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नौटंकी

सूची नौटंकी

'सुल्ताना डाकू' नामक मशहूर नौटंकी के एक प्रदर्शन में देवेन्द्र शर्मा और पलक जोशी एक और नौटंकी का नज़ारा नौटंकी (Nautanki) उत्तर भारत, पाकिस्तान और नेपाल के एक लोक नृत्य और नाटक शैली का नाम है। यह भारतीय उपमहाद्वीप में प्राचीनकाल से चली आ रही स्वांग परम्परा की वंशज है और इसका नाम मुल्तान (पाकिस्तानी पंजाब) की एक ऐतिहासिक 'नौटंकी' नामक राजकुमारी पर आधारित एक 'शहज़ादी नौटंकी' नाम के प्रसिद्ध नृत्य-नाटक पर पड़ा।, Don Rubin, Taylor & Francis, 2001, ISBN 978-0-415-26087-9,...

14 संबंधों: चौबोला, ट्रिपल एच, डकैती, नाटक, भारतीय रंगमंच, भवनपुरा,जनपद मथुरा, मनोरंजन, माच, हिन्दी नाटक, जमूरा, जॉन सीना, ख्याल (मालवी गीत), इंदर सभा, अंतरिक्ष ओपेरा

चौबोला

'सुल्ताना डाकू' नामक मशहूर नौटंकी का एक प्रदर्शन - नौटंकियों में चौबोले बहुत प्रयोग होते हैं चौबोला या चौबोल उत्तर भारत और पाकिस्तान की काव्य परम्परा में प्रयोग होने वाली चार पंक्तियों की एक छंद शैली है, जो अक्सर लोक-गीत में प्रयोग की जाती है। .

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ट्रिपल एच

पॉल माइकल लेवेस्क (जन्म 27 जुलाई 1969) एक अमेरिकी पेशेवर पहलवान और अभिनेता हैं, जो अपने रिंग नाम, ट्रिपल एच से विख्यात हैं, जोकि उनके पूर्व रिंग नाम हंटर हर्स्ट हेम्सले का एक संक्षिप्त रूप है। इस समय उनका अनुबंध वर्ल्ड रेसलिंग एंटरटेनमेंट (WWE) के साथ है और वे उसके RAW ब्रांड पर लड़ते हैं, जहां वे शॉन माइकल्स के साथ एकीकृत WWE टैग टीम चैम्पियन्स का आधा हिस्सा हैं। WWE में शामिल होने से पहले, लेवेस्क ने 1993 में वर्ल्ड चैम्पियनशिप रेसलिंग (WCW) के साथ अपना कुश्ती कॅरिअर शुरू किया, पहले टेरा राइज़िग के रिंग नाम के तहत और बाद में जीन-पॉल लेवेस्क के नाम से कुश्ती लड़ी.

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डकैती

सुल्ताना डाकू नामक नौटन्की का एक दृश्य - सुल्ताना अपनी माशूका नीलकँवल के साथ ब्राज़ील की सरकार की तरफ़ से एक डाकू को ज़िन्दा या मुर्दा पकड़वाने के इनाम का इश्तेहार इतालवी चित्रकार साल्वातोर रोसा एक डाकुओं के अड्डे पर उनका चित्र बनाते हुए डकैती हिन्सा या हिन्सा की धमकी से ग़ैर-क़ानूनी ढंग से किसी अन्य व्यक्ति का धन, माल, जान, पशुधन या अन्य वास्तु छीन लेने को कहते हैं। डकैती करने वाले व्यक्तियों को डाकू या दस्यु कहा जाता है। डाकू अक्सर गिरोहों का भाग होते हैं और ऐसे क्षेत्रों में अड्डे बनाते हैं जहाँ पुलिस और अन्य क़ानून के रखवालों का पहुँचना कठिन हो। राहज़नी एक विशेष प्रकार की डकैती होती है जिसमें यात्रा कर रहे लोगों पर हमला कर के उनसे चोरी की जाती है या स्वयं उनपर बलात्कार या क़त्ल जैसा अपराध किया जाता है।, M. Durga Prasad, E. J. Lazarus, 1874,...

