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दमा

सूची दमा

अस्थमा (दमा) (ग्रीक शब्द ἅσθμα, ásthma, "panting" से) श्वसन मार्ग का एक आम जीर्ण सूजन disease वाला रोग है जिसे चर व आवर्ती लक्षणों, प्रतिवर्ती श्वसन बाधा और श्वसनी-आकर्षसे पहचाना जाता है। आम लक्षणों में घरघराहट, खांसी, सीने में जकड़न और श्वसन में समस्याशामिल हैं। दमा को आनुवांशिक और पर्यावरणीय कारकों का संयोजन माना जाता है।इसका निदान सामान्यतया लक्षणों के प्रतिरूप, समय के साथ उपचार के प्रति प्रतिक्रिया और स्पाइरोमेट्रीपर आधारित होता है। यह चिकित्सीय रूप से लक्षणों की आवृत्ति, एक सेकेन्ड में बलपूर्वक निःश्वसन मात्रा (FEV1) और शिखर निःश्वास प्रवाह दर के आधार पर वर्गीकृत है।दमे को अटॉपिक (वाह्य) या गैर-अटॉपिक (भीतरी) की तरह भी वर्गीकृत किया जाता है जहां पर अटॉपी को टाइप 1 अतिसंवेदनशीलता प्रतिक्रियाओं के विकास की ओर पहले से अनुकूलित रूप में सन्दर्भित किया गया है। गंभीर लक्षणों का उपचार आम तौर पर एक अंतःश्वसन वाली लघु अवधि मे काम करे वाली बीटा-2 एगोनिस्ट (जैसे कि सॉल्ब्यूटामॉल) और मौखिक कॉर्टिकोस्टरॉएड द्वारा किया जाता है। प्रत्येक गंभीर मामले में अंतःशिरा कॉर्टिकोस्टरॉएड, मैग्नीशियम सल्फेट और अस्पताल में भर्ती करना आवश्यक हो सकता है। लक्षणों को एलर्जी कारकों और तकलीफ कारकों जैसे उत्प्रेरकों से बचाव करके तथा कॉर्टिकोस्टरॉएड के उपयोग से रोका जा सकता है। यदि अस्थमा लक्षण अनियंत्रित रहते हैं तो लंबी अवधि से सक्रिय हठी बीटा (LABA) या ल्यूकोट्रीन प्रतिपक्षी को श्वसन किये जाने वाले कॉर्टिकोस्टरॉएड को उपयोग किया जा सकता है। 1970 के बाद से अस्थमा के लक्षण महत्वपूर्ण रूप से बढ़ गये हैं। 2011 तक, पूरे विश्व में 235-300 मिलियन लोग इससे प्रभावित थे, जिनमें लगभग 2,50,000 मौतें शामिल हैं। .

37 संबंधों: एक्यूपंक्चर, डेंगू बुख़ार, डॉ. रेड्डीज लेबोरेटरीज, तनाव (मनोवैज्ञानिक), तम्बाकू, त्वचाखरता, धतूरा, न्यूमोनिया, नेब्युलाइज़र (कणित्र या तरल पदार्थ को सूक्ष्म कणों में बदलने वाला यंत्र) (Nebulizer), प्राचीन मिस्र, पेरासिटामोल, पीपल, ब्रोन्किइक्टेसिस, भारत में पर्यावरणीय समस्याएं, मदार, मूलबंध, मोनोसोडियम ग्लूटामेट, रश्मिचिकित्सा, रेकी चिकित्सा, श्वसन चिकित्सा, श्वसन तंत्र, श्वास योग्य सस्पेंडेड कणीय पदार्थ, श्वास कष्ट (डिस्पनिया), हेपरिन, जिम मॉरिसन, जेसिका एल्बा, घरघराहट (व्हीज़), वायु प्रदूषण, विपवारम, विश्व अस्थमा दिवस, ग्लैक्सो स्मिथक्लाइन, ग्लोरिया वेंडरबिल्ट, कलौंजी, किवांच, क्रॉनिक ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिसीस, अनुपालन (दवा), अंजीर

एक्यूपंक्चर

हुआ शउ से एक्यूपंक्चर चार्ट (fl. 1340 दशक, मिंग राजवंश). शि सी जिंग फ़ा हुई की छवि (चौदह मेरिडियन की अभिव्यक्ति). (टोक्यो: सुहाराया हेइसुके कंको, क्योहो गन 1716). एक्यूपंक्चर (Accupuncture) दर्द से राहत दिलाने या चिकित्सा प्रयोजनों के लिए शरीर के विभिन्न बिंदुओं में सुई चुभाने और हस्तकौशल की प्रक्रिया है।एक्यूपंक्चर: दर्द से राहत दिलाने, शल्यक बेहोशी और उपचारात्मक उद्देश्यों के लिए परिसरीय नसों के समानांतर शरीर के विशिष्ट भागों में बारीक सुईयां चुभाने का चीना अभ्यास.

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डेंगू बुख़ार

डेंगू बुख़ार एक संक्रमण है जो डेंगू वायरस के कारण होता है। समय पर करना बहुत जरुरी होता हैं. मच्छर डेंगू वायरस को संचरित करते (या फैलाते) हैं। डेंगू बुख़ार को "हड्डीतोड़ बुख़ार" के नाम से भी जाना जाता है, क्योंकि इससे पीड़ित लोगों को इतना अधिक दर्द हो सकता है कि जैसे उनकी हड्डियां टूट गयी हों। डेंगू बुख़ार के कुछ लक्षणों में बुखार; सिरदर्द; त्वचा पर चेचक जैसे लाल चकत्ते तथा मांसपेशियों और जोड़ों में दर्द शामिल हैं। कुछ लोगों में, डेंगू बुख़ार एक या दो ऐसे रूपों में हो सकता है जो जीवन के लिये खतरा हो सकते हैं। पहला, डेंगू रक्तस्रावी बुख़ार है, जिसके कारण रक्त वाहिकाओं (रक्त ले जाने वाली नलिकाएं), में रक्तस्राव या रिसाव होता है तथा रक्त प्लेटलेट्स  (जिनके कारण रक्त जमता है) का स्तर कम होता है। दूसरा डेंगू शॉक सिंड्रोम है, जिससे खतरनाक रूप से निम्न रक्तचाप होता है। डेंगू वायरस चार भिन्न-भिन्न प्रकारों के होते हैं। यदि किसी व्यक्ति को इनमें से किसी एक प्रकार के वायरस का संक्रमण हो जाये तो आमतौर पर उसके पूरे जीवन में वह उस प्रकार के डेंगू वायरस से सुरक्षित रहता है। हलांकि बाकी के तीन प्रकारों से वह कुछ समय के लिये ही सुरक्षित रहता है। यदि उसको इन तीन में से किसी एक प्रकार के वायरस से संक्रमण हो तो उसे गंभीर समस्याएं होने की संभावना काफी अधिक होती है।  लोगों को डेंगू वायरस से बचाने के लिये कोई वैक्सीन उपलब्ध नहीं है। डेंगू बुख़ार से लोगों को बचाने के लिये कुछ उपाय हैं, जो किये जाने चाहिये। लोग अपने को मच्छरों से बचा सकते हैं तथा उनसे काटे जाने की संख्या को सीमित कर सकते हैं। वैज्ञानिक मच्छरों के पनपने की जगहों को छोटा तथा कम करने को कहते हैं। यदि किसी को डेंगू बुख़ार हो जाय तो वह आमतौर पर अपनी बीमारी के कम या सीमित होने तक पर्याप्त तरल पीकर ठीक हो सकता है। यदि व्यक्ति की स्थिति अधिक गंभीर है तो, उसे अंतः शिरा द्रव्य (सुई या नलिका का उपयोग करते हुये शिराओं में दिया जाने वाला द्रव्य) या रक्त आधान (किसी अन्य व्यक्ति द्वारा रक्त देना) की जरूरत हो सकती है। 1960 से, काफी लोग डेंगू बुख़ार से पीड़ित हो रहे हैं। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद से यह बीमारी एक विश्वव्यापी समस्या हो गयी है। यह 110 देशों में आम है। प्रत्येक वर्ष लगभग 50-100 मिलियन लोग डेंगू बुख़ार से पीड़ित होते हैं। वायरस का प्रत्यक्ष उपचार करने के लिये लोग वैक्सीन तथा दवाओं पर काम कर रहे हैं। मच्छरों से मुक्ति पाने के लिये लोग, कई सारे अलग-अलग उपाय भी करते हैं।  डेंगू बुख़ार का पहला वर्णन 1779 में लिखा गया था। 20वीं शताब्दी की शुरुआत में वैज्ञानिकों ने यह जाना कि बीमारी डेंगू वायरस के कारण होती है तथा यह मच्छरों के माध्यम से संचरित होती (या फैलती) है। .

