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ज्वालामुखी

सूची ज्वालामुखी

तवुर्वुर का एक सक्रिय ज्वालामुखी फटते हुए, राबाउल, पापुआ न्यू गिनिया ज्वालामुखी पृथ्वी की सतह पर उपस्थित ऐसी दरार या मुख होता है जिससे पृथ्वी के भीतर का गर्म लावा, गैस, राख आदि बाहर आते हैं। वस्तुतः यह पृथ्वी की ऊपरी परत में एक विभंग (rupture) होता है जिसके द्वारा अन्दर के पदार्थ बाहर निकलते हैं। ज्वालामुखी द्वारा निःसृत इन पदार्थों के जमा हो जाने से निर्मित शंक्वाकार स्थलरूप को ज्वालामुखी पर्वत कहा जाता है। ज्वालामुखी का सम्बंध प्लेट विवर्तनिकी से है क्योंकि यह पाया गया है कि बहुधा ये प्लेटों की सीमाओं के सहारे पाए जाते हैं क्योंकि प्लेट सीमाएँ पृथ्वी की ऊपरी परत में विभंग उत्पन्न होने हेतु कमजोर स्थल उपलब्ध करा देती हैं। इसके अलावा कुछ अन्य स्थलों पर भी ज्वालामुखी पाए जाते हैं जिनकी उत्पत्ति मैंटल प्लूम से मानी जाती है और ऐसे स्थलों को हॉटस्पॉट की संज्ञा दी जाती है। भू-आकृति विज्ञान में ज्वालामुखी को आकस्मिक घटना के रूप में देखा जाता है और पृथ्वी की सतह पर परिवर्तन लाने वाले बलों में इसे रचनात्मक बल के रूप में वर्गीकृत किया जाता है क्योंकि इनसे कई स्थलरूपों का निर्माण होता है। वहीं, दूसरी ओर पर्यावरण भूगोल इनका अध्ययन एक प्राकृतिक आपदा के रूप में करता है क्योंकि इससे पारितंत्र और जान-माल का नुकसान होता है। .

182 संबंधों: चन्द्रशेखर आजाद, चरमपसंदी, चांगबाई पर्वत, टफ़, टाइटन (चंद्रमा), टिबेस्टी पर्वत, टकीला, टेफ़्रा, ऍयाफ़्यात्लायोएकुत्ल्ल, एल्ब्रुस पर्वत, ऐतिहासिक भूविज्ञान, डेवाओ शहर, ढाल ज्वालामुखी, ताऊपो ज्वालामुखीय क्षेत्र, ताल ज्वालामुखी, तुर्काना झील, तुंगुरहुा ज्वालामुखी, त्वष्ट्र, त्वष्ट्र पैटरे, तोबा झील, तोमानीवी पर्वत, दक्षिण अमेरिका, दक्कन उद्भेदन, द्वीपसमूह, दैत्य सेतुक, धूल, धोसी पहाड़ी, नर्कोन्दम द्वीप, निम्नस्खलन, निसार (उपग्रह), निअंडरथल मानव, पनामा, पर्वत निर्माण, पर्वतमाला, पांपेई, पिटकेर्न द्वीपसमूह, पिज़्ज़ा, पिको देल तेइदे, पकाया ज्वालामुखी, प्रतापगढ़, राजस्थान, प्रशान्त महासागर, प्राकृतिक आपदा, प्रिमोर्स्की क्राय, प्रवाल द्वीप, प्लेट विवर्तनिकी, पृथ्वी, पृथ्वी का भूवैज्ञानिक इतिहास, पृथ्वी का इतिहास, पूर्व अफ़्रीकी रिफ़्ट, पोज़ोलाना, ..., फ़ूमारोल, फ़ूजीयामा, बएकदू पर्वत, बहिर्भेदी शैल, बाढ़ बेसाल्ट, बानदुंग, बुरीरम प्रान्त, ब्रोमो पर्वत, बृहस्पति (ग्रह), बेंकुलू, भारत का भूगोल, भौतिक भूगोल, भौतिकी की शब्दावली, भू-आकृति विज्ञान, भूप्रावार पिच्छक, भूभौतिकी, भूमध्य सागर, भूमंडलीय ऊष्मीकरण, भूसंचलन, भूविज्ञान, भूगतिकी, भूगोल शब्दावली, भूकम्प, भूकम्पीय तरंग, मन्दारा पहाड़ियाँ, मायोन ज्वालामुखी, मारियाना द्वीपसमूह, मार्शेना (गैलापागोस), मालवा, मावी, माउण्ट कैमरून, माउन्ट पोपा, मिश्रित ज्वालामुखी, मंगल ग्रह, मृदा, मैग्मा, मेटरनिख, मेसोअमेरिकी, यान मायेन, यूकॉन, रिची द्वीपसमूह, रुआपेहू पर्वत, रॉस द्वीप, अंटार्कटिका, रोबोट, लाम्पुंग, लावा, लावा ट्यूब, लिपारी द्वीप, लक्षद्वीप, लौह अयस्क, शिकोकू, सल्फर डाइऑक्साइड, सहारा मरुस्थल, साइबेरिया, सिडली पर्वत, सिनाबंग पर्वत, संमिलन सीमा, सुन्दा चाप, स्थलीय ग्रह, सूखा, सोलोमन द्वीप, सीनाई पर्वत, हलियाकला, हिन्दी पुस्तकों की सूची/च, हिमाचल प्रदेश विधानसभा चुनाव, २००७, हवाई तुल्य ज्वालामुखी, होन्शू, होगर पर्वत, जल प्रदूषण, जलतापीय छिद्र, जावा (द्वीप), ज्वलखण्डाश्मि पदार्थ, ज्वालामुख-कुण्ड, ज्वालामुखी शंकु, ज्वालामुखी विस्फोटों के प्रकार, ज्वालामुखी विज्ञान, ज्वालामुखीय चट्टानें, ज्वालामुखीय चाप, ज्वालामुखीय झील, ज्वालामुखीय द्वीप, ज्वालामुखीय क्रेटर, ज्वालामुखीयता, ज्वालाकाच, जॉन टूज़ो विल्सन, ईजियन सागर, वनोन्मूलन, वर्षावन, वायकाटो नदी, वायु प्रदूषण, विदर छिद्र, विरुंगा पहाड़ियाँ, विस्फोट, वॉयेजर द्वितीय, खनिजों का बनना, गारामुखी, गिनी की खाड़ी, गैलापागोस द्वीपसमूह, गूगल धरती, गोंडवाना, आयो (उपग्रह), आर्सेनिक, आवर्न, आग्नेय शैल, इश्तार टेरा, कमचातका प्रायद्वीप, कायाम्बे ज्वालामुखी, क्यूशू, क्रिस्टलकी, क्रेटर, कैनरी द्वीपसमूह, कैरीबियाई प्लेट, केप्लर-452बी, कोरिया का इतिहास, कोर्दिल्येरा सेन्ट्रल (लूज़ोन), अण्डमान, अदन, अदन प्रान्त, अनार (आतिशबाज़ी), अफ़्रीका, अफ़्रीका की भू-प्रकृति, अरख़ानगई प्रांत, अर्कनोइड (खगोलभूविज्ञान), अल्बाय प्रान्त, अग्नि वृत्त, अंतरिक्ष विज्ञान, उड़नेवाला स्पघेटी दानव, उष्णकटिबंधीय सदाबहार वन, उष्णोत्स, उस्यन्त पठार, १९१९, २ दिसम्बर, २५ मई सूचकांक विस्तार (132 अधिक) »

चन्द्रशेखर आजाद

पण्डित चन्द्रशेखर 'आजाद' (२३ जुलाई १९०६ - २७ फ़रवरी १९३१) ऐतिहासिक दृष्टि से भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम के स्वतंत्रता सेनानी थे। वे पण्डित राम प्रसाद बिस्मिल व सरदार भगत सिंह सरीखे क्रान्तिकारियों के अनन्यतम साथियों में से थे। सन् १९२२ में गाँधीजी द्वारा असहयोग आन्दोलन को अचानक बन्द कर देने के कारण उनकी विचारधारा में बदलाव आया और वे क्रान्तिकारी गतिविधियों से जुड़ कर हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसियेशन के सक्रिय सदस्य बन गये। इस संस्था के माध्यम से उन्होंने राम प्रसाद बिस्मिल के नेतृत्व में पहले ९ अगस्त १९२५ को काकोरी काण्ड किया और फरार हो गये। इसके पश्चात् सन् १९२७ में 'बिस्मिल' के साथ ४ प्रमुख साथियों के बलिदान के बाद उन्होंने उत्तर भारत की सभी क्रान्तिकारी पार्टियों को मिलाकर एक करते हुए हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन ऐसोसियेशन का गठन किया तथा भगत सिंह के साथ लाहौर में लाला लाजपत राय की मौत का बदला सॉण्डर्स का हत्या करके लिया एवं दिल्ली पहुँच कर असेम्बली बम काण्ड को अंजाम दिया। .

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चरमपसंदी

स्पेन की रिओ तिन्तो (नदी) जिसके तेज़ाब-युक्त पानी को उसमें रह रहे चरमपसंदी जीवाणु एक पीला-नारंगी सा रंग दे देते हैं चरमपसंदी ऐसे जीव को कहा जाता है, जो ऐसे चरम वातावरण में फलता-फूलता हो जहाँ पृथ्वी पर रहने वाले साधारण जीव बहुत कठिनाई से जीवित रह पाते हो या बिलकुल ही रह न सके। ऐसे चरम वातावरणों में ज्वालामुखी चश्मों का खौलता-उबलता हुऐ पानी, तेज़ाब से भरपूर वातावरण और आरसॅनिक जैसे ज़हरीले पदार्थों से युक्त वातावरण शामिल हैं। .

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चांगबाई पर्वत

तिआन ची ज्वालामुखीय झील चांगबाई पर्वत शृंखला (Changbai Mountains) या जांगबाएक पर्वत शृंखला (Jangbaek Mountains) मंचूरिया क्षेत्र में चीन और उत्तर कोरिया की सरहद पर स्थित एक पर्वत शृंखला है। यह चीन को रूस के प्रिमोर्स्की क्राय प्रान्त से भी अलग करते हैं। इन्हें रूस में वोस्तोचनो-मान्चझ़ुर्स्कीए शृंखला (Vostochno-Manchzhurskie gory) कहते हैं। इस शृंखला का सबसे ऊंचा पहाड़ २,७४५ मीटर लम्बा 'बएकदू पर्वत' (Baekdu Mountain) नामक ज्वालामुखी है, जिसकी ढलानों से सोंगहुआ नदी, यालू नदी और तूमन नदी शुरू होती हैं। इन पहाड़ों में 'तिआन ची' (Tian Chi, अर्थ: स्वर्ग झील) नामक एक प्रसिद्ध बड़ी ज्वालामुखीय झील भी स्थित है।, David Leffman, Martin Zatko, Penguin, 2011, ISBN 978-1-4053-8908-2,...

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टफ़

नये मैक्सिको का वेल्डेड टफ़ टफ़ (इतालवी: टूफ़ो), किसी ज्वालामुखीय उद्गार के दौरान बाहर निकली ज्वालामुखीय राख के संपिंडन से गठित शैल का एक प्रकार है। टफ़ को कभी कभी टूफा भी कहा जाता है, खासकर तब, जब इसे एक निर्माण सामग्री के रूप में इस्तेमाल किया जाता है, हालांकि टूफा भी एक अलग प्रकार का शैल है। यदि किसी शैल में टफ़ का प्रतिशत 50% से अधिक होता है तो वह शैल टफ़मय कहलाता है।.

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टाइटन (चंद्रमा)

टाइटन (या Τῑτάν), या शनि शष्टम, शनि ग्रह का सबसे बड़ा चंद्रमा है। यह वातावरण सहित एकमात्र ज्ञातचंद्रमा है, और पृथ्वी के अलावा एकमात्र ऐसा खगोलीय पिंड है जिसके सतही तरल स्थानों, जैसे नहरों, सागरों आदि के ठोस प्रमाण उपलब्ध हों। यूरोपीय-अमेरिकी के कासीनी अंतरिक्ष यान के साथ गया उसका अवतरण यान हायगन्स, १६ जनवरी २००४ को, टाइटन के धरातल पर उतरा जहां उसने भूरे-नारंगी रंग में रंगे टाईटन के नदियों-पहाडों और झीलों-तालाबों वाले जो चित्र भेजे। टाइटन के बहुत ही घने वायुमंडल के कारण इससे पहले उसकी ऊपरी सतह को देख या उसके चित्र ले पाना संभव ही नहीं था। २००८ अगस्त के मध्य में ब्राज़ील की राजधानी रियो दी जनेरो में अंतरराष्ट्रीय खगोल विज्ञान संघ के सम्मेलन में ऐसे चित्र दिखाये गये और दो ऐसे शोधपत्र प्रस्तुत किये गये, जिनसे पृथ्वी के साथ टाइटन की समानता स्पष्ट होती है। ये चित्र और अध्ययन भी मुख्यतः कासीनी और होयगन्स से मिले आंकड़ों पर ही आधारित थे। .

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टिबेस्टी पर्वत

टिबेस्टी पर्वत अल्जीरिया, अफ्रीका में स्थित एक पर्वत है। यह ज्वालामुखी पर्वत है। श्रेणी:अल्जीरिया के पर्वत श्रेणी:सहारा मरुस्थल श्रेणी:ज्वालामुखी पर्वत.

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टकीला

विभिन्न शैलियों के टकीला टकीला, एक आसवित पेय है जिसे नीले आगेव से तैयार किया जाता है। इसे मुख्य रूप से ग्वादलहारा के पश्चिमोत्तर में ६५ किमी की दूरी पर स्थित टकीला शहर के आस-पास के क्षेत्रों और पश्चिमी मैक्सिको के राज्य, जालिस्को की उच्चभूमि में स्थित लॉस अल्टोस में बनाया जाता है। टकीला के आस-पास के क्षेत्र में लाल ज्वालामुखीय मिट्टी विशेष रूप से नीले आगेव की खेती के लिए अनुकूल है और यहां हर साल 30 करोड़ से भी अधिक पौधों की खेती होती है।http://www.ianchadwick.com/tequila/jalisco.htm मैक्सिको के क़ानून के अनुसार टकीला का उत्पादन केवल जालिस्को राज्य और ग्वानाजुआटो, माइकोकैन, नयारित और तमॉलिपास के सीमित क्षेत्रों में ही किया जा सकता है। टकीला को अक्सर 38-40% अल्कोहॉल की मात्रा (76-80 प्रमाण) के साथ बनाया जाता है, लेकिन 35-55% के बीच अल्कोहॉल की मात्रा (70-110 प्रमाण) में भी इसका उत्पादन किया जा सकता है। हालांकि अधिकांश टकीला 80 प्रमाण के होते हैं, लेकिन कई आसवक 100 प्रमाण तक बनाते हैं और उसके बाद पानी के साथ इसकी कडुवाहट को कम करते हैं। कुछ अन्य प्रतिष्ठित कंपनियां, इसे फीका करने के लिए बग़ैर अतिरिक्त पानी के, अल्कोहॉल को 80 प्रमाण तक आसवित करती हैं .

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टेफ़्रा

हेक्ला का रायोलाइट टेफ़्रा है। टेफ़्रा, किसी ज्वालामुखीय विस्फोट के दौरान निकला एक खंडित पदार्थ है, चाहे उसका आकार, संघटन या स्थापन प्रक्रिया कुछ भी रही हो। ज्वालामुखी विशेषज्ञों इन वायुवाहित खंडों (जब खंड हवा में रहता है) को ज्वलखंडाश्म या पाइरोक्लास्ट भी कहते हैं। एक बार जब यह खंड जमीन गिर जाते हैं तो टेफ़्रा कहलाते हैं बशर्ते यह इतने गर्म ना हों कि किसी ज्वलखंडाश्मी शैल (पाइरोक्लास्टिक रॉक) या टफ़ पर गिर कर उसी का भाग ना बन जायें। .

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ऍयाफ़्यात्लायोएकुत्ल्ल

20 मार्च 2010 को ऍयाफ़्यात्लायोएकुत्ल्ल ज्वालामुखीय मंडल में फटता हुआ एक मुख ऍयाफ़्यात्लायोएकुत्ल्ल (आइस्लैण्डी: Eyjafjallajökull) आइसलैंड में एक ज्वालामुखी और उस पर स्थित एक बर्फ़ की टोपी है, जिस से कुछ हिमानियाँ (ग्लेशियर) भी चलते हैं। इस ज्वालामुखी का मुख 1,666 मीटर (5,466 फ़ुट) की ऊंचाई पर है। ऍयाफ़्यात्लायोएकुत्ल्ल अक्सर फटता रहता है। सन् 2010 में इसके फटने से पश्चिमोत्तर यूरोप के वायुमंडल में इसकी राख के बादल फैल गए थे जिस से कई हफ़्तों तक हवाई जहाज़ों का यातायात ठप्प रहा।, Amie Jane Leavitt, Capstone Press, 2011, ISBN 978-1-4296-6022-8,...

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एल्ब्रुस पर्वत

एल्ब्रुस पर्वत, जिसके दोनों पश्चिमी और पूर्वी शिखर नज़र आ रहे हैं एल्ब्रुस पर्वत एक सुप्त ज्वालामुखी है जो कॉकस क्षेत्र की कॉकस पर्वत शृंखला में स्थित है। इसके दो शिखर हैं - पश्चिमी शिखर ५,६४२ मीटर (१८,५१० फ़ुट) ऊंचा है और पूर्वी शिखर उस से ज़रा कम ५,६२१ मीटर (१८,४४२ फ़ुट) ऊंचा है। यूरोप और एशिया की सीमा कॉकस के इलाक़े से गुज़रती है और इस बात पर विवाद है के एल्ब्रुस यूरोप में है या एशिया में। अगर इसको यूरोप में माना जाए, तो यह यूरोप का सबसे ऊंचा पर्वत है। एल्ब्रुस रूस के काराचाए-चरकस्सिया क्षेत्र में स्थित है और जॉर्जिया की सीमा के काफ़ी नज़दीक है। .

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ऐतिहासिक भूविज्ञान

ऐतिहासिक भूविज्ञान (Historical geology) के अन्तर्गत भूविज्ञान के सिद्धान्तों का उपयोग करके पृथ्वी के इतिहास की पुनर्रचना की जाती है और उसे समझने की कोशिश की जाती है। ऐतिहासिक भूविज्ञान उन प्रक्रियाओं पर अपना ध्यान केंद्रित करता है जो पृथ्वी की सतह तथा उपसतह को बदलते हैं। यह स्तरिकी (stratigraphy), संरचना-भूविज्ञान तथा पैलिओंटोलॉजी (paleontology) आदि का उपयोग करके इन घटनाओं के क्रम को निर्धारित करता है। ऐतिहासिक भूविज्ञान विभिन्न भूवैज्ञानिक कालों में विकसित पादपों एवं जन्तुओं पर भी ध्यान केंद्रित करता है। बीसवीं शताब्दी के पूर्वार्ध में रेडियोसक्रियता एवं अन्य रेडियोमापी कालनिर्धारण तकनीकों के विकास से ऐतिहासिक भूविज्ञान को बहुत सहायता मिली। किसी स्थान के भूवैज्ञानिक इतिहास की अच्छी जानकारी से आर्थिक भूविज्ञान के क्षेत्र में बहुत मदद मिलती है। आर्थिक भूविज्ञान, ऊर्जा एवं कच्चे माल की खोज एवं निष्कर्षण का विज्ञान है। इसी प्रकार, ऐतिहासिक भूविज्ञान की गहरी समझ के द्वारा पर्यावरणीय भूविज्ञान (Environmental geology) में बहुत मदद मिलती है, जैसे भूकम्प एवं ज्वालामुखी आदि के बारे में जानकारी। .

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डेवाओ शहर

डेवाओ शहर या दावाओ शहर, फिलीपींस के सबसे अधिक जनसंख्या वाले शहरों में से एक है। यह भौगोलिक रूप से दावाओ देल सूर प्रान्त में स्थित है और इस प्रांत के तहत फिलीपीन सांख्यिकी प्राधिकरण द्वारा समूहीकृत है। लेकिन यह एक बेहद शहरीकृत शहर है। और इसे राजनीतिक रूप से स्वतंत्र शासित और प्रशासित किया जाता है। शहर का क्षेत्रफल 2,443.61 किमी2 (943.48 वर्ग मील) है, और 2015 की जनगणना के आधार पर 1,632,991 लोगों की आबादी है। इसके अनुसार यह फिलीपींस में तीसरा सबसे अधिक जनसंख्या वाला शहर और मिंडानाओ में सबसे ज्यादा आबादी वाला शहर है। .

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ढाल ज्वालामुखी

एक परिपक्व ढाल ज्वालामुखी में लावा प्रवाह की कई परतों को दिखाता, ढाल ज्वालामुखी का एक आरेख।ढाल ज्वालामुखी जिसे शील्ड ज्वालामुखी, भी कहा जाता है, ज्वालामुखियों का एक प्रकार है। इन ज्वालामुखियों का निर्माण आमतौर पर लगभग पूरी तरह से तरल लावा प्रवाह के द्वारा होता है। इन ज्वालामुखियों का यह विशिष्ट नाम इसलिए पड़ा है क्योंकि, देखने में यह किसी योद्धा की ढाल के समान प्रतीत होते हैं, यानि एक ढाल के समान इनका आकार बड़ा और पार्श्व ऊँचाई कम होती है। इन ज्वालामुखियों के द्वारा उद्गारित अत्यधिक तरल लावा, जो कि अन्य अधिक विस्फोटक ज्वालामुखियों से निकले लावे की तुलना में अधिक दूर तक बहता है और लावे की एक व्यापक चादर का निर्माण कर, किसी ढाल ज्वालामुखी को इसका यह विशिष्ट रूप का प्रदान करता है। .

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ताऊपो ज्वालामुखीय क्षेत्र

ताऊपो ज्वालामुखीय क्षेत्र (Taupo Volcanic Zone) न्यू ज़ीलैंड के उत्तर द्वीप में स्थित एक बहुत ही सक्रीय ज्वालामुखीय क्षेत्र है। इसका नाम ताऊपो झील पर पड़ा है जो यहाँ के सबसे बड़े ज्वालामुख-कुण्ड में स्थित एक झील है। यह ज्वालामुखीय क्षेत्र V का आकार रखता है और हर वर्ष ८ मिलिमीटर अधिक बढ़ जाता है। इसमें रुआपेहू (Ruapehu), नंगारेहोई (Ngauruhoe) और व्हाकारी (Whakaari) जैसे कई प्रसिद्ध ज्वालामुखी खड़े हुए हैं। .

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ताल ज्वालामुखी

ताल ज्वालामुखी (Taal Volcano) दक्षिणपूर्व एशिया के फ़िलिपीन्ज़ देश के लूज़ोन द्वीप पर स्थित एक ज्वालामुखी है। यह फ़िलिपीन्ज़ का दूसरा सबसे सक्रीय ज्वालामुखी है जिसके ३३ ज्ञात विस्फोट हो चुके हैं। इसके क्रेटर में एक ज्वालामुखीय झील है जो ताल झील कहलाती है।Herre, Albert W. (1927-12-14); "The Fisheries of Lake Taal, Luzon and Lake Naujan", Philippine Journal of Science, Vol.

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तुर्काना झील

तुर्काना झील (अंग्रेज़ी: Lake Turkana), जिसे पहले रुडोल्फ़ झील (अंग्रेज़ी: Lake Rudolf) बुलाया जाता था, महान अफ़्रीकी झीलों में से एक है। यह कुछ-कुछ खारे पानी की झील घनफल (वोल्यूम) के हिसाब से कैस्पियन सागर, इसिक-कुल और वान झील के बाद दुनिया की चौथी सबसे बड़ी खारी झील है। अरल सागर इस से कभी बड़ा हुआ करता था लेकिन अधिकतर सूख जाने के कारण अब इस से छोटा है। तुर्काना एक रेगिस्तान-जैसे क्षेत्र में स्थित है और विश्व की सबसे बड़ी स्थाई रेगिस्तानी झील भी है। इसका अधिकतर भाग कीनिया में है लेकिन सुदूर उत्तरी छोर इथियोपिया में पड़ता है। .

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तुंगुरहुा ज्वालामुखी

यह इक्वाडोर कि राजधानी क्विटो से 130 किलोमीटर दूर 5,010 मीटर ऊंचा एक सक्रीय ज्वालामुखी है। .