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नाटक

नाटक, काव्य का एक रूप है। जो रचना श्रवण द्वारा ही नहीं अपितु दृष्टि द्वारा भी दर्शकों के हृदय में रसानुभूति कराती है उसे नाटक या दृश्य-काव्य कहते हैं। नाटक में श्रव्य काव्य से अधिक रमणीयता होती है। श्रव्य काव्य होने के कारण यह लोक चेतना से अपेक्षाकृत अधिक घनिष्ठ रूप से संबद्ध है। नाट्यशास्त्र में लोक चेतना को नाटक के लेखन और मंचन की मूल प्रेरणा माना गया है। .

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भारतीय रंगमंच

'कुडियट्टम' में सुग्रीव की भूमिका में एक कलाकार भारत में रंगमंच का इतिहास बहुत पुराना है। ऐसा समझा जाता है कि नाट्यकला का विकास सर्वप्रथम भारत में ही हुआ। ऋग्वेद के कतिपय सूत्रों में यम और यमी, पुरुरवा और उर्वशी आदि के कुछ संवाद हैं। इन संवादों में लोग नाटक के विकास का चिह्न पाते हैं। अनुमान किया जाता है कि इन्हीं संवादों से प्रेरणा ग्रहण कर लागों ने नाटक की रचना की और नाट्यकला का विकास हुआ। यथासमय भरतमुनि ने उसे शास्त्रीय रूप दिया। .

