते हैं क्योंकि प्लेट सीमाएँ पृथ्वी की ऊपरी परत में विभंग उत्पन्न होने हेतु कमजोर स्थल उपलब्ध करा देती हैं। इसके अलावा कुछ अन्य स्थलों पर भी ज्वालामुखी पाए जाते हैं जिनकी उत्पत्ति मैंटल प्लूम से मानी जाती है और ऐसे स्थलों को हॉटस्पॉट की संज्ञा दी जाती है। भू-आकृति विज्ञान में ज्वालामुखी को आकस्मिक घटना के रूप में देखा जाता है और पृथ्वी की सतह पर परिवर्तन लाने वाले बलों में इसे रचनात्मक बल के रूप में वर्गीकृत किया जाता है क्योंकि इनसे कई स्थलरूपों का निर्माण होता है। वहीं, दूसरी ओर पर्यावरण भूगोल इनका अध्ययन एक प्राकृतिक आपदा के रूप में करता है क्योंकि इससे पारितंत्र और जान-माल का नुकसान होता है। .

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ज्वालामुखीय चाप

ज्वालामुखीय चाप (volcanic arc) ज्वालामुखियों की एक शृंखला होती है जो दो भौगोलिक तख़्तों की संमिलन सीमा में निम्नस्खलित तख़्ते (subducting plate) के ऊपर बन जाती है। ऊपर से देखने पर ज्वालामुखियों की यह शृंखला एक चाप (आर्क) के आकार में नज़र आती है। यदि यह किसी महासागर में स्थित हो तो अक्सर यह ज्वालामुखी समुद्र सतह से ऊपर निकलकर ज्वालामुखीय द्वीप बना देते हैं और यह शृंखला एक द्वीप चाप के रूप में नज़र आती है। अक्सर इन द्वीपों से सामानांतर एक महासागरीय गर्त (ट्रेन्च) भी स्थित होता है। .

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जैक ओलिवर

जैक ओलिवर (अंग्रेज़ी:John "Jack" Ertle Oliver; September 26, 1923 – January 5, 2011) एक अमेरिकन वैज्ञानिक थे जिन्होंने भूकम्प विज्ञान के क्षेत्र में शोध कार्य किया तथा प्लेट विवर्तनिकी सिद्धान्त की पुष्टि के प्रमाण उपलब्ध कराये। उन्होंने 1953 अपनी पी॰ एच॰ डी॰ की डिग्री हासिल की और साठ के दशक में अपने एक विद्यार्थी ब्रायन आइजक्स (Bryan Isacks) के साथ मिलकर दक्षिणी प्रशान्त महासागर में भूकम्प मापन हेतु यंत्र स्थापित किये जिनसे प्राप्त आँकड़ों से समुद्र के प्रसरण की पुष्टि हुयी। .

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जॉन टूज़ो विल्सन

जॉन टूज़ो विल्सन एक कनाडाई भूवैज्ञानिक थे जिन्होंने प्लेट विवर्तनिकी के क्षेत्र में योगदान दिया। उन्होंने सागर नितल प्रसरण और पर्वत निर्माण पर अपना योगदान दिया तथा ज्वालामुखियों के अध्ययन में काफ़ी महत्वपूर्ण कार्य किये। .

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वलन

बहुत तंग सिलवटों. मोृूया के पास, न्यू साउथ वेल्स, ऑस्ट्रेलिया जब कोई तलछटी स्तर, मूल रूप से फ्लैट और समतल सतहों का ढेर तुला या घुमावदार स्थायी विकृति धारण कर लेता है तब परिणाम के रूप को सिलवटों भूविज्ञान कहा जाता है। ये सभी सिलवटों (फोल्ड्स-अंग्रेज़ी मे) स्यूक्ष्म से लेकेर बहुत बड़े तक हो सकते है। ये सभी फोल्ड्स (सिलवटों) तनाव, हीड्रास्टाटिक दबाव, रंध्र दाब और तापमान के कारण होते है। .

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वलित पर्वत

वलित पर्वत (अंग्रेज़ी:Fold mountains)वे पर्वत हैं जिनका निर्माण वलन नामक भूगर्भिक प्रक्रिया के तहत हुआ है। प्लेट विवर्तनिकी के सिद्धांत के बाद इनके निर्माण के बारे में यह माना जाता है कि भूसन्नतियों में जमा अवसादों के दो प्लेटों के आपस में करीब आने के कारण दब कर सिकुड़ने और सिलवटों के रूप में उठने से हुआ है। टर्शियरी युग में बने वलित पर्वत आज सबसे महत्वपूर्ण पर्वत श्रृंखलाओं में से हैं जैसे ऐल्प्स, हिमालय, इत्यादि। .

