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डमरु

सूची डमरु

डमरु या डुगडुगी एक छोटा संगीत वाद्य यन्त्र होता है। इसमें एक-दूसरे से जुड़े हुए दो छोटे शंकुनुमा हिस्से होते हैं जिनके चौड़े मुखों पर चमड़ा या ख़ाल कसकर तनी हुई होती है। डमरू के तंग बिचौले भाग में एक रस्सी बंधी होती है जिसके दूसरे अन्त पर एक पत्थर या कांसे का डला या भारी चमड़े का टुकड़ा बंधा होता है। हाथ एक-फिर-दूसरी तरफ़ हिलाने पर यह डला पहले एक मुख की ख़ाल पर प्रहार करता है और फिर उलटकर दूसरे मुख पर, जिस से 'डुग-डुग' की आवाज़ उत्पन्न होती है। तेज़ी से हाथ हिलाने पर इस 'डुग-डुग' की गति और ध्वनि-शक्ति काफ़ी बढ़ाई जा सकती है। .

9 संबंधों: तबला, तालवाद्य, पार्वती, पार्वती बाउल, प्राचीन शिव मंदिर,डमरू,रायपुर, भारतीय संगीत का इतिहास, भारतीय वाद्य यंत्र, शिव, जलसंधि

तबला

तबला भारतीय संगीत में प्रयोग होने वाला एक तालवाद्य है जो मुख्य रूप से दक्षिण एशियाई देशों में बहुत प्रचलित है। यह लकड़ी के दो ऊर्ध्वमुखी, बेलनाकार, चमड़ा मढ़े मुँह वाले हिस्सों के रूप में होता है, जिन्हें रख कर बजाये जाने की परंपरा के अनुसार "दायाँ" और "बायाँ" कहते हैं। यह तालवाद्य हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत में काफी महत्वपूर्ण है और अठारहवीं सदी के बाद से इसका प्रयोग शाष्त्रीय एवं उप शास्त्रीय गायन-वादन में लगभग अनिवार्य रूप से हो रहा है। इसके अतिरिक्त सुगम संगीत और हिंदी सिनेमा में भी इसका प्रयोग प्रमुखता से हुआ है। यह बाजा भारत, पाकिस्तान, नेपाल, बांग्लादेश, और श्री लंका में प्रचलित है। एन्साइक्लोपीडिया ब्रिटैनिका पहले यह गायन-वादन-नृत्य इत्यादि में ताल देने के लिए सहयोगी वाद्य के रूप में ही बजाय जाता था, परन्तु बाद में कई तबला वादकों ने इसे एकल वादन का माध्यम बनाया और काफी प्रसिद्धि भी अर्जित की। नाम तबला की उत्पत्ति अरबी-फ़ारसी मूल के शब्द "तब्ल" से बतायी जाती है। हालाँकि, इस वाद्य की वास्तविक उत्पत्ति विवादित है - जहाँ कुछ विद्वान् इसे एक प्राचीन भारतीय परम्परा में ही उर्ध्वक आलिंग्यक वाद्यों का विकसित रूप मानते हैं वहीं कुछ इसकी उत्पत्ति बाद में पखावज से निर्मित मानते हैं और कुछ लोग इसकी उत्पत्ति का स्थान पच्छिमी एशिया भी बताते हैं। .

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तालवाद्य

तालवाद्य (percussion instrument) संगीत में ऐसा वाद्य यन्त्र जिस से ध्वनी उसपर हाथ या अन्य किसी उपकरण से प्रहार द्बारा या रगड़कर उत्पन्न हो। इसके उदाहरण तबला, डमरु, झांझ और मृदंग हैं। झांझ जैसे तालवाद्यों में दो एक-समान भाग होते हैं जिन्हें आपस में टकराकर संगीत बनाया जाता है। इतिहासकार मानते हैं कि मानव स्वर के बाद तालवाद्य ही सबसे पहले आविष्कृत संगीत वाद्य थे।The Oxford Companion to Music, 10th edition, p.775, ISBN 0-19-866212-2 .