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भवनपुरा,जनपद मथुरा

गांव-भवनपुरा - गोवर्धन से ०३ कि॰मी॰ की दूरी पर स्थित जनपद मथुरा में जिला मुख्यालय से २१ किमी की दूरी पर स्थित है,यहां की किसी भी घर की छत से आप गोवर्धन स्थित श्री गिरिराज जी मंदिर के साक्षात दर्शन कर सकते हैं। यह गांव सडक मार्ग द्वारा जिला मुख्यालय मथुरा उत्तर प्रदेशसे जुडा हुआ है, गांव भवनपुरा हिंदू धर्म इस गांव के लोग सांस्कृतिक परंपराओं का निर्वहन बडी ही शालीनता व सहयोग की भावना से करते हैं गांव भवनपुरा के निवासी बडे ही खुशमिजाज व शाकाहारी खानपान के शौकीन हैं,यहां वर्ष भर विभिन्न प्रकार के सांस्कृतिक आयोजन चलते रहते हैं,जैसे ०१ जनवरी के दिन गोपाला महोत्सव का आयोजन किया जाता है यह आयोजन गांव-भवनपुरा की एकता व भाईचारे का प्रतीक हैं इस गांव में भक्ति भाव व भाईचारे की भावना को बनाये रखने के लिये प्रतिदिन सुबह ०४ बजे भगवान श्री कृष्ण नाम का कीर्तन करते हुये गांव की परिक्रमा करते हुये प्रभातफेरी निकाली जाती है जिसमें बडी संख्या में गांव के स्त्री पुरूष भाग लेते हैं,जिससे गांव भवनपुरा का प्रात:काल का वातावरण कृष्णमय हो जाता है जिसके कारण गांव के निवासियों को आनंद की अनुभूति होती है जोकि अविस्मरणीय है,इस प्रभातफेरी का आयोजन बृज के संतों की कृपा से पिछले ३५ वर्षों से किया जा रहा है,अत: इसी प्रभातफेरी की वर्षगांठ के रूप में प्रतिवर्ष गोपाला महोत्सव का आयोजन किया जाता है,इसी दिन ही गांव भवनपुरा के निवासियों की ओर से आर्थिक सामर्थ्य के अनुसार सहयोग राशि एकत्रित कर विशाल प्रसाद भंडारेका आयोजन किया जाता है जिसमें समस्त ग्राम वासी इच्छानुसार नये वस्त्र धारण कर बडे हर्षोल्लास के साथ टाट पट्टियों पर बैठकर सामूहिक रूप से प्रसाद ग्रहण करते हैं, यह क्षण वास्तव में ही प्रत्येक ग्रामवासी के लिये अत्यंत आनंद दायक होता है इसके उपरांत अन्य समीपवर्ती गांवों से निमंत्रण देकर बुलवायी गयी कीर्तन मंडलियों द्वारा कीर्तन प्रतियोगिता का रंगारंग आयोजन होता है जिसमें प्रथम स्थान प्राप्त करने वाली कीर्तन मंडली को मुख्य अतिथि द्वारा विशेष उपहार देकर व अन्य कीर्तन मंडलियों को भी उपहार वितरित कर सम्मानित किया जाता है रक्षाबंधन पर विशेष खेलकूद प्रतियोगिता का आयोजन गांव भवनपुरा में किया जाता है जिसमें बडी संख्या में गांव के युवा द्वारा और रक्षाबंधन के अवसर पर आने वाले नये पुराने रिश्तेदारों द्वारा बढचढकर प्रतिभाग किया जाता है | गांव भवनपुरामें होली,दीपावली,गोवर्धनपूजा के त्यौहार भी बडे हर्षोल्लास के साथ मनाये जाते हैं,होली के बाद हुरंगा का रंगारंग आयोजन किया जाता है, कुश्ती दंगल- होली से १३ दिवस उपरांत चैत्र माह की त्रियोदशी को गांव में कुश्ती दंगल का आयोजन गांव-भवनपुरा में किया जाता है जिसमें दूर दूर आये हुये से पहलवान अपनी बृज प्रसिद्ध मल्ल विधा के कौशल का परिचय देते हैं इस आयोजन को देखने आसपडोस के गांव कस्बों से भारी संख्या में बालक,युवा,बृद्ध व गणमान्य व्यक्ति उपस्थित होते हैं,दंगल के दिन ही गांव में विक्रेताओं द्वारा जलेबी सोनहलवा,पान,आईसक्रीम चांट पकौडी,समौसा,आदि की स्टाल व बच्चौं के लिये खिलौनों की दुकान व खेलकूद के लिये तरह तरह के झूले लगाये जाते हैं जिनका कि बच्चे व गांव की महिलायें जमकर लुप्त उठाती हैं तथा दंगल देखने बाद गांव जाने वाले लोग अपने परिवार के लिये जलेबी,सोनहलुवा अनिवार्य रूप से ले जाते हैं इसी दिन ही रात्रि में गांव में नौटंकी का आयोजन किया जाता हैं जिसे आस-पास के गांवों से काफी संख्या में युवा वर्ग के नौजवान एकत्रित होते हैं तथा गांव के युवा वर्ग द्वारा इस आयोजन का जमकर आनंद लिया जाता है, महाशिवरात्रि अर्थात भोला चौदस पर भी गांव-भवनपुरा में विशेष आयोजन होते हैं इस दिन भगवान भोलेनाथ के भक्त ग्रामवासी युवा श्री गंगा जी रामघाट से कांवर लेकर आते हैं इन कावडियों के ग्राम पहुंचनें पर भव्य स्वागत किया जाता है तथा गांव के सभी लोग बैंड बाजे के साथ गांव की परिक्रमा करने के बाद भगवान शिव का जलाभिषेक करते हैं,इस दिन गांव सभी घरों में विशेष पकवान व गाजर का हलवा,खोवा के लड्डू,सिघाडे का हलवा आदि बनते हैं जिन्हें महाशिवरात्रि पर व्रत रखने वाले लोग बडे चाव से खाते हैं, शिक्षा- प्रारंभिक शिक्षा हेतु गांव में ही प्राईमरी स्कूल, जूनियर हाईस्कूल है, इससे आगे की पढाई के लिये निकटवर्ती कस्बा गोवर्धन, अडींग जाना पडता है इन कस्बों के प्रमुख इंटर कालेजों/पी०जी० कालेजों की सूची निम्नलिखित है निकटवर्ती पर्यटन/धार्मिक स्थल- .