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आनातोलियाई प्लेट

आनातोलियाई प्लेट आनातोलियाई प्लेट एक भौगोलिक प्लेट है जिसपर तुर्की के देश का अधिकाँश हिस्सा स्थित है। उत्तर की तरफ़ यह यूरेशियाई प्लेट से और दक्षिण की तरफ़ अफ़्रीकी और अरबी प्लेट से सीमा लगाती है। .

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काकेशस पर्वत शृंखला

अंतरिक्ष से कॉकस पर्वतों का दृश्य - बर्फ़-ढके महाकॉकस की शृंखला उत्तर-पश्चिम में कृष्ण सागर से चलकर दक्षिण-पूर्व में कैस्पियन सागर तक पहुँचती साफ़ नज़र आ रही है काकेशस पर्वत शृंखला यूरोप और एशिया की सीमा पर स्थित, कृष्ण सागर और कैस्पियन सागर के दरमियान के कॉकस क्षेत्र की एक पर्वत शृंखला है, जिसमें यूरोप का सब से ऊंचा पहाड़, एल्ब्रुस पर्वत, भी शामिल है। कॉकस पर्वतों के दो मुख्य भाग हैं - महाकॉकस पर्वत शृंखला और हीनकॉकस पर्वत शृंखला। महाकॉकस पर्वत कृष्ण सागर के उत्तरपूर्वी छोर पर बसे रूस के सोची शहर से शुरू होकर पूर्व के ओर कैस्पियन सागर पर बसी अज़रबैजान की राजधानी बाकू तक पहुँचते हैं। हीनकॉकस इनके दक्षिण में १०० किमी की दूरी पर साथ-साथ चलते हैं। जॉर्जिया की मेसख़ेती पर्वत शृंखला हीनकॉकस का ही एक हिस्सा हैं। .

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क्यूशू

जापान का क्यूशू द्वीप (लाल रंग में, जिसके अन्दर प्रान्त दिखाए गए हैं) बॅप्पु के गरम पानी के चश्मों से उठती हुई भाप क्यूशू का नक़्शा क्यूशू (जापानी: 九州, "नौ प्रान्त") जापान के चारों मुख्य द्वीपों में से तीसरा सब से बड़ा और सब से दक्षिणपश्चिमी द्वीप है। कुल मिलकर क्यूशू का क्षेत्रफल ३५,६४० वर्ग किमी है और इसकी जनसँख्या सन् २००६ में १,३२,३१,९९५ थी। यह होन्शू और शिकोकू द्वीपों के दक्षिण-पश्चिम में स्थित है। प्राचीनकाल में क्यूशू को कुछ अन्य नामों से भी बुलाया जाता था, जैसे के क्यूकोकु (九国, "नौ राज्य"), चिनज़इ (鎮西, "अधिकृत क्षेत्र से पश्चिम") और त्सुकुशी-नो-शीमा (筑紫島,"त्सुकुशी का द्वीप")। क्यूशू और इसके इर्द-गिर्द के छोटे द्वीपों को इतिहास में साऍकाऍदो (西海道, "पश्चिमी समुद्री घेरा") भी बुलाया जाता था। .

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क्रांतिकारी बदलाव

क्रांतिकारी बदलाव या रूपांतरण (या क्रांतिकारी विज्ञान) थामस कुह्न द्वारा उनकी प्रभावशाली पुस्तक द स्ट्रक्चर ऑफ साइंटिफिक रिवोलुशनस (1962) में प्रयुक्त (पर उनके द्वारा बनाया गया नहीं) पद है जो उन्होंने विज्ञान के प्रभावी सिद्धांत के भीतर मूल मान्यताओं में परिवर्तन को व्यक्त करने के लिये प्रयुक्त किया था। यह सामान्य विज्ञान के बारे में उनके विचार से भिन्न है। तब से क्रांतिकारी बदलाव शब्द घटनाओं के मूल आदर्श के रूप में परिवर्तन के रूप में मानवीय अनुभव के अन्य कई भागों में भी व्यापक रूप से प्रयोग किया जाने लगा है, हालांकि स्वयं कुह्न ने इस पद के प्रयोग को कठिन विज्ञानों तक ही सीमित रखा है। कुह्न के अनुसार, "क्रांति वह चीज है जिसका केवल वैज्ञानिक समाज के सदस्य ही साझा करते हैं।" (द एसेंसियल टेंशन, 1977).