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त्वष्ट्र

त्वष्टा या त्वष्ट्र या त्वष्टृ संस्कृत साहित्य में जाति और व्यक्तिवाचक संज्ञाओं का बोध कराने के लिये अनेक अर्थों में प्रयुक्त हुआ है। महाभारत (प्रथम, 95, 14-15) तथा विष्णुपुराण (प्रथम अंश, 15, 132) के अनुसार 12 आदित्यों में 11 का नाम त्वष्टा है। उसका हिंदू धर्म में प्रमुख स्थान है। इस देवता के संबंध में एक देवकथा मिलती है (रघु षष्ट, 32) कि उसने अपने पुत्री संज्ञा का विवाह सूर्य से कर दिया किंतु संज्ञा सूर्य का तेज न सहन कर सकी और पिता के पास लौट आई। त्वष्टा ने सूर्य के प्रभामण्डल में थोड़ी कांट छांट कर दी, तब संज्ञा का उस अल्पतेजस सूर्य के पास रहना संभव हो गया। धार्मिक हिंदुओं का ऐसा विश्वास है कि सूर्य के कटे हुए भाग से विष्णु का चक्र और शिव का त्रिशूल बना। महाभारत के एक अन्य स्थल में (पचंम 9। 3) प्रजापति को तथा ऋग्वेद के सायण भाष्य (प्रथम, 117। 22) में इंद्र को त्वष्टा कहा गया है। त्वष्टा के मूल कार्य, सूर्य को छांटने, के कारण धीरे धीरे उसका अर्थ बढ़ई से लिया जाने लगा (हेमचंद्र और अमरसिंह के शब्दकोश), जो काष्ठादिकों को स्वरूप प्रदान करता है। इसी कारण त्वष्टा से विश्वकर्मा (प्रजापति अथवा बढ़ई) का भी बोध हुआ। ऋग्वेद के दसवे मंडल व पुरुष सूक्त में उनका उल्लेख हुआ है। वे दिव्य लोहार व धातु से शस्त्र व औज़ार निर्माण करते हैं। उन्हें इन्द्र के वज्र का निर्माता और सोम का रक्षक कहा गया है। ऋग्वेद में उनका ६५ बार ज़िक्र आता है और उन्हें जानवरों व मानवों के शरीरों का रचियता भी बुलाया गया है। संतान पाने वालों के लिये उन्हें गर्भ-पति (यानि गर्भ का अधिदेवता) कहा गया है। उनके लिये रथकार (रथ बनाने वाला) और तक्षा भी नाम उपयोग हुए हैं। इन देवता के नाम पर बृहस्पति ग्रह के आयो चंद्रमा पर एक ज्वालामुखीय क्षेत्र का नाम रखा गया है। .

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त्वष्ट्र पैटरे

त्वष्ट्र पैटरे, जिसे त्वश्तर पैटरे (Tvashtar Paterae) भी उच्चारित करते हैं, बृहस्पति ग्रह के चंद्रमा आयो पर स्थित एक ज्वालामुखीय क्षेत्र है। यह उस चंद्रमा के उत्तरी ध्रुव के पास स्थित है और इसमें ज्वालामुखीय क्रेटरों की एक शृंखला मौजूद है। इसका नाम त्वष्ट्र नामक हिन्दू ऋग्वैदिक देवता पर रखा गया है जो लोहारों के अधिदेवता माने जाते हैं। गैलिलेयो (अंतरिक्ष यान) ने कई सालों तक इस क्षेत्र का अध्ययन किया था जिस दौरान यहाँ एक स्थल से एक २५ किलोमीटर चौड़ी दरार से लावा फटा जो सतह से १ से २ किमी की ऊँचाई तक पहुँच गया। देखने में यह एक २५ किमी चौड़े और १-२ किमी ऊँचे परदे जैसा लगा। कुछ समय बाद यहाँ एक गैस का फ़व्वारा फटा जो सतह से ३८५ किमी की ऊँचाई तक पहुँच गया और जिसकी सामग्री विस्फोट स्थल से ७०० किमी दूर तक के स्थानों को ढक गई। .

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तोबा झील

अंतरिक्ष से ली गई तोबा झील और उसमे स्थित समोसिर नामक द्वीप की फ़ोटो तोबा झील इण्डोनेशिया के द्वीप सुमात्रा के उत्तर-मध्य में स्थित एक झील और एक महाज्वालामुखी है। यह झील १०० कि॰मी॰ लम्बी और ३० कि॰मी॰ चौड़ी है और इसकी अधिकतम गहराई ५०० मीटर है। तोबा झील इण्डोनेशिया की सबसे बड़ी झील है और विश्व की सबसे बड़ी ज्वालामुखीय झील भी है। ज्वालामुखीय झीलें वह झीलें होती हैं जो किसी जीवित या मृत ज्वालामुखी के मुंह में पानी भर जाने से बन जाती हैं। यह माना जाता है कि आज से क़रीब ६९,००० से लेकर ७७,००० साल पहले इस ज्वालामुखी में विश्व का सबसे बड़ा ज्वालामुखीय विस्फोट हुआ। यह अनुमान लगाया जाता है के इस विस्फोट के कारण विश्व में उस समय मौजूद अधिकतर मनुष्य मारे गए थे और मनुष्यजाति हमेशा के लिए नष्ट होने के बहुत क़रीब आ पहुंची थी। हिंद उपमहाद्वीप के पूरे क्षेत्र को इस विस्फोट से अत्यंत हानि हुई जिसमे इस क्षेत्र के सारे जंगल नष्ट हो गये। इस पूरे इलाक़े पर राख की मोटी परत फैल गयी जो आज भी सारे भारत और पाकिस्तान में ज़मीन के नीचे पायी जाती है। तोबा झील के किनारे बताक लोग रहते हैं जो मलय लोगों से नृजातीय रूप से अलग हैं। यहाँ तक पहुँचने के लिये मेदान सबसे नज़दीकी हवाई अड्डा है और सियांतर सबसे नज़दीकी रेलवे स्टेशन। .

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तोमानीवी पर्वत

तोमानीवी पर्वत (Mount Tomanivi), जो पहले विक्टोरिया पर्वत (Mount Victoria) कहलाता था, प्रशांत महासागर में स्थित फ़िजी देश का सबसे ऊँचा पर्वत है। यह उस देश के विति लेवु द्वीप की उत्तरी उच्चभूमियों में खड़ा है और वास्तव में एक मृत ज्वालामुखी है। विति लेवु द्वीप की मुख्य नदियाँ - रेवा नदी, नवुआ नदी, सिन्गातोका नदी और बा नदी - इसी पर्वत की ढलानों से शुरु होती हैं। .

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दक्षिण अमेरिका

दक्षिण अमेरिका (स्पेनी: América del Sur; पुर्तगाली: América do Sul) उत्तर अमेरिका के दक्षिण पूर्व में स्थित पश्चिमी गोलार्द्ध का एक महाद्वीप है। दक्षिणी अमेरिका उत्तर में १३० उत्तरी अक्षांश (गैलिनस अन्तरीप) से दक्षिण में ५६० दक्षिणी अक्षांश (हार्न अन्तरीप) तक एवं पूर्व में ३५० पश्चिमी देशान्तर (रेशिको अन्तरीप) से पश्चिम में ८१० पश्चिमी देशान्तर (पारिना अन्तरीप) तक विस्तृत है। इसके उत्तर में कैरीबियन सागर तथा पनामा नहर, पूर्व तथा उत्तर-पूर्व में अन्ध महासागर, पश्चिम में प्रशान्त महासागर तथा दक्षिण में अण्टार्कटिक महासागर स्थित हैं। भूमध्य रेखा इस महाद्वीप के उत्तरी भाग से एवं मकर रेखा मध्य से गुजरती है जिसके कारण इसका अधिकांश भाग उष्ण कटिबन्ध में पड़ता है। दक्षिणी अमेरिका की उत्तर से दक्षिण लम्बाई लगभग ७,२०० किलोमीटर तथा पश्चिम से पूर्व चौड़ाई ५,१२० किलोमीटर है। विश्व का यह चौथा बड़ा महाद्वीप है, जो आकार में भारत से लगभग ६ गुना बड़ा है। पनामा नहर इसे पनामा भूडमरुमध्य पर उत्तरी अमरीका महाद्वीप से अलग करती है। किंतु पनामा देश उत्तरी अमरीका में आता है। ३२,००० किलोमीटर लम्बे समुद्रतट वाले इस महाद्वीप का समुद्री किनारा सीधा एवं सपाट है, तट पर द्वीप, प्रायद्वीप तथा खाड़ियाँ कम हैं जिससे अच्छे बन्दरगाहों का अभाव है। खनिज तथा प्राकृतिक सम्पदा में धनी यह महाद्वीप गर्म एवं नम जलवायु, पर्वतों, पठारों घने जंगलों तथा मरुस्थलों की उपस्थिति के कारण विकसित नहीं हो सका है। यहाँ विश्व की सबसे लम्बी पर्वत-श्रेणी एण्डीज पर्वतमाला एवं सबसे ऊँची टीटीकाका झील हैं। भूमध्यरेखा के समीप पेरू देश में चिम्बोरेजो तथा कोटोपैक्सी नामक विश्व के सबसे ऊँचे ज्वालामुखी पर्वत हैं जो लगभग ६,०९६ मीटर ऊँचे हैं। अमेजन, ओरीनिको, रियो डि ला प्लाटा यहाँ की प्रमुख नदियाँ हैं। दक्षिण अमेरिका की अन्य नदियाँ ब्राज़ील की साओ फ्रांसिस्को, कोलम्बिया की मैगडालेना तथा अर्जेण्टाइना की रायो कोलोरेडो हैं। इस महाद्वीप में ब्राज़ील, अर्जेंटीना, चिली, उरुग्वे, पैराग्वे, बोलिविया, पेरू, ईक्वाडोर, कोलोंबिया, वेनेज़ुएला, गुयाना (ब्रिटिश, डच, फ्रेंच) और फ़ाकलैंड द्वीप-समूह आदि देश हैं। .

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दक्कन उद्भेदन

भारत में दक्कन ट्रैप (बैगनी रंग में) मुम्बई के पूर्व में स्थित माथेरान के दक्कन ट्रैप दक्कन उद्भेदन अथवा दकन ट्रैप भारत के पश्चिमी हिस्से में एक प्रदेश है जहाँ की भूवैज्ञानिक संरचना क्रीटाशियस युग के के ज्वालामुखी उद्भेदन के दौरान बनी बेसाल्ट चट्टानों है और इस इलाके में बेसाल्ट के ऊपर बनी काली रेगुर मिट्टी पायी जाती है। यह 17°–24° उत्तर तथा 73°–74° पूर्व के मध्य स्थित है। यह विश्व के कुछ सबसे बड़े ज्वालामुखी निर्मित स्थलरूपों में से एक है। श्रेणी:भारत का भूविज्ञान.

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द्वीपसमूह

भारत के पड़ौसी देश बर्मा में स्थित मेरगुई द्वीपसमूह द्वीपसमूह किसी सागर, महासागर या झील में स्थित द्वीपों की शृंखला को कहते हैं। भारत के अण्डमान, निकोबार और लक्षद्वीप द्वीपसमूहों के उदहारण हैं। .

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दैत्य सेतुक

दैत्य सेतुक, (अंग्रेजी: Giant's Causeway, आयरिश: Clochán an Aifir या Clochán na bhFomhórach और अल्स्टर स्कॉट:tha Giant's Causey) एक प्राचीन ज्वालामुखीय विस्फोट के परिणामस्वरूप अस्तित्व में आये लगभग 40,000 अन्त:पाशित (आपस में गुथे हुए) बेसाल्ट स्तंभों की संरचना वाला क्षेत्र है। यह उत्तरी आयरलैंड की अंटरिम काउंटी के उत्तरी-पूर्व तट पर स्थित है और बुशमिल्स नामक शहर के उत्तर पूर्व में तीन मील (4.8 किमी) की दूरी पर स्थित है। यूनेस्को ने इस क्षेत्र को 1986 में एक विश्व धरोहर स्थल घोषित किया था, जबकि उत्तरी आयरलैंड के पर्यावरण विभाग ने 1987 में इसे एक राष्ट्रीय प्रकृति संरक्षित क्षेत्र घोषित किया। 2005 में रेडियो टाइम्स के पाठकों के बीच कराये गये एक सर्वेक्षण में, इस संरचना को संयुक्त राजशाही का चौथा सबसे बड़ा प्राकृतिक आश्चर्य चुना गया। सागर से उभरने वाले इन उर्ध्वाधर खड़े स्तभों के सिरे कमोबेश चपटे हैं। अधिकांश स्तंभ षटकोणीय हैं, हालांकि चार, पांच, सात और आठ पक्षों वाले स्तंभ भी उपस्थित हैं। सबसे लंबा स्तंभ 12 मीटर (39 फुट) ऊंचा है और चट्टानों में जमा लावा कई स्थानों पर 28 मीटर तक मोटा है। दैत्य सेतुक का प्रबंधन और स्वामित्व, राष्ट्रीय न्यास के हाथों में है और उत्तरी आयरलैंड में यह सबसे अधिक लोकप्रिय पर्यटन स्थल है। .

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धूल

धूल (dust) पदार्थ के महीन कणों को कहते हैं। वायुमंडल में धूल मिट्टी, रेत, ज्वालामुखीय विस्फोट, प्रदूषण और उल्काओं जैसे स्रोतों से उत्पन्न होती है। घरों में मिलने वाली धूल इनके अलावा पशुओं व मानवों के बालों और त्वचा के अंशों, फूलों के पराग, वस्त्रों के रेशों, कागज़ के रेशों और अन्य स्रोतों से उत्पन्न होती है।Kathleen Hess-Kosa, (2002), Indoor Air Quality: sampling methodologies, page 216.

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धोसी पहाड़ी

अरावली पर्वत श्रृंखला के अंतिम छोर पर उत्तर-पश्चिमी हिस्से में एक सुप्त ज्वालामुखी है, जिसे धोसी पहाड़ी के नाम से जाना जाता है। यह उत्तरी अक्षांश 28*03'39.47" और पूर्वी देशान्तर 76*01'52.63" पर स्थित इकलौती पहाड़ी है, जो कई महत्वपूर्ण और रहस्यमयी कारणों से चर्चित रहती है। इस पहाड़ी का उल्लेख विभिन्न धार्मिक पुस्तकों में भी मिलता है जैसे महाभारत, पुराण आदि। .

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नर्कोन्दम द्वीप

नर्कोन्दम या नर्कोन्दुम अंडमान सागर में स्थित एक ज्वालामुखी द्वीप है। इसकी मुख्य चोटी समुद्र स्तर से लगभग 710 मीटर की उंचाई पर है। इस द्वीप को अण्डमान और निकोबार द्वीपसमूह का हिस्सा माना जाता है। भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण के द्वारा इसे शान्त ज्वालामुखी की श्रेणी में वर्गीकृत किया गया था। श्रेणी:भारत के केन्द्र शासित प्रदेश श्रेणी:अण्डमान और निकोबार द्वीपसमूह के द्वीप श्रेणी:भारत के द्वीप समूह श्रेणी:ज्वालामुखी निर्मित द्वीप श्रेणी:बंगाल की खाड़ी श्रेणी:हिन्द महासागर के द्वीप श्रेणी:भारत के ज्वालामुखी.

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निम्नस्खलन

भूविज्ञान में निम्नस्खलन या सबडक्शन (subduction) उस प्रक्रिया को कहते हैं जिसमें दो भौगोलिक तख़्तों की संमिलन सीमा पर एक तख़्ता दूसरे के नीचे फिसलकर दबने लगता है, यानि कि उसका दूसरे तख़्ते के नीचे स्खलन होने लगता है। निम्नस्खलन क्षेत्र (सबडक्शन ज़ोन, subduction zone) पृथ्वी के वे इलाक़े होते हैं जहाँ यह निम्नस्खलन चल रहा हो। अक्सर इन निम्नस्खलन क्षेत्रों में ज्वालामुखी, पर्वतमालाएँ, या (यदि यह समुद्री क्षेत्र में हो) महासागरीय गर्त (खाईयाँ या ट्रेन्च) बन जाते हैं। निम्नस्खलन की प्रक्रिया की गति चंद सेन्टीमीटर प्रति वर्ष ही होती है। एक तख़्ता दूसरे तख़्ते के नीचे दो से आठ सेमी प्रति वर्ष के औसत दर से खिसकता है। भारतीय उपमहाद्वीप में भारतीय प्लेट के यूरेशियाई प्लेट की संमिलन सीमा पर भारतीय प्लेट के निम्नस्खलन से ही हिमालय व तिब्बत के पठार की उच्चभूमि का निर्माण हुआ है। .

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निसार (उपग्रह)

नासा-इसरो सिंथेटिक एपर्चर राडार या निसार मिशन (NASA-ISRO Synthetic Aperture Radar or NISAR) दोहरी आवृत्ति वाले सिंथेटिक एपर्चर रडार उपग्रह को विकसित करने और लॉन्च करने के लिए नासा और इसरो के बीच एक संयुक्त परियोजना है। यह उपग्रह दोहरी आवृत्ति का उपयोग करने वाला पहला रडार इमेजिंग सैटेलाइट होगा और इसे धरती के प्राकृतिक प्रक्रियाओं को समझने के लिए रिमोट सेंसिंग में इस्तेमाल किया जाएगा। .

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निअंडरथल मानव

निएंडरथल मानव का कंकाल निएंडरथल मानव होमो वंश का एक विलुप्त सदस्य है। जर्मनी में निअंडर की घाटी में इस आदिमानव की कुछ हड्डियाँ मिली है, इसलिए इसे निएंडरथल मानव का नाम दिया गया है। इसका कद अन्य मानवजातियों की अपेक्षा छोटा था। यह पश्चिम यूरोप, पश्चिम एशिया तथा अफ्रीका में रहता था। यह अब से लगभग 1,60,000 वर्ष पूर्व रहता था। इसका श्रेणीविभाजन मनुष्य की ही एक उपजाति के रूप में किया जाता है। इसका कद 4.5 से 5.5 फिट तक था। 2007 में किये गए अध्ययनों से यह पता चलता है कि इनके बालों का रंग लाल तथा त्वचा पीली थी। .

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पनामा

पनामा का नक़्शा पनामा की राजधानी (सियुदाद दे पानामा) पनामा, जिसका औपचारिक नाम पनामा गणतंत्र (स्पेनी: República de Panamá, रेपुब्लिका पानामा) है, मध्य अमेरिका का सबसे दक्षिणतम राष्ट्र है। यह पनामा भूडमरु पर स्थित है जो उत्तर अमेरिका और दक्षिण अमेरिका के दो महाद्वीपों को धरती की एक पतले डमरू से जोड़ता है। इसके उत्तरपश्चिम में कोस्टा रीका, दक्षिणपूर्व में कोलम्बिया, दक्षिण में प्रशांत महासागर और पूर्व में कैरिबियाई समुद्र है जो अंध महासागर का एक भाग है। पनामा की राजधानी का नाम पनामा नगर है (स्पेनी में Ciudad de Panama, "सियुदाद दे पानामा")। पनामा की जनसंख्या २०१० में ३४,०५,८१३ थी और इसका क्षेत्रफल ७५,५१७ वर्ग किमी है। पनामा स्पेन का उपनिवेश हुआ करता था लेकिन सन् १८२१ में स्पेन से नाता तोड़कर वह नुएवा ग्रानादा (Nueva Granada), एकुआदोर और वेनेज़ुएला के साथ एक "ग्रान कोलम्बिया" नाम के संघ में शामिल हो गया। यह संघ १८३० में टूट गया। नुएवा ग्रानादा एक ही राष्ट्र में जुड़े रहे और इसने अपना नाम बदलकर कोलम्बिया रख लिया। बीसवी सदी के आरम्भ में संयुक्त राज्य अमेरिका पनामा के क्षेत्र में से पनामा नहर बनाना चाहता था, क्योंकि इस से अमेरिका के पूर्वी और पश्चिमी तटों के बीच में समुद्री यातायात को बहुत बड़ा फ़ायदा होने वाला था। अमेरिका के उकसाने पर पनामा में कोलम्बिया से अलगाववाद की लहर उठी और १९०३ में पनामा कोलम्बिया से अलग होकर एक स्वतन्त्र राष्ट्र बन गया। अमेरिकी सेना के अभियंताओं ने १९०४ और १९१४ के बीच में खुदाई कर के पनामा नहर तैयार कर दी, लेकिन अमेरिका और पनामा के समझौते के अंतर्गत इस नाहर पर अमेरिका का नियंत्रण रहा। यह बात पनामा को खटकती रही और वह अमेरिका से नहर के क्षेत्र की वापसी की मांग करता रहा। १९७७ में अमेरिका इस नाहर को २०वी शताब्दी के अंत तक पनामा को वापस करने के लिए राज़ी हो गया। .

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पर्वत निर्माण

पर्वतों का निर्माण करती हैं। .

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पर्वतमाला

अंतरिक्ष से देखने पर हिमालय पर्वतमाला एक पर्वतमाला या पर्वत श्रृंखला पहाड़ों की एक श्रृंखला होती है जहाँ एक पर्वत दूसरे से सटा रहता हैं और इन पर्वतों को कोई दर्रा या घाटी ही से दूसरे पर्वतों से अलग करती है। यह आवश्यक नहीं है कि एक ही पर्वत श्रृंखला के भीतर आने वाले हर पर्वत का भूविज्ञान (संगठन) एक समान ही हो पर अक्सर ऐसा ही होता है और एक ही श्रृंखला में पृथक उत्पत्ति के पर्वत हो सकते हैं, उदाहरणत: ज्वालामुखी, प्रोत्थान पर्वत या वलित पर्वत एक ही श्रृंखला में हो सकते हैं जो वस्तुतः अलग अलग चट्टान से बने होते हैं। हिमालय पर्वत श्रृंखला में पृथ्वी की सतह पर स्थित दुनिया के कुछ सर्वोच्च पर्वत शामिल हैं और जिसमें से उच्चतम माउंट एवरेस्ट है। एण्डीज़ पृथ्वी की सतह पर विश्व की सबसे लंबी पर्वत श्रृंखला है। सबसे लंबी पर्वत श्रृंखला वास्तव में मध्याह्न अटलांटिक पर्वतश्रेणी है, जिसका फैलाव अटलांटिक महासागर के तल पर बीच में है। आर्कटिक कॉर्डिलेरा विश्व के सबसे उत्तर में स्थित पर्वतमाला है जिसमे पूर्वी उत्तरी अमेरिका के कुछ ऊँचे पर्वत समाहित हैं। .

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पांपेई

पंपेई के रोमनकालीन भग्नावशेष पांपेई (Pompei) दक्षिणी इटली के नेप्लीज (Naples) प्रान्त का एक नगर और कम्यून है। यह प्राचीन रोमकालीन भग्नावशेषों (ruins) के लिए प्रसिद्ध है। वर्ष २०१० में यहाँ की जनसंख्या 25,671 थी। .

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पिटकेर्न द्वीपसमूह

पिटकेर्न द्वीपसमूह (पिटकेर्न: Pitkern Ailen), आधिकारिक नाम पिटकेर्न, हेण्डरसन, डूस तथा ओएनो द्वीपसमूह, दक्षिण प्रशान्त महासागर में चार ज्वालामुखीय द्वीप हैं जो कि ब्रिटिश समुद्रपार प्रदेश के अन्तर्गत आते हैं। ये चार द्वीप पिटकेर्न, हेण्डरसन, डूस तथा ओएनो नाम से जाने जाते हैं। इन सभी द्वीपों का संयुक्त क्षेत्रफल है। हेण्डरसन द्वीप कुल क्षेत्रफल का ८६% है। पिटकेर्न विश्व का सबसे छोटा राष्ट्रीय न्याय क्षेत्र है। अज इस द्वीप पर सिर्फ ५० स्थायी निवासी रहते हैं जो कि चार मुख्य परिवारों से हैं।Rob Solomon and Kirsty Burnett (January 2014).

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पिज़्ज़ा

पिज़्ज़ा (इतालवी Pizza) भट्टी में बनाए जानी वाली चपटी ब्रेड होती है, जीसे मुख्यतः टमाटर की चटनी, चीज़ और अन्य विविध टॉपिंग के साथ परोसा जाता है। इसकी उत्पत्ती इटली में हुई और अब यह विश्वभर में लोकप्रिय है। .

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पिको देल तेइदे

पिको देल तेइदे पिको देल तेइदे 3D पिको देल तेइदे (स्पेनी भाषा: Spanish, Pico del Teide; अर्थात 'तेइदे पर्वत') एक प्रमुख ज्वालामुखी हैं यह कैनरी द्वीप के टेनराइफ (तेनरीफ़) में स्थित है और स्पेन में सबसे बड़ा पहाड़ है। 2007 में इसे विश्व विरासत घोषित किया गया।। पहाड़ द्वीप के प्राचीन निवासियों को पवित्र किया गया था (गुआंचे)। .

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पकाया ज्वालामुखी

ग्वाटेमाला का 2500 मीटर ऊंचा यह ज्वालामुखी मध्य अमेरिका महाद्वीप के सबसे सक्रिय ज्वालामुखियों में से है। यह ग्वाटेमाला सिटी से 26 किलोमीटर दक्षिण में स्थित है। .

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प्रतापगढ़, राजस्थान

प्रतापगढ़, क्षेत्रफल में भारत के सबसे बड़े राज्य राजस्थान के ३३वें जिले प्रतापगढ़ जिले का मुख्यालय है। प्राकृतिक संपदा का धनी कभी इसे 'कान्ठल प्रदेश' कहा गया। यह नया जिला अपने कुछ प्राचीन और पौराणिक सन्दर्भों से जुड़े स्थानों के लिए दर्शनीय है, यद्यपि इसके सुविचारित विकास के लिए वन विभाग और पर्यटन विभाग ने कोई बहुत उल्लेखनीय योगदान अब तक नहीं किया है। .

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प्रशान्त महासागर

श्रेणी:प्रशान्त महासागर प्रशान्त महासागरप्रशान्त महासागर अमेरिका और एशिया को पृथक करता है। यह विश्व का सबसे बड़ा तथा सबसे गहरा महासागर है। तुलनात्मक भौगौलिक अध्ययन से पता चलता है कि इस महासागर में पृथ्वी का भाग कम तथा जलीय क्षेत्र अधिक है। .