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पार्वती

पार्वती हिमनरेश हिमावन तथा मैनावती की पुत्री हैं, तथा भगवान शंकर की पत्नी हैं। उमा, गौरी भी पार्वती के ही नाम हैं। यह प्रकृति स्वरूपा हैं। पार्वती के जन्म का समाचार सुनकर देवर्षि नारद हिमनरेश के घर आये थे। हिमनरेश के पूछने पर देवर्षि नारद ने पार्वती के विषय में यह बताया कि तुम्हारी कन्या सभी सुलक्षणों से सम्पन्न है तथा इसका विवाह भगवान शंकर से होगा। किन्तु महादेव जी को पति के रूप में प्राप्त करने के लिये तुम्हारी पुत्री को घोर तपस्या करना होगा। बाद में इनके दो पुत्र कार्तिकेय तथा गणेश हुए। कई पुराणों में इनकी पुत्री अशोक सुंदरी का भी वर्णन है। .

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पार्वती बाउल

पार्वती बाउल (जन्म १९७६) बंगाल से एक बाउल लोक गायिका, संगीतज्ञ एवं मौखिक कथावाचक हैं। ये भारत की अग्रणी बाउल संगीतज्ञ भी हैं। बाउल गुरु, सनातन दास बाउल, शशांको घोष बाउल की देखरेख में, ये भारत एवं अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर भी बाउल कार्यक्रम १९९५ से करती आ रही हैं। इनका विवाह रवि गोपालन नायर, जो एक जाने माने पाव कथकली दस्ताने वाली कठपुतलीकार हैं, से हुआ। अब पार्वती १९९७ से तिरुवनंतपुरम, केरल में रहती हैं। यहां वे एकतारा बाउल संगीत कलारी नामक बाउल संगीत विद्यालय भी चलाती हैं। संगीत के अलावा पार्वती पेंटिंग, प्रिंट मेकिंग, नाटक, नृत्य और चित्रों की सहायता से किस्सागोई की विधा में भी महारत रखती हैं। .

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प्राचीन शिव मंदिर,डमरू,रायपुर

छत्तीसगढ़ राज्य के संरक्षित स्मारक प्राचीन शिव मंदिर छत्तीसगढ़ राज्य के रायपुर जिले में डमरू नगर में स्थित है। यह स्मारक छत्तीसगढ़ राज्य द्वारा संरक्षित है।.

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भारतीय संगीत का इतिहास

पाँच गन्धर्व (चौथी-पाँचवीं शताब्दी, भारत के उत्तर-पश्चिम भाग से प्राप्त) प्रगैतिहासिक काल से ही भारत में संगीत कीसमृद्ध परम्परा रही है। गिने-चुने देशों में ही संगीत की इतनी पुरानी एवं इतनी समृद्ध परम्परा पायी जाती है। माना जाता है कि संगीत का प्रारम्भ सिंधु घाटी की सभ्यता के काल में हुआ हालांकि इस दावे के एकमात्र साक्ष्य हैं उस समय की एक नृत्य बाला की मुद्रा में कांस्य मूर्ति और नृत्य, नाटक और संगीत के देवता रूद्र अथवा शिव की पूजा का प्रचलन। सिंधु घाटी की सभ्यता के पतन के पश्चात् वैदिक संगीत की अवस्था का प्रारम्भ हुआ जिसमें संगीत की शैली में भजनों और मंत्रों के उच्चारण से ईश्वर की पूजा और अर्चना की जाती थी। इसके अतिरिक्त दो भारतीय महाकाव्यों - रामायण और महाभारत की रचना में संगीत का मुख्य प्रभाव रहा। भारत में सांस्कृतिक काल से लेकर आधुनिक युग तक आते-आते संगीत की शैली और पद्धति में जबरदस्त परिवर्तन हुआ है। भारतीय संगीत के इतिहास के महान संगीतकारों जैसे कि स्वामी हरिदास, तानसेन, अमीर खुसरो आदि ने भारतीय संगीत की उन्नति में बहुत योगदान किया है जिसकी कीर्ति को पंडित रवि शंकर, भीमसेन गुरूराज जोशी, पंडित जसराज, प्रभा अत्रे, सुल्तान खान आदि जैसे संगीत प्रेमियों ने आज के युग में भी कायम रखा हुआ है। भारतीय संगीत में यह माना गया है कि संगीत के आदि प्रेरक शिव और सरस्वती है। इसका तात्पर्य यही जान पड़ता है कि मानव इतनी उच्च कला को बिना किसी दैवी प्रेरणा के, केवल अपने बल पर, विकसित नहीं कर सकता। .