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कैरीबियाई प्लेट

कैरीबियाई तख़्ता इस नक़्शे के ठीक बीच में है कैरीबियाई प्लेट एक भौगोलिक प्लेट है जिसके ऊपर कैरीबियन सागर और मध्य अमेरिका के कुछ भाग स्थित हैं। इस प्लेट का क्षेत्रफल ३२ लाख वर्ग किमी है। इसकी सीमाएँ उत्तर अमेरिकी प्लेट, दक्षिण अमेरिकी प्लेट, नाज़का प्लेट और कोकोस प्लेट को लगती हैं। इन सीमाओं पर कई ज्वालामुखी स्थित हैं और कभी-कभी भूकंप भी आते हैं। .

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कॅरीबियाई सागर

कैरिबियाई सागर दोमिनिकी गणतंत्र के इस्ला साओना द्वीप का एक तटीय क्षेत्र कॅरीबियाई सागर (अंग्रेज़ी: Caribbean Sea) अंध महासागर के मध्य-पश्चिमी भाग से जुड़ा हुआ एक समुद्र है। यह उष्ण कटिबंधीय क्षेत्र में पश्चिमी गोलार्ध में आता है। इसके पश्चिम और दक्षिण-पश्चिम में मेक्सिको और मध्य अमेरिका हैं, उत्तर में बड़े ऐंटिलीस के द्वीप हैं और पूर्व में छोटे ऐंटिलीस के द्वीप हैं। इस सागर का कुल क्षेत्रफल २७,५४,००० वर्ग किमी है। इसका सबसे गहरा बिंदु केमन खाई (Cayman Trough) में पड़ता है और सतह से ७,६८६ मीटर नीचे है। .

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कोकोस प्लेट

कोकोस प्लेट इस नक़्शे के लगभग बीच में स्थित है कोकोस प्लेट एक भौगोलिक प्लेट है जो मध्य अमेरिका के पश्चिमी तट से मिले हुए प्रशांत महासागर के नीचे स्थित है। करोड़ों वर्ष पूर्व एक बहुत बड़ा फारालोन प्लेट हुआ करता था जो उत्तर अमेरिकी प्लेट से टकराया और धीरे-धीरे उसके नीचे धंस गया। अब उसके कुछ बचेकुचे हिस्से हैं जिसमें से एक हुआन दे फ़ूका प्लेट है और दूसरा कोकोस प्लेट है। .

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कीनिया

कीनिया गणतंत्र पूर्वी अफ्रीका में स्थित एक देश है। भूमध्य रेखा पर हिंद महासागर के सटे हुए इस देश की सीमा उत्तर में इथियोपिया, उत्तर-पूर्व में सोमालिया, दक्षिण में तंजानिया, पश्चिम में युगांडा व विक्टोरिया झील और उत्तर पश्चिम में सूडान से मिलती है। देश की राजधानी नैरोबी है। केन्या में 581,309 km2 (224,445 वर्ग मील) शामिल हैं और जुलाई 2012 तक इसकी जनसंख्या लगभग 4.4 करोड़ है। देश का नाम माउंट केन्या पर रखा गया है, जो एक महत्वपूर्ण भौगोलिक प्रतीक है और अफ्रीका महाद्वीप की दूसरी सबसे ऊंची पर्वत चोटी है। 1920 से पहले, जिस क्षेत्र को अब कीनिया के नाम से जाना जाता है, उसे ब्रिटिश ईस्ट अफ्रीका संरक्षित राज्य के रूप में जाना जाता था। .

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अप्रैल 2015 नेपाल भूकम्प

2015 नेपाल भूकम्प क्षणिक परिमाण परिमाप पर 7.8 या 8.1 तीव्रता का भूकम्प था जो 25 अप्रैल 2015 सुबह 11:56 स्थानीय समय में घटित हुआ था। भूकम्प का अधिकेन्द्र लामजुंग, नेपाल से 38 कि॰मी॰ दूर था। भूकम्प के अधिकेन्द्र की गहराई लगभग 15 कि॰मी॰ नीचे थी। बचाव और राहत कार्य जारी हैं। भूकंप में कई महत्वपूर्ण प्राचीन ऐतिहासिक मंदिर व अन्य इमारतें भी नष्ट हुईं हैं। 1934 के बाद पहली बार नेपाल में इतना प्रचंड तीव्रता वाला भूकम्प आया है जिससे 8000 से अधिक मौते हुई हैं और 2000 से अधिक घायल हुए हैं। भूकंप के झटके चीन, भारत, बांग्लादेश और पाकिस्तान में भी महसूस किये गये। नेपाल के साथ-साथ चीन, भारत और बांग्लादेश में भी लगभग 250 लोगों की मौत की पुष्टि हो चुकी है। भूकम्प की वजह से एवरेस्ट पर्वत पर हिमस्खलन आ गया जिससे 17 पर्वतारोहियों के मृत्यु हो गई। काठमांडू घाटी में यूनेस्को विश्व धरोहर समेत कई प्राचीन एतिहासिक इमारतों को नुकसान पहुचाँ है। 18वीं सदी में निर्मित धरहरा मीनार पूरी तरह से नष्ट हो गयी, अकेले इस मीनार के मलबे से 200 से ज्यादा शव निकाले गये। भूकम्प के बाद के झटके 12 मई 2015 तक भारत, नेपाल, चीन, अफगानिस्तान, पाकिस्तान व पडोसी देशों में महसूस किये जाते रहे। .