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प्राकृतिक आपदा

एक प्राकृतिक आपदा एक प्राकृतिक जोखिम (natural hazard) का परिणाम है (जैसे की ज्वालामुखी विस्फोट (volcanic eruption), भूकंप, या भूस्खलन (landslide) जो कि मानव गतिविधियों को प्रभावित करता है। मानव दुर्बलताओं को उचित योजना और आपातकालीन प्रबंधन (emergency management) का आभाव और बढ़ा देता है, जिसकी वजह से आर्थिक, मानवीय और पर्यावरण को नुकसान पहुँचता है। परिणाम स्वरुप होने वाली हानि निर्भर करती है जनसँख्या की आपदा को बढ़ावा देने या विरोध करने की क्षमता पर, अर्थात उनके लचीलेपन पर। ये समझ केंद्रित है इस विचार में: "जब जोखिम और दुर्बलता (vulnerability) का मिलन होता है तब दुर्घटनाएं घटती हैं". जिन इलाकों में दुर्बलताएं निहित न हों वहां पर एक प्राकृतिक जोखिम कभी भी एक प्राकृतिक आपदा में तब्दील नहीं हो सकता है, उदहारण स्वरुप, निर्जन प्रदेश में एक प्रबल भूकंप का आना.बिना मानव की भागीदारी के घटनाएँ अपने आप जोखिम या आपदा नहीं बनती हैं, इसके फलस्वरूप प्राकृतिक शब्द को विवादित बताया गया है। .

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प्रिमोर्स्की क्राय

रूस में प्रिमोर्सकी क्राय का स्थान दुनिया के अधिकतर जंगली साइबेरियाई शेर प्रिमोर्सकी क्राय में रहते हैं प्रिमोर्स्की क्राय (रूसी: Примо́рский край), जिसे पहले प्रिमोर्ये (Примо́рье) भी कहा जाता था, रूस का एक संघीय खंड है जो क्राय का दर्जा रखता है। रूसी भाषा में 'प्रिमोर्सकी' का मतलब 'समुद्री' होता है इसलिए इस राज्य को कभी-कभी 'समुद्री प्रांत' या 'समुद्री क्षेत्र' भी कहा जाता है। इसका प्रशासनिक केंद्र और राजधानी व्लादिवोस्तोक का शहर है। प्रिमोर्सकी क्राय का क्षेत्रफल वर्ग १,६५,९०० किमी है और सन् २०१० की जनगणना में इस प्रांत की आबादी १९,५६,४२६ थी। .

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प्रवाल द्वीप

प्रशांत महासागर में टोकेलाऊ में https://www.google.co.in/maps/place/%E0%A4%9F%E0%A5%8B%E0%A4%95%E0%A5%87%E0%A4%B2%E0%A4%BE%E0%A4%8A/@-9.166827,-171.8882544,12z/data.

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प्लेट विवर्तनिकी

प्लेट विवर्तनिकी (Plate tectonics) एक वैज्ञानिक सिद्धान्त है जो पृथ्वी के स्थलमण्डल में बड़े पैमाने पर होने वाली गतियों की व्याख्या प्रस्तुत करता है। साथ ही महाद्वीपों, महासागरों और पर्वतों के रूप में धरातलीय उच्चावच के निर्माण तथा भूकम्प और ज्वालामुखी जैसी घटनाओं के भौगोलिक वितरण की व्याख्या प्रस्तुत करने का प्रयास करता है। यह सिद्धान्त बीसवीं शताब्दी के प्रथम दशक में अभिकल्पित महाद्वीपीय विस्थापन नामक संकल्पना से विकसित हुआ जब 1960 के दशक में ऐसे नवीन साक्ष्यों की खोज हुई जिनसे महाद्वीपों के स्थिर होने की बजाय गतिशील होने की अवधारणा को बल मिला। इन साक्ष्यों में सबसे महत्वपूर्ण हैं पुराचुम्बकत्व से सम्बन्धित साक्ष्य जिनसे सागर नितल प्रसरण की पुष्टि हुई। हैरी हेस के द्वारा सागर नितल प्रसरण की खोज से इस सिद्धान्त का प्रतिपादन आरंभ माना जाता है और विल्सन, मॉर्गन, मैकेंज़ी, ओलिवर, पार्कर इत्यादि विद्वानों ने इसके पक्ष में प्रमाण उपलब्ध कराते हुए इसके संवर्धन में योगदान किया। इस सिद्धान्त अनुसार पृथ्वी की ऊपरी लगभग 80 से 100 कि॰मी॰ मोटी परत, जिसे स्थलमण्डल कहा जाता है, और जिसमें भूपर्पटी और भूप्रावार के ऊपरी हिस्से का भाग शामिल हैं, कई टुकड़ों में टूटी हुई है जिन्हें प्लेट कहा जाता है। ये प्लेटें नीचे स्थित एस्थेनोस्फीयर की अर्धपिघलित परत पर तैर रहीं हैं और सामान्यतया लगभग 10-40 मिमी/वर्ष की गति से गतिशील हैं हालाँकि इनमें कुछ की गति 160 मिमी/वर्ष भी है। इन्ही प्लेटों के गतिशील होने से पृथ्वी के वर्तमान धरातलीय स्वरूप की उत्पत्ति और पर्वत निर्माण की व्याख्या प्रस्तुत की जाती है और यह भी देखा गया है कि प्रायः भूकम्प इन प्लेटों की सीमाओं पर ही आते हैं और ज्वालामुखी भी इन्हीं प्लेट सीमाओं के सहारे पाए जाते हैं। प्लेट विवर्तनिकी में विवर्तनिकी (लातीन:tectonicus) शब्द यूनानी भाषा के τεκτονικός से बना है जिसका अर्थ निर्माण से सम्बंधित है। छोटी प्लेट्स की संख्या में भी कई मतान्तर हैं परन्तु सामान्यतः इनकी संख्या 100 से भी अधिक स्वीकार की जाती है। .

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पृथ्वी

पृथ्वी, (अंग्रेज़ी: "अर्थ"(Earth), लातिन:"टेरा"(Terra)) जिसे विश्व (The World) भी कहा जाता है, सूर्य से तीसरा ग्रह और ज्ञात ब्रह्माण्ड में एकमात्र ग्रह है जहाँ जीवन उपस्थित है। यह सौर मंडल में सबसे घना और चार स्थलीय ग्रहों में सबसे बड़ा ग्रह है। रेडियोधर्मी डेटिंग और साक्ष्य के अन्य स्रोतों के अनुसार, पृथ्वी की आयु लगभग 4.54 बिलियन साल हैं। पृथ्वी की गुरुत्वाकर्षण, अंतरिक्ष में अन्य पिण्ड के साथ परस्पर प्रभावित रहती है, विशेष रूप से सूर्य और चंद्रमा से, जोकि पृथ्वी का एकमात्र प्राकृतिक उपग्रह हैं। सूर्य के चारों ओर परिक्रमण के दौरान, पृथ्वी अपनी कक्षा में 365 बार घूमती है; इस प्रकार, पृथ्वी का एक वर्ष लगभग 365.26 दिन लंबा होता है। पृथ्वी के परिक्रमण के दौरान इसके धुरी में झुकाव होता है, जिसके कारण ही ग्रह की सतह पर मौसमी विविधताये (ऋतुएँ) पाई जाती हैं। पृथ्वी और चंद्रमा के बीच गुरुत्वाकर्षण के कारण समुद्र में ज्वार-भाटे आते है, यह पृथ्वी को इसकी अपनी अक्ष पर स्थिर करता है, तथा इसकी परिक्रमण को धीमा कर देता है। पृथ्वी न केवल मानव (human) का अपितु अन्य लाखों प्रजातियों (species) का भी घर है और साथ ही ब्रह्मांड में एकमात्र वह स्थान है जहाँ जीवन (life) का अस्तित्व पाया जाता है। इसकी सतह पर जीवन का प्रस्फुटन लगभग एक अरब वर्ष पहले प्रकट हुआ। पृथ्वी पर जीवन की उत्पत्ति के लिये आदर्श दशाएँ (जैसे सूर्य से सटीक दूरी इत्यादि) न केवल पहले से उपलब्ध थी बल्कि जीवन की उत्पत्ति के बाद से विकास क्रम में जीवधारियों ने इस ग्रह के वायुमंडल (the atmosphere) और अन्य अजैवकीय (abiotic) परिस्थितियों को भी बदला है और इसके पर्यावरण को वर्तमान रूप दिया है। पृथ्वी के वायुमंडल में आक्सीजन की वर्तमान प्रचुरता वस्तुतः जीवन की उत्पत्ति का कारण नहीं बल्कि परिणाम भी है। जीवधारी और वायुमंडल दोनों अन्योन्याश्रय के संबंध द्वारा विकसित हुए हैं। पृथ्वी पर श्वशनजीवी जीवों (aerobic organisms) के प्रसारण के साथ ओजोन परत (ozone layer) का निर्माण हुआ जो पृथ्वी के चुम्बकीय क्षेत्र (Earth's magnetic field) के साथ हानिकारक विकिरण को रोकने वाली दूसरी परत बनती है और इस प्रकार पृथ्वी पर जीवन की अनुमति देता है। पृथ्वी का भूपटल (outer surface) कई कठोर खंडों या विवर्तनिक प्लेटों में विभाजित है जो भूगर्भिक इतिहास (geological history) के दौरान एक स्थान से दूसरे स्थान को विस्थापित हुए हैं। क्षेत्रफल की दृष्टि से धरातल का करीब ७१% नमकीन जल (salt-water) के सागर से आच्छादित है, शेष में महाद्वीप और द्वीप; तथा मीठे पानी की झीलें इत्यादि अवस्थित हैं। पानी सभी ज्ञात जीवन के लिए आवश्यक है जिसका अन्य किसी ब्रह्मांडीय पिण्ड के सतह पर अस्तित्व ज्ञात नही है। पृथ्वी की आतंरिक रचना तीन प्रमुख परतों में हुई है भूपटल, भूप्रावार और क्रोड। इसमें से बाह्य क्रोड तरल अवस्था में है और एक ठोस लोहे और निकल के आतंरिक कोर (inner core) के साथ क्रिया करके पृथ्वी मे चुंबकत्व या चुंबकीय क्षेत्र को पैदा करता है। पृथ्वी बाह्य अंतरिक्ष (outer space), में सूर्य और चंद्रमा समेत अन्य वस्तुओं के साथ क्रिया करता है वर्तमान में, पृथ्वी मोटे तौर पर अपनी धुरी का करीब ३६६.२६ बार चक्कर काटती है यह समय की लंबाई एक नाक्षत्र वर्ष (sidereal year) है जो ३६५.२६ सौर दिवस (solar day) के बराबर है पृथ्वी की घूर्णन की धुरी इसके कक्षीय समतल (orbital plane) से लम्बवत (perpendicular) २३.४ की दूरी पर झुका (tilted) है जो एक उष्णकटिबंधीय वर्ष (tropical year) (३६५.२४ सौर दिनों में) की अवधी में ग्रह की सतह पर मौसमी विविधता पैदा करता है। पृथ्वी का एकमात्र प्राकृतिक उपग्रह चंद्रमा (natural satellite) है, जिसने इसकी परिक्रमा ४.५३ बिलियन साल पहले शुरू की। यह अपनी आकर्षण शक्ति द्वारा समुद्री ज्वार पैदा करता है, धुरिय झुकाव को स्थिर रखता है और धीरे-धीरे पृथ्वी के घूर्णन को धीमा करता है। ग्रह के प्रारंभिक इतिहास के दौरान एक धूमकेतु की बमबारी ने महासागरों के गठन में भूमिका निभाया। बाद में छुद्रग्रह (asteroid) के प्रभाव ने सतह के पर्यावरण पर महत्वपूर्ण बदलाव किया। .

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पृथ्वी का भूवैज्ञानिक इतिहास

300px पृथ्वी का भूवैज्ञानिक इतिहास इसके शैलों के स्तरों के अध्ययन के आधार पर निकाला जाता है। पृथ्वी का निर्माण लगभग 4.54 बिलियन वर्ष पूर्व हुआ। .

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पृथ्वी का इतिहास

पृथ्वी के इतिहास के युगों की सापेक्ष लंबाइयां प्रदर्शित करने वाले, भूगर्भीय घड़ी नामक एक चित्र में डाला गया भूवैज्ञानिक समय. पृथ्वी का इतिहास 4.6 बिलियन वर्ष पूर्व पृथ्वी ग्रह के निर्माण से लेकर आज तक के इसके विकास की सबसे महत्वपूर्ण घटनाओं और बुनियादी चरणों का वर्णन करता है। प्राकृतिक विज्ञान की लगभग सभी शाखाओं ने पृथ्वी के इतिहास की प्रमुख घटनाओं को स्पष्ट करने में अपना योगदान दिया है। पृथ्वी की आयु ब्रह्माण्ड की आयु की लगभग एक-तिहाई है। उस काल-खण्ड के दौरान व्यापक भूगर्भीय तथा जैविक परिवर्तन हुए हैं। .

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पूर्व अफ़्रीकी रिफ़्ट

पूर्व अफ़्रीकी रिफ़्ट (अंग्रेज़ी: East African Rift) एक सक्रीय भूवैज्ञानिक रिफ़्ट है जो पूर्व अफ़्रीका में बढ़ रही है। इसे पहले ग्रेट रिफ़्ट घाटी का भाग माना जाता था लेकिन बहुत से भूवैज्ञानिक इसे अब एक अलग रिफ़्ट घाटी मानते हैं। यह अफ़्रीकी प्लेट के टूटकर दो भागों में बंटने की जारी प्रक्रिया के कारण बन गई है। .

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पोज़ोलाना

पोज़ोलाना या पोज़ोलाना की राख, एक महीन, रेतीली ज्वालामुखीय राख है। पोज़ोलाना को पहली बार इटली के पोज़्ज़ुओली में वेसुवियस ज्वालामुखी के आसपास के क्षेत्र में खोजा और खोदा गया था। इसके बाद इसे अन्य कई स्थानों पर भी पाया गया। वित्रुवियस के अनुसार पोज़ोलाना के चार प्रकार क्रमश: काला, सफेद, धूसर और लाल, इटली के ज्वालामुखीय क्षेत्रों जैसे कि नेपल्स में पाये जाते हैं। .

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फ़ूमारोल

फ़ूमारोल (fumarole) पृथ्वी की भूपर्पटी (क्रस्ट, सबसे ऊपरी परत में खुले हुए एक मुख को कहते हैं जिस में से भाप और गैसें (जैसे कि कार्बन डाईऑक्साइड, सल्फर डाइऑक्साइड, हाइड्रोजन क्लोराइड व हाइड्रोजन सल्फाइड) निकलते रहते हैं। यह अक्सर ज्वालामुखियों के पास मिलते हैं। .

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फ़ूजीयामा

फ़ूजी पर्वत, जिसे फ़ूजी यामा ('यामा' का अर्थ जापानी भाषा में 'पर्वत' होता है) भी कहते हैं, जापान के होन्शू द्वीप पर स्थित एक ज्वालामुखी है जो जापान का सबसे ऊँचा पर्वत भी है। इस पर्वत का जापानी संस्कृति में विशेष स्थान है और इसे आदरपूर्वक फ़ूजी सान (यानि 'फ़ूजी जी') भी बुलाया जाता है। .

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बएकदू पर्वत

अंतरिक्ष से ली गई बएकदू ज्वालामुखी और उसके क्रेटर के कुछ भाग में स्थित 'तियान ची' नामक ज्वालामुखीय झील की तस्वीर उत्तर कोरिया और चीन की सरहद के नक़्शे पर बएकदू पर्वत सर्दियों में बर्फ़ से ढका बएकदू पर्वत और स्वर्ग झील (तियान ची) बएकदू पर्वत (कोरियाई: 백두산, Baekdu-san), जिसे चांगबाई पर्वत (चीनी: 长白山, Changbai shan) या बाईतोऊ (Baitou) भी कहा जाता है, उत्तर कोरिया और चीन की सरहद पर स्थित एक २,७४४ मीटर ऊंचा ज्वालामुखी है। यह चांगबाई पर्वत शृंखला का सबसे ऊंचा शिखर है। यह पूरे कोरियाई प्रायद्वीप (पेनिन्सुला) का भी सबसे ऊंचा पहाड़ है। कोरिया के लोग इसे एक पवित्र पर्वत मानते हैं और इसे कोरिया का एक राष्ट्रीय चिह्न समझते हैं।, Dale T. Irvin, Akintunde E. Akinade, Orbis Books, 1996, ISBN 978-1-57075-084-7,...

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बहिर्भेदी शैल

बहिर्भेदी आग्नेय चट्टानें वे चट्टानें हैं जो मैग्मा के पृथ्वी कि सतह के ऊपर निकल कर लावा के रूप में आकर ठंढे होकर जमने से बनती हैं। चूँकि इस प्रकार के उद्भेदन को ज्वालामुखी उद्भेदन कहा जाता है, अतः ऐसी चट्टानों को ज्वालामुखीय चट्टानें भी कहते हैं। .

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बाढ़ बेसाल्ट

बाढ़ बेसाल्ट (flood basalt) ऐसे भयानक ज्वालामुखीय विस्फोट या विस्फोटों की शृंखला का नतीजा होता है जो किसी समुद्री फ़र्श या घरती के विस्तृत क्षेत्र पर बेसाल्ट लावा फैला दे, यानि वहाँ लावा की बाढ़ फैलाकर उसे जमने पर बेसाल्ट की चट्टानों से ढक दे। बहुत ही बड़े बाढ़ बेसाल्ट के प्रदेशों को उद्भेदन (ट्रैप) कहा जाता है, जिसका एक महत्वपूर्ण उदाहरण भारत का दक्कन उद्भेदन है। पृथ्वी के पिछले २५ करोड़ वर्षों के इतिहास में बाढ़ बेसाल्ट की ग्यारह घटनाएँ रहीं हैं, जिन्होंने विश्व में कई पठार और पर्वतमालाएँ निर्मित की हैं। हमारे ग्रह के इतिहास की पाँच महाविलुप्ति घटनाओं के पीछे भी एसी बाढ़ बेसाल्ट घटनाओं के होने का सन्देह है और सम्भव है कि पृथ्वी पर क्षुद्रग्रह प्रहार से भी बाढ़ बेसाल्ट घटनाएँ बीत सकती हैं। .

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बानदुंग

बानदुंग (Bandung) इण्डोनेशिया के पश्चिम जावा प्रान्त का सबसे बड़ा शहर और राजधानी है। इसके महानगर क्षेत्र में सन् 2015 में 84,95,928 निवासी थे, जिसके आधार पर यह इण्डोनेशिया का दूसरा सबसे बड़ा महानगर क्षेत्र था। केन्द्रीय शहर की आबादी 25 लाख है जिसके अनुसार यह देश का तीसरा सबसे बड़ा शहर है। बानदुंग जावा द्वीप पर राष्ट्रीय राजधानी जकार्ता से 140 किलोमीटर (87 मील) दक्षिणपूर्व में समुद्रतल से 768 मीटर (2,520 फ़ुट) की ऊँचाई पर बसा हुआ है। अपनी ऊँचाई के कारण यहाँ का तापमान सालभर अन्य इण्डोनेशियाई शहरों से ठंडा रहता है। यह एक नदी द्रोणी में ज्वालामुखीय पहाड़ियों से घिरा हुआ है। सन् 2018 के एशियाई खेलों के मेज़बान नगरों में बानदुंग भी एक है। .

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बुरीरम प्रान्त

बुरीरम थाईलैण्ड का एक प्रान्त है। यह देश के पूर्वोत्तरी भाग (ईसान क्षेत्र) में खोरात पठार के दक्षिणी भाग पर स्थित है। इस क्षेत्र में कई मृत ज्वालामुखी हैं। प्रान्त की दक्षिणपूर्वी सीमाएँ कम्बोडिया से लगती हैं। .

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ब्रोमो पर्वत

ब्रोमो पर्वत जावा द्वीप का पर्वत पूर्व में टेंगर प्रदेश के पास है। 2,32 9 मीटर (7,641 फीट) में यह द्रव्यमान का सबसे ऊंचा शिखर नहीं है, लेकिन सबसे प्रसिद्ध है। मास्टीफ क्षेत्र पूर्वी जावा, इंडोनेशिया में सबसे ज्यादा दौरा करने वाले पर्यटकों में से एक है। ज्वालामुखी ब्रोमो टेंगर सेमेरु राष्ट्रीय उद्यान से संबंधित है। ब्रामो का नाम ब्रह्मा के जावानीस उच्चारण से लिया गया है, हिंदू निर्माता देवता। माउंट ब्रोमो 1 9 1 9 से एक संरक्षित प्रकृति आरक्षित "सागर ऑफ रेत" नामक सादे के बीच में बैठता है। माउंट ब्रोमो का दौरा करने का विशिष्ट तरीका, सिमोरो लॉआंग के पास के पहाड़ गांव से है। वहां से लगभग 45 मिनट में ज्वालामुखी से चलना संभव है, लेकिन एक संगठित जीप का दौरा भी संभव है, जिसमें पर्वत पर्वानकन पर्वत पर दृष्टिकोण पर रोक शामिल है। पर्वान पर्वानक पर दृष्टिकोण लगभग दो घंटे में पैर पर पहुंचा जा सकता है। ज्वालामुखीय गतिविधि की डिग्री के आधार पर, ज्वाला विज्ञान और आपदा खतरे में पड़ने के लिए इन्डोनेशियाई केंद्र कभी-कभी माउंट ब्रोमो की यात्रा के खिलाफ चेतावनी देता है। View into the Mount Bromo crater श्रेणी:इण्डोनेशिया श्रेणी:पर्वत श्रेणी:दो हज़ारी .

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बृहस्पति (ग्रह)

बृहस्पति सूर्य से पांचवाँ और हमारे सौरमंडल का सबसे बड़ा ग्रह है। यह एक गैस दानव है जिसका द्रव्यमान सूर्य के हजारवें भाग के बराबर तथा सौरमंडल में मौजूद अन्य सात ग्रहों के कुल द्रव्यमान का ढाई गुना है। बृहस्पति को शनि, अरुण और वरुण के साथ एक गैसीय ग्रह के रूप में वर्गीकृत किया गया है। इन चारों ग्रहों को बाहरी ग्रहों के रूप में जाना जाता है। यह ग्रह प्राचीन काल से ही खगोलविदों द्वारा जाना जाता रहा है तथा यह अनेकों संस्कृतियों की पौराणिक कथाओं और धार्मिक विश्वासों के साथ जुड़ा हुआ था। रोमन सभ्यता ने अपने देवता जुपिटर के नाम पर इसका नाम रखा था। इसे जब पृथ्वी से देखा गया, बृहस्पति -2.94 के सापेक्ष कांतिमान तक पहुंच सकता है, छाया डालने लायक पर्याप्त उज्जवल, जो इसे चन्द्रमा और शुक्र के बाद आसमान की औसत तृतीय सर्वाधिक चमकीली वस्तु बनाता है। (मंगल ग्रह अपनी कक्षा के कुछ बिंदुओं पर बृहस्पति की चमक से मेल खाता है)। बृहस्पति एक चौथाई हीलियम द्रव्यमान के साथ मुख्य रूप से हाइड्रोजन से बना हुआ है और इसका भारी तत्वों से युक्त एक चट्टानी कोर हो सकता है।अपने तेज घूर्णन के कारण बृहस्पति का आकार एक चपटा उपगोल (भूमध्य रेखा के पास चारों ओर एक मामूली लेकिन ध्यान देने योग्य उभार लिए हुए) है। इसके बाहरी वातावरण में विभिन्न अक्षांशों पर कई पृथक दृश्य पट्टियां नजर आती है जो अपनी सीमाओं के साथ भिन्न भिन्न वातावरण के परिणामस्वरूप बनती है। बृहस्पति के विश्मयकारी 'महान लाल धब्बा' (Great Red Spot), जो कि एक विशाल तूफ़ान है, के अस्तित्व को १७ वीं सदी के बाद तब से ही जान लिया गया था जब इसे पहली बार दूरबीन से देखा गया था। यह ग्रह एक शक्तिशाली चुम्बकीय क्षेत्र और एक धुंधले ग्रहीय वलय प्रणाली से घिरा हुआ है। बृहस्पति के कम से कम ६४ चन्द्रमा है। इनमें वो चार सबसे बड़े चन्द्रमा भी शामिल है जिसे गेलीलियन चन्द्रमा कहा जाता है जिसे सन् १६१० में पहली बार गैलीलियो गैलिली द्वारा खोजा गया था। गैनिमीड सबसे बड़ा चन्द्रमा है जिसका व्यास बुध ग्रह से भी ज्यादा है। यहाँ चन्द्रमा का तात्पर्य उपग्रह से है। बृहस्पति का अनेक अवसरों पर रोबोटिक अंतरिक्ष यान द्वारा, विशेष रूप से पहले पायोनियर और वॉयजर मिशन के दौरान और बाद में गैलिलियो यान के द्वारा, अन्वेषण किया जाता रहा है। फरवरी २००७ में न्यू होराएज़न्ज़ प्लूटो सहित बृहस्पति की यात्रा करने वाला अंतिम अंतरिक्ष यान था। इस यान की गति बृहस्पति के गुरुत्वाकर्षण का इस्तेमाल कर बढाई गई थी। इस बाहरी ग्रहीय प्रणाली के भविष्य के अन्वेषण के लिए संभवतः अगला लक्ष्य यूरोपा चंद्रमा पर बर्फ से ढके हुए तरल सागर शामिल हैं। .

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बेंकुलू

बेंकुलू दक्षिणपूर्व एशिया के इण्डोनेशिया देश के सुमात्रा द्वीप पर स्थित एक प्रान्त है। यह सुमात्रा के दक्षिणपश्चिमी तट पर स्थित है। प्रांत में तट से कुछ दूरी पर बेंकुलू पर्वतमाला चलती है जिसमें मृत और सक्रीय ज्वालामुखी हैं। हिन्द महासागर में कुछ दूरी पर स्थित मेगा द्वीप और एंग्गानो द्वीप भी प्रांत का हिस्सा हैं। .