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डॉ. रेड्डीज लेबोरेटरीज

डॉ॰ रेड्डीज लेबोरेटरीज लिमिटेड (Dr. Reddy's Laboratories Ltd.), जिसे डॉ रेड्डीज के नाम से ट्रेड किया जाता है, आज भारत की दूसरी सबसे बड़ी औषधि कंपनी है। इसकी स्थापना 1984 में डॉक्टर के.

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तनाव (मनोवैज्ञानिक)

आज के समय में तनाव (stress) लोगों के लिए बहुत ही सामान्य अनुभव बन चुका है, जो कि अधिसंख्य दैहिक और मनोवैज्ञानिक प्रतिक्रियाओं द्वारा व्यक्त होता है। तनाव की पारंपरिक परिभाषा दैहिक प्रतिक्रिया पर केंद्रित है। हैंस शैले (Hans Selye) ने 'तनाव' (स्ट्रेस) शब्द को खोजा और इसकी परिभाषा शरीर की किसी भी आवश्यकता के आधार पर अनिश्चित प्रतिक्रिया के रूप में की। हैंस शैले की पारिभाषा का आधार दैहिक है और यह हारमोन्स की क्रियाओं को अधिक महत्व देती है, जो ऐड्रिनल और अन्य ग्रन्थियों द्वारा स्रवित होते हैं। शैले ने दो प्रकार के तनावों की संकल्पना की-.

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तम्बाकू

तम्बाकू एक प्रकार के निकोटियाना प्रजाति के पेड़ के पत्तों को सुखा कर नशा करने की वस्तु बनाई जाती है। दरअसल तम्बाकू एक मीठा जहर है, एक धीमा जहर.

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त्वचाखरता

thumb त्वचाखरता (xeroderma) त्वचा का एक रोग है। त्वचा का रूखा हो जाना (जेरोडर्मा) या जन्म से सूखी त्वचा होना (जेरोडर्मिया) एक ऐसी समस्या है जो कि अध्यावरणी तंत्र की गड़बड़ी के कारण होती है। आम तौर पर इसका इलाज नमीकारक के इस्तेमाल के द्वारा किया जा सकता है। सुखी त्वचा की समस्या काफ़ी भद्दी और पीड़ादायक हो सकती है। जेरोडर्मा आम तौर पर खोपड़ी, पैरों के निचले भाग, बाँह, हाथों, पोरों, पेट के किनारों और जाँघो मे होती है। इसके लक्षणो मे पपड़ी पड़ना (बाहरी त्वचा का उखड़ना), खुजली और त्वचा में दरार पड़ना सबसे आम है। इन सभी भागों में लाल रंग ने निशान बन जातें हैं और लगतार खुजली बनी रहती है। .

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धतूरा

धतूरा एक पादप है।। यह लगभग १ मीटर तक ऊँचा होता है। यह वृक्ष काला-सफेद दो रंग का होता है। और काले का फूल नीली चित्तियों वाला होता है। हिन्दू लोग धतूरे ले फल, फूल और पत्ते शंकरजी पर चढ़ाते हैं। आचार्य चरक ने इसे 'कनक' और सुश्रुत ने 'उन्मत्त' नाम से संबोधित किया है। आयुर्वेद के ग्रथों में इसे विष वर्ग में रखा गया है। अल्प मात्रा में इसके विभिन्न भागों के उपयोग से अनेक रोग ठीक हो जाते हैं। नाम: संस्कृत - धतूर, मदन, उन्मत्त, मातुल, हिन्दी - धतूरा, बंगला - धुतुरा, मराठी - धोत्रा, धोधरा, गुजराती - धंतर्रा, अंग्रेजी - धोर्न एप्पल स्ट्रामोनियम। .

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न्यूमोनिया

फुफ्फुसशोथ या फुफ्फुस प्रदाह (निमोनिया) फेफड़े में सूजन वाली एक परिस्थिति है—जो प्राथमिक रूप से अल्वियोली(कूपिका) कहे जाने वाले बेहद सूक्ष्म (माइक्रोस्कोपिक) वायु कूपों को प्रभावित करती है। यह मुख्य रूप से विषाणु या जीवाणु और कम आम तौर पर सूक्ष्मजीव, कुछ दवाओं और अन्य परिस्थितियों जैसे स्वप्रतिरक्षित रोगों द्वारा संक्रमण द्वारा होती है। आम लक्षणों में खांसी, सीने का दर्द, बुखार और सांस लेने में कठिनाई शामिल है। नैदानिक उपकरणों में, एक्स-रे और बलगम का कल्चर शामिल है। कुछ प्रकार के निमोनिया की रोकथाम के लिये टीके उपलब्ध हैं। उपचार, अंतर्निहित कारणों पर निर्भर करते हैं। प्रकल्पित बैक्टीरिया जनित निमोनिया का उपचार प्रतिजैविक द्वारा किया जाता है। यदि निमोनिया गंभीर हो तो प्रभावित व्यक्ति को आम तौर पर अस्पताल में भर्ती किया जाता है। वार्षिक रूप से, निमोनिया लगभग 450 मिलियन लोगों को प्रभावित करता है जो कि विश्व की जनसंख्या का सात प्रतिशत है और इसके कारण लगभग 4 मिलियन मृत्यु होती हैं। 19वीं शताब्दी में विलियम ओस्लर द्वारा निमोनिया को "मौत बांटने वाले पुरुषों का मुखिया" कहा गया था, लेकिन 20वीं शताब्दी में एंटीबायोटिक उपचार और टीकों के आने से बचने वाले लोगों की संख्या बेहतर हुई है।बावजूद इसके, विकासशील देशों में, बहुत बुज़ुर्गों, बहुत युवा उम्र के लोगों और जटिल रोगियों में निमोनिया अभी मृत्यु का प्रमुख कारण बना हुआ है। .