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भारतीय वाद्य यंत्र

राजा रवि वर्मा द्वारा चित्रित कादम्बरी '''सितार''' बजाते हुए पुलुवन् पुत्तु बजाती एक महिला जलतरंग Chenda (top) and Chande (below) are different drums. Chande 200 ईसा पूर्व से 200 ईसवीं सन् के समय में भरतमुनि द्वारा संकलित नाट्यशास्‍त्र में ध्‍वनि की उत्‍पत्ति के आधार पर संगीत वाद्यों को चार मुख्‍य वर्गों में विभाजित किया गया है.

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शिव

शिव या महादेव हिंदू धर्म में सबसे महत्वपूर्ण देवताओं में से एक है। वह त्रिदेवों में एक देव हैं। इन्हें देवों के देव भी कहते हैं। इन्हें भोलेनाथ, शंकर, महेश, रुद्र, नीलकंठ,गंगाधार के नाम से भी जाना जाता है। तंत्र साधना में इन्हे भैरव के नाम से भी जाना जाता है। हिन्दू धर्म के प्रमुख देवताओं में से हैं। वेद में इनका नाम रुद्र है। यह व्यक्ति की चेतना के अन्तर्यामी हैं। इनकी अर्धांगिनी (शक्ति) का नाम पार्वती है। इनके पुत्र कार्तिकेय और गणेश हैं, तथा पुत्री अशोक सुंदरी हैं। शिव अधिक्तर चित्रों में योगी के रूप में देखे जाते हैं और उनकी पूजा शिवलिंग तथा मूर्ति दोनों रूपों में की जाती है। शिव के गले में नाग देवता विराजित हैं और हाथों में डमरू और त्रिशूल लिए हुए हैं। कैलाश में उनका वास है। यह शैव मत के आधार है। इस मत में शिव के साथ शक्ति सर्व रूप में पूजित है। भगवान शिव को संहार का देवता कहा जाता है। भगवान शिव सौम्य आकृति एवं रौद्ररूप दोनों के लिए विख्यात हैं। अन्य देवों से शिव को भिन्न माना गया है। सृष्टि की उत्पत्ति, स्थिति एवं संहार के अधिपति शिव हैं। त्रिदेवों में भगवान शिव संहार के देवता माने गए हैं। शिव अनादि तथा सृष्टि प्रक्रिया के आदिस्रोत हैं और यह काल महाकाल ही ज्योतिषशास्त्र के आधार हैं। शिव का अर्थ यद्यपि कल्याणकारी माना गया है, लेकिन वे हमेशा लय एवं प्रलय दोनों को अपने अधीन किए हुए हैं। राम, रावण, शनि, कश्यप ऋषि आदि इनके भक्त हुए है। शिव सभी को समान दृष्टि से देखते है इसलिये उन्हें महादेव कहा जाता है। .

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जलसंधि

जलडमरूमध्य जिब्राल्टर जलडमरूमध्य जलसंधि (अंग्रेज़ी: Strait, स्ट्रेट) या जलसंयोगी या जलडमरू पानी के ऐसे तंग मार्ग को कहते हैं जो दो बड़े पानी के समूहों को जोड़ता हो और जिसमें से नौकाएँ गुज़रकर एक बड़े जलाशय से दूसरे बड़े जलाशय तक जा सकें। इसका भौगोलिक आकार अक्सर डमरू जैसा होता है, जिसके दो बड़े जलीय भागों के मध्य में जलसंधि होती है, इसलिये इसे जलडमरूमध्य भी कहते हैं। कूटनीतिक दृष्टि से जो भी दो सागरों को जोड़ने वाले किसी जलसंधि क्षेत्र पर क़ब्ज़ा रखता है वह आने-जाने वाले व्यापारिक व सैनिक नाव-यातायात पर नज़र और नियंत्रण रख सकता है। थलसेनाएँ भी जलसंधियों की कम चौड़ाई को पार करके एक स्थान से दूसरे स्थान में प्रवेश करती हैं। इस कारणवश जलसंधियाँ इतिहास में महत्वपूर्ण रहीं हैं और उनपर अंतरराष्ट्रीय खीचातानी हमेशा से जारी रही है। उदाहरण के लिए जिब्राल्टर जलसंधि स्पेन एवं मोरोक्को भूभागों को अलग करती है, व अंध महासागर को भूमध्य सागर से जोड़ती है और इस क्षेत्र पर स्पेन, ब्रिटेन और मोरोक्को में बहुत मजा ले दे रहा है।, Ana G. Lâopez Martâin, pp.

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यहां पुनर्निर्देश करता है:

डमरू, डुगडुगी, डुग्गी

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