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भारत का भूगोल

भारत का भूगोल या भारत का भौगोलिक स्वरूप से आशय भारत में भौगोलिक तत्वों के वितरण और इसके प्रतिरूप से है जो लगभग हर दृष्टि से काफ़ी विविधतापूर्ण है। दक्षिण एशिया के तीन प्रायद्वीपों में से मध्यवर्ती प्रायद्वीप पर स्थित यह देश अपने ३२,८७,२६३ वर्ग किमी क्षेत्रफल के साथ विश्व का सातवाँ सबसे बड़ा देश है। साथ ही लगभग १.३ अरब जनसंख्या के साथ यह पूरे विश्व में चीन के बाद दूसरा सबसे अधिक जनसंख्या वाला देश भी है। भारत की भौगोलिक संरचना में लगभग सभी प्रकार के स्थलरूप पाए जाते हैं। एक ओर इसके उत्तर में विशाल हिमालय की पर्वतमालायें हैं तो दूसरी ओर और दक्षिण में विस्तृत हिंद महासागर, एक ओर ऊँचा-नीचा और कटा-फटा दक्कन का पठार है तो वहीं विशाल और समतल सिन्धु-गंगा-ब्रह्मपुत्र का मैदान भी, थार के विस्तृत मरुस्थल में जहाँ विविध मरुस्थलीय स्थलरुप पाए जाते हैं तो दूसरी ओर समुद्र तटीय भाग भी हैं। कर्क रेखा इसके लगभग बीच से गुजरती है और यहाँ लगभग हर प्रकार की जलवायु भी पायी जाती है। मिट्टी, वनस्पति और प्राकृतिक संसाधनो की दृष्टि से भी भारत में काफ़ी भौगोलिक विविधता है। प्राकृतिक विविधता ने यहाँ की नृजातीय विविधता और जनसंख्या के असमान वितरण के साथ मिलकर इसे आर्थिक, सामजिक और सांस्कृतिक विविधता प्रदान की है। इन सबके बावजूद यहाँ की ऐतिहासिक-सांस्कृतिक एकता इसे एक राष्ट्र के रूप में परिभाषित करती है। हिमालय द्वारा उत्तर में सुरक्षित और लगभग ७ हज़ार किलोमीटर लम्बी समुद्री सीमा के साथ हिन्द महासागर के उत्तरी शीर्ष पर स्थित भारत का भू-राजनैतिक महत्व भी बहुत बढ़ जाता है और इसे एक प्रमुख क्षेत्रीय शक्ति के रूप में स्थापित करता है। .

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भौतिक भूगोल

पृथ्वी के धरातल और वतावरण का रंगीन चित्र भौतिक भूगोल (Physical geography) भूगोल की एक प्रमुख शाखा है जिसमें पृथ्वी के भौतिक स्वरूप का अध्ययन किया जाता हैं। यह धरातल पर अलग अलग जगह पायी जाने वाली भौतिक परिघटनाओं के वितरण की व्याख्या व अध्ययन करता है, साथ ही यह भूविज्ञान, मौसम विज्ञान, जन्तु विज्ञान और रसायनशास्त्र से भी जुड़ा हुआ है। इसकी कई उपशाखाएँ हैं जो विविध भौतिक परिघटनाओं की विवेचना करती हैं। .

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भौतिकी की शब्दावली

* ढाँचा (Framework).

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भू-आकृति विज्ञान

धरती की सतह भू-आकृति विज्ञान (Geomorphology) (ग्रीक: γῆ, ge, "पृथ्वी"; μορφή, morfé, "आकृति"; और λόγος, लोगोस, "अध्ययन") भू-आकृतियों और उनको आकार देने वाली प्रक्रियाओं का वैज्ञानिक अध्ययन है; तथा अधिक व्यापक रूप में, उन प्रक्रियाओं का अध्ययन है जो किसी भी ग्रह के उच्चावच और स्थलरूपों को नियंत्रित करती हैं। भू-आकृति वैज्ञानिक यह समझने की कोशिश करते हैं कि भू-दृश्य जैसे दिखते हैं वैसा दिखने के पीछे कारण क्या है, वे भू-आकृतियों के इतिहास और उनकी गतिकी को जानने का प्रयास करते हैं और भूमि अवलोकन, भौतिक परीक्षण और संख्यात्मक मॉडलिंग के एक संयोजन के माध्यम से भविष्य के बदलावों का पूर्वानुमान करते हैं। भू-आकृति विज्ञान का अध्ययन भूगोल, भूविज्ञान, भूगणित, इंजीनियरिंग भूविज्ञान, पुरातत्व और भू-तकनीकी इंजीनियरिंग में किया जाता है और रूचि का यह व्यापक आधार इस विषय के तहत अनुसंधान शैली और रुचियों की व्यापक विविधता को उत्पन्न करता है। पृथ्वी की सतह, प्राकृतिक और मानवोद्भव विज्ञान सम्बन्धी प्रक्रियाओं के संयोजन की प्रतिक्रिया स्वरूप विकास करती है और सामग्री जोड़ने वाली और उसे हटाने वाली प्रक्रियाओं के बीच संतुलन के साथ जवाब देती है। ऐसी प्रक्रियाएं स्थान और समय के विभिन्न पैमानों पर कार्य कर सकती हैं। सर्वाधिक व्यापक पैमाने पर, भू-दृश्य का निर्माण विवर्तनिक उत्थान और ज्वालामुखी के माध्यम से होता है। अनाच्छादन, कटाव और व्यापक बर्बादी से होता है, जो ऐसे तलछट का निर्माण करता है जिसका परिवहन और जमाव भू-दृश्य के भीतर या तट से दूर कहीं अन्य स्थान पर हो जाता है। उत्तरोत्तर छोटे पैमाने पर, इसी तरह की अवधारणा लागू होती है, जहां इकाई भू-आकृतियां योगशील (विवर्तनिक या तलछटी) और घटाव प्रक्रियाओं (कटाव) के संतुलन के जवाब में विकसित होती हैं। आधुनिक भू-आकृति विज्ञान, किसी ग्रह के सतह पर सामग्री के प्रवाह के अपसरण का अध्ययन है और इसलिए तलछट विज्ञान के साथ निकट रूप से संबद्ध है, जिसे समान रूप से उस प्रवाह के अभिसरण के रूप में देखा जा सकता है। भू-आकृतिक प्रक्रियाएं विवर्तनिकी, जलवायु, पारिस्थितिकी, और मानव गतिविधियों से प्रभावित होती हैं और समान रूप से इनमें से कई कारक धरती की सतह पर चल रहे विकास से प्रभावित हो सकते हैं, उदाहरण के लिए, आइसोस्टेसी या पर्वतीय वर्षण के माध्यम से। कई भू-आकृति विज्ञानी, भू-आकृतिक प्रक्रियाओं की मध्यस्थता वाले जलवायु और विवर्तनिकी के बीच प्रतिपुष्टि की संभावना में विशेष रुचि लेते हैं। भू-आकृति विज्ञान के व्यावहारिक अनुप्रयोग में शामिल है संकट आकलन जिसमें शामिल है भूस्खलन पूर्वानुमान और शमन, नदी नियंत्रण और पुनर्स्थापना और तटीय संरक्षण। .

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भूप्रावार पिच्छक

भूप्रावार पिच्छक अथवा भूप्रावार पिच्छ (अंग्रेज़ी: Mantle plume) एक ऊष्मा के संकेन्द्रण द्वारा उत्पन्न अनियमितता है जो पृथ्वी के अन्दर भूप्रावार-क्रोड सीमा पर धटित होती है और इसके कारण चट्टानी पदार्थ गरम लपक के रूप में ऊपर उठता है। इसके होने की कल्पना सत्तर के दशक में की गयी जब प्लेट सीमाओं से इतर भागों में ज्वालामुखी के वितरण की व्याख्या की आवश्यकता पड़ी। श्रेणी:भूविज्ञान श्रेणी:भूगतिकी.

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भूभौतिकी

भूभौतिकी (Geophysics) पृथ्वी की भौतिकी है। इसके अंतर्गत पृथ्वी संबंधी सारी समस्याओं की छानबीन होती है। साथ ही यह एक प्रयुक्त विज्ञान भी है, क्योंकि इसमें भूमि समस्याओं और प्राकृतिक रूपों में उपलब्ध पदार्थों के व्यवहार की व्याख्या मूल विज्ञानों की सहायता से की जाती है। इसका विकास भौतिकी और भौमिकी से हुआ है। भूविज्ञानियों की आवश्यकता के फलस्वरूप नए साधनों के रूप में इसका जन्म हुआ। विज्ञान की शाखाओं या उपविभागों के रूप में भौतिकी, रसायन, भूविज्ञान और जीवविज्ञान को मान्यता मिले एक अरसा बीत चुका है। ज्यों-ज्यों विज्ञान का विकास हुआ, उसकी शाखाओं के मध्यवर्ती क्षेत्र उत्पन्न होते गए, जिनमें से एक भूभौतिकी है। उपर्युक्त विज्ञानों को चतुष्फलकी के शीर्ष पर निरूपित करें तो चतुष्फलक की भुजाएँ (कोर) नए विज्ञानों को निरूपित करती हैं। भूभौतिकी का जन्म भौमिकी एवं भौतिकी से हुआ है। .

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भूमध्य सागर

भूमध्य सागर (Mediterranean sea) पृथ्वी का एक सागर है, जो उत्तरी अफ्रीका, यूरोप, अनातोलिया तथा मध्य पूर्व के बीच स्थित है। इसका क्षेत्रफल लगभग २५ लाख वर्ग किलोमीटर है, जो भारत के क्षेत्रफल का लगभग तीन-चौथाई है। प्राचीन काल में यूनान, अनातोलिया, कार्थेज, स्पेन, रोम, यरुशलम, अरब तथा मिस्र जैसे प्रदेशों तथा नगरों के बीच स्थित होने की वजह से इसे भूमध्य (धरती के बीच का) सागर कहते थे। यह अटलांटिक महासागर से जिब्राल्टर द्वारा जुड़ा है, जो केवल १४ किलोमीटर चौड़ा एक जलडमरूमध्य है। भूमध्य सागर का मानचित्र .

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भूमंडलीय ऊष्मीकरण

वैश्‍विक माध्‍य सतह का ताप 1961-1990 के सापेक्ष से भिन्‍न है 1995 से 2004 के दौरान औसत धरातलीय तापमान 1940 से 1980 तक के औसत तापमान से भिन्‍न है भूमंडलीय ऊष्मीकरण (या ग्‍लोबल वॉर्मिंग) का अर्थ पृथ्वी की निकटस्‍थ-सतह वायु और महासागर के औसत तापमान में 20वीं शताब्‍दी से हो रही वृद्धि और उसकी अनुमानित निरंतरता है। पृथ्‍वी की सतह के निकट विश्व की वायु के औसत तापमान में 2005 तक 100 वर्षों के दौरान 0.74 ± 0.18 °C (1.33 ± 0.32 °F) की वृद्धि हुई है। जलवायु परिवर्तन पर बैठे अंतर-सरकार पैनल ने निष्कर्ष निकाला है कि "२० वीं शताब्दी के मध्य से संसार के औसत तापमान में जो वृद्धि हुई है उसका मुख्य कारण मनुष्य द्वारा निर्मित ग्रीनहाउस गैसें हैं। जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है, धरती के वातावरण के तापमान में लगातार हो रही विश्वव्यापी बढ़ोतरी को 'ग्लोबल वार्मिंग' कहा जा रहा है। हमारी धरती सूर्य की किरणों से उष्मा प्राप्त करती है। ये किरणें वायुमंडल से गुजरती हुईं धरती की सतह से टकराती हैं और फिर वहीं से परावर्तित होकर पुन: लौट जाती हैं। धरती का वायुमंडल कई गैसों से मिलकर बना है जिनमें कुछ ग्रीनहाउस गैसें भी शामिल हैं। इनमें से अधिकांश धरती के ऊपर एक प्रकार से एक प्राकृतिक आवरण बना लेती हैं जो लौटती किरणों के एक हिस्से को रोक लेता है और इस प्रकार धरती के वातावरण को गर्म बनाए रखता है। गौरतलब है कि मनुष्यों, प्राणियों और पौधों के जीवित रहने के लिए कम से कम 16 डिग्री सेल्शियस तापमान आवश्यक होता है। वैज्ञानिकों का मानना है कि ग्रीनहाउस गैसों में बढ़ोतरी होने पर यह आवरण और भी सघन या मोटा होता जाता है। ऐसे में यह आवरण सूर्य की अधिक किरणों को रोकने लगता है और फिर यहीं से शुरू हो जाते हैं ग्लोबल वार्मिंग के दुष्प्रभाव। आईपीसीसी द्वारा दिये गये जलवायु परिवर्तन के मॉडल इंगित करते हैं कि धरातल का औसत ग्लोबल तापमान 21वीं शताब्दी के दौरान और अधिक बढ़ सकता है। सारे संसार के तापमान में होने वाली इस वृद्धि से समुद्र के स्तर में वृद्धि, चरम मौसम (extreme weather) में वृद्धि तथा वर्षा की मात्रा और रचना में महत्वपूर्ण बदलाव आ सकता है। ग्लोबल वार्मिंग के अन्य प्रभावों में कृषि उपज में परिवर्तन, व्यापार मार्गों में संशोधन, ग्लेशियर का पीछे हटना, प्रजातियों के विलुप्त होने का खतरा आदि शामिल हैं। .

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भूसंचलन

धरती के कुछ भाग दूसरे भागों के सापेक्ष धीमी किन्तु लगातार विस्थापित हो रहे हैं। इन्हें ही भूसंचलन (Earth's movements) कहते हैं। ये संचलन, धरती को अपरूपित (deform) करते हैं। भूसंचलन के निम्नलिखित कारक हैं-.

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भूविज्ञान

पृथ्वी के भूवैज्ञनिक क्षेत्र पृथ्वी से सम्बंधित ज्ञान ही भूविज्ञान कहलाता है।भूविज्ञान या भौमिकी (Geology) वह विज्ञान है जिसमें ठोस पृथ्वी का निर्माण करने वाली शैलों तथा उन प्रक्रियाओं का अध्ययन किया जाता है जिनसे शैलों, भूपर्पटी और स्थलरूपों का विकास होता है। इसके अंतर्गत पृथ्वी संबंधी अनेकानेक विषय आ जाते हैं जैसे, खनिज शास्त्र, तलछट विज्ञान, भूमापन और खनन इंजीनियरी इत्यादि। इसके अध्ययन बिषयों में से एक मुख्य प्रकरण उन क्रियाओं की विवेचना है जो चिरंतन काल से भूगर्भ में होती चली आ रही हैं एवं जिनके फलस्वरूप भूपृष्ठ का रूप निरंतर परिवर्तित होता रहता है, यद्यपि उसकी गति साधारणतया बहुत ही मंद होती है। अन्य प्रकरणों में पृथ्वी की आयु, भूगर्भ, ज्वालामुखी क्रिया, भूसंचलन, भूकंप और पर्वतनिर्माण, महादेशीय विस्थापन, भौमिकीय काल में जलवायु परिवर्तन तथा हिम युग विशेष उल्लेखनीय हैं। भूविज्ञान में पृथ्वी की उत्पत्ति, उसकी संरचना तथा उसके संघटन एवं शैलों द्वारा व्यक्त उसके इतिहास की विवेचना की जाती है। यह विज्ञान उन प्रक्रमों पर भी प्रकाश डालता है जिनसे शैलों में परिवर्तन आते रहते हैं। इसमें अभिनव जीवों के साथ प्रागैतिहासिक जीवों का संबंध तथा उनकी उत्पत्ति और उनके विकास का अध्ययन भी सम्मिलित है। इसके अंतर्गत पृथ्वी के संघटक पदार्थों, उन पर क्रियाशील शक्तियों तथा उनसे उत्पन्न संरचनाओं, भूपटल की शैलों के वितरण, पृथ्वी के इतिहास (भूवैज्ञानिक कालों) आदि के अध्ययन को सम्मिलित किया जाता है। .

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भूगतिकी

भूगतिकी (Geodynamics) भूभौतिकी की वह शाखा है जो पृथ्वी पर केन्द्रित गति विज्ञान का अध्ययन करती है। इसमें भौतिकी, रसायनिकी और गणित के सिद्धांतों से पृथ्वी की कई प्रक्रियाओं को समझा जाता है। इनमें भूप्रावार (मैंटल) में संवहन (कन्वेक्शन) द्वारा प्लेट विवर्तनिकी का चलन शामिल है। सागर नितल प्रसरण, पर्वत निर्माण, ज्वालामुखी, भूकम्प, भ्रंशण जैसी भूवैज्ञानिक परिघटनाएँ भी इसमें सम्मिलित हैं। भूगतिकी में चुम्बकीय क्षेत्रों, गुरुत्वाकर्षण और भूकम्पी तरंगों का मापन तथा खनिज विज्ञान की तकनीकों के प्रयोग से पत्थरों और उनमें उपस्थित समस्थानिकों (आइसोटोपों) का मापन भूगतिकी में ज्ञानवर्धन की महत्वपूर्ण विधियाँ हैं। पृथ्वी के अलावा अन्य ग्रहों पर अनुसंधान में भी भूगतिकी का प्रयोग होता है। .

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भूगोल शब्दावली

कोई विवरण नहीं।

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भूकम्प

भूकम्प या भूचाल पृथ्वी की सतह के हिलने को कहते हैं। यह पृथ्वी के स्थलमण्डल (लिथोस्फ़ीयर) में ऊर्जा के अचानक मुक्त हो जाने के कारण उत्पन्न होने वाली भूकम्पीय तरंगों की वजह से होता है। भूकम्प बहुत हिंसात्मक हो सकते हैं और कुछ ही क्षणों में लोगों को गिराकर चोट पहुँचाने से लेकर पूरे नगर को ध्वस्त कर सकने की इसमें क्षमता होती है। भूकंप का मापन भूकम्पमापी यंत्रों (सीस्मोमीटर) के साथ करा जाता है, जो सीस्मोग्राफ भी कहलाता है। एक भूकंप का आघूर्ण परिमाण मापक्रम पारंपरिक रूप से नापा जाता है, या सम्बंधित और अप्रचलित रिक्टर परिमाण लिया जाता है। ३ या उस से कम रिक्टर परिमाण की तीव्रता का भूकंप अक्सर अगोचर होता है, जबकि ७ रिक्टर की तीव्रता का भूकंप बड़े क्षेत्रों में गंभीर क्षति का कारण होता है। झटकों की तीव्रता का मापन विकसित मरकैली पैमाने पर किया जाता है। पृथ्वी की सतह पर, भूकंप अपने आप को, भूमि को हिलाकर या विस्थापित कर के प्रकट करता है। जब एक बड़ा भूकंप उपरिकेंद्र अपतटीय स्थति में होता है, यह समुद्र के किनारे पर पर्याप्त मात्रा में विस्थापन का कारण बनता है, जो सूनामी का कारण है। भूकंप के झटके कभी-कभी भूस्खलन और ज्वालामुखी गतिविधियों को भी पैदा कर सकते हैं। सर्वाधिक सामान्य अर्थ में, किसी भी सीस्मिक घटना का वर्णन करने के लिए भूकंप शब्द का प्रयोग किया जाता है, एक प्राकृतिक घटना) या मनुष्यों के कारण हुई कोई घटना -जो सीस्मिक तरंगों) को उत्पन्न करती है। अक्सर भूकंप भूगर्भीय दोषों के कारण आते हैं, भारी मात्रा में गैस प्रवास, पृथ्वी के भीतर मुख्यतः गहरी मीथेन, ज्वालामुखी, भूस्खलन और नाभिकीय परिक्षण ऐसे मुख्य दोष हैं। भूकंप के उत्पन्न होने का प्रारंभिक बिन्दु केन्द्र या हाईपो सेंटर कहलाता है। शब्द उपरिकेंद्र का अर्थ है, भूमि के स्तर पर ठीक इसके ऊपर का बिन्दु। San Andreas faultके मामले में, बहुत से भूकंप प्लेट सीमा से दूर उत्पन्न होते हैं और विरूपण के व्यापक क्षेत्र में विकसित तनाव से सम्बंधित होते हैं, यह विरूपण दोष क्षेत्र (उदा. “बिग बंद ” क्षेत्र) में प्रमुख अनियमितताओं के कारण होते हैं। Northridge भूकंप ऐसे ही एक क्षेत्र में अंध दबाव गति से सम्बंधित था। एक अन्य उदाहरण है अरब और यूरेशियन प्लेट के बीच तिर्यक अभिकेंद्रित प्लेट सीमा जहाँ यह ज़ाग्रोस पहाड़ों के पश्चिमोत्तर हिस्से से होकर जाती है। इस प्लेट सीमा से सम्बंधित विरूपण, एक बड़े पश्चिम-दक्षिण सीमा के लम्बवत लगभग शुद्ध दबाव गति तथा वास्तविक प्लेट सीमा के नजदीक हाल ही में हुए मुख्य दोष के किनारे हुए लगभग शुद्ध स्ट्रीक-स्लिप गति में विभाजित है। इसका प्रदर्शन भूकंप की केन्द्रीय क्रियाविधि के द्वारा किया जाता है। सभी टेक्टोनिक प्लेट्स में आंतरिक दबाव क्षेत्र होते हैं जो अपनी पड़ोसी प्लेटों के साथ अंतर्क्रिया के कारण या तलछटी लदान या उतराई के कारण होते हैं। (जैसे deglaciation).ये तनाव उपस्थित दोष सतहों के किनारे विफलता का पर्याप्त कारण हो सकते हैं, ये अन्तःप्लेट भूकंप को जन्म देते हैं। .

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भूकम्पीय तरंग

भूकम्पीय तरंगें (seismic waves) पृथ्वी की आतंरिक परतों व सतह पर चलने वाली ऊर्जा की तरंगें होती हैं, जो भूकम्प, ज्वालामुखी विस्फोट, बड़े भूस्खलन, पृथ्वी के अंदर मैग्मा की हिलावट और कम-आवृत्ति (फ़्रीक्वेन्सी) की ध्वनि-ऊर्जा वाले मानवकृत विस्फोटों से उत्पन्न होती हैं। .

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मन्दारा पहाड़ियाँ

मन्दारा पहाड़ियाँ (Mandara Mountains) पश्चिम अफ़्रीका में एक ज्वालामुखी पहाड़ों की पर्वतमाला है जो २०० किमी तक नाइजीरिया व कैमरून की अंतरराष्ट्रीय सीमा के उत्तरी भाग में फैली हुई है। इनका विस्तार दक्षिण में बेनुए नदी से लेकर उत्तर में कैमरून के मारुआ शहर तक है। .

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मायोन ज्वालामुखी

मायोन ज्वालामुखी (Mayon Volcano) फ़िलिपीन्ज़ देश के लूज़ोन द्वीप पर स्थित बिकोल प्रशासनिक क्षेत्र के अल्बाय प्रान्त में एक सक्रीय मिश्रित ज्वालामुखी है। यह अपने लगभग पूरे शंकु आकार के लिए जाना जाता है। इसका समय-समय पर विस्फोट होता रहता है, जिसमें सन् 1814, 1881–1882, 1897, 1984, 1993, 2006, 2008 और 2009–2010 के विस्फोट शामिल हैं। 1938 में इसे एक राष्ट्रीय उद्यान घोषित कर दिया गया, जिसका नाम 2000 में बदलकर मायोन ज्वालामुखी प्राकृतिक उद्यान (Mayon Volcano Natural Park) रख दिया गया।.

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मारियाना द्वीपसमूह

मारियाना द्वीपसमूह प्रशान्त महासागर के पश्चिमी भाग में स्थित एक अर्धचन्द्र आकार का द्वीपसमूह है जिसके द्वीप १५ समुद्री ज्वालामुखियों के वे शिखर हैं जो समुद्रतल से ऊपर उभर आए हैं। इनमें से अधिकतर ज्वालामुखी सुप्त हैं। यह द्वीपसमूह जापान से पूर्व-दक्षिणपूर्व, हवाई से पश्चिम-दक्षिणपश्चिम, नया गिनी से उत्तर और फ़िलिपीन्ज़ से पूर्व में हैं और फ़िलिपीन सागर की पूर्वी सीमा परिभाषित करते हैं। यह माइक्रोनीशिया क्षेत्र का भाग माने जाते हैं। इस पूरे द्वीपसमूह पर संयुक्त राज्य अमेरिका का अधिकार है और प्रशासनिक रूप से इसे दो भागों में बाँटा गया है: उत्तरी मारियाना द्वीप और द्वीपसमूह के दक्षिणी अंत पर गुआम क्षेत्र। तीनियन और साइपैन उत्तरी मारियाना द्वीपों के मुख्य द्वीप हैं और ऐतिहासिक अवशेषों से पता चलता है कि तीनियन पूरे द्वीपसमूह का पहला द्वीप था जहाँ मानवों का डेरा डला। .