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नेब्युलाइज़र (कणित्र या तरल पदार्थ को सूक्ष्म कणों में बदलने वाला यंत्र) (Nebulizer)

चिकित्सा उद्योग में, नेब्युलाइज़र (ब्रिटिश अंग्रेजी में इसकी वर्तनी nebuliser है) एक ऐसा उपकरण है जिसका उपयोग दवा को फेफड़ों में एक धूम के रूप में पहुंचाने के लिए किया जाता है। एक कम्प्रेसर से जुड़ा हुआ एक जेट नेब्युलाइज़र. नेब्युलाइज़र का उपयोग आमतौर पर सिस्टिक फाइब्रोसिस, अस्थमा, सीओपीडी और अन्य सांस के रोगों के उपचार के लिए किया जाता है। ज्वलनशील धूम्रपान उपकरण (Combustible smoking devices) (जैसे अस्थमा सिगरेट (asthma cigarettes) या केनाबीस जोइंट्स (cannabis joints)), एक वेपोराइज़र, शुष्क पाउडर इन्हेलर, या एक दबाव युक्त मापी गयी खुराक के इन्हेलर का उपयोग भी दवा को सांस के ज़रिये अन्दर लेने के लिए किया जा सकता है। आजकल ज्वलनशील धूम्रपान उपकरणों और वेपोराइज़र का उपयोग दवा को सांस के ज़रिये अन्दर लेने (इन्हेल करने) के लिए नहीं किया जाता है, क्योंकि आधुनिक इन्हेलर और नेब्युलाइज़र अधिक प्रभावी हैं। सभी नेब्युलाइज़र्स के लिए सामान्य तकनीकी सिद्धांत एक ही है, जिसके अनुसार ऑक्सीजन, संपीडित वायु या अल्ट्रासॉनिक शक्ति का उपयोग दवा के विलयन निलंबन को छोटे एरोसोल बूंदों में मिलाने के लिए किया जाता है ताकि उपकरण के मुख से सीधे इस विलयन को इन्हेल किया जा सके.

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प्राचीन मिस्र

गीज़ा के पिरामिड, प्राचीन मिस्र की सभ्यता के सबसे ज़्यादा पहचाने जाने वाले प्रतीकों में से एक हैं। प्राचीन मिस्र का मानचित्र, प्रमुख शहरों और राजवंशीय अवधि के स्थलों को दर्शाता हुआ। (करीब 3150 ईसा पूर्व से 30 ई.पू.) प्राचीन मिस्र, नील नदी के निचले हिस्से के किनारे केन्द्रित पूर्व उत्तरी अफ्रीका की एक प्राचीन सभ्यता थी, जो अब आधुनिक देश मिस्र है। यह सभ्यता 3150 ई.पू.

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पेरासिटामोल

पेरासिटामोल (INN)() या एसिटामिनोफेन (USAN) व्यापक रूप से प्रयुक्त की जाने वाली काउंटर पर उपलब्ध एनाल्जेसिक (दर्द निवारक) और एंटीपायरेटिक (बुखार कम करने वाली) दवा है। इसका प्रयोग आम तौर पर बुखार, सर दर्द और अन्य छोटे मोटे दर्द से राहत पाने के लिए किया जाता है और यह असंख्य सर्दी और फ्लू के उपचार में काम में ली जाने वाली दवाओं का प्रमुख अवयव है। स्टेरोयड रहित प्रति-शोथ दवाओं (NSAIDs) और ओपिओइड एनाल्जेसिक के साथ संयोजन में, पेरासिटामोल का प्रयोग अधिक गंभीर दर्द के इलाज में भी किया जाता है। (जैसे सर्जरी के बाद में होने वाले दर्द में)ओपिओइड एनाल्जेसिक हालांकि इसे आम तौर पर निर्धारित मात्रा में मानव उपयोग के लिए सुरक्षित माना जाता है, लेकिन पेरासिटामोल की निर्धारित मात्रा से अधिक खुराक (वयस्कों में प्रति खुराक 1000 mg से ज्यादा और प्रति दिन 4000 mg से ज्यादा और प्रति दिन 2000 mg से ज्यादा यदि एल्कोहल का सेवन किया जा रहा है) लीवर की घातक क्षति का कारण बन सकती है, किसी किसी व्यक्ति में सामान्य खुराक भी इसी प्रकार से हानिकारक हो सकती है; यह जोखिम एल्कोहल के उपभोग के साथ बढ़ जाता है। पश्चिमी दुनिया में पेरासिटामोल की विषालुता लीवर की घातक विफलता का सबसे प्रमुख कारण है और संयुक्त राज्य अमेरिका, संयुक्त राष्ट्र, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलेंड में सबसे ज्यादा ओवरडोज़ इसी दवा की ली जाती है। पेरासिटामोल की व्युत्पत्ति कोलतार से हुई है और यह "एनिलिन एनाल्जेसिक" नामक दवाओं के वर्ग का एक भाग है। यह फेनासेटिन का सक्रिय मेटाबॉलिज़मक है, जो कभी खुद एक एनाल्जेसिक और एंटीपायरेटिक के रूप में लोकप्रिय था, लेकिन फेनासेटिन और इसके संयोजन के विपरीत, पेरासिटामोल को चिकित्सकीय खुराक में कार्सिनोजनिक नहीं माना जाता है। दोनों शब्द एसिटामिनोफेन और पेरासिटामोल एक ही यौगिक के रासायनिक नाम से आये हैं, यह यौगिक है: पेरा -एसिटा इलएमिनोफिनो ल और पेरा -एसिटा इलएमि नोफिनोल कुछ सन्दर्भों में, इसे संक्षिप्त रूप में केवल APAP कहा जाता है, यह संक्षिप्त रूप N-एसिटाइल -पेरा-एमिनोफिनोल के लिए है। .

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पीपल

''पीपल की कोपलें'' पीपल (अंग्रेज़ी: सैकरेड फिग, संस्कृत:अश्वत्थ) भारत, नेपाल, श्री लंका, चीन और इंडोनेशिया में पाया जाने वाला बरगद, या गूलर की जाति का एक विशालकाय वृक्ष है जिसे भारतीय संस्कृति में महत्त्वपूर्ण स्थान दिया गया है तथा अनेक पर्वों पर इसकी पूजा की जाती है। बरगद और गूलर वृक्ष की भाँति इसके पुष्प भी गुप्त रहते हैं अतः इसे 'गुह्यपुष्पक' भी कहा जाता है। अन्य क्षीरी (दूध वाले) वृक्षों की तरह पीपल भी दीर्घायु होता है। इसके फल बरगद-गूलर की भांति बीजों से भरे तथा आकार में मूँगफली के छोटे दानों जैसे होते हैं। बीज राई के दाने के आधे आकार में होते हैं। परन्तु इनसे उत्पन्न वृक्ष विशालतम रूप धारण करके सैकड़ों वर्षो तक खड़ा रहता है। पीपल की छाया बरगद से कम होती है, फिर भी इसके पत्ते अधिक सुन्दर, कोमल और चंचल होते हैं। वसंत ऋतु में इस पर धानी रंग की नयी कोंपलें आने लगती है। बाद में, वह हरी और फिर गहरी हरी हो जाती हैं। पीपल के पत्ते जानवरों को चारे के रूप में खिलाये जाते हैं, विशेष रूप से हाथियों के लिए इन्हें उत्तम चारा माना जाता है। पीपल की लकड़ी ईंधन के काम आती है किंतु यह किसी इमारती काम या फर्नीचर के लिए अनुकूल नहीं होती। स्वास्थ्य के लिए पीपल को अति उपयोगी माना गया है। पीलिया, रतौंधी, मलेरिया, खाँसी और दमा तथा सर्दी और सिर दर्द में पीपल की टहनी, लकड़ी, पत्तियों, कोपलों और सीकों का प्रयोग का उल्लेख मिलता है। .