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अफ़ार द्रोणी

अफ़ार द्रोणी का नक़्शा डनाकील रेगिस्तान का एक दृश्य अफ़ार द्रोणी, डनाकील द्रोणी या अफ़ार त्रिकोण अफ़्रीका के सींग के पास स्थित एक धंसा हुआ इलाक़ा है जो तीन देशों (इरीट्रिया, इथियोपिया और जिबूटी) में फैली हुई है। यह एक बंद जलसम्भर है जिसमें सिर्फ़ एक नदी (अवाश नदी) दाख़िल होती है जिसका पानी कुछ खारी झीलों में रुक जाता है। अफ़र द्रोणी महान दरार घाटी का सुदूर उत्तर-पूर्वी हिस्सा है। .

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अफ़्रीकी प्लेट

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अरबी प्लेट

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अंटार्कटिक प्लेट

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अक्टूबर २०१५ हिन्दू कुश भूकंप

२६ अक्टूबर २०१५ को, १४:४५ पर (०९:०९ यूटीसी), हिंदू कुश के क्षेत्र में, एक 7.5 परिमाण के भूकंप ने दक्षिण एशिया को प्रभावित किया। मुख्य भूकंप के 40 मिनट बाद 4.8 परिमाण के पश्चात्वर्ती आघात ने फिर से प्रभावित किया; 4.1 परिमाण या उससे अधिक के तेरह और अधिक झटकों ने 29 अक्टूबर की सुबह को प्रभावित किया। मुख्य भूकंप 210 किलोमीटर की गहराई पर हुआ। 5 नवम्बर तक, यह अनुमान लगाया गया था कि कम से कम 398 लोगों की मौत हो गयी हैं, ज्यादातर पाकिस्तान में। http://abcnews.go.com/International/wireStory/latest-strong-afghan-earthquake-felt-south-asia-34730075 भूकंप के झटके अफगानिस्तान, पाकिस्तान, भारत, ताजिकिस्तान, और किर्गिस्तान में महसूस किए गए। भूकंप के झटके भारतीय शहरों नई दिल्ली, श्रीनगर, अमृतसर, चंडीगढ़ लखनऊ आदि और चीन के जनपदों झिंजियांग, आक़्सू, ख़ोतान तक महसूस किए गए जिनकी सूचना अफगानिस्तान की राजधानी काबुल में भी दिया गया। कंपन नेपालियों की राजधानी काठमांडू में भी महसूस किया गया, जहां लोगों ने शुरू में सोचा कि यह अप्रैल 2015 में आए भूकंप के कई मायनों आवर्ती झटकों में से एक था। दैनिक पाकिस्तानी "द नेशन" ने सूचित किया कि यह भूकंप पाकिस्तान में 210 किलोमीटर पर होने वाला सबसे बड़ा भूकंप है। .

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उत्तर अमेरिकी प्लेट

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२००५ कश्मीर भूकम्प

२००५ कश्मीर भूकम्प ८ अक्तूबर २००५ में उत्तरी पाकिस्तान के ख़ैबर-पख़्तूनख़्वा प्रान्त, पाक-अधिकृत कश्मीर और भारत के जम्मू और कश्मीर राज्य में आने वाला एक भूकम्प था। यह भारतीय मानक समय के अनुसार सुबह के ०९:२०:३९ बजे घटा और इसका उपरिकेंद्र पाक-अधिकृत कश्मीर की राजधानी मुज़फ़्फ़राबाद के पास स्थित था। भारत व पाकिस्तान के अन्य क्षेत्रों के अलावा इसके झटके अफ़्ग़ानिस्तान, ताजिकिस्तान और चीन के शिंजियांग प्रान्त में भी महसूस करे गए। .

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