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मार्शेना (गैलापागोस)

स्पैनिश संत फ्रेय एंटोनियो डी मार्शेना के नाम से नामित गैलापागोस द्वीपसमूह के द्वीप मार्शेना (पुराना अंग्रेजी नाम बिंडलॉ) का क्षेत्रफल 130 किमी2 और अधिकतम ऊंचाई 343 मीटर है। हालांकि इस द्वीप पर कोई आगंतुक स्थल नहीं हैं, पर इसके आसपास किसी आयोजित यात्रा के दौरान सागर में गोता लगाना संभव है। अधिकतर आगंतुक (पर्यटक) इसे केवल तभी देख पाते हैं जब वो जेनोवेसा या टॉवर द्वीप पर जाते समय ईसाबेला द्वीप के उत्तर से होकर गुजरते हैं। जेनोवेसा द्वीप जो इसका निकटतम पड़ोसी है इसके पश्चिम में 45 मील की दूरी पर स्थित है। गैलापागोस के कई ज्वालामुखियों की तरह मार्शेना पर भी एक ज्वालामुख-कुण्ड है। मार्शेना का ज्वालामुख-कुण्ड प्राय: अण्डाकार है। मार्शेना का ज्वालामुख-कुण्ड असामान्य है और यह लगभग पूरा ही नये लावे से भरा है, जिसमें से कुछ इसकी दीवारों से छलक कर इसकी ढलानों पर भी फिसल गया है। द्वीप पर मौजूद सबसे पुराना लावा लगभग 500000 साल पुराना है। मार्शेना के प्रसिद्ध होने का एक अन्य कारण भी है, हालांकि यह निर्जन है पर यह 'फ्लोरियाना रहस्य' में शामिल है। रुडोल्फ लोरेंज़ और उस जहाज के कप्तान का जिसमें वो सवार था, का मृत शरीर आश्चर्यजनक रूप से बह कर मार्शेना के तट पर आ पहुँचा और प्राकृतिक रूप से ममीकृत हो गया जिसका कारण द्वीप पर किसी प्राकृतिक परभक्षी का ना होना था। .

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मालवा

1823 में बने एक एक ऐतिहासिक मानचित्र में मालवा को दिखाया गया है। विंध्याचल का दृश्य, यह मालवा की दक्षिणी सीमा को निर्धारित करता है। इससे इस क्षेत्र की कई नदियां निकली हैं। मालवा, ज्वालामुखी के उद्गार से बना पश्चिमी भारत का एक अंचल है। मध्य प्रदेश के पश्चिमी भाग तथा राजस्थान के दक्षिणी-पूर्वी भाग से गठित यह क्षेत्र प्राचीन काल से ही एक स्वतंत्र राजनीतिक इकाई रहा है। मालवा का अधिकांश भाग चंबल नदी तथा इसकी शाखाओं द्वारा संचित है, पश्चिमी भाग माही नदी द्वारा संचित है। यद्यपि इसकी राजनीतिक सीमायें समय समय पर थोड़ी परिवर्तित होती रही तथापि इस छेत्र में अपनी विशिष्ट सभ्यता, संस्कृति एंव भाषा का विकास हुआ है। मालवा के अधिकांश भाग का गठन जिस पठार द्वारा हुआ है उसका नाम भी इसी अंचल के नाम से मालवा का पठार है। इसे प्राचीनकाल में 'मालवा' या 'मालव' के नाम से जाना जाता था। वर्तमान में मध्यप्रदेश प्रांत के पश्चिमी भाग में स्थित है। समुद्र तल से इसकी औसत ऊँचाई ४९६ मी.

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मावी

मावी हवाई प्रान्त का एक द्वीप है। इसपर सुप्त हलियाकला ज्वालामुखी स्थापित है।.

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माउण्ट कैमरून

कैमरून (Mount Cameroon) एक प्रमुख ज्वालामुखी पर्वत हैं। कैमरून (पर्वत) पश्चिमी अफ्रीका के कैमरून प्रदेश के उत्तर और उत्तरपश्चिमी छोर पर कटावपूर्ण (Broken structure) विषम धरातलीय चाप की तरह फैली पर्वतश्रेणी के पश्चिमी छोर पर स्थित है। इसका पदतलीय आधार लगभग १८०० वर्ग किलोमीटर है। इसके दो प्रमुख शिखर हैं - बड़ा कैमरून (१३,३७० फुट), जिसमें अनेक ज्वालामुखी विवर (Craters) हैं और छोटा कैमरून (५,८२० फुट), जिसकी ढाल सर्वथा वनाच्छादित है। यह पर्वतक्षेत्र संसार के सर्वाधिक वर्षावाले (औसत ४०० - ५४० इंच वार्षिक) क्षेत्रों में है। पर्वत के ठीक दक्षिण ३० किमी चौड़ी कैमरून इस्चुअरी या खाड़ी है जिसमें मुंगों तथा बुरी (Wuri) नदियाँ बहती हैं। श्रेणी:विश्व के प्रमुख ज्वालामुखी श्रेणी:कैमरून के पर्वत.

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माउन्ट पोपा

माउन्ट पोपा माउन्ट पोपा मध्य बर्मा में स्थित एक मृत ज्वालामुखी है। यह पर्वत समुन्द्र तल से १,५२८ मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। श्रेणी:म्यान्मार.

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मिश्रित ज्वालामुखी

मिश्रित ज्वालामुखी मिश्रित ज्वालामुखी की खड़ी काट फुजी पर्वत, एक सक्रिय मिश्रित ज्वालामुखी है इसका अंतिम उद्गार 1707–08 में हुआ था मिश्रित ज्वालामुखी, एक लंबा, शंक्वाकार ज्वालामुखी होता है, जिसका निर्माण जम कर ठोस हुए लावा, टेफ्रा, कुस्रन और ज्वालामुखीय राख की कई परतों (स्तर) द्वारा होता है। मिश्रित ज्वालामुखी को ऐसा इसलिए कहा जाता है क्योंकि, इनकी रचना ज्वालामुखीय उद्गार के समय निकले मिश्रित पदार्थों के विभिन्न स्तरों पर घनीभूत होने के फलस्वरूप होती है। ढाल ज्वालामुखी के विपरीत, तीखी ढलान और समय समय पर होने वाले विस्फोटक उद्गार इनकी विशेषतायें है। इन ज्वालामुखियों से निकला लावा, ढाल ज्वालामुखी से निकले लावे की तुलना में अधिक श्यान (गाढ़ा और चिपचिपा) होता है और आमतौर पर उद्गार के पश्चात दूर तक बहने से पहले ही ठंडा हो जाता है। इनके लावे की रचना करने वाला मैग्मा अक्सर फेल्सिक होता है जिसमें, सिलिका की मात्रा उच्च से लेकर मध्य स्तर तक की होती है और कम श्यानता वाले मैफिक मैग्मा की मात्रा कम होती है। फेल्सिक लावा का व्यापक (दूर तक) प्रवाह असामान्य है, लेकिन फिर भी इसे 15 किमी (9.3 मील) तक बहते देखा गया है। ढाल ज्वालामुखी (जो कम मिलते हैं) के विपरीत यह ज्वालामुखियों का सबसे सामान्य प्रकार हैं। दो प्रसिद्ध मिश्रित ज्वालामुखियों में से पहला क्राकाटोआ है, जिसको उसके 1883 के उद्गार के लिए जाना जाता है जबकि, दूसरा विसुवियस है जिसके उद्गार के कारण 79 ईस्वी में पॉम्पेई और हरकुलेनियम नामक दो इतालवी शहर पूरी तरह से नष्ट हो गये थे। .

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मंगल ग्रह

मंगल सौरमंडल में सूर्य से चौथा ग्रह है। पृथ्वी से इसकी आभा रक्तिम दिखती है, जिस वजह से इसे "लाल ग्रह" के नाम से भी जाना जाता है। सौरमंडल के ग्रह दो तरह के होते हैं - "स्थलीय ग्रह" जिनमें ज़मीन होती है और "गैसीय ग्रह" जिनमें अधिकतर गैस ही गैस है। पृथ्वी की तरह, मंगल भी एक स्थलीय धरातल वाला ग्रह है। इसका वातावरण विरल है। इसकी सतह देखने पर चंद्रमा के गर्त और पृथ्वी के ज्वालामुखियों, घाटियों, रेगिस्तान और ध्रुवीय बर्फीली चोटियों की याद दिलाती है। हमारे सौरमंडल का सबसे अधिक ऊँचा पर्वत, ओलम्पस मोन्स मंगल पर ही स्थित है। साथ ही विशालतम कैन्यन वैलेस मैरीनेरिस भी यहीं पर स्थित है। अपनी भौगोलिक विशेषताओं के अलावा, मंगल का घूर्णन काल और मौसमी चक्र पृथ्वी के समान हैं। इस गृह पर जीवन होने की संभावना है। 1965 में मेरिनर ४ के द्वारा की पहली मंगल उडान से पहले तक यह माना जाता था कि ग्रह की सतह पर तरल अवस्था में जल हो सकता है। यह हल्के और गहरे रंग के धब्बों की आवर्तिक सूचनाओं पर आधारित था विशेष तौर पर, ध्रुवीय अक्षांशों, जो लंबे होने पर समुद्र और महाद्वीपों की तरह दिखते हैं, काले striations की व्याख्या कुछ प्रेक्षकों द्वारा पानी की सिंचाई नहरों के रूप में की गयी है। इन् सीधी रेखाओं की मौजूदगी बाद में सिद्ध नहीं हो पायी और ये माना गया कि ये रेखायें मात्र प्रकाशीय भ्रम के अलावा कुछ और नहीं हैं। फिर भी, सौर मंडल के सभी ग्रहों में हमारी पृथ्वी के अलावा, मंगल ग्रह पर जीवन और पानी होने की संभावना सबसे अधिक है। वर्तमान में मंगल ग्रह की परिक्रमा तीन कार्यशील अंतरिक्ष यान मार्स ओडिसी, मार्स एक्सप्रेस और टोही मार्स ओर्बिटर है, यह सौर मंडल में पृथ्वी को छोड़कर किसी भी अन्य ग्रह से अधिक है। मंगल पर दो अन्वेषण रोवर्स (स्पिरिट और् ओप्रुच्युनिटी), लैंडर फ़ीनिक्स, के साथ ही कई निष्क्रिय रोवर्स और लैंडर हैं जो या तो असफल हो गये हैं या उनका अभियान पूरा हो गया है। इनके या इनके पूर्ववर्ती अभियानो द्वारा जुटाये गये भूवैज्ञानिक सबूत इस ओर इंगित करते हैं कि कभी मंगल ग्रह पर बडे़ पैमाने पर पानी की उपस्थिति थी साथ ही इन्होने ये संकेत भी दिये हैं कि हाल के वर्षों में छोटे गर्म पानी के फव्वारे यहाँ फूटे हैं। नासा के मार्स ग्लोबल सर्वेयर की खोजों द्वारा इस बात के प्रमाण मिले हैं कि दक्षिणी ध्रुवीय बर्फीली चोटियाँ घट रही हैं। मंगल के दो चन्द्रमा, फो़बोस और डिमोज़ हैं, जो छोटे और अनियमित आकार के हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि यह 5261 यूरेका के समान, क्षुद्रग्रह है जो मंगल के गुरुत्व के कारण यहाँ फंस गये हैं। मंगल को पृथ्वी से नंगी आँखों से देखा जा सकता है। इसका आभासी परिमाण -2.9, तक पहुँच सकता है और यह् चमक सिर्फ शुक्र, चन्द्रमा और सूर्य के द्वारा ही पार की जा सकती है, यद्यपि अधिकांश समय बृहस्पति, मंगल की तुलना में नंगी आँखों को अधिक उज्जवल दिखाई देता है। .

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मृदा

पृथ्वी ऊपरी सतह पर मोटे, मध्यम और बारीक कार्बनिक तथा अकार्बनिक मिश्रित कणों को मृदा (मिट्टी / soil) कहते हैं। ऊपरी सतह पर से मिट्टी हटाने पर प्राय: चट्टान (शैल) पाई जाती है। कभी कभी थोड़ी गहराई पर ही चट्टान मिल जाती है। 'मृदा विज्ञान' (Pedology) भौतिक भूगोल की एक प्रमुख शाखा है जिसमें मृदा के निर्माण, उसकी विशेषताओं एवं धरातल पर उसके वितरण का वैज्ञानिक अध्ययन किया जाता हैं। पृथऽवी की ऊपरी सतह के कणों को ही (छोटे या बडे) soil कहा जाता है .

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मैग्मा

मैग्मा चट्टानों का पिघला हुआ रूप है जिसकी रचना ठोस, आधी पिघली अथवा पूरी तरह पिघली चट्टानों के द्वारा होती है और जो पृथ्वी के सतह के नीचे निर्मित होता है। मैग्मा के बाहर निकलने वाले रूप को लावा कहते हैं। मैग्मा के शीतलन द्वारा आग्नेय चट्टानों का निर्माण होता है। जब मैग्मा ज़मीनी सतह के ऊपर आकर लावा के रूप में ठंडा होकर जमता है तो बहिर्भेदी और जब सतह के नीचे ही जम जाता है तो अंतर्भेदी आग्नेय चट्टानों का निर्माण होता है। सामान्यतः ज्वालामुखी विस्फोट में मैग्मा का लावा के रूप में निकलना एक प्रमुख भूवैज्ञानिक क्रिया के रूप में चिह्नित किया जाता है। .

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मेटरनिख

मेटरनिख मेटरनिख (Prince Klemens Wenzel von Metternich (जर्मन में पूरा नाम: Klemens Wenzel Nepomuk Lothar, Fürst von Metternich-Winneburg zu Beilstein, अंग्रेजी रूपान्तरण: Clement Wenceslas Lothar von Metternich-Winneburg-Beilstein; 15 मई 1773 – 11 जून 1859) राजनेता व राजनयज्ञ था। वह १८०९ से १८४८ तक आस्ट्रियाई साम्राज्य का विदेश मंत्री रहा। वह अपने समय का सबसे महत्वपूर्ण और सबसे प्रतिभाशाली राजनयिक था। नेपोलियन की वाटरलू पराजय के बाद मेटरनिख यूरोप की राजनीति का सर्वेसर्वा बन गया। उसने यूरोपीय राजनीति में इतनी प्रमुख भूमिका निभाई कि 1815 से 1848 तक के यूरोपीय इतिहास का काल 'मेटरनिख युग’ के नाम से प्रसिद्ध है। मेटरनिख ने अपने प्रधानमन्त्रितत्व-काल में प्रतिक्रया और अनुदारीता का अनुकरण करने की नीति अपनाई और उसके प्रभाव के कारण आस्ट्रिया का साम्राज्य यूरोप में अत्यन्त महत्वपूर्ण बन गया। .

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मेसोअमेरिकी

350 पीएक्स (px) 350 पीएक्स (px) 350 पीएक्स (px) 350 पीएक्स (px) पैलेंकी के क्लासिक माया शहर का दृश्य, जो 6 और 7 सदियों में सुशोभित हुआ, मेसोअमेरिकी सभ्यता की उपलब्धियों के कई उदाहरणों में से एक है ट्युटिहुकन के मेसोअमेरिकी शहर का एक दृश्य, जो 200 ई. से 600 ई. तक सुशोभित हुआ और जो अमेरिका में दूसरी सबसे बड़ी पिरामिड की साइट है माया चित्रलिपि पत्रिका में अभिलेख, कई मेसोअमरिकी लेखन प्रणालियों में से एक शिलालेख.दुनिया में मेसोअमेरिका पांच स्थानों में से एक है जहां स्वतंत्र रूप से लेखन विकसित हुआ है मेसोअमेरिका या मेसो-अमेरिका (Mesoamérica) अमेरिका का एक क्षेत्र एवं सांस्कृतिक प्रान्त है, जो केन्द्रीय मैक्सिको से लगभग बेलाइज, ग्वाटेमाला, एल सल्वाडोर, हौंड्यूरॉस, निकारागुआ और कॉस्टा रिका तक फैला हुआ है, जिसके अन्दर 16वीं और 17वीं शताब्दी में, अमेरिका के स्पैनिश उपनिवेशवाद से पूर्व कई पूर्व कोलंबियाई समाज फलफूल रहे थे। इस क्षेत्र के प्रागैतिहासिक समूह, कृषि ग्रामों तथा बड़ी औपचारिक व राजनैतिक-धार्मिक राजधानियों द्वारा वर्णित हैं। यह सांस्कृतिक क्षेत्र अमेरिका की कुछ सर्वाधिक जटिल और उन्नत संस्कृतियों जैसे, ऑल्मेक, ज़ैपोटेक, टियोतिहुआकैन, माया, मिक्सटेक, टोटोनाक और एज़्टेक को शामिल करता है। .

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यान मायेन

यान मायेन द्वीप (Jan Mayen) आर्कटिक महासागर में स्थित एक ज्वालामुखीय द्वीप है जो नोर्वे का अंग है। यान मायेन द्वीप आइसलैंड से 600 किमी पूर्वोत्तर, ग्रीनलैंड से 500 किमी पूर्व और नोर्वे के पश्चिमोत्तरी छोर से 1,000 किमी पश्चिम में स्थित है। इस पूर्वोत्तर-से-दक्षिणपश्चिम 55 किमी लम्बे और 373 वर्ग किमी क्षेत्रफल वाले द्वीप के कुछ भाग पर हिमानियाँ (ग्लेशियर) विस्तृत हैं। द्वीप के दो मुख्य भाग हैं: पूर्वोत्तर का बड़ा 'नॉर्द यान' (Nord-Jan) हिस्सा और दक्षिणपश्चिम का छोटा 'सोर-यान' (Sør-Jan) हिस्सा जो एक 2.5 किमी चौड़े भूडमरू (इस्थ्मस) से जुड़े हुए हैं। द्वीप के उत्तर में 2,277 मीटर (7,470 फ़ुट) ऊँचा बीरेनबर्ग​ (Beerenberg) ज्वालामुखी स्थित है। द्वीप के उत्तर और दक्षिणी हिस्से को जोड़ने वाले जलडमरू पर दो झीलें हैं जिन्हें नॉर्दलागूना (Nordlaguna, उत्तर झील) और सोरलागूना (Sørlaguna, दक्षिण झील) कहते हैं। इस टापू का निर्माण समुद्रतल में एक 'यान मायेन हॉटस्पॉट (गर्मछिद्र)' नामक ज्वालामुखीय दरार से लावा उगलने से हुआ था। .

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यूकॉन

यूकॉन, Yukon (अन्य नाम द युकों) कनाडा के पश्चिमी छोर पर स्थित व तीन प्रांतों में से सबसे छोटा प्रान्त है। व्हाइटहॉर्स, यूकॉन की राजधानी और यहाँ का एकमात्र शहर है। यह प्रदेश नॉर्थवेस्ट टेरीटरीज़ से 1898 में अलग कर दिया गया था और इसे यूकॉन प्रान्त ("Yukon Territory") नाम दिया गया। २७ मार्च २००२ को संघीय सरकार के यूकॉन कानून के तहत इस पश्चिमी क्षेत्र को आधिकारिक रूप से यूकॉन नाम दिया गया। हालांकि यूकॉन टेरीटरी अभी भी इसका एक प्रचलित नाम है। जिसे लघु रूप में वाईटी (YT) कहते हैं। हालांकि यहाँ कि सरकार आधिकारिक रूप से अंग्रेज़ी और फ्रांसीसी भाषा का उपयोग करती है, प्राथमिक लोग भाषाओं की भी मान्यता है। की ऊँचाई के साथ यूकॉन के क्लुआन राष्ट्रीय अभयारण्य में स्थित लोगन पर्वत कनाडा का सबसे ऊँचा और अलास्का में स्थित देनाली के बाद उत्तर अमेरिका का दूसरा सबसे ऊँचा पर्वत है। अधिकांश यूकॉन में उपआर्कटिक जलवायु होती है। जिसमें लंबी सर्दियाँ और छोटी गर्मियाँ होती हैं। यहाँ की प्रमुख नदियाँ हैं: यूकॉन नदी जिसके नाम पर ही इस प्रान्त का नाम भी रखा गया है। पेली, स्टीवर्ट, पील, व्हाइट और टैटशेनशिनी नदी भी यहीं बहती हैं। .

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रिची द्वीपसमूह

रिची द्वीपसमूह भारत के अण्डमान और निकोबार द्वीपसमूह की एक अंश है जिसके द्वीप बृहत अण्डमान (ग्रेट अण्डमान) से पूर्व में अंडमान सागर में स्थित हैं। रिची द्वीपसमूह में ४ बड़े द्वीप, ७ छोटे द्वीप और कई नन्हें टापू व समुद्र से बाहर उभरी हुई चट्टानें हैं, जो बृहत अण्डमान से सामांतर उत्तर-दक्षिण दिशा में विस्तृत हैं। बैरन द्वीप, जो एक सक्रीय ज्वालामुखी है, ७५ किमी और भी पूर्व में स्थित है। .

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रुआपेहू पर्वत

रुआपेहू पर्वत (Mount Ruapehu), जिसे केवल रुआपेहू भी कहा जाता है, न्यूज़ीलैण्ड के उत्तर द्वीप के ताऊपो ज्वालामुखीय क्षेत्र के दक्षिणी छोर पर स्थित एक सक्रीय मिश्रित ज्वालामुखी (स्ट्रैटोवोल्केनो) है। यह ताऊपो झील के दक्षिणी तट से ४० किमी की दूरी पर टोंगारीरो राष्ट्रीय उद्यान (Tongariro National Park) में विराजमान है। उत्तर द्वीप कि सभी हिमानियाँ (ग्लेशियर) इसी पर्वत की ढलानो पर स्थित हैं। रुआपेहू दुनिया के सबसे सक्रीय ज्वालामुखियों में से एक है और न्यूज़ीलैण्ड का सबसे बड़ा ज्वालामुखी है। यह उत्तर द्वीप का सबसे ऊँचा बिन्दु है और इसके तीन प्रमुख शिखर हैं: २७९७ मीटर ऊँचा ताहूरांगी (Tahurangi), २७५५ मीटर ऊँचा ते हेउहेउ (Te Heuheu) और २७५१ मीटर ऊँचा पारेतेतातोंगा (Paretetaitonga)। इन शिखरों के दरमियान एक गहरा ज्वालामुखीय क्रेटर है जहाँ से समय-समय पर विस्फोट होता है। विस्फोटों के बीच के शान्त काल में इसमें पानी भरने से एक ज्वालामुखीय झील बन जाती है। .

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रॉस द्वीप, अंटार्कटिका

रॉस द्वीप (Ross Island) अंटार्कटिका महाद्वीप की मुख्यभूमि के समीप चार ज्वालामुखियों द्वारा बनाया गया एक द्वीप है। यह अंटार्कटिका के विक्टोरिया धरती नामक क्षेत्र में रॉस सागर की मैक्मरडो खाड़ी में स्थित है। .

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रोबोट

एक कारखाने में चीजों को उठाने और सही स्थान पर रखने वाला रोबोट रोबोट एक आभासी (virtual) या यांत्रिक (mechanical)कृत्रिम (artificial) एजेंट है व्यवहारिक रूप से, यह प्रायः एक विद्युत यांत्रिकी निकाय (electro-mechanical system) होता है, जिसकी दिखावट और गति ऐसी होती है की लगता है जैसे उसका अपना एक इरादा (intent) और अपना एक अभिकरण (agency) है।रोबोट शब्द भौतिक रोबोट और आभासी (virtual) सॉफ्टवेयर एजेंट (software agent), दोनों को ही प्रतिबिंबित करता है लेकिन प्रायः आभासी सॉफ्टवेयर एजेंट को बोट्स (bots) कहा जाता है। ऐसी कोई भी सर्वसम्मति नहीं बन पाई है की मशीन रोबोटों के रूप में योग्य हैं, लेकिन एक विशेषज्ञों और जनता के बीच आम सहमति है कि कुछ या सभी निम्न कार्य कर सकता है जैसे: घूमना, यंत्र या कल सम्बन्धी अवयव को संचालित करना, वातावरण की समझ और उसमें फेर बदल करना और बुद्धिमानी भरे व्यवहार को प्रधार्षित करना जो की मानव और पशुओं के व्यवहारों की नक़ल करना। कृत्रिम सहायकों और साथी की कहानिया और और उन्हें बनाने के प्रयास का एक लम्बा इतिहास है लेकिन पूरी तरह से स्वायत्त (autonomous) मशीने केवल 20 वीं सदी में आए डिजिटल (digital) प्रणाली से चलने वाला प्रोग्राम किया हुआ पहला रोबोट युनिमेट (Unimate), १९६१ में ठप्पा बनाने वाली मशीन से धातु के गर्म टुकड़ों को उठाकर उनके ढेर बनाने के लिए लगाया गया था। आज, वाणिज्यिक और औद्योगिक रोबोट (industrial robot) व्यापक रूप से सस्ते में और अधिकसे अधिक सटीकता और मनुष्यों की तुलना में ज्यादा विश्वसनीयता के साथ प्रयोग में आ रहे हैं उन्हें ऐसे कार्यों के लिए भी नियुक्त किया जाता है जो की मानव लिहाज़ से काफी खतरनाक, गन्दा और उबाऊ कार्य होता है रोबोट्स का प्रयोग व्यापक रूप से विनिर्माण (manufacturing), सभा और गठरी लादने, परिवहन, पृथ्वी और अन्तरिक्षीय खोज, सर्जरी, हथियारों के निर्माण, प्रयोगशाला अनुसंधान और उपभोक्ता और औद्योगिक उत्पादन के लिए किया जा रहा है आमतौर पर लोगों का जिन रोबोटों से सामना हुआ है उनके बारे में लोगों के विचार सकारात्मक हैं घरेलू रोबोट (Domestic robot) सफाई और रखरखाव के काम के लिए घरों के आस पास आम होते जा रहे हैंबहरहाल रोबोटिक हथियारों और स्वचालन के आर्थिक प्रभाव को लेकर चिंता बनी हुई है, ऐसी चिंता जिसका समाधान लोकप्रिय मनोरंजन में वर्णित खलनायकी, बुद्धिमान, कलाबाज़ रोबोट के सहारे नहीं होता अपने काल्पनिक समकक्षों की तुलना में असली रोबोट्स अभी भी सौम्य, मंद बुद्धि और स्थूल हैं .