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ब्रोन्किइक्टेसिस

ब्रोन्किइक्टेसिस (श्वासनलिका का विस्फार) एक रोग की अवस्था है जिसे ब्रोन्कियल पेड़ के एक भाग के स्थानीयकृत, अपरिवर्तनीय फैलाव के रूप में परिभाषित किया गया है। यह वातस्फीति, ब्रोंकाइटिस और सिस्टिक फाइब्रोसिस सहित रोग प्रतिरोधी फेफड़े के रूप में वर्गीकृत किया जाता है। वायुप्रवाह रूकावट और क्षीण स्राव निकासी के परिणामस्वरूप शामिल ब्रांकाई फैला, सूजा हुआ और आसानी से सिमटने वाला हो जाता है। ब्रोन्किइक्टेसिस कई प्रकार के विकारों के साथ जुड़ा हुआ है, लेकिन यह आमतौर पर स्टैफीलोकोकस या क्लेबसिएला जीवाणु अथवा बोर्डेटेला काली खांसी जैसे नेक्रोटाइज़िंग जीवाणु संक्रमण की वजह से होता है। .

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भारत में पर्यावरणीय समस्याएं

गंगा बेसिन के ऊपर मोटी धुंध और धुआं. तेजी से बढ़ती हुई जनसंख्या व आर्थिक विकास के कारण भारत में कई पर्यावरणीय समस्याएं उत्पन्न हो रही हैं और इसके पीछे शहरीकरण व औद्योगीकरण में अनियंत्रित वृद्धि, बड़े पैमाने पर कृषि का विस्तार तथा तीव्रीकरण, तथा जंगलों का नष्ट होना है। प्रमुख पर्यावरणीय मुद्दों में वन और कृषि-भूमिक्षरण, संसाधन रिक्तीकरण (पानी, खनिज, वन, रेत, पत्थर आदि), पर्यावरण क्षरण, सार्वजनिक स्वास्थ्य, जैव विविधता में कमी, पारिस्थितिकी प्रणालियों में लचीलेपन की कमी, गरीबों के लिए आजीविका सुरक्षा शामिल हैं। यह अनुमान है कि देश की जनसंख्या वर्ष 2018 तक 1.26 अरब तक बढ़ जाएगी.

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मदार

मदार का वृक्ष आक के पुष से बनीं मालाएँ मदार (वानस्पतिक नाम:Calotropis gigantea) एक औषधीय पादप है। इसको मंदार', आक, 'अर्क' और अकौआ भी कहते हैं। इसका वृक्ष छोटा और छत्तादार होता है। पत्ते बरगद के पत्तों समान मोटे होते हैं। हरे सफेदी लिये पत्ते पकने पर पीले रंग के हो जाते हैं। इसका फूल सफेद छोटा छत्तादार होता है। फूल पर रंगीन चित्तियाँ होती हैं। फल आम के तुल्य होते हैं जिनमें रूई होती है। आक की शाखाओं में दूध निकलता है। वह दूध विष का काम देता है। आक गर्मी के दिनों में रेतिली भूमि पर होता है। चौमासे में पानी बरसने पर सूख जाता है। आक के पौधे शुष्क, उसर और ऊँची भूमि में प्रायः सर्वत्र देखने को मिलते हैं। इस वनस्पति के विषय में साधारण समाज में यह भ्रान्ति फैली हुई है कि आक का पौधा विषैला होता है, यह मनुष्य को मार डालता है। इसमें किंचित सत्य जरूर है क्योंकि आयुर्वेद संहिताओं में भी इसकी गणना उपविषों में की गई है। यदि इसका सेवन अधिक मात्रा में कर लिया जाये तो, उल्दी दस्त होकर मनुष्य की मृत्यु हो सकती है। इसके विपरीत यदि आक का सेवन उचित मात्रा में, योग्य तरीके से, चतुर वैद्य की निगरानी में किया जाये तो अनेक रोगों में इससे बड़ा उपकार होता है। .

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मूलबंध

महावीर के केवल ज्ञान '''मूलबन्धासन''' की मुद्रा में। मूलबन्ध का सर्वप्रथम उल्लेख जैन धर्मग्रन्थ 'आचारंग सूत्र' में हुआ है। बंध मुद्राएँ शरीर की कुछ ऐसी अवस्थाएँ हैं जिनके द्वारा कुंडलिनी सफलतापूर्वक जाग्रत की जा सकती है। घेरंड संहिता में २५ मुद्राओं एवं महत्वपूर्ण हैं: उपर्युक्त अनेक क्रियाओं का एक दूसरे से घनिष्ठ संबंध है। किसी किसी अभ्यास में दो या तीन बंधों और मुद्राओं को सम्मिलित करना पड़ता है। यौगिक क्रियाओं का जब नित्य विधिपूर्वक अभ्यास किया जाता है निश्चय ही उनका इच्छित फल मिलता है। मुद्राओं एवं बंधों के प्रयोग करने से मंदाग्नि, कोष्ठबद्धता, बवासीर, खाँसी, दमा, तिल्ली का बढ़ना, योनिरोग, कोढ़ एवं अनेक असाध्य रोग अच्छे हो जाते हैं। ये ब्रह्मचर्य के लिये प्रभावशाली क्रियाएँ हैं। ये आध्यात्मिक उन्नति के लिये अनिवार्य हैं। घेरण्ड संहिता में मूलबंध इस प्रकार वर्णित है: गुह्यप्रदेश को बाईं एड़ी पर संकुचित करके यत्नपूर्वक नाभिग्रंथि को मेरूदंड में दृढ़ता से संयुक्त करें। पुन: नाभि को भीतर खींचकर पीठ से लगाकर फिर उपस्थ को दाहिनी एड़ी से दृढ़ भाव से संबंद्ध करे। इसे ही मूलबंध कहते हैं। यह मुद्रा बुढ़ापे को नष्ट करती है। घेरंड संहिता में मूलबंध का फल इस प्रकार दिया हुआ है: मतांतर में मूलबंध इस प्रकार वर्णित है: एड़ी से मध्यप्रदेश का यत्नपूर्वक संपीडन करते हुए अपान वायु की बलपूर्वक धीरे-धीरे ऊपर की ओर खींचना चाहिए। इसे ही मूलबंध कहते हैं। यह बुढ़ापा एवं मृत्यु को नष्ट करता है। इसके द्वारा योनिमुद्रा सिद्ध होती है। इसके प्रभाव से साधक आकाश में उड़ सकते हैं। मूलबंध के नित्य अभ्यास करने से अपान वायु पूर्णरूपेण नियंत्रित हो जाती है। उदर रोग से मुक्ति हो जाती है। वीर्य रोग हो ही नहीं सकता। मूलबंध का साधक निर्द्वंद्व होकर वास्तविक स्वस्थ शरीर से आध्यात्मिक आनंद का अनुभव करता है। आयु बढ़ जाती है। इसका साधक भौतिक कार्यो को भी उल्लासपूर्वक संपन्न करता है। सभी बंधों में मूलबंध सर्वोच्च एवं शरीर के लिये अत्यंत उपयोगी है। .