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मनोरंजन

मनोरंजन एक ऐसी क्रिया है जिसमें सम्मिलित होने वाले को आनन्द आता है एवं मन श्रान्त होता हैं। मनोरंजन सीधे भाग लेकर हो सकता है या कुछ लोगों को कुछ करते हुए देखने से हो सकता है। .

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माच

माच (अंग्रेजी में Mach) मालवा का प्रमुख लोक नाट्य रूप है। लोक मानस के प्रभावी मंच माच को उज्जैन में जन्म मिला है। माच शब्द का सम्बन्ध संस्कृत मूल मंच से है। इस मंच शब्द के मालवी में अनेक क्षेत्रों में प्रचलित परिवर्तित रूप मिलते हैं। उदाहणार्थ- माचा, मचली, माचली, माच, मचैली, मचान जैसे कई शब्दों का आशय मंच के समानार्थी भाव बोध को ही व्यक्त करता है। माच गुरु सिद्धेश्वर सेन माच की व्युत्पत्ति के पीछे सम्भावना व्यक्त करते हैं कि माच के प्रवर्तक गुरु गोपालजी ने सम्भवतः कृषि की रक्षा के लिए पेड़ पर बने मचान को देखा होगा, जिस पर चढ़कर स्त्री या पुरुष आवाज आदि के माध्यम से नुकसान पहुँचाने वाले पशु-पक्षियों से खेत की रक्षा करते हैं। गुरु गोपालजी ने मचान शब्द को ध्यान में रखा होगा और फिर नाट्य-प्रदर्शन के ऊँचे स्थान (मंच) से उसी मचान की आकृति एवं रूप साम्य के आधार पर अपने मंच का नाम माच दे दिया होगा। कालान्तर में यही नाम प्रचलित हो गया। वस्तुतः माच के मंच और मचान में पर्याप्त साम्य रहा है। पुराने दौर में माच का मंच इतना अधिक ऊँचा बनाया जाता था कि उसके नीचे से बैलगाड़ी भी गुजर जाती थी। इन दिनों मंच की ऊँचाई प्रायः सामान्य ही रहती है। भारत के विभिन्न अंचलों में बोली जाने वाली लोक-भाषाएँ राष्ट्रभाषा हिंदी की समृद्धि का प्रमाण हैं। लोक-भाषाएँ और उनका साहित्य वस्तुतः भारतीय संस्कृति एवं राष्ट्रवाणी के लिए अक्षय स्रोत हैं। हम इनका जितना मंथन करें, उतने ही अमूल्य रत्न हमें मिलते रहेंगे। कथित आधुनिकता के दौर में हम अपनी बोली-बानी, साहित्य-संस्कृति से विमुख होते जा रहे हैं। ऐसे समय में जितना विस्थापन लोगों और समुदायों का हो रहा है, उससे कम लोक-भाषा और लोक-साहित्य का नहीं हो रहा है। घर-आँगन की बोलियाँ अपने ही परिवेश में पराई होने का दर्द झेल रही हैं। इस दिशा में लोकभाषा, साहित्य और संस्कृतिप्रेमियों के समग्र प्रयासों की दरकार है। प्रो शैलेंद्रकुमार शर्मा के अनुसार भारत के हृदय अंचल मालवा ने तो एक तरह से समूची भारतीय संस्कृति