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लाम्पुंग

लाम्पुंग दक्षिणपूर्व एशिया के इण्डोनेशिया देश के सुमात्रा द्वीप के दक्षिणतम में स्थित एक प्रान्त है। यहाँ प्रसिद्ध क्राकाटोआ ज्वालामुखी स्थित है जिसके १८८३ के भयंकर विस्फोट से स्थानीय प्रकोप और विश्वव्यापी असर हुये थे। लाम्पुंग प्रान्त में भूकम्प आते रहते हैं और कई सक्रीय ज्वालामुखी हैं। .

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लावा

लावा पिघली हुई चट्टान आर्थात मैग्मा का धरातल पर प्रकट होकर बहने वाला भाग है। यह ज्वालामुखी उद्गार द्वारा बाहर निकलता है और आग्नेय चट्टानों की रचना करता है। श्रेणी:भूविज्ञान श्रेणी:ज्वालामुखी श्रेणी:भू-आकृति विज्ञान श्रेणी:ज्वालामुखीयता.

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लावा ट्यूब

लावा ट्यूब (lava tube) एक प्राकृतिक रूप से बनी हुई पाइप, ट्यूब या सुरंग की आकृति का ढांचा होता है जो लावा बहाव से बन जाता है। यह किसी लावा नहर कि सतह पर ठंडे हुए लावा के जमकर ठोस हो जाने के बाद उसके नीचे लगातार लावा बहते रहने से निर्मित होता है। लावा ट्यूबें सक्रीय हो सकती हैं, यानि किसी ज्वालामुखी के विस्फोटों के समय उस से निकल रहे लावा को बहने का स्थान देती हैं या मृत हो सकती हैं, यानि लावा बहाव बहुत काल से समाप्त हो चुका है और वे ठंडी होकर एक लम्बी गुफ़ा-जैसी सुरंगें बन गई हैं। विश्व के कई स्थानों पर मृत लावा ट्यूबों में लोग सैर करने जाते हैं और वे पर्यटक स्थलों के रूप में जानी जाती हैं। .

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लिपारी द्वीप

लिपारी इटली के दक्षिण में सिसली द्वीप के पास एक छोटा सा ज्वालामुखी निर्मित द्वीप है। श्रेणी:इटली श्रेणी:ज्वालामुखी निर्मित द्वीप.

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लक्षद्वीप

कोई विवरण नहीं।

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लौह अयस्क

हैमेताईट: ब्राजील की खानों में मुख्य लौह अयस्क लौह अयस्क के छर्रों के इस ढेर का उपयोग इस्पात के उत्पादन में किया जाएगा। लौह अयस्क (Iron ores) वे चट्टानें और खनिज हैं जिनसे धात्विक लौह (iron) का आर्थिक निष्कर्षण किया जा सकता है। इन अयस्कों में आमतौर पर आयरन (लौह या iron) ऑक्साइडों की बहुत अधिक मात्रा होती है और इनका रंग गहरे धूसर से लेकर, चमकीला पीला, गहरा बैंगनी और जंग जैसा लाल तक हो सकता है। लौह आमतौर पर मेग्नेटाईट (magnetite), हैमेटाईट (hematite), जोईथाईट (goethite), लिमोनाईट (limonite), या सिडेराईट (siderite), के रूप में पाया जाता है। हैमेटाईट को "प्राकृतिक अयस्क" भी कहा जाता है। यह नाम खनन के प्रारम्भिक वर्षों से सम्बंधित है, जब हैमेटाईट के विशिष्ट अयस्कों में 66% लौह होता था और इन्हें सीधे लौह बनाने वाली ब्लास्ट फरनेंस (एक विशेष प्रकार की भट्टी जिसका उपयोग धातुओं के निष्कर्षण में किया जाता है) में डाल दिया जाता था। लौह अयस्क कच्चा माल है, जिसका उपयोग पिग आयरन (ढलवां लोहा) बनाने के लिए किया जाता है, जो इस्पात (स्टील) बनाने के लिए बनाने में काम आता है। वास्तव में, यह तर्क दिया गया है कि लौह अयस्क "संभवतया तेल को छोड़कर, किसी भी अन्य वस्तु की तुलना में वैश्विक अर्थव्यवस्था का अधिक अभिन्न अंग है।" .

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शिकोकू

जापान का शिकोकू द्वीप (लाल रंग में) "८८ मंदिरों की तीर्थयात्रा" के लिए शिकोकू आई एक श्रद्धालु लड़की शिकोकू का नक़्शा (जिसमें ८८ मंदिरों के स्थल दिखाए गए हैं) शिकोकू (जापानी: 四国, "चार प्रान्त") जापान के चारों मुख्य द्वीपों में से सब से छोटा और सब से कम आबादी वाला द्वीप है। यह २२५ किमी लम्बा है और इसकी चौड़ाई ५० और १५० किमी के बीच (जगह-जगह पर अलग) है। कुल मिलकर शिकोकू का क्षेत्रफल १८,८०० वर्ग किमी है और इसकी जनसँख्या सन् २००५ में ४१,४१,९५५ थी। यह होन्शू द्वीप के दक्षिण में और क्यूशू के पूर्व में स्थित है। .

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सल्फर डाइऑक्साइड

सल्फर डाइऑक्साइड (Sulfur dioxide), एक रासायनिक यौगिक है। इसका रासायनिक सूत्र SO2 है। यह तीव्र गंध युक्त, एक तीक्ष्ण विषैली गैस है, जो कई तरह की औद्योगिक प्रक्रियाओं में तथा ज्वालामुखियों द्वारा छोड़ी जाती है। .

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सहारा मरुस्थल

पाठ.

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साइबेरिया

साइबेरिया का नक़्शा (गाढ़े लाल रंग में साइबेरिया नाम का संघी राज्य है, लेकिन लाल और नारंगी रंग वाले सारे इलाक़े साइबेरिया का हिस्सा माने जाते हैं गर्मी के मौसम में दक्षिणी साइबेरिया में जगह-जगह पर झीलें और हरियाली नज़र आती है याकुत्स्क शहर में 17वी शताब्दी में बना एक रूसी सैनिक-गृह साइबेरिया (रूसी: Сибирь, सिबिर) एक विशाल और विस्तृत भूक्षेत्र है जिसमें लगभग समूचा उत्तर एशिया समाया हुआ है। यह रूस का मध्य और पूर्वी भाग है। सन् 1991 तक यह सोवियत संघ का भाग हुआ करता था। साइबेरिया का क्षेत्रफल 131 लाख वर्ग किमी है। तुलना के लिए पूरे भारत का क्षेत्रफल 32.8 लाख वर्ग किमी है, यानि साइबेरिया भारत से क़रीब चार गुना है। फिर भी साइबेरिया का मौसम और भूस्थिति इतनी सख़्त है के यहाँ केवल 4 करोड़ लोग रहते हैं, जो 2011 में केवल उड़ीसा राज्य की आबादी थी। यूरेशिया का अधिकतर स्टॅप (मैदानी घासवाला) इलाक़ा साइबेरिया में आता है। साइबेरिया पश्चिम में यूराल पहाड़ों से शुरू होकर पूर्व में प्रशांत महासागर तक और उत्तर में उत्तरध्रुवीय महासागर (आर्कटिक महासागर) तक फैला हुआ है। दक्षिण में इसकी सीमाएँ क़ाज़ाक़स्तान, मंगोलिया और चीन से लगती हैं। .

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सिडली पर्वत

सिडली पर्वत अंटार्कटिका महाद्वीप का सबसे ऊँचा ज्वालामुखी है। यह ४,२८५ मीटर लम्बा पहाड़ है और लगभग पूरी तरह हिम से ढका हुआ है। भौगोलिक रूप से यह पश्चिमी अंटार्कटिका की मारी बर्ड धरती में स्थित एग्ज़ीक्यूटिव कमेटी पर्वतमाला (Executive Committee Range) में आता है। इस पर्वतमाला में पाँच ज्वालामुखीय शिखर हैं जिनमें यह सबसे ऊँचा है। .

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सिनाबंग पर्वत

सिनाबंग इण्डोनेशिया के सुमात्रा द्वीप के उत्तरी हिस्से में कारू पठार पर स्थित एक ज्वालामुखी पर्वत है। यह प्लीस्टोसीन-होलोसीन युग में निर्मित एक स्तरित ज्वालामुखी है। इसका पिछला उद्भेदन 1600 ई के आसपास हुआ माना जाता है जिसके बाद लगभग 400 वर्षों तक शांत रहने के बाद सन् 2010 में अचानक सक्रिय हो उठा और अब सक्रिय ज्वालामुखियों में गिना जाने लगा है। इसमें हालिया विस्फोट 26 जून 2015 को हुआ था जिसकी वजह से कम से कम 10,000 लोगों को अपना घर ख़ाली कर के सुरक्षित स्थानों की ओर जाना पड़ा। .

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संमिलन सीमा

भूवैज्ञानिक प्लेट विवर्तनिकी में संमिलन सीमा (convergent boundary) वह सीमा होती है जहाँ पृथ्वी के स्थलमण्डल (लिथोस्फ़ीयर) के दो भौगोलिक तख़्ते (प्लेटें) एक दूसरे की ओर आकर टकराते हैं या आपस में घिसते हैं। ऐसे क्षेत्रों में दबाव और रगड़ से भूप्रावार (मैन्टल) का पत्थर पिघलने लगता है और ज्वालामुखी तथा भूकम्पन घटनाओं में से एक या दोनों मौजूद रहते हैं। संमिलन सीमाओं पर या तो एक तख़्ते का छोर दूसरे तख़्ते के नीचे दबने लगता है (इसे निम्नस्खलन या सबडक्शन कहते हैं) या फिर महाद्वीपीय टकराव होता है।Butler, Rob (October 2001).

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सुन्दा चाप

सुन्दा चाप (Sunda Arc) दक्षिणपूर्व एशिया में स्थित एक ज्वालामुखीय चाप (volcanic arc) है जिसने सुमात्रा, जावा, सुन्दा जलसन्धि और लघुतर सुन्दा द्वीपसमूह के द्वीपों का निर्माण किया। इस पूरे चाप में ज्वालामुखियों की एक शृंखला रीढ़ की भांति खड़ी है। .

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स्थलीय ग्रह

सीरीस (बौना ग्रह)। स्थलीय ग्रह या चट्टानी ग्रह मुख्य रूप से सिलिकेट शैल अथवा धातुओ से बना हुआ ग्रह होता है। हमारे सौर मण्डल में स्थलीय ग्रह, सूर्य के सबसे निकटतम, आंतरिक ग्रह है। स्थलीय ग्रह अपनी ठोस सतह की वजह से गैस दानवों से काफी अलग होते हैं, जो कि मुख्यतः हाइड्रोजन, हीलियम और विभिन्न प्रावस्थाओ में मौजूद पानी के मिश्रण से बने होते हैं। .

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सूखा

अकाल भोजन का एक व्यापक अभाव है जो किसी भी पशुवर्गीय प्रजाति पर लागू हो सकता है। इस घटना के साथ या इसके बाद आम तौर पर क्षेत्रीय कुपोषण, भुखमरी, महामारी और मृत्यु दर में वृद्धि हो जाती है। जब किसी क्षेत्र में लम्बे समय तक (कई महीने या कई वर्ष तक) वर्षा कम होती है या नहीं होती है तो इसे सूखा या अकाल कहा जाता है। सूखे के कारण प्रभावित क्षेत्र की कृषि एवं वहाँ के पर्यावरण पर अत्यन्त प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। इससे स्थानीय अर्थव्यवस्था डगमगा जाती है। इतिहास में कुछ अकाल बहुत ही कुख्यात रहे हैं जिसमें करोंड़ों लोगों की जाने गयीं हैं। अकाल राहत के आपातकालीन उपायों में मुख्य रूप से क्षतिपूरक सूक्ष्म पोषक तत्व जैसे कि विटामिन और खनिज पदार्थ देना शामिल है जिन्हें फोर्टीफाइड शैसे पाउडरों के माध्यम से या सीधे तौर पर पूरकों के जरिये दिया जाता है।, बीबीसी न्यूज़, टाइम सहायता समूहों ने दाता देशों से खाद्य पदार्थ खरीदने की बजाय स्थानीय किसानों को भुगतान के लिए नगद राशि देना या भूखों को नगद वाउचर देने पर आधारित अकाल राहत मॉडल का प्रयोग करना शुरू कर दिया है क्योंकि दाता देश स्थानीय खाद्य पदार्थ बाजारों को नुकसान पहुंचाते हैं।, क्रिश्चियन साइंस मॉनिटर लंबी अवधि के उपायों में शामिल हैं आधुनिक कृषि तकनीकों जैसे कि उर्वरक और सिंचाई में निवेश, जिसने विकसित दुनिया में भुखमरी को काफी हद तक मिटा दिया है।, न्यूयॉर्क टाइम्स, 9 जुलाई 2009 विश्व बैंक की बाध्यताएं किसानों के लिए सरकारी अनुदानों को सीमित करते हैं और उर्वरकों के अधिक से अधिक उपयोग के अनापेक्षित परिणामों: जल आपूर्तियों और आवास पर प्रतिकूल प्रभावों के कारण कुछ पर्यावरण समूहों द्वारा इसका विरोध किया जाता है।, न्यूयॉर्क टाइम्स, 2 दिसम्बर 2007, दी अटलांटिक .

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सोलोमन द्वीप

सोलोमन द्वीप है एक संप्रभु देश मिलकर के छह प्रमुख द्वीपों और 900 से अधिक छोटे द्वीपों में ओशिनिया के लिए झूठ बोल के पूर्व पापुआ न्यू गिनी और नॉर्थवेस्ट के वानुअतु और कवर एक भूमि क्षेत्र के साथ 28,400 वर्ग किलोमीटर (11,000 वर्ग मील)है। देश की राजधानी होनियारा, द्वीप पर स्थित है के गुआडलकैनाल.

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सीनाई पर्वत

सीनाई प्रायद्वीप, सीनाई पर्वत के स्थान को प्रदर्शित कर रहा है सीनाई पर्वत (अंग्रेज़ी: Mount Sinai, माउण्ट सायनाय; इब्रानी: הר סיני, हार सीनाई), जिसे अरबी में तूर सीना या जबल मूसा (अर्थ: मूसा का पर्वत) कहते हैं, मिस्र के सीनाई प्रायद्वीप में संत कैथरीन के पास स्थित एक पर्वत का नाम है। बदूईन लोग इसे होरेब पर्वत के नाम से भी बुलाते हैं। सीनाई पर्वत का कुरान में कई बार उल्लेख किया गया है;.

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हलियाकला

ज्वालमुखि के अन्दर सुप्त हलियाकला ज्वालामुखी हवाई के मावी द्वीप पर है। .

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हिन्दी पुस्तकों की सूची/च

कोई विवरण नहीं।

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हिमाचल प्रदेश विधानसभा चुनाव, २००७

हिमाचल प्रदेश दिसंबर 2007 विधानसभा चुनाव दिसंबर 2007 मे हिमाचल प्रदेश की हिमाचल प्रदेश विधान सभा के लिए हुआ चुनाव था। राज्य के 65 विधानसभा चुनाव क्षेत्रों में 19 दिसम्बर 2007 को तथा किन्नौर, लाहौल स्पीती और भरमौर जनजातीय क्षेत्रों में 14 नवम्बर 2007 को दो चरणों में मतदान हुआ था। राज्‍य में सत्ता विरोधी लहर का फायदा उठाते हुए भाजपा ने 41 सीट जीतकर कांग्रेस का कड़ी शिकस्‍त दी। राज्य विधानसभा चुनावों के घोषित नतीजों के मुताबिक 68 सदस्यीय विधानसभा में कांग्रेस को 23 सीटों से ही संतोष करना पडा, जबकि बहुजन समाज पार्टी को एक और अन्य को तीन सीटें मिली। लोक जनशक्ति पार्टी राज्य में खाता भी नहीं खोल पाई। हिमाचल प्रदेश में 1990 के बाद भाजपा अब पहली बार अपने बूते पर सरकार बनाई। वर्ष 1990 में भाजपा ने जनता पार्टी के साथ चुनाव पूर्व गठबंधन कर 51 सीटों पर चुनाव लडा था और उसे 46 सीटे मिली थी। जनता पार्टी को 11 सीटें मिली। इसी के साथ भाजपा- जनता पार्टी की गठबंधन सरकार गठित हुई। उस दौरान कांग्रेस को मात्र 8 सीटें मिली थी। चुनावों में तीन निर्दलीय भी जीते थे। बाद में वर्ष 1998 में भाजपा ने हिमाचल विकास कांग्रेस के साथ गठबंधन सरकार गठित की। उस दौरान भाजपा को 31 सीटें हासिल हुई थी जबकि हिमाचल विकास कांग्रेस को 5 सीटों पर जीत मिली थी। .

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हवाई तुल्य ज्वालामुखी

ज्वालामुखी के उद्गार की प्रकृति के आधार प्रकार:-;हवाई तुल्य; स्ट्राम्बोली तुल्य; वलकैनो तुल्य; पीलियन तुल्य; विसूवियन तुल्य श्रेणी:ज्वालामुखी.

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होन्शू

होक्काइदो का नक़्शा फ़ूजी पर्वत का दृश्य क्योतो शहर में गोकोगु जिन्जा मंदिर होन्शू (जापानी: 本州, अंग्रेज़ी: Honshu) जापान का सबसे बड़ा द्वीप है। यह त्सुगारु जलडमरू के पार होक्काइदो द्वीप से दक्षिण में, सेतो भीतरी सागर के पार शिकोकू द्वीप के उत्तर में और कानमोन जलडमरू के पार क्यूशू द्वीप से पूर्वोत्तर में स्थित है। होन्शू दुनिया का सातवा सबसे बड़ा द्वीप है और इंडोनीशिया के जावा द्वीप के बाद विश्व का दूसरा सर्वाधिक जनसँख्या वाला द्वीप भी है। जापान की राजधानी टोक्यो होन्शु के मध्य-पूर्व में स्थित है। होन्शू पर सन् २००५ में १०.३ करोड़ लोग रह रहे थे। इसका क्षेत्रफल २,२७,९६२ वर्ग किमी है, जो ब्रिटेन से ज़रा बड़ा है और भारत के उत्तर प्रदेश राज्य से ज़रा छोटा है।, Paul A. Tucci, Mathew T. Rosenberg, Visible Ink Press, 2009, ISBN 978-1-57859-215-9,...

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होगर पर्वत

टिबेस्टी पर्वत अल्जीरिया, अफ्रीका में स्थित एक पर्वत है। यह ज्वालामुखी पर्वत है। श्रेणी:अल्जीरिया के पर्वत श्रेणी:सहारा मरुस्थल श्रेणी:ज्वालामुखी पर्वत.

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जल प्रदूषण

जल प्रदूषण, से अभिप्राय जल निकायों जैसे कि, झीलों, नदियों, समुद्रों और भूजल के पानी के संदूषित होने से है। जल प्रदूषण, इन जल निकायों के पादपों और जीवों को प्रभावित करता है और सर्वदा यह प्रभाव न सिर्फ इन जीवों या पादपों के लिए अपितु संपूर्ण जैविक तंत्र के लिए विनाशकारी होता है। जल प्रदूषण का मुख्य कारण मानव या जानवरों की जैविक या फिर औद्योगिक क्रियाओं के फलस्वरूप पैदा हुये प्रदूषकों को बिना किसी समुचित उपचार के सीधे जल धारायों में विसर्जित कर दिया जाना है। .

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जलतापीय छिद्र

जलतापीय छिद्र (hydrothermal vents) पृथ्वी या अन्य किसी ग्रह पर उपस्थित ऐसा विदर छिद्र होता है जिस से भूतापीय स्रोतों से गरम किया गया जल उगलता है। यह अक्सर सक्रीय ज्वालामुखीय क्षेत्रों, भौगोलिक तख़्तो के अलग होने वाले स्थानों और महासागर द्रोणियों जैसे स्थानों पर मिलते हैं। जलतापीय छिद्रों के अस्तित्व का मूल कारण पृथ्वी की भूवैज्ञानिक सक्रीयता और उसकी सतह व भीतरी भागों में पानी की भारी मात्रा में उपस्थिति है। जब जलतापीय छिद्र भूमि पर होते हैं तो उन्हें गरम चश्मों, फ़ूमारोलों और उष्णोत्सों के रूप में देखा जाता है। जब वे महासागरों के फ़र्श पर होते हैं तो उन्हें काले धुआँदारी (black smokers) और श्वेत धुआँदारी (white smokers) के रूप में पाया जाता है। गहरे समुद्र के बाक़ि क्षेत्र की तुलना में काले धुआँदारियों के आसपास अक्सर बैक्टीरिया और आर्किया जैसे सूक्ष्मजीवों की भरमार होती है। यह जीव इन छिद्रों में से निकल रहे रसायनों को खाकर ऊर्जा बनाते हैं और जीवित रहते हैं और फिर आगे ऐसे जीवों को ग्रास बनाने वाले अन्य जीवों के समूह भी यहाँ पनपते हैं। माना जाता है कि बृहस्पति ग्रह के यूरोपा चंद्रमा और शनि ग्रह के एनसेलेडस चंद्रमा पर भी सक्रीय जलतापीय छिद्र मौजूद हैं और अति-प्राचीनकाल में यह सम्भवतः मंगल ग्रह पर भी रहे हों। .

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जावा (द्वीप)

मेरबाबु पर्वत ज्वालामुखी जावा द्वीप इंडोनेशिया का सबसे अधिक जनसंख्या वाला द्वीप है। प्राचीन काल में इसका नाम यव द्वीप था और इसका वर्णन भारत के ग्रन्थों में बहुत आता है। यहां लगभग २००० वर्ष तक हिन्दू सभ्यता का प्रभुत्व रहा। अब भी यहां हिन्दुओं की बस्तियां कई स्थानों पर पाई जाती हैं। विशेषकर पूर्व जावा में मजापहित साम्राज्य के वंशज टेंगर लोग रहते हैं जो अब भी हिन्दू हैं। सुमेरू पर्वत और ब्रोमो पर्वत पूर्व जावा में यहां की और पूरे इंडोनेशिया की राजधानी जकार्ता (संस्कृत: जयकर्त) है। बोरोबुदुर और प्रमबनन मन्दिर यहां स्थित हैं। .

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ज्वलखण्डाश्मि पदार्थ

ज्वलखण्डाश्मि चट्टान या ज्वलखण्डाश्मि पदार्थ, पूर्ण अथवा मुख्य रूप से ज्वालामुखीय पदार्थों से निर्मित खण्डमय चट्टानें हैं। यह ज्वालामुखीय पदार्थ हवा या पानी की यांत्रिक क्रिया के द्वारा द्वारा एक स्थान से दूसरे स्थान पर पहुँच कर फिर से घनीभूत हो जाते हैं। .

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ज्वालामुख-कुण्ड

इर्टा एले के ज्वालामुख-कुण्ड में भरा लावाकिसी ज्वालामुखी के विस्फोट के परिणाम स्वरूप अस्तित्व में आई एक कुण्ड या पात्र सदृश रचना भूवैज्ञानिक भाषा में ज्वालामुख-कुण्ड कहलाती है। अंग्रेजी और अन्य यूरोपीय भाषायों मे इसे कैल्डेरा (Caldera) कहते हैं, जो एक स्पैनिश शब्द है पर इसका मूल लैटिन भाषा के कैल्डेरिया में निहित है जिसका अर्थ 'खाना पकाने का बर्तन' होता है।। .

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ज्वालामुखी शंकु

ज्वालामुखी शंकु ज्वालामुखी शंकु, ज्वालामुखी से संबंधित सरलतम संरचनाओं में से एक हैं। इनका निर्माण ज्वालामुखीय उद्गार के समय निकास नलिका से निकले उत्सर्ग के निकास नली के चारों ओर शंक्वाकार रूप में जमने से होता है, जबकि इस शंकु का मध्य भाग एक गर्त के रूप में विकसित होता है। उद्गार के दौरान बाहर निकले टुकड़ों की प्रकृति और आकार के अनुसार ज्वालामुखी शंकु विभिन्न प्रकारों में विकसित होते हैं। .

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ज्वालामुखी विस्फोटों के प्रकार

ज्वालामुखी के विस्फोट के समय लावा, टेफ्रा और विभिन्न गैसें ज्वालामुखी से निकलतीं हैं। ज्वालामुखी विशेषज्ञों ने ज्वालामुखी-विस्फोटों के अनेक प्रकारों का वर्णन किया है। इनका नामकरण प्रायः प्रसिद्ध ज्वालामुखियों के नाम पर किया गया है जिसमें उसी प्रकार का व्यवहार देखने को मिला था। .

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ज्वालामुखी विज्ञान

ज्वालामुखी विज्ञान (volcanology या vulcanology) ज्वालामुखियों व उन से सम्बन्धित चीज़ों, जैसे कि मैग्मा, लावा और अन्य सम्बन्धित भूवैज्ञानिक, भूभौतिक और भूरसायनिक पहलुओं के अध्ययन को कहते हैं। ज्वालामुखी वैज्ञानिक का विशेष ध्यान ज्वालामुखियों के निर्माण, ऐतिहासिक अ आधुनिक विस्फोटों, जीवन-क्रमों, इत्यादि को समझने में लगता है। वे अक्सर जीवित, मूर्छित और मृत ज्वालामुखियों पर जाकर माप और नमूने लेते हैं और अन्य छानबीन करते हैं। ज्वालामुखी विज्ञान को भूविज्ञान की शाखा माना जाता है। .