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मोनोसोडियम ग्लूटामेट

मोनोसोडियम ग्लूटामेट, जिसे सोडियम ग्लूटामेट या एमएसजी भी कहा जाता है, एक सोडियम लवण है,ग्लूटामिक अम्ल का सोडियम लवण। यह अम्ल कुदरती रूप से मिलनेवाला सबसे सुलभ गैर-ज़रूरी अमीनो अम्ल है। अमरीका के खाद्य और दवा प्रशासन ने एमएसजी को सामान्यतः सुरक्षित समझे जानेवाले (जीआरएएस) के रूप में और यूरोपीय संघ ने भोजन योज्य के रूप में वर्गीकृत किया है। एमएसजी का एचएस कोड 29224220 और ई संख्या ई621 है। एमएसजी का ग्लूटामेट भोजन में ग्लूटामेट का ही उमामी स्वाद लाता है। रासायनिक दृष्टि से ये दोनों अभिन्न हैं। औद्योगिक आहार निर्माता एमएसजी को स्वाद बढ़ानेवाले के रूप में बेचते और उपयोग करते हैं, क्योंकि यह अन्य स्वादों को संतुलित करता है, मिलाता है और उनके संपूर्ण एहसास को पूर्णता प्रदान करता है। मोनोसोडियम ग्लूटामेट के व्यापार नामों में शामिल हैं अजि-नो-मोटो®, वेटसिन और एसेन्ट। .

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रश्मिचिकित्सा

मनुष्य अपने उत्पत्तिकाल से ही सूर्य की उपासना तथा सूर्यकिरणों का रोगों की चिकित्सा के लिए प्रयोग करता आया है। इन किरणों को वैज्ञानिक रूप में प्रयुक्त करने का श्रेय फिनसन्‌ (Finsen) को है। किरणचिकित्सा में कृत्रिम किरणों (artificial light), विशेषत: कार्बन आर्क (carbon arc) प्रयुक्त करने का सुझाव इन्हीं का है। उसी प्रकार रोलियर (Rollier) ने यक्ष्मा रोग (फुफ्फुस यक्ष्मा दोड़कर) की चिकित्सा में सूर्यकिरण-चिकित्सा (Heliotherapy या फोटोथिरैपी या लाइट थिरैपी) को बहुत लोकप्रिय बनाया। रश्मिचिकित्सा सूर्यकिरण चिकित्सा से विशिष्ट रोगों में बहुत लाभ होता है। चिकित्सा के समय इन बातों का ध्यान रखना आवश्यक है कि रागी को चिकित्साकाल में न तो अधिक शीत या ऊष्मा में रहना पड़े और न ही सूर्य के प्रखर, चौंधियानेवाले प्रकाश के कारण रोगी के मस्तिष्क में पीड़ा होने लगे। नेत्रों पर गहरा रंगीन चश्मा लगाना, सर को धूप से ढँका रखना, सूर्यकिरण चिकित्सा के समयमान पर उचित नियंत्रण तथा शरीर के खुले भाग के क्षेत्र आदि का ध्यान रखना आवश्यक रहता है। सूर्यरश्मियों के प्रति प्रत्येक राग तथा रोगी की सहनशीलता भिन्न भिन्न होती है। गोरी त्वचावाले व्यक्तियों की अपेक्षा साँवली त्वचावालों में किरण के प्रति सहनशीलता की क्षमता अधिक होती है। श्वेत कुष्ट से पीड़ित व्यक्ति में रश्मियों की त्वचा पर रश्मिचिकित्सा के कारण, प्राय: 6 घंटे में, अतिरक्तिमा (Erythema) उभड़ आती है। इससे अधिक समय तक रश्मिप्रयोग नहीं करना चाहिए, अन्यथा फफोले, या छाले बनने का डर रहता है। धीरे-धीरे त्वचा का रंग ताँबे के वर्ण का हो जाता है, क्योंकि त्वचा में अब विशेष वर्णक (pigment) उतपन्न हो जाते हैं, जो सूर्यकिरणों से होनेवाली हानियों को रोकते हैं। चिकित्सा के दौरान ठंढे देशों में शरीर की उपापचयी क्रिया की गति बढ़ जाती है। सूर्यकिरणों में सब सूक्ष्म तरंग दैर्ध्यवाली किरणें परावैगनी किरणें होती है। ऊष्मा वाली किरणों से रोगी को बचाना चाहिए, तब रोगी को प्रफुल्लता तथा नवजीवन का अनुभव होगा तथा मानसिक क्रिया और शक्ति का विकास होगा। थकान नहीं होने देना चाहिए। सूर्यरश्मि जीवाणुनाशक भी होती है, जिससे त्वचा के रोगों में और दाह में लाभ होता है। ऐसा विश्वास है कि सूर्यकिरण त्वचा में प्रवेश कर रुधिर में मिश्रित होकर, सूर्य की भौतिक ऊर्जा से ऊष्मीय ऊर्जा (thermal energy) में रूपांतरित हो जाती है, जिससे रक्त में परिसंचरण करनेवाले कीटाणुओं, जीवाणुओं, तथा विष का नाश होता है। सूर्यताप से कैल्सियम, फॉस्फोरस तथा लोहे की मात्रा रक्त में बढ़ जाती है। शल्ययक्ष्मा (surgical tuberculosis), सुखंडी रोग (rickets), दमा आदि रोगों में सूर्यकिरणचिकित्सा द्वारा लाभ होता है। चर्मरोग, विशेषत: सोरियोसिस (psoriasis) के उपशमन में, संतानोत्पादन, तथा अंत: स्रावी ग्रंथियों के उपचार में इससे अच्छा लाभ होता है। उपचार की अपेक्षा उपचार में सहायक के रूप में इसकी उपयोगिता शीघ्रता से बढ़ रही है। इसका उपयोग द्विध्रुवी विकार (bipolar disorder) में भी किया जाता है। श्रेणी:चिकित्सा पद्धति श्रेणी:चित्र जोड़ें.

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रेकी चिकित्सा

100px रेकी चिकित्सा प्रगति पर 2-ch'i4 |j.

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श्वसन चिकित्सा

श्वसन चिकित्सा (Pulmonology या pneumology या espirology या respiratory medicine) श्वसन पथ से सम्बन्धित रोगों की चिकित्सा की विशिष्टता का क्षेत्र (speciality) है। यह आन्तरिक चिकित्सा की एक शाखा माना जाता है तथा सघन देख-भाल चिकित्सा से संबंधित है। श्वसन चिकित्सा में प्रायः ऐसे रोगियों की चिकित्सा करनी होती है जिनको जीवनरक्षक (life support) और यांत्रिक श्वसन की आवश्यकता होती है। श्वसनचिकित्सक विशेष रूप से न्युमोनिया, दमा (आस्थमा), क्षयरोग, एम्फीसेमा, छाती के जटिल संक्रमणों आदि की चिकित्सा के लिए प्रशिक्षित किये जाते हैं। श्रेणी:श्वसनचिकित्सा.