को गागर में सागर की तरह समाया हुआ है। मालवा की परम्पराएँ समूचे भारत से प्रभावित हुई हैं और पूरे भारत को मालवा की संस्कृति ने किसी न किसी रूप में प्रभावित किया है। मालवा भारत का हृदय अंचल है तो इसकी सांस्कृतिक राजधानी है उज्जैन। उज्जैन कला के अधिष्ठाता शिव और सर्व-कला-रत्न श्रीकृष्ण की नगरी है। इसी नगरी को लोक नाट्य माच के जन्म का श्रेय जाता है। आज का मालवा सम्पूर्ण पश्चिमी मध्यप्रदेश और उसके साथ सीमावर्ती पूर्वी राजस्थान के कुछ जिलों तक विस्तार लिए हुए है, जहाँ मालवी और उसकी उपबोलियों का प्रयोग होता है। इसकी सीमा रेखा के संबंध में एक पारम्परिक दोहा प्रचलित है जिसके अनुसार चम्बल, बेतवा और नर्मदा नदियों से घिरे भू-भाग को मालवा की सीमा मानना चाहिए- इत चम्बल उत बेतवा मालव सीम सुजान। दक्षिण दिसि है नर्मदा यह पूरी पहचान।। मालवा का लोक-साहित्य की दृष्टि से अत्यंत समृद्ध है। यहाँ का लोकमानस शताब्दी-दर-शताब्दी कथा-वार्ता, गाथा, गीत, नाट्य, पहेली, लोकोक्ति आदि के माध्यम से अभिव्यक्ति पाता आ रहा है। जीवन का ऐसा कोई प्रसंग नहीं है, जब मालवजन अपने हर्ष-उल्लास, सुख-दुःख को दर्ज करने के लिये लोक-साहित्य का सहारा न लेता हो। भारतीय लोक-नाट्य परम्परा में मालवा के माच का विशिष्ट स्थान है। मालवा क्षेत्र का प्रतिनिधि लोक नाट्य माच है, जो अपनी सुदीर्घ परम्परा के साथ आज भी लोक मानस का प्रभावी मंच बना हुआ हैं। मालवा के लोकगीतों, लोक-कथाओं, लोक- नृत्य रूपों और लोक-संगीत के समावेश से समृद्ध माच सम्पूर्ण नाट्य (टोटल थियेटर) की सम्भावनाओं को मूर्त करता है। लोकमानस की सहज अभिव्यंजना और लोक रंग व्यवहारों की सरल रेखीय अनायासता से उपजा यह लोकनाट्य लोकरंजन और लोक मंगल के प्रभावी माध्यम के रूप में स्थापित है। माच मालवा-राजस्थान के व्यापक जनसमुदाय को आन्दोलित करता आ रहा है। माच शब्द संस्कृत के मंच शब्द का ही परिवर्तित रूप है। माच के नाटकों को खेल कहा जाता है, जो मुक्ताकाशी रंगमंच पर प्रस्तुत किए जाते हैं। संगीत, नृत्य, पाठ, अभिनय और बोलों  की अन्तः क्रिया माच को एक सम्पूर्ण नाट्य या यूँ कहें टोटल थियेटर का रूप दे देती है। माच के खेलों में सामाजिक सद्भाव, परस्पर प्रेम और सहज लोक जीवन के दर्शन होते हैं। माच के दर्शकों में भी एक खास ढंग की रसिकता देखी जा सकती है। इसके दर्शक महज दर्शक नहीं होते, मंच व्यापार में उनकी आपसदारी भी दिखाई द .