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ज्वालामुखीय चट्टानें

ज्वालामुखीय चट्टान ऐसी आग्नेय चट्टान है जो ज्वालामुखी क्रिया द्वारा मैग्मा के लावा के रूप मे धरती कि सतह के ऊपर आकर जमने से बनती है। .

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ज्वालामुखीय चाप

ज्वालामुखीय चाप (volcanic arc) ज्वालामुखियों की एक शृंखला होती है जो दो भौगोलिक तख़्तों की संमिलन सीमा में निम्नस्खलित तख़्ते (subducting plate) के ऊपर बन जाती है। ऊपर से देखने पर ज्वालामुखियों की यह शृंखला एक चाप (आर्क) के आकार में नज़र आती है। यदि यह किसी महासागर में स्थित हो तो अक्सर यह ज्वालामुखी समुद्र सतह से ऊपर निकलकर ज्वालामुखीय द्वीप बना देते हैं और यह शृंखला एक द्वीप चाप के रूप में नज़र आती है। अक्सर इन द्वीपों से सामानांतर एक महासागरीय गर्त (ट्रेन्च) भी स्थित होता है। .

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ज्वालामुखीय झील

क्रेटर लेक अमेरिका में स्थित एक ज्वालामुखीय झील है। यह उसका अंतरिक्ष से देखा गया एक दृश्य है। ज्वालामुखीय झील ऐसी झील को कहा जाता है जो किसी ज्वालामुखी के मुख में पानी भर जाने से बन जाती हो। ज्वालामुखीय झीलें जीवित या मृत ज्वालामुखी दोनों में बन सकती हैं। आम तौर से इनमे पानी वर्षा या हिमपात से भर जाता है। यदि किसी जीवित ज्वालामुखी में झील बनी हो और वह ज्वालामुखी फटना शुरू हो जाये, तो ऐसी झीलें तेज़ी से उबल कर ख़ाली हो जातीं हैं। इण्डोनेशिया में स्थित तोबा झील विश्व की सबसे बड़ी ज्वालामुखीय झील है। .

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ज्वालामुखीय द्वीप

ज्वालामुखीय द्वीप (volcanic island) ऐसा द्वीप होता है जो किसी ज्वालामुखी के फटने से निकले हुए पत्थर व चट्टानों से उभरकर पानी की सतह से ऊपर निकल आए। ऐसे द्वीपों की ऊँचाई अक्सर अवसादन (सेडिमेन्टेशन) या मूँगे (कोरल) द्वारा बने द्वीपों से अधिक होती है, इसलिये इन्हें कभी-कभी ऊँचे द्वीप (high islands) भी कहा जाता है। इन द्वीपों को बनाने वाले ज्वालामुखी अक्सर द्वीप पर देखे जा सकते हैं हालांकि कभी-कभी वे मृत होते हैं या वायु-जल के प्रभाव से घिसे और वनस्पतियों से ढके जा चुके होते हैं। .

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ज्वालामुखीय क्रेटर

अफ़्रीका के माउण्ट कैमरून पर ज्वालामुखीय क्रेटर ज्वालामुखीय क्रेटर ज़मीन में एक गोल आकार का गड्ढा होता है जो किसी ज्वालामुखी के फटने से बन जाता है। आम तौर से इस गड्ढे का फर्श समतल होता है और उसमें एक छेद से पिघले पत्थर, गैस और अन्य ज्वालामुखीय पदार्थ उगलते हैं। कई दफ़ा ज्वालामुखी के अन्दर लावा से भरी हुई गुफ़ा ख़ाली हो जाने से उसकी छत बैठ जाती है और एक क्रेटर-नुमा गड्ढा बना देती है, पर यह क्रेटर नहीं बल्कि एक ज्वालामुखीय कुण्ड या "कैल्डेरा" कहलाता है। .

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ज्वालामुखीयता

ज्वालामुखीयता (volcanism या vulcanism) पृथ्वी या अन्य किसी स्थलीय ग्रह या प्राकृतिक उपग्रह पर सबसी ऊपरी सतह में बनी दरार या छिद्र से नीचे से पिघले पत्थर या अन्य सामग्री के लावा और गैसों के रूप में उलगाव को कहते हैं। इनमें वह सारी परिघटनाएँ आती हैं जिनमें भूपर्पटी (क्रस्ट) और भूप्रावार (मैन्टल) से पिघली सामग्री उगल कर या विस्फोटक प्रक्रिया द्वारा ऊपर सतह पर आए और वहाँ जमकर ठोस रूप ले ले। .

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ज्वालाकाच

ज्वालाकाच या ऑब्सिडियन (Obsidian), एक प्राकृतिक रूप से पाया जाने वाला ज्वालामुखीय काच है। यह रायोलाइट (Rhyolite) नामक ज्वालामुखी-शिला का अत्यन्त काचीय रूप है। अत: रासायनिक एवं खनिज संरचना में ज्वालाकाच रायोलाइट अथवा ग्रेनाइट के समतुल्य है, परन्तु भौतिक सरंचना एवं बाह्य रूप में दोनों में पर्याप्त भिन्नता है। ज्वालाकाच वस्तुत: 'प्राकृतिक काच' का दूसरा नाम है। नवीन परिभाषा के अनुसार ज्वालाकाच उस स्थूल, अपेक्षाकृत सघन परंतु प्राय: झावाँ की भाँति दिखनेवाले, गहरे भूरे या काले, साँवले, पीले या चितकबरे काच को कहते हैं, जो तोड़ने पर सूक्ष्म शंखाभ विभंग (conchoidal fracture) प्रदर्शित करता है। इस शिला का यह विशेष गुण है। प्राचीन काल में ज्वालाकाच का प्रयोग होता था और वर्तमान समय में भी अपने भौतिक गुणों एवं रासायनिक संरचना के कारण इसका प्रयोग हो रहा है। अभी हाल तक अमरीका की रेडइंडियन जाति अपने बाणों और भालों की नोक इसी शिला के तेज टुकड़ों से बनाती थी। प्लिनी के अनुसार ऑब्सिडियनस नामक व्यक्ति ने ईथियोपिया देश मे सर्वप्रथम इस शिला की खोज की। अतएव इसका नाम ऑब्सिडियन पड़ा। जॉनहिल (१७४६ ईo) के अनुसार एंटियंट जाति इस शिला पर पालिश चढ़ाकर दर्पण के रूप में इसका उपयोग करती थी। इनकी भाषा में ऑब्सिडियन का जो नाम था वह कालांतर में लैटिन भाषा में क्रमश: ऑपसियनस, ऑपसिडियनस तथा ऑवसिडियनस (obsiodianus) लिखा जाने लगा। शब्द की व्युत्पत्ति प्राय: पूर्णतया विस्मृत हो चुकी है, एवं भ्रमवश यह मान लिया गया है कि ऑब्सिडियन नाम उसके आविष्कर्ता ऑब्सिडियनस के नाम पर पड़ा। साधारणतया रायोलाइट के काचीय रूप को ही ऑब्सिडियन कहते हैं, परंतु ट्रेकाइट (trachyte) अथवा डेसाइट नामक ज्वाला-मुखी अम्लशैल (volcanic acid-rocks) भी अत्यंत तीव्र गति से शीतल होकर प्राकृतिक काच को जन्म देते हैं। पर ऐसे शैलों को ट्रेफाइट या डेसाइट ऑब्सिडियन कहते हैं। सूक्ष्मदर्शक यंत्र से देखने पर ज्ञात होता है कि ऑब्सिडियन शैल का अधिकांश भाग काँच से निर्मित है। इसके अंतरावेश में अणुमणिभस्फट (microlite) देखे जा सकते हैं। इन मणिभों के विशेष विन्यास से स्पष्ट आभास मिलेगा कि कभी शैलमूल या मैग्मा (magma) में प्रवाहशीलता थी। शिला का गहरा रंग इन्हीं सूक्ष्म स्फटों के बाहुल्य का प्रतिफल है। कभी कभी ऑब्सिडियन धब्बेदार या धारीदार भी होता है। 'स्फेरूलाइट' तो इस शैल का सामान्य लक्षण है। ज्वालाकांच का आपेक्षिक घनत्व २.३० से २.५८ तक होता है। ऑब्सिडियन सदृश्य काचीय शिलाओं की उत्पत्ति ऐसे शैलमूलों के दृढ़ीभवन के फलस्वरूप होती है जिनकी संरचना स्फटिक (quartz) एवं क्षारीय फैलस्पार (alkali felspar) के 'यूटेकटिक मिश्रणों के निकट हो। ('यूटेकटिक मिश्रण' दो खनिजों के अविरल समानुपात की वह स्थिति है, जब ताप की एक निश्चित अवस्था में दोनों घटकों का एक साथ क्रिस्टल बनने लगे। यूटेकटिक बिन्दुओं के निकट इस प्रकार के शैलमूल पर्याप्त श्यान (viscous) हो उठते हैं। फलस्वरूप या तो मणिभीकरण पूर्णत: अवरुद्ध हो जाता है, या अतिशय बाधापूर्ण अवस्था में संपन्न होता है। तीव्रगति से शीतल होने के कारण ऐसे शैलों का उद्भव होता है जो प्राय: पूर्णत: काचीय होते हैं। ऑब्सिडियन क्लिफ, यलोस्टोन पार्क, संयुक्त राज्य अमरीका, में ७५ इंच से १०० इंच मोटे लावास्तरोें के रूप में ऑब्सिडियन मिलता है। भारत में गिरनार, एवं पावागढ़ के लावास्तरों से ऑब्सिडियन की प्राप्ति प्रचुर मात्रा में होती है। .

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जॉन टूज़ो विल्सन

जॉन टूज़ो विल्सन एक कनाडाई भूवैज्ञानिक थे जिन्होंने प्लेट विवर्तनिकी के क्षेत्र में योगदान दिया। उन्होंने सागर नितल प्रसरण और पर्वत निर्माण पर अपना योगदान दिया तथा ज्वालामुखियों के अध्ययन में काफ़ी महत्वपूर्ण कार्य किये। .

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ईजियन सागर

ईजियन सागर (Αιγαίο Πέλαγος, ईजिओ पेलागोस) भूमध्य सागर का एक विस्तार है। यह दक्षिणी बाल्कान क्षेत्र और एनाटोलिया प्रायद्वीप के बीच में स्थित है, इस प्रकार ये यूनान और तुर्की के मध्य स्थित है। यह भूमध्य सागर की एक भुजा है जिसके पश्चिम में युनान और पूर्व में टर्की हैं। यह डार्डेनेल्स और बॉसपोरस जल-संयोजकों द्वारा मारमारा और काला सागर से जुड़ा है। 'ईजियन' शब्द का संबंध ईजी नगर से अथवा ईजिया (अमेज़न की रानी) से, अथवा ईजियस (थीसियस के पिता) से बताया गया है। संरचना की दुष्टि से यह सागर एक प्राचीन ध्वस्त स्थलखंड है जो लगभग पूर्णतया निमज्जित हो गया है। इसके चारों ओर नवीन भंजित पर्वत हैं जो स्वयं थोड़ी मात्रा में निमज्जित हैं। इन दशाओं के फलस्वरूप यह सागर द्वीपों से भरा है और इसमें यथाक्रम गहरी और उथली द्रोणियाँ हैं। यहाँ कुछ ज्वालामुखी द्वीप भी स्थित हैं। द्वीपों में गेहूँ, अगूंर, अंजीर, मुनक्का, गोंद, शहद, मोम, कपास और रेशम का उत्पादन होता है। .

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वनोन्मूलन

वनोन्मूलन का अर्थ है वनों के क्षेत्रों में पेडों को जलाना या काटना ऐसा करने के लिए कई कारण हैं; पेडों और उनसे व्युत्पन्न चारकोल को एक वस्तु के रूप में बेचा जा सकता है और मनुष्य के द्वारा उपयोग में लिया जा सकता है जबकि साफ़ की गयी भूमि को चरागाह (pasture) या मानव आवास के रूप में काम में लिया जा सकता है। पेडों को इस प्रकार से काटने और उन्हें पुनः न लगाने के परिणाम स्वरुप आवास (habitat) को क्षति पहुंची है, जैव विविधता (biodiversity) को नुकसान पहुंचा है और वातावरण में शुष्कता (aridity) बढ़ गयी है। साथ ही अक्सर जिन क्षेत्रों से पेडों को हटा दिया जाता है वे बंजर भूमि में बदल जाते हैं। आंतरिक मूल्यों के लिए जागरूकता का अभाव या उनकी उपेक्षा, उत्तरदायी मूल्यों की कमी, ढीला वन प्रबन्धन और पर्यावरण के कानून, इतने बड़े पैमाने पर वनोन्मूलन की अनुमति देते हैं। कई देशों में वनोन्मूलन निरंतर की जाती है जिसके परिणामस्वरूप विलोपन (extinction), जलवायु में परिवर्तन, मरुस्थलीकरण (desertification) और स्वदेशी लोगों के विस्थापन जैसी प्रक्रियाएं देखने में आती हैं। .

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वर्षावन

ऑस्ट्रेलिया के क्वींसलैंड में डैनट्री वर्षावन. क्वींसलैंड, ऑस्ट्रेलिया में केर्न्स के पास डैनट्री वर्षावन. न्यू साउथ वेल्स, ऑस्ट्रेलिया में इल्लावारा ब्रश के भाग। वर्षावन वे जंगल हैं, जिनमें प्रचुर मात्रा में वर्षा होती है अर्थात जहां न्यूनतम सामान्य वार्षिक वर्षा 1750-2000 मि॰मी॰ (68-78 इंच) के बीच है। मानसूनी कम दबाव का क्षेत्र जिसे वैकल्पिक रूप से अंतर-उष्णकटिबंधीय संसृति क्षेत्र के नाम से जाना जाता है, की पृथ्वी पर वर्षावनों के निर्माण में उल्लेखनीय भूमिका है। विश्व के पशु-पौधों की सभी प्रजातियों का कुल 40 से 75% इन्हीं वर्षावनों का मूल प्रवासी है। यह अनुमान लगाया गया है कि पौधों, कीटों और सूक्ष्मजीवों की कई लाख प्रजातियां अभी तक खोजी नहीं गई हैं। उष्णकटिबंधीय वर्षावनों को पृथ्वी के आभूषण और संसार की सबसे बड़ी औषधशाला कहा गया है, क्योंकि एक चौथाई प्राकृतिक औषधियों की खोज यहीं हुई है। विश्व के कुल ऑक्सीजन प्राप्ति का 28% वर्षावनों से ही मिलता है, इसे अक्सर कार्बन डाई ऑक्साइड से प्रकाश संष्लेषण के द्वारा प्रसंस्करण कर जैविक अधिग्रहण के माध्यम से कार्बन के रूप में भंडारण करने वाले ऑक्सीजन उत्पादन के रूप में गलत समझ लिया जाता है। भूमि स्तर पर सूर्य का प्रकाश न पहुंच पाने के कारण वर्षावनों के कई क्षेत्रों में बड़े वृक्षों के नीचे छोटे पौधे और झाड़ियां बहुत कम उग पाती हैं। इस से जंगल में चल पाना संभव हो जाता है। यदि पत्तों के वितानावरण को काट दिया जाए या हलका कर दिया जाए, तो नीचे की जमीन जल्दी ही घनी उलझी हुई बेलों, झाड़ियों और छोटे-छोटे पेड़ों से भर जाएगी, जिसे जंगल कहा जाता है। दो प्रकार के वर्षावन होते हैं, उष्णकटिबंधीय वर्षावन तथा समशीतोष्ण वर्षावन। .

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वायकाटो नदी

वायकाटो नदी (Waikato River) न्यूज़ीलैण्ड की सबसे लम्बी नदी है। यह उस देश के उत्तर द्वीप (नोर्थ आईलैण्ड) में स्थित है। इसकी उत्पत्ति ताऊपो ज्वालामुखीय क्षेत्र में स्थित रुआपेहू पर्वत (Mount Ruapehu) नामक ज्वालामुखी की पूर्वी ढलानों में पिघलती बर्फ में होती है और वहाँ से यह ताऊपो झील (Lake Taupo) पहुँचती है, जो कि न्यूज़ीलैण्ड की सबसे विशाल झील है। यहाँ से यह झील के पूर्वोत्तरी छोर से फिर आगे निकलती है और हूका झरना श्रंखला (Huka Falls) बनाती है। फिर वायकाटो मैदान से निकलती हुई यह ऑक्लैण्ड शहर के पास स्थित पोर्ट वायकाटो (Port Waikato) नामक बंदरगाह में तस्मान सागर में विलय हो जाती है। .

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वायु प्रदूषण

वायु प्रदूषण रसायनों, सूक्ष्म पदार्थ, या जैविक पदार्थ के वातावरण में, मानव की भूमिका है, जो मानव को या अन्य जीव जंतुओं को या पर्यावरण को नुकसान पहुँचाता है। वायु प्रदूषण के कारण मौतें और श्वास रोग.

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विदर छिद्र

विदर छिद्र (fissure vent) या ज्वालामुखीय विदर (volcanic fissure) लगभग एक रेखा के आकार का ज्वालामुखीय छिद्र होता है जिसमें से पृथ्वी के भीतर से लावा उगला जाता है। इसमें और ज्वालामुखी में एक बड़ा अंतर यह है कि विदर छिद्र से लावा बिना किसी विस्फोट के निकलता है। विदर छिद्र के रेखा-मुख कुछ मीटर से लेकर कुछ किलोमीटर लम्बा हो सकता है। विदर छिद्रों से बाढ़ बेसाल्ट बनता है जो पहले तो लावा नहरों में और फिर लावा ट्यूबों में चलता है। .

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विरुंगा पहाड़ियाँ

विरुंगा पहाड़ियाँ (Virunga Mountains), जो मुफ़ुमबीरो भी कहलाते हैं, पूर्वी अफ़्रीका में रुआण्डा, कांगो लोकतान्त्रिक गणराज्य और युगांडा की सीमाओं पर स्थित एक ज्वालामुखियों की शृंखला है। यह ऍड्वर्ड झील और कीवू झील के बीच में खड़ी हुई हैं। इनमें से लगभग सभी प्रसुप्त हैं सिवाय ३,४६२ मीटर ऊँचे न्यीरागोन्गो पर्वत (Mount Nyiragongo) और ३,०६३ मीटर ऊँचे न्यामूरागिरा पर्वत (Mount Nyamuragira) के जो सक्रीय हैं। यह दोनों सक्रीय ज्वालामुखी कांगो लोकतान्त्रिक गणराज्य में हैं और इनके २००६ और २०१० में विस्फोट हुए थे। विरुंगा पहाड़ियाँ पर्वतीय गोरिला का घर हैं जहाँ यह प्राणी विलुप्ति के ख़तरे में है, जिस वजह से यह एक महत्वपूर्ण संरक्षण क्षेत्र है। .

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विस्फोट

किसी पदार्थ को एक साथ फ़ोडने की क्रिया को विस्फ़ोट कहा जाता है। विस्फ़ोट में अधिकतर बारूद का प्रयोग किया जाता है, इसमे बारूद भी अलग अलग शक्तियों की होती है, जिसमे आर डी एक्स नामक बारूद बहुत ही शक्तिशाली होती है। बन्दूक और तोप के गोले को भी विस्फ़ोट से ही दागा जाता है। अत्याधिक ज्वलनशील पदार्थ को आग के सम्पर्क में आते ही वह अचानक जलता है और विस्फ़ोट हो जाता है। विस्फ़ोट के लिये तीन कारकों का होना अत्याधि्क जरूरी है, पहला ईंधन दूसरा ताप और तीसरी आक्सीजन.

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वॉयेजर द्वितीय

वायेजर द्वितीय एक अमरीकी मानव रहित अंतरग्रहीय शोध यान था जिसे वायेजर १ से पहले २० अगस्त १९७७ को अमरीकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा द्वारा प्रक्षेपित किया गया था। यह काफी कुछ अपने पूर्व संस्करण यान वायेजर १ के समान ही था, किन्तु उससे अलग इसका यात्रा पथ कुछ धीमा है। इसे धीमा रखने का कारण था इसका पथ युरेनस और नेपचून तक पहुंचने के लिये अनुकूल बनाना। इसके पथ में जब शनि ग्रह आया, तब उसके गुरुत्वाकर्षण के कारण यह युरेनस की ओर अग्रसर हुआ था और इस कारण यह भी वायेजर १ के समान ही बृहस्पति के चन्द्रमा टाईटन का अवलोकन नहीं कर पाया था। किन्तु फिर भी यह युरेनस और नेपच्युन तक पहुंचने वाला प्रथम यान था। इसकी यात्रा में एक विशेष ग्रहीय परिस्थिति का लाभ उठाया गया था जिसमे सभी ग्रह एक सरल रेखा मे आ जाते है। यह विशेष स्थिति प्रत्येक १७६ वर्ष पश्चात ही आती है। इस कारण इसकी ऊर्जा में बड़ी बचत हुई और इसने ग्रहों के गुरुत्व का प्रयोग किया था। .

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खनिजों का बनना

खनिजों का बनना (formation) अनेक प्रकार से होता है। बनने में उष्मा, दाब तथा जल मुख्य रूप से भाग लेते हैं। निम्नलिखित विभिन्न प्रकारों से खनिज बनते हैं: (१) मैग्मा का मणिभीकरण (Crystallization from magma) - पृथ्वी के आभ्यंतर में मैग्मा में अनेक तत्व आक्साइड एवं सिलिकेट के रूपों में विद्यमान हैं। जब मैग्मा ठंडा होता है तब अनेक यौगिक खनिज के रूप में मणिभ (क्रिस्टलीय) हो जाते है और इस प्रकार खनिज निक्षेपों (deposit) को जन्म देते हैं। इस प्रकार के मुख्य उदाहरण हीरा, क्रोमाइट तथा मोनेटाइट हैं। (२) ऊर्ध्वपातन (Sublimation)- पृथ्वी के आभ्यंतर में उष्मा की अधिकता के कारण अनेक वाष्पशील यौगिक गैस में परिवर्तित हो जाते हैं। जब यह गैस शीतल भागों में पहुँचती है तब द्रव दशा में गए बिना ही ठोस बन जाती है। इस प्रकार के खनिज ज्वालामुखी द्वारों के समीप, अथवा धरातल के समीप, शीतल आग्नेय पुंजों (igneous masses) में प्राप्त होते हैं। गंधक का बनना उर्ध्वपातन क्रिया द्वारा ही हुआ है। (३) आसवन (Distillation) - ऐसा समझा जाता है कि समुद्र की तलछटों (sediments) में अंतर्भूत (imebdded) छोटे जीवों के कायविच्छेदन के पश्चात्‌ तैल उत्पन्न होता है, जो आसुत होता है और इस प्रकार आसवन द्वारा निर्मित वाष्प पेट्रोलियम में परिवर्तित हो जाता है अथवा कभी-कभी प्राकृतिक गैसों को उत्पन्न करता है। (४) वाष्पायन एवं अतिसंतृप्तीकरण (Vaporisation and Supersaturation) - अनेक लवण जल में घुल जाते हैं और इस प्रकार लवण जल के झरनों तथा झीलों को जन्म देते हैं। लवण जल का वाष्पायन द्वारा लवणों का अवशोषण (precipitation) होता है। इस प्रकार लवण निक्षेप अस्तित्व में आते हैं। इसके अतिरिक्त कभी कभी वाष्पायन द्वारा संतृप्त स्थिति आ जाने पर घुले हुए पदार्थों मणिभ पृथक हो जाते हैं। (५) 'गैसों, द्रवों एवं ठोसों की पारस्परिक अभिक्रियाएँ - जब दो विभिन्न गैसें पृथ्वी के आभ्यंतर से निकलकर धरातल तक पहुँचती हैं तथा परस्पर अभिक्रिया करती हैं तो अनेक यौगिक उत्पन्न होते है उदाहरणार्थ: इसी प्रकार गैसें कुछ विलयनों पर अभिक्रिया करती हैं। फलस्वरूप कुछ खनिज अवक्षिप्त हो जाते हैं। उदाहरण के लिए, जब हाइड्रोजन सल्फाइड गैस ताम्र-सल्फेट-विलयन से पारित होती है तब ताम्र सल्फाइड अवक्षिप्त हो जाता है। कभी ये गैसें ठोस पदार्थ से अभिक्रिया कर खनिजों को उत्पन्न करती हैं। यह क्रिया अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि अनेक खनिज सिलिकेट, आक्साइड तथा सल्फाइड के रूप में इसी क्रिया द्वारा निर्मित होते हैं। किसी समय ऐसा होता है कि पृथ्वी के आभ्यंतर का उष्ण आग्नेय शिलाओं से पारित होता है एवं विशाल संख्या में अयस्क कार्यों (ore bodies) को अपने में विलीन कर लेता है। यह विलयन पृथ्वी तल के समीप पहुँच कर अनेक धातुओं को अवक्षिप्त कर देता है। स्वर्ण के अनेक निक्षेप इसी प्रकार उत्पन्न हुए हैं। कुछ अवस्थाओं में इस प्रकार के विलयन पृथ्वीतल के समीप विभिन्न शिलाओं के संपर्क में आते हैं तथा एक एक करके कणों का प्रतिस्थापन (replacement) होता है, अर्थात्‌ जब शिला के एक कण का निष्कासन होता है तो उस निष्कासित कण के स्थान पर धात्विक विलयन के एक कण का प्रतिस्थापन हो जाता है। इस प्रकार शिलाओं के स्थान पर नितांत नवीन धातुएँ मिलती हैं, जिनका आकार और परिमाण प्राचीन प्रतिस्थापित शिलाओं का ही होता है। अनेक दिशाओं में यदि शिलाओं में कुछ विदार (cracks) या शून्य स्थान (void or void spaces) होते हैं तो पारच्यवित विलयन (percolating solution) उन शून्य स्थानों में खनिज निक्षेपों को जन्म देते हैं। यह क्रिया अत्यंत सामान्य है, जिसने अनेक धात्विक निक्षेपों को उत्पन्न किया है। (६) जीवाणुओं (bacteria) द्वारा अवक्षेपण - यह भली प्रकार से ज्ञात है कि कुछ विशेष प्रकार के जीवाणुओं में विलयनों से खनिज अवक्षिप्त करने की क्षमता होती है। उदाहरणार्थ, कुछ जीवाणु लौह को अवक्षिप्त करते हैं। ये जीवाणु विभिन्न प्रकार के होते हैं तथा विभिन्न प्रकार के निक्षेपों का निर्माण करते हैं। (७) कलिलीय निक्षेपण (Collodial Deposition) - वे खनिज, जो जल में अविलेय हैं, विशाल परिमाण में कलिलीय विलयनों में परिवर्तित हो जाते हैं तथा जब इनसे कोई विद्युद्विश्लेष्य (electroyte) मिलता है तब ये विलयन अवक्षेप देते हैं। इस प्रकार कोई भी धातु अवक्षिप्त हो सकती है। कभी कभी अवक्षेपण के पश्चात्‌ अवक्षिप्त खनिज मणिभीय हो जाते हैं, किंतु अन्य दशाओं में ऐसा नहीं होता। (८) ऋतुक्षारण प्रक्रम (Weathering Process) - यह ऋतुक्षारण शिलाओं के अपक्षय के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है उसी प्रकार जो विलयन बनते हैं उनमें लौह, मैंगनीज तथा दूसरे यौगिक हो सकते हैं। ये यौगिक, विलयनों द्वारा सागर में ले जाए जाते हैं और वहीं वे अवक्षिप्त हो जाते हैं। लौह तथा मैगनीज के निक्षेप इसी प्रकार उत्पन्न हुए। ऋतुक्षारण या तो पूर्ववर्ती (pre-existing) शिलाओं से अथवा पूर्ववर्ती खनिज निक्षेपों से हो सकता है। कुछ दशाओं में किसी शिला में कुछ अधोवर्ग (low grade) के विकिरित खनिज (disseminated minerals) होते हैं। तलीय जल शिलाओं के साधारण अवयवों को विलीन कर लेता है और अवशिष्ट भाग को मूल विकीरित खनिजों से समृद्ध करता है। अनेक अयस्क निक्षेप, अवशिष्ट उत्पाद के रूप में पाए जाते हैं, जैसे बाक्साइट। कुछ शिलाएँ, जैसे ग्रैनाइट (कणाश्म), वियोजन (disintegration) के पश्चात्‌ काइनाइट जैसे खनिजों को उत्पन्न करती हैं। (९) उपरूपांतरण (Metamorphism)-कुछ निक्षेप पूर्ववर्ती तलछटों के उपरूपांतरणों द्वारा निर्मित होते हैं। उदाहरण के लिए, चूना पत्थर संगमरमर को तथा कुछ मृत्तिकाएँ और सिलिका निक्षेप सिलोमनाइट को उत्पन्न करते हैं। .