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श्वसन तंत्र

श्वसन तंत्र का योजनामूलक चित्र श्वसन तंत्र या 'श्वासोच्छ्वास तंत्र' में सांस संबंधी अंग जैसे नाक, स्वरयंत्र (Larynx), श्वासनलिका (Wind Pipe) और फुफ्फुस (Lungs) आदि शामिल हैं। शरीर के सभी भागों में गैसों का आदान-प्रदान (gas exchange) इस तंत्र का मुक्य कार्य है। .

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श्वास योग्य सस्पेंडेड कणीय पदार्थ

श्वास योग्य सस्पेंडेड कणीय पदार्थ (अंग्रेज़ी:रीस्पाइरेबल सस्पेंडेड पर्टकिलेट मैटर, लघुरूप:आरएसपीएम) वायु के वे कण होते हैं, जो हवा में घुलनशील होते हैं और इनका आकार साइज दस माइक्रोन से भी कम होता है, यानि मानव के बाल की चौड़ाई के पांचवें भाग से भी कम होता है।। हिन्दुस्तान लाइव। १७ अक्टूबर २००९ आरएसपीएम कार्बनिक और अकार्बनिक तत्वों का मिश्रण होते यह कण बंद और खुले वातावरण दोनों में मिलते हैं पर अधिकतर इनके मिलने की संभावना खुले के बजाए बंद वातावरण में अधिक ज्यादा होती है। प्लास्टिक का सामान, सिंथेटिक रेशे, दरी, पर्दो, मॉनिटर और घरेलू सामानों में इनके होने की संभावना ज्यादा होती है। साथ ही यह कण वातावरण से रासायनिक अभिक्रिया और गाड़ियों के धुएं के दहन से उत्पन्न होते हैं। आकार में जितना छोटा कण होगा, उतनी ही जल्दी वह नाक में प्रवेश करेगा। नाक आरएसपीएम को रोक नहीं पाती है, खासकर तब जब उनके कणों का आकार २.५ माइक्रोन यानि मानव के बाल की चौड़ाई के बारहवें हिस्से से भी कम होता है। सामान्यत: नाक ४ से ५ माइक्रोन के आरएसपीएम कणों को नाक में प्रवेश करने से रोकने में सक्षम होती है। धूल के कणों के साथ मिश्रित हो जाने पर यह कण सामान्य से अधिक भारी हो जाते हैं, जिससे नाक में यह आसानी से प्रवेश कर जाते हैं। ये कण शरीर के लिए बहुत हानिकारक होते हैं। इनके कारण फेफड़ों के प्रकार्य पर बुरा प्रभाव पड़ता है। इन्हीं के कारण अस्थाई रूप से बुद्धि का ह्रास भी हो सकता है। इसके अलावा इनसे ब्रोंकाइटिस, अस्थमा, अवसाद, बैचेनी होना जैसे रोगों की भी संभावना हो जाती है। .

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श्वास कष्ट (डिस्पनिया)

डिस्पनिया (Dyspnea) (जिसकी अंग्रेज़ी वर्तनी dyspnoea भी है) या (श्वास की लघुता (एसओबी), श्वास क्षुधा), श्वासल्पता का व्यक्तिपरक लक्षण है। यह अत्यधिक श्रम का एक आम लक्षण होता है तथापि यदि यह अप्रत्याशित स्थिति में उत्पन्न हो तो यह एक रोग बन जाता है। 85% मामलों में इसका कारण होता है: अस्थमा, निमोनिया, हृदय इशेमिया, छिद्रपूर्ण फेफड़ों के रोग, रक्तसंलयी हृदय विफलता, क्रोनिक प्रतिरोधी फेफड़े का रोग, या कुछ कारण साइकोजेनिक होते हैं। आमतौर पर इसका उपचार अंतर्निहित कारणों पर निर्भर करता है। .

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हेपरिन

हेपरिन (प्राचीन ग्रीक ηπαρ से (हेपर), यकृत), जिसे अखंडित हेपरिन के रूप में भी जाना जाता है, एक उच्च-सल्फेट ग्लाइकोसमिनोग्लाइकन, व्यापक रूप से एक थक्का-रोधी इंजेक्शन के रूप में प्रयोग किया जाता है और किसी भी ज्ञात जैविक अणु घनत्व से इसमें सबसे ज्यादा ऋणात्मक चार्ज है। इसका इस्तेमाल विभिन्न प्रयोगात्मक और चिकित्सा उपकरणों जैसे टेस्ट ट्यूब और गुर्दे की डायलिसिस मशीनों पर थक्का-रोधी आंतरिक सतह बनाने के लिए किया जाता है। फ़ार्मास्युटिकल ग्रेड हेपरिन को मांस के लिए वध किये जाने वाले जानवरों, जैसे शूकरीय (सुअर) आंत या गोजातीय (गाय) फेफड़े के म्युकोसल ऊतकों से प्राप्त किया जाता है। हालांकि चिकित्सा में इसका उपयोग मुख्य रूप से थक्कारोध के लिए किया जाता है, शरीर में इसकी वास्तविक क्रियात्मक भूमिका अस्पष्ट बनी हुई है, क्योंकि रक्त विरोधी स्कंदन को अधिकांशतः हेपरन सल्फेट प्रोटियोग्लाइकन्स द्वारा हासिल किया जाता है जिसे अंतःस्तरीय कोशिकाओं से प्राप्त किया जाता है। हेपरिन आम तौर पर मास्ट कोशिका के स्रावी बीजाणु के भीतर संग्रहीत रहता है और सिर्फ ऊतक चोट की जगहों पर वस्कुलेचर में जारी होता है। यह प्रस्तावित है कि थक्कारोध के बजाय, हेपरिन का मुख्य उद्देश्य ऐसी जगहों पर हमलावर बैक्टीरिया और अन्य बाह्य तत्वों से रक्षा करना है। इसके अलावा, यह व्यापक रूप से विभिन्न प्रजातियों में संरक्षित है, जिनमें शामिल हैं कुछ अकशेरुकी जीव जिनमें ऐसी ही समान रक्त जमाव प्रणाली नहीं है। .

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जिम मॉरिसन

जेम्स डगलस "जिम" मॉरिसन (8 दिसम्बर 1943 - 3 जुलाई 1971) एक अमेरिकी गायक, गीतकार, कवि, लेखक और फिल्म निर्माता थे। वे द डोर्स के प्रमुख गायक और गीतकार के रूप में सबसे अधिक जाने जाते हैं और उन्हें व्यापक रूप से रॉक संगीत के इतिहास में सबसे करिश्माई अगुआ व्यक्तियों में से एक माना जाता है।"देखे उदाहरण., मॉरिसन पोएम बैक्स क्लाइमेट प्ले", BBC न्यूज़, 31 जनवरी 2007.