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हिन्दी नाटक

हिंदी में नाटकों का प्रारंभ भारतेन्दु हरिश्चंद्र से माना जाता है। उस काल के भारतेन्दु तथा उनके समकालीन नाटककारों ने लोक चेतना के विकास के लिए नाटकों की रचना की इसलिए उस समय की सामाजिक समस्याओं को नाटकों में अभिव्यक्त होने का अच्छा अवसर मिला। जैसाकि कहा जा चुका है, हिन्दी में अव्यावसायिक साहित्यिक रंगमंच के निर्माण का श्रीगणेश आगाहसन ‘अमानत’ लखनवी के ‘इंदर सभा’ नामक गीति-रूपक से माना जा सकता है। पर सच तो यह है कि ‘इंदर सभा’ की वास्तव में रंगमंचीय कृति नहीं थी। इसमें शामियाने के नीचे खुला स्टेज रहता था। नौटंकी की तरह तीन ओर दर्शक बैठते थे, एक ओर तख्त पर राजा इंदर का आसन लगा दिया जाता था, साथ में परियों के लिए कुर्सियाँ रखी जाती थीं। साजिंदों के पीछे एक लाल रंग का पर्दा लटका दिया जाता था। इसी के पीछे से पात्रों का प्रवेश कराया जाता था। राजा इंदर, परियाँ आदि पात्र एक बार आकर वहीं उपस्थित रहते थे। वे अपने संवाद बोलकर वापस नहीं जाते थे। उस समय नाट्यारंगन इतना लोकप्रिय हुआ कि अमानत की ‘इंदर सभा’ के अनुकरण पर कई सभाएँ रची गई, जैसे ‘मदारीलाल की इंदर सभा’, ‘दर्याई इंदर सभा’, ‘हवाई इंदर सभा’ आदि। पारसी नाटक मंडलियों ने भी इन सभाओं और मजलिसेपरिस्तान को अपनाया। ये रचनाएँ नाटक नहीं थी और न ही इनसे हिन्दी का रंगमंच निर्मित हुआ। इसी से भारतेन्दु हरिश्चन्द्र इनको 'नाटकाभास' कहते थे। उन्होंने इनकी पैरोडी के रूप में ‘बंदर सभा’ लिखी थी। .

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जमूरा

जमूरा प्रदर्शक-कलाकार ज़्यादादर उत्तर भारत और पाकिस्तान के कलओ में मौजूद होते है। जमूरा (Jamoora) एक प्रदर्शक-कलाकार होता है जो भारतीय उपमहाद्वीप के उत्तर भाग (विशेषकर उत्तर भारत और पाकिस्तान) के भांड, तमाशा और नौटंकी जैसी लोक-नाटक शैलियों में एक सहायक का काम करता है।, रामसिंह जाखड़, हरियाणा साहित्य मंडल, १९९१,...

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जॉन सीना

जॉन फेलिक्स एंथोनी सीना (जन्म 23 अप्रैल 1977) एक अमेरिकी अभिनेता, हिप-हॉप संगीतकार और पेशेवर पहलवान हैं, जो सम्प्रति वर्ल्ड रेसलिंग इंटरटेनमेंट (WWE) द्वारा उसके रॉ ब्रांड पर नियोजित हैं, जहां वे विजेता हैं। पेशेवर कुश्ती में सीना पंद्रह बार के विश्व चैंपियन है, तीन बार के वर्ल्ड हेवीवेट चैंपियन तथा रिकॉर्ड बारह बार के डब्ल्यू डब्ल्यू ई वर्ल्ड हेवीवेट चैंपियन हैं। इन प्रतियोगिताओं के अलावा, सीना ने WWE अमेरिकी चैम्पियनशिप भी तीन बार और वर्ल्ड टैग टीम चैम्पियनशिप दो बार (शॉन माइकल्स और एक बार बतिस्ता के साथ) जीता है। सीना, 2008 रॉयल रंबल मैच के भी विजेता रहे हैं। सीना ने अपना पेशेवर कुश्ती कॅरियर, 2000 में अल्टीमेट प्रो रेसलिंग (UPW) के लिए कुश्ती लड़ते हुए शुरू किया, जहां उन्होंने UPW हैवीवेट चैम्पियनशिप को अपने नाम किया। 2001 में, सीना ने विश्व कुश्ती महासंघ (WWF) के साथ एक अनुबंध पर हस्ताक्षर किए और उन्हें ओहियो वैली रेसलिंग (OVW) भेजा गया, जहां उन्होंने OVW हैवीवेट चैम्पियनशिप और OVW सदर्न टैग टीम चैम्पियनशिप (रिको कॉन्स्टेनटिनो के साथ) अपने नाम किया। कुश्ती के बाहर, सीना ने रैप एलबम यु कांट सी मी जारी किया है, जो US ''बिल बोर्ड'' 200 चार्ट पर #15 पर शुरू हुआ और द मरीन (2006) और 12 राउंड्स (2009) फिल्मों में अभिनय किया है। सीना ने टेलीविज़न कार्यक्रमों पर भी प्रस्तुति दी है, जिनमें शामिल हैं, मैनहंट/0, 0डील ऑर नो डील, MADtv, सैटरडे नाईट लाइव और पंक्ड.