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जेसिका एल्बा

जेसिका मैरी एल्बा (जन्म - 28 अप्रैल 1981) एक अमेरिकी टेलीविज़न और फ़िल्म अभिनेत्री है। उसने 13 वर्ष की आयु में कैंप नोव्हेयर और द सीक्रेट वर्ल्ड ऑफ़ एलेक्स मैक (1994) में अपने टेलीविज़न और मूवी कार्यक्रमों का आरंभ किया। एल्बा, टेलीविज़न श्रृंखला डार्क एंजल (2000–2002) में प्रमुख अभिनेत्री के रूप में उभर कर सामने आई.

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घरघराहट (व्हीज़)

व्हीज़, सांस लेने के दौरान श्वास मार्ग में उत्पन्न होने वाली सतत्, भारी और सीटीदार ध्वनि होती है। व्हीज़ होने के लिए, श्वसन मार्ग के कुछ हिस्सों को संकुचित या बाधित होना जरूरी होता है, या श्वसन वृक्ष के भीतर सांस वेग का बढ़ना आवश्यक होता है। सामान्य तौर पर फेफड़ों की बीमारी वाले लोगों में घरघराहट होती है; पुरावर्ती घरघराहट का सबसे सामान्य कारण अस्थमा अटैक है। घरघराहट की अंतरीय निदान काफी व्यापक है और मरीज में घरघराहट का कारणों को व्हीज़ के अभिलक्षण और ऐतिहासिक और चिकित्सक की नैदानिक जांच के निष्कर्षों द्वारा निर्धारित किया जाता है। .

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वायु प्रदूषण

वायु प्रदूषण रसायनों, सूक्ष्म पदार्थ, या जैविक पदार्थ के वातावरण में, मानव की भूमिका है, जो मानव को या अन्य जीव जंतुओं को या पर्यावरण को नुकसान पहुँचाता है। वायु प्रदूषण के कारण मौतें और श्वास रोग.

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विपवारम

The human whipworm (Trichuris trichiura or Trichocephalus trichiuris) is a round worm (a type of helminth) that causes trichuriasis (a type of helminthiasis which is one of the neglected tropical diseases) when it infects a human large intestine.

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विश्व अस्थमा दिवस

विश्व अस्थमा दिवस (अंग्रेज़ी: World Asthma Day) प्रतिवर्ष मई महीने के पहले मंगलवार को पूरे विश्‍व में मनाया जाता है। वर्तमान में वायु प्रदूषण को देखते हुए अस्थमा के रोगियों की संख्या दिनों दिन बढ़ती जा रही है। इस बीमारी से छोटे बच्चों से लेकर वयोवृध्द जन तक प्रभावित हो रहे हैं अस्थमा विरोध की जागरूकता एवं शिक्षा हेतु इस इस दिन को संपूर्ण विश्व में मनाया जाता है। वर्ष २०१७ में इसे २ मई को मनाया जाएगा। .

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ग्लैक्सो स्मिथक्लाइन

जीएसके (GSK) के नाम से प्रसिद्ध ग्लैक्सोस्मिथक्लाइन पीएलसी (GlaxoSmithKline plc) एक वैश्विक स्तर की औषध, जीव-विज्ञान (बायोलॉजिक्स), टीका एवं उपभोक्ता स्वास्थ्य-देखभाल कंपनी है जिसका मुख्यालय लंदन, यूनाइटेड किंगडम में स्थित है। आमदनी के आधार पर जॉन्सन एण्ड जॉन्सन एवं फाइज़र के बाद यह विश्व की तीसरी सबसे बड़ी फार्मास्यूटिकल कंपनी है। इसके उत्पादों की श्रृंखला में बड़ी बीमारियों जैसे कि दमा, कैंसर, वायरस नियंत्रण, संक्रमण, मानसिक स्वास्थ्य, मधुमेह एवं पाचन संबंधी उत्पाद शामिल हैं। इसका एक बहुत बड़ा उपभोक्ता स्वास्थ्य प्रभाग है जो कि मौखिक स्वास्थ्य उत्पादों, पौष्टिक पेय पदार्थों एवं आसानी से सुलभ चिकित्सा उत्पादों का उत्पादन एवं विपणन करता है, इनमें सेंसोडाइन, हॉर्लिक्स एवं गेविस्कॉन जैसे उत्पाद शामिल हैं। यह प्राथमिक रूप से लंदन स्टॉक एक्सचेंज में सूचीबद्ध है एवं यह FTSE 100 सूचकांक का एक घटक है। इसके अतिरिक्त यह न्यूयॉर्क स्टॉक एक्सचेंज में भी सूचीबद्ध है। .

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ग्लोरिया वेंडरबिल्ट

ग्लोरिया लॉरा मॉर्गन वेंडरबिल्ट (जन्म 20 फ़रवरी 1924) एक अमेरिकी कलाकार, लेखक, अभिनेत्री, उत्तराधिकारी, तथा सोशलाइट हैं जो ब्लू जींस की शुरुआती डिजाइनर के रूप में सर्वाधिक प्रसिद्ध रही हैं। वे न्यू यॉर्क के प्रख्यात वेंडरबिल्ट परिवार की सदस्या तथा सीएनएन की एंडरसन कूपर की माँ हैं। .

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कलौंजी

कलौंजी, (अंग्रेजी:Nigella) एक वार्षिक पादप है जिसके बीज औषधि एवं मसाले के रूप में प्रयुक्त होते हैं। कलौंजी और प्याज में फर्क .

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किवांच

किवांच की लता में लगी हुई एक फली किवांच (Mucuna pruriens) 10-12 फीट लम्बी एकवर्षीय शाकीय लता है। पत्तियाँ त्रिपर्णक व पर्णक अण्डाकार तथा रोमिल छोटे है। पुष्प बैगनी रंग के तथा फली 5-10 से.मी.

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क्रॉनिक ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिसीस

क्रॉनिक ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिसीस (सीओपीडी), जिसे क्रॉनिक ऑब्सट्रक्टिव लंग्स डिसीस (सीओएलडी), तथा क्रॉनिक ऑब्सट्रक्टिव एयरवे डिसीस (सीओएडी) तथा अन्य भी कहा जाता है यह एक प्रकार का प्रतिरोधी फेफड़े का रोग कहा जाता है जिसे जीर्ण रूप से खराब वायु प्रवाह से पहचाना जाता है। --> आम तौर पर यह समय के साथ बिगड़ता जाता है। --> इसके मुख्य लक्षणों में श्वसन में कमी, खांसी, और कफ उत्पादन शामिल हैं। क्रॉनिक ब्रॉन्काइटिस से पीड़ित अधिकांश लोगों को सीओपीडी होता है। तंबाकू धूम्रपान सीओपीडी का एक आम कारण है, जिसमें कई अन्य कारक जैसे वायु प्रदूषण और आनुवांशिक समान भूमिका निभाते हैं। विकासशील देश में वायु प्रदूषण का आम स्रोत खराब वातायन वाली भोजन पकाने की व्यवस्था और गर्मी के लिए आग जलाने से संबंधित है। इन परेशानी पैदा करने वाले कारणों से दीर्घ कालीन अनावरण के कारण फेफड़ों में सूजन की प्रतिक्रिया होती है जिसके कारण वायुमार्ग छोटे हो जाते हैं और एम्फीसेमा नामक फेफड़ों के ऊतकों की टूटफूट जन्म लेती है। इसका निदान खराब वायुप्रवाह पर आधारित है जिसकी गणना फेफड़ों के कार्यक्षमता परीक्षणों से की जाती है। अस्थामा के विपरीत, दवा दिए जाने से वायुप्रवाह में कमी महत्वपूर्ण रूप से बेहतर नहीं होती है। ज्ञात कारणों से अनावरण को कम करके सीओपीडी की रोकथाम की जा सकती है। इसमें धूम्रपान की दर घटाने के प्रयास तथा घर के भीतर व बाहर की वायु गुणवत्ता का सुधार शामिल है। सीओपीडी उपचार में:धूम्रपान छोड़ना, टीकाकरण, पुनर्वास और अक्सर श्वसन वाले ब्रांकोडायलेटर और स्टीरॉएड शामिल होते हैं। कुछ लोगों को दीर्घअवधि ऑक्सीजन उपचार या फेफड़ों के प्रत्यारोपण की जरूरत पड़ती है। वे लोग जिनमें those who have periods of गंभीर खराबी के लक्षण हों उनके लिए दवाओं का बढ़ा हुआ उपयोग और अस्पताल में उपचार की जरूरत पड़ सकती है। पूरी दुनिया में सीओपीडी 329 मिलियन लोगों या जनसंख्या के लगभग 5% लोगों को प्रभावित करती है। 2012 में इस विश्वव्यापी मौतों के कारणों में तीसरा स्थान हासिल था क्योंकि इससे 3 मिलियन लोगों की मौत हुई थी। धूम्रपान की अधिक दर और अनेक देशों में जनसंख्या के बुजुर्ग होने से, होने वाली मौतों की संख्या में वृद्धि का अनुमान है। 2010 में इसके चलते $2.1 ट्रिलियन की राशि का व्यय हुआ। .

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अनुपालन (दवा)

दवा में, अनुपालन (पालन या सामंजस्य भी) रोगियों उस अवस्था को वर्णित करता है, जब उसे चिकित्सा सलाह लेने की आवश्यकता होती है। अधिकांशतः, यह औषध या दवा अनुपालन का संदर्भ देता है, लेकिन इसका उपयोग चिकित्सा उपकरणों जैसे सम्पीडन स्टॉकिंग्स, पुराने घाव की देखभाल, स्व निर्देशित-भौतिक चिकित्सा अभ्यास, या परामर्श देने या अन्य उपचारों के लिए किया जा सकता है मरीज और स्वास्थ्य-सेवा प्रदाता दोनों के अनुपालन और एक सकारात्मक चिकित्सक रोगी रिश्ता को प्रभावित करते हैं, जो कि अनुपालन में सुधार का सबसे महत्त्वपूर्ण कारक है, यद्यपि दवा के पर्चे का उच्च लागत भी प्रमुख निभाता है एक.

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अंजीर

अंजीर (अंग्रेजी नाम फ़िग, वानस्पतिक नाम: "फ़िकस कैरिका", प्रजाति फ़िकस, जाति कैरिका, कुल मोरेसी) एक वृक्ष का फल है जो पक जाने पर गिर जाता है। पके फल को लोग खाते हैं। सुखाया फल बिकता है। सूखे फल को टुकड़े-टुकड़े करके या पीसकर दूध और चीनी के साथ खाते हैं। इसका स्वादिष्ट जैम (फल के टुकड़ों का मुरब्बा) भी बनाया जाता है। सूखे फल में चीनी की मात्रा लगभग ६२ प्रतिशत तथा ताजे पके फल में २२ प्रतिशत होती है। इसमें कैल्सियम तथा विटामिन 'ए' और 'बी' काफी मात्रा में पाए जाते हैं। इसके खाने से कोष्ठबद्धता (कब्जियत) दूर होती है। अंजीर मध्यसागरीय क्षेत्र और दक्षिण पश्चिम एशियाई मूल की एक पर्णपाती झाड़ी या एक छोटे पेड़ है जो पाकिस्तान से यूनान तक पाया जाता है। इसकी लंबाई ३-१० फुट तक हो सकती है। अंजीर विश्व के सबसे पुराने फलों मे से एक है। यह फल रसीला और गूदेदार होता है। इसका रंग हल्का पीला, गहरा सुनहरा या गहरा बैंगनी हो सकता है। अंजीर अपने सौंदर्य एवं स्वाद के लिए प्रसिद्ध अंजीर एक स्वादिष्ट, स्वास्थ्यवर्धक और बहु उपयोगी फल है। यह विश्व के ऐसे पुराने फलों में से एक है, जिसकी जानकारी प्राचीन समय में भी मिस्त्र के फैरोह लोगों को थी। आजकल इसकी पैदावार ईरान, मध्य एशिया और अब भूमध्यसागरीय देशों में भी होने लगी है। प्राचीन यूनान में यह फल व्यापारिक दृष्टि से इतना महत्त्वपूर्ण था और इसके निर्यात पर पाबंदी थी। आज विश्व का सबसे पुराना अंजीर का पेड़ सिसली के एक बगीचे में है। अंजीर का वृक्ष छोटा तथा पर्णपाती (पतझड़ी) प्रकृति का होता है। तुर्किस्तान तथा उत्तरी भारत के बीच का भूखंड इसका उत्पत्ति स्थान माना जाता है। भूमध्यसागरीय तट वाले देश तथा वहाँ की जलवायु में यह अच्छा फलता-फूलता है। निस्संदेह यह आदिकाल के वृक्षों में से एक है और प्राचीन समय के लोग भी इसे खूब पसंद करते थे। ग्रीसवासियों ने इसे कैरिया (एशिया माइनर का एक प्रदेश) से प्राप्त किया; इसलिए इसकी जाति का नाम कैरिका पड़ा। रोमवासी इस वृक्ष को भविष्य की समृद्धि का चिह्न मानकर इसका आदर करते थे। स्पेन, अल्जीरिया, इटली, तुर्की, पुर्तगाल तथा ग्रीस में इसकी खेती व्यावसायिक स्तर पर की जाती है। नाशपाती के आकार के इस छोटे से फल की अपनी कोई विशेष तेज़ सुगंध नहीं पर यह रसीला और गूदेदार होता है। रंग में यह हल्का पीला, गहरा सुनहरा या गहरा बैंगनी हो सकता है। छिलके के रंग का स्वाद पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता पर इसका स्वाद इस बात पर निर्भर करता है कि इसे कहाँ उगाया गया है और यह कितना पका है। इसे पूरा का पूरा छिलका बीज और गूदे सहित खाया जा सकता है। घरेलू उपचार में ऐसा माना जाता है कि स्थाई रूप से रहने वाली कब्ज़ अंजीर खाने से दूर हो जाती है। जुकाम, फेफड़े के रोगों में पाँच अंजीर पानी में उबाल कर छानकर यह पानी सुबह-शाम पीना चाहिए। दमा जिसमे कफ (बलगम) निकलता हो उसमें अंजीर खाना लाभकारी है इससे कफ बाहर आ जाता है। कच्चे अंजीरों को कमरे के तापमान पर रख कर पकाया जा सकता है लेकिन उसमें स्वाभाविक स्वाद नहीं आता। घरेलू उपचारों में अंजीर का विभिन्न प्रकार से प्रयोग किया जाता है। .

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