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ख्याल (मालवी गीत)

हास्य प्रधान मालवी गीत और चित्र को ख्याल कहते हैं। किंतु इसका अभिप्राय राजस्थान में एक प्रकार के लोकनाट्य से समझा जाता है जो उत्तर प्रदेश की नौटंकी तथा मालवा के माच से मिलता जुलता है। यह खुले प्रांगण में खेला जाता है। चारों ओर दर्शक बैठते हैं, बीच में रंगमंच के लिए स्थान खाली रहता है। वहाँ ख्याल प्रदर्शित करने वाली मंडली बैठती है; नगाड़ा, ढोल, सारंगी और हारमोनियम का बाजे के रूप में प्रयोग किया जाता है। ख्याल की कथा की अभिव्यक्ति लावनी, दूहा, दोहा, चौबोला, चौपाई, छंद, शेर, कवित्त, छप्पय आदि छंदो तथा पांड, सोरठ, कालंगड़ा, आसावरी अदि किसी राग रागनी में गाकर की जाती है। अभिनेता ऊँचे स्वर से गाता हुआ भूमिका के अनुरूप अभिनय करता है। ख्याल के अभिनेता मंच से बाहर रहकर गणपति और सरस्वती पूजन करते हैं। तदनंतर मंच पर एक एक कर भंगी, भिश्ती आदि आकर मंच की सफाई, झाड़पोेंछ का अभिनय करते हैं। तदनंतर आख्यान का मुख्य नायक उपस्थित होकर आत्मपरिचय देता है और ख्याल आरंभ होता हैं। ख्याल का विषय पौराणिक, ऐतिहासिक अथवा प्रेम कथा होते है। इस नाटक का आरंभ मूलत: वीरपूजा की भावना से हुआ था। अनेक कवियों ने राजस्थानी भाषा में ख्यालों की रचना की है। .

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इंदर सभा

इंदर सभा एक उर्दू का नाटक और ओपेरा है जिसे लखनऊ के अवध दरबार से सम्बन्ध रखने वाले लेखक व कवि आग़ा हसन अमानत​ ने लिखा और जिसे मंच पर सबसे पहले सन् १८५३ में प्रस्तुत किया गया।, Amaresh Datta, Sahitya Akademi, 2006, ISBN 978-81-260-1194-0,...

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अंतरिक्ष ओपेरा

अंतरिक्ष ओपेरा उपन्यास का बाहरी पन्ना जिसमें इस शैली के कुछ क्लीशे तत्व दर्शाए गए हैं अंतरिक्ष ओपेरा या स्पेस ओपेरा (space opera) विज्ञान कथा (साइंस फ़िक्शन) की एक उपशैली है जसमें पृथ्वी से बाहर अन्य ग्रहों में या खुले अंतरिक्ष में में रोमांचकारी घटनाएँ होती हैं और अक्सर कहानी में प्रेमकथा के तत्व भी मिश्रित होते हैं। इसमें अक्सर दो ऐसे प्रतिद्वंदियों के बीच की लड़ाई भी दर्शाई जाती है जिनके पास एक काल्पनिक सुदूर भविष्य की वैज्ञानिक उपलब्धियाँ और हथियार होते हैं। छह फ़िल्मों वाली प्रसिद्ध स्टार वॉर्स शृंखला अंतरिक्ष ओपेरा का एक अच्छा उदाहरण है।, Kathleen Kuiper, pp., The Rosen Publishing Group, 2011, ISBN 978-1-61530-494-3,...

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