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गारामुखी

अज़रबैजान के गोबुस्तान क्षेत्र में गारामुखियों की एक शृंखला गारामुखी (mud volcano, मड वॉल्केनो) या पंकमुखी या पंक ज्वालामुखी एक ऐसी प्राकृतिक रचना को कहते हैं जिसमें ज़मीन के नीचे से उभरते हुए गरम द्रवों और गैसों से एक टीला बन जाए जिसके ऊपर स्थित मुख से गीली मिट्टी और मलबा (यानि 'गारा') उगलता हो। एक तरह से यह ज्वालामुखी की तरह ही होता है हालांकि गारामुखी से लावा नहीं निकलता और इनका तापमान ज्वालामुखियों से बहुत कम होता है। पूरे विश्व में लगभग ७०० गारामुखी ज्ञात हैं और सबसे बड़ा वाला ७०० मीटर ऊँचा है और १० किमी का व्यास (डायामीटर) रखता है। गारामुखियों से निकलने वाली गैस का लगभग ८५% मीथेन होता है और इसके अतिरिक्त इसमें कार्बन डायोक्साइड और नाइट्रोजन भी होती हैं। इनमें से निकलने वाला द्रव अधिकतर गरम पानी होता है जिसमें महीन धुल और पत्तर के कण मिले होते हैं, हालांकि कुछ मात्रा हाइड्रोकार्बन द्रवों की भी होती है। अक्सर यह द्रव (लिक्विड) अम्लीय (एसिडिक) और नमकीन होता है। कुछ खगोलशास्त्रियों को मंगल ग्रह पर भी गारामुखियों के मौजूद होने का शक है।, BBC, Accessed 2009-03-27 .

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गिनी की खाड़ी

ज्वालामुखियों द्वारा बनाए गए द्वीपों की शृंखला दिखाता गिनी की खाड़ी का मानचित्र गिनी की खाड़ी अंध महासागर में अफ्रीका महाद्वीप के दक्षिणी ओर स्थित है। श्रेणी:अफ़्रीका श्रेणी:अटलांटिक महासागर की खाड़ियाँ श्रेणी:खाड़ियाँ श्रेणी:गिनी की खाड़ी.

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गैलापागोस द्वीपसमूह

गैलापागोस द्वीप समूह (आधिकारिक नाम: Archipiélago de Colón; अन्य स्पेनिश नाम: Islas de Colón या Islas Galápagos) प्रशांत महासागर में भूमध्य रेखा के आसपास फैले ज्वालामुखी द्वीपों का एक द्वीपसमूह है, जो महाद्वीपीय ईक्वाडोर के 972 किमी पश्चिम में स्थित है। यह एक यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल है: वन्यजीवन इसकी सबसे प्रमुख विशेषता है। गैलापागोस द्वीप समूह ईक्वाडोर के गैलापागोस प्रांत का निर्माण करते हैं साथ ही यह देश की राष्ट्रीय उद्यान प्रणाली का हिस्सा हैं। इस द्वीप की प्रमुख भाषा स्पेनिश है। इस द्वीपों की जनसंख्या 40000 के आसपास है, जिसमें पिछले 50 वर्षों में 40 गुना वृद्धि हुई है। भौगोलिक रूप से यह द्वीपसमूह नये हैं और स्थानीय प्रजातियों की अपनी विशाल संख्या के लिए प्रसिद्ध है, जिनका चार्ल्स डार्विन ने अपने बीगल के खोजी अभियान के दौरान अध्ययन किया था। उनकी टिप्पणियों और संग्रह ने डार्विन के प्राकृतिक चयन द्वारा क्रम-विकास के सिद्धांत के प्रतिपादन में योगदान दिया। विश्व के नये सात आश्चर्य फाउंडेशन द्वारा गैलापागोस द्वीपसमूह को प्रकृति के सात नए आश्चर्यों में से एक के लिए एक उम्मीदवार के रूप में सूचीबद्ध किया गया था। फ़रवरी 2009 तक द्वीप की श्रेणी, समूह बी में द्वीपसमूह की वरीयता प्रथम थी। .

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गूगल धरती

गूगल अर्थ वास्तविक भूमंडल (virtual globe) चित्रण का एक ऐसा कार्यक्रम है जिसे प्रारम्भ में अर्थ व्यूअर नाम दिया गया, तथा इसे कीहोल, इंक (Keyhole, Inc) द्वारा तैयार किया गया है, जो 2004 में गूगल द्वारा अधिगृहीत की गई एक कंपनी है। यह कार्यक्रम उपग्रह चित्रावली (satellite imagery), हवाई छायांकन (aerial photography) तथा भौगोलिक सूचना प्रणाली (GIS) त्रि आयामी (3D) भूमंडल से प्राप्त चित्रों का अध्यारोपण (superimposition) करते हुए धरती का चित्रण करता है। यह तीन विभिन्न अनुज्ञप्तियों के अधीन उपलब्ध है: गूगल अर्थ, सीमित कार्यात्मकता के साथ एक मुक्त संस्करण; गूगल अर्थ प्लस ($ २० प्रति वर्ष), जो अतिरिक्त विशेषताओं से युक्त है तथा गूगल अर्थ प्रो ($ ४०० प्रति वर्ष), जो कि वाणिज्यिक कार्यों में उपयोग हेतु तैयार किया गया है। २००६ में इस उत्पाद का नाम बदलकर गूगल अर्थ कर दिया गया, जो कि वर्तमान में माइक्रोसॉफ्ट विन्डोज़ (Microsoft Windows) २००० (2000), एक्स पी अथवा विस्ता, मैक ओएस एक्स (Mac OS X) १०.३.९ तथा उससे अधिक, लिनुक्स(१२ जून, २००६ को जारी) तथा फ्री BSD (FreeBSD) से युक्त निजी कंप्यूटरों (personal computer) पर उपयोग के लिए उपलब्ध है। गूगल अर्थ फायरफॉक्स, आई ई 6 (IE6) अथवा आई ई 7 (IE7) के लिए एक ब्राउज़र प्लगइन (02 जून, 2008 को जारी) के रूप में भी उपलब्ध है। एक अद्यतन कीहोल आधारित क्लाइंट को जारी करने के साथ, गूगल ने अपने वेब आधारित प्रतिचित्रण सॉफ़्टवेयर में अर्थ डेटाबेस की चित्रावली भी शामिल की है। वर्ष २००६ के मध्य जनता के लिए गूगल अर्थ जारी होने के साथ २००६ तथा २००७ के बीच आभासी भूमंडल (virtual globes) पर मीडिया कवरेज में दस गुना से भी अधिक की वृद्धि हुई तथा भूस्थानिक (geospatial) तकनीकों तथा अनुप्रयोगों में जनता की रूचि बढ़ गई। .

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गोंडवाना

लॉरेसिया एवं गोंडवाना लैंड गोण्डवाना (पूर्वनाम 'गोंडवाना लैंड ') प्राचीन वृहत महाद्वीप (अंग्रेज़ी:super continent) पैन्जिया का दक्षिणी भाग था। उत्तरी भाग को लॉरेशिया कहा जाता है। गोंडवाना लैंड का नाम एडुअरड सुएस ने भारत के गोंडवाना क्षेत्र के नाम पर रखा था। गोंडवाना भूभाग आज के समस्त दक्षिणी गोलार्ध के अलावा भारतीय उप महाद्वीप और अरब प्रायद्वीप जो वर्तमान मे उत्तरी गोलार्ध मे है का उद्गम स्थल है। गोंडवाना नाम नर्मदा नदी के दक्षिण स्थित प्राचीन गोंड राज्य से व्युत्पन्न है, जहाँ से गोंडवाना काल की शिलाओं का पहले पहल विज्ञानजगत्‌ को बोध हुआ था। इनका निक्षेपण पुराकल्प के अंतिम काल से अर्थात्‌ अंतिम कार्बन युग (Carboniferous) से आरंभ होकर मध्यकल्प के अधिकांश समय तक, अर्थात्‌ जुरैसिक (Jurassic) युग के अंत तक, चलता रहा। एक पूर्वकालीन विशाल दक्षिणी प्रायद्वीप के निम्न स्थलों अथवा विभंजित द्रोणियों में जो संभवत: मंद गति से निमजित हो रही थीं, नदी द्वारा निक्षिप्त अवसादों से इन शिलाओं का निर्माण हुआ। गोंडवाना काल में मुख्यत: मृत्तिका, शेलशिला (Shell), बलुआ पत्थर (sandstone), कंकरला मिश्रपिंडाश्म (conglomerate), सकोणाश्म (braccia) इत्यादि शिलाओं का निक्षेपण हुआ। स्वच्छ जल में निर्मित होने के कारण इन शिलाओं में स्वच्छ जलीय एवं स्थलीय जीवों तथा वनस्पतियों के जीवाश्म का बाहुल्य और महासागरीय जीवों एवं वनस्पतियों के जीवाश्म का अभाव है। .

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आयो (उपग्रह)

आयो (Io), हमारे सौर मण्डल के पाँचवे ग्रह बृहस्पति का तीसरा सब से बड़ा उपग्रह है और यह पूरे सौर मंडल का चौथा सब से बड़ा चन्द्रमा है। आयो का व्यास (डायामीटर) 3,642 किमी है। बृहस्पति के चार प्रमुख उपग्रहों (गैनिमीड, कलिस्टो, आयो और यूरोपा) में यह बृहस्पति की सब से क़रीबी कक्षा में परिक्रमा करने वाला चन्द्रमा है। बृहस्पति के इतना समीप होने की वजह से उस ग्रह के भयंकर गुरुत्वाकर्षण से पैदा होने वाला ज्वारभाटा बल आयो को गूंथता रहता है जिस से इस उपग्रह पर बहुत से ज्वालामुखी हैं। सन् 2010 तक आयो पर 400 से भी अधिक सक्रीय ज्वालामुखी गिने जा चुके थे। पूरे सौर मंडल में और कोई वस्तु नहीं जहाँ आयो से ज़्यादा भौगोलिक उथल-पुथल हो रही हो। सौर मंडल के बाहरी चंद्रमाओं की बनावट में ज़्यादातर बर्फ़ की बहुतायत होती है लेकिन आयो पर ऐसा नहीं है। आयो अधिकतर पत्थरीले पदार्थों का बना हुआ है। .

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आर्सेनिक

आर्सेनिक, आवर्त सारणी के पंचम मुख्य समूह का एक रासायनिक तत्व है। इसकी स्थिति फास्फोरस के नीचे तथा एंटीमनी के ऊपर है। आर्सेनिक में अधातु के गुण अधिक और धातु के गुण कम विद्यमान हैं। इस धातु को उपधातु (मेटालॉयड) की श्रेणी में रखा जाता है। आर्सेनिक से नीचे एंटीमनी में धातुगुण अधिक हैं तथा उससे नीचे बिस्मथ पूर्णरूपेण धातु है। पंचम मुख्य समूह में नीचे उतरने पर धातुगुण में वृद्धि होती है। आर्सैनिक की कुछ विशेषताएं निम्नांकित हैं: .

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आवर्न

फ्रांस का आर्वन प्रशासनिक क्षेत्र आवर्न (Auvergne) (फ्रांसीसी उच्चारण) फ्रांस से 27 प्रशानिक क्षेत्रों में से एक क्षेत्र है। इसमें चार डिपार्टमेन्त आते हैं - अलिर (Allier), पुई-डी-डोम (Puy de Dome), कैंटल (Cantal) और हौट ल्वायर (Haute Loire)। आवर्न पूर्वकाल में फ्रांस का एक प्रांत था। वर्तमान आवर्न क्षेत्र, ऐतिहासिक आवर्न प्रान्त से बड़ा है जिसमें अब वे भी क्षेत्र मिला लिये गये हैं जो पूर्व मे इससे अलग थे। इसकी प्राचीन और वर्तमान राजधनियां क्रमश: क्लेरमांट और क्लेरमांट-फेरंड हैं। 'आवर्न' शब्द की उत्पत्ति आवर्नी से हुई है। आवर्नी रोमन काल में एक जातिसमुदाय था, जिसकी प्रभुता अक्वीटानिया के अधिकांश पर फैली हुई थी। इस समुदाय ने जूलिएस सीज़र के विरुद्ध युद्ध में भाग लिया था। आवर्न 1532 ई. में स्थायी रूप से फ्रांसीसी राजसत्ता के अधीन आ गया। यहाँ स्थित पर्वत अधिकतर ज्वालामुखी हैं। महत्वपूर्ण पर्वतशिखर मांट डोर (ऊँचाई 6,188 फुट), प्लंब डी कैंटल (ऊँचाई 6,096) फुट और पुई-डी-डोम (ऊँचाई 4,806 फुट) हैं। यहां के सुप्त ज्वालामुखियों की संख्या लगभग 300 हैं। यहाँ विस्तृत चरागाह और औषधीय सोते (धाराएँ) भी हैं। .

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आग्नेय शैल

ग्रेनाइट (एक आग्नेय चट्टान) चेन्नई मे, भारत. आग्नेय चट्टान (जर्मन: Magmatisches Gestein) की रचना धरातल के नीचे स्थित तप्त एवं तरल चट्टानी पदार्थ, अर्थात् मैग्मा, के सतह के ऊपर आकार लावा प्रवाह के रूप में निकल कर अथवा ऊपर उठने के क्रम में बाहर निकल पाने से पहले ही, सतह के नीचे ही ठंढे होकर इन पिघले पदार्थों के ठोस रूप में जम जाने से होती है। अतः आग्नेय चट्टानें पिघले हुए चट्टानी पदार्थ के ठंढे होकर जम जाने से बनती हैं। ये रवेदार भी हो सकती है और बिना कणों या रवे के भी। ये चट्टानें पृथ्वी पर पायी जाने वाली अन्य दो प्रमुख चट्टानों, अवसादी और रूपांतरित के साथ मिलकर पृथ्वी पर पायी जाने वाली चट्टानों के तीन प्रमुख प्रकार बनाती हैं। पृथ्वी के धरातल की उत्पत्ति में सर्वप्रथम इनका निर्माण होने के कारण इन्हें 'प्राथमिक शैल' भी कहा जाता है। ऐसा इसलिए भी कहा जाता है कि यही वे पहली चट्टानें हैं जो पिघले हुए चट्टानी पदार्थ से बनती हैंजबकि अवसादी या रूपांतरित चट्टानें इन आग्नेय चट्टानों के टूटने या ताप और दाब के प्रभाव आकार में बदलने से से बनती हैं। इनके दो मुख्य प्रकार हैं। ज्वालामुखी उदगार के समय भूगर्भ से निकालने वाला लावा जब धरातल पर जमकर ठंडा हो जाने के पश्चात आग्नेय चट्टानों में परिवर्तित हो जाता है तो इसे बहिर्भेदी या ज्वालामुखीय चट्टान कहा जाता है। इसके विपरीत जब ऊपर उठता हुआ मैग्मा धरातल की सतह पर आकर बाहर निकलने से पहले ही ज़मीन के अन्दर ही ठंडा होकर जम जाता है तो इस प्रकार अंतर्भेदी चट्टान कहते हैं। चूँकि, ज़मीनी सतह से नीचे बनने वाली आग्नेय चट्टानें धीरे-धीरे ठंडी होकर जमती है, ये रवेदार होती हैं, क्योंकि मैग्माई पदार्थ के अणुओं के एक दूसरे के साथ संयोजित होकर क्रिस्टल या रवे बनाने हेतु काफ़ी समय मिल जाता है। इसके ठीक उलट, जब मैग्मा लावा के रूप में ज्वालामुखी उदगार के समय बाहर निकल कर ठंढा होकर जमता है तो रवे बनने के लिये पर्याप्त समय नहीं मिलता और इस प्रकार बहिर्भेदी आग्नेय चट्टानें काँचीय या गैर-रवेदार (glassy) होती हैं। आग्नेय चट्टानों में परतों और जीवाश्मों का पूर्णतः अभाव पाया जाता है। अप्रवेश्यता अधिक होने के कारण इन पर रासायनिक अपक्षय का बहुत कम प्रभाव पड़ता है, लेकिन यांत्रिक एवं भौतिक अपक्षय के कारण इनका विघटन व वियोजन प्रारम्भ हो जाता है। ग्रेनाइट, बेसाल्ट, गैब्रो, ऑब्सीडियन, डायोराईट, डोलोराईट, एन्डेसाईट, पेरिड़ोटाईट, फेलसाईट, पिचस्टोन, प्युमाइस इत्यादि आग्नेय चट्टानों के प्रमुख उदाहरण है। .

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इश्तार टेरा

इश्तार टेरा (Ishtar Terra), शुक्र ग्रह पर दो मुख्य उच्चभूम क्षेत्रों में से एक है। यह दो "महाद्वीपों" में छोटा है और उत्तरी ध्रुव के पास स्थित है। यह अकाडिनी देवी इश्तार पर नामित है। इश्तार टेरा का आकार मोटे तौर पर ऑस्ट्रेलिया और संयुक्त राज्य अमेरिका महाद्वीप के बीच है। इसके पूर्वी किनारे पर महान पर्वत श्रृंखला मैक्सवेल मोंटेस स्थित है जो 11 किमी ऊंची है, तुलना के लिए माउंट एवरेस्ट 8.8 किमी उंचा है। पर्वत श्रृंखला के एक तरफ लावा से भरा 100 किमी व्यास का प्रहार क्रेटर है। इश्तार टेरा शुक्र की चार मुख्य पर्वत श्रृंखलाएं शामिल करती है: पूर्वी तट पर मैक्सवेल मोंटेस, उत्तर में फ्रेज्या मोंटेस, अक्ना मोंटेस पश्चिमी तट पर और दक्षिणी क्षेत्र में दानु मोंटेस। ये इश्तार टेरा के निचले मैदान को घेरते हैं, जो कि लक्ष्मी प्लैनम से नामित है (हिंदू देवी लक्ष्मी के नाम पर)। इश्तार टेरा प्रसिद्ध महिलाओं पर नामित ज्वालामुखी भी शामिल करते हैं: साकाज़ाविया, कोलेट और क्लियोपेट्रा। श्रेणी:खगोलशास्त्र श्रेणी:शुक्र ग्रह श्रेणी:शुक्र की स्थलाकृति.

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कमचातका प्रायद्वीप

अंतरिक्ष से (आधे बर्फ़ से ढके हुए) कमचातका का दृश्य कमचातका प्रायद्वीप (रूसी: полуо́стров Камча́тка, पोलूओस्त्रोव कमचातका) रूस के साइबेरिया क्षेत्र के सुदूर पूर्व में एक 1,250 किमी लम्बा प्रायद्वीप है। इसका क्षेत्रफल 472,300 वर्ग किमी है (यानि भारत के उत्तर प्रदेश राज्य से लगभग दुगना)। यह उत्तर में साइबेरिया से जुड़ा हुआ है। इसके पूर्व में प्रशांत महासागर है और पश्चिम में ओख़ोत्स्क सागर है। प्रशासनिक रूप से यह रूस के कमचातका क्राय विभाग का हिस्सा है। कमचातका का काफ़ी क्षेत्र पहाड़ी है और इसपर लगभग 160 ज्वालामुखी स्थित हैं, जिनमें से 29 अभी भी सक्रीय माने जाते हैं। इनमें से एक ज्वालामुखी, क्लुचेव्स्काया सोप्का, 15,584 फ़ुट ऊँचा है और पृथ्वी के उत्तरी गोलार्ध (हेमिस्फ़ेयर) का सबसे बड़ा ज्वालामुखी माना जाता है। कमचातका पर तरह-तरह के पशु-पक्षी पाए जाते हैं, जिनमें से भूरा भालू सबसे प्रसिद्ध है और बहुत बड़े आकार का होता है। .

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कायाम्बे ज्वालामुखी

कायाम्बे ज्वालामुखी इक्वेडोर में स्थित एक ज्वालामुखी है। इक्वेडोर के ज्वालामुखी .

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क्यूशू

जापान का क्यूशू द्वीप (लाल रंग में, जिसके अन्दर प्रान्त दिखाए गए हैं) बॅप्पु के गरम पानी के चश्मों से उठती हुई भाप क्यूशू का नक़्शा क्यूशू (जापानी: 九州, "नौ प्रान्त") जापान के चारों मुख्य द्वीपों में से तीसरा सब से बड़ा और सब से दक्षिणपश्चिमी द्वीप है। कुल मिलकर क्यूशू का क्षेत्रफल ३५,६४० वर्ग किमी है और इसकी जनसँख्या सन् २००६ में १,३२,३१,९९५ थी। यह होन्शू और शिकोकू द्वीपों के दक्षिण-पश्चिम में स्थित है। प्राचीनकाल में क्यूशू को कुछ अन्य नामों से भी बुलाया जाता था, जैसे के क्यूकोकु (九国, "नौ राज्य"), चिनज़इ (鎮西, "अधिकृत क्षेत्र से पश्चिम") और त्सुकुशी-नो-शीमा (筑紫島,"त्सुकुशी का द्वीप")। क्यूशू और इसके इर्द-गिर्द के छोटे द्वीपों को इतिहास में साऍकाऍदो (西海道, "पश्चिमी समुद्री घेरा") भी बुलाया जाता था। .

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क्रिस्टलकी

क्रिस्टलकी (Crystallography) या मणिविज्ञान एक प्रायोगिक विज्ञान है जिसमें ठोसों में परमाणों के विन्यास (arrangement) का अध्ययन किया जाता है। पहले क्रिस्टलिकी से तात्पर्य उस विज्ञान से था जिसमें क्रिस्टलों का अध्ययन किया जाता है। एक्स-किरण के डिफ्रैक्सन द्वारा क्रिस्टलोंके अध्ययनके पहले क्रिस्टलोंका अध्ययन केवल उनकी ज्यामिति (आकार-प्रकार) देखकर की जाती थी। किन्तु आजकल विविध-प्रकार के किरण-पुंजों (एक्स-किरण, एलेक्ट्रान, न्यूट्रान, सिन्क्रोट्रान आदि) के डिफ्रैक्सन से किया जाता है। .

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क्रेटर

अपोलो १५ यान द्वारा खींची गयी चन्द्रमा पर ऍरिस्टार्कस और हॅरोडोटस क्रेटरों की तस्वीर क्रेटर किसी खगोलीय वस्तु पर एक गोल या लगभग गोल आकार के गड्ढे को कहते हैं जो किसी विस्फोटक ढंग से बना हो, चाहे वह ज्वालामुखी का फटना हो, अंतरिक्ष से गिरे उल्कापिंड का प्रहार हो या फिर ज़मीन के अन्दर कोई अन्य विस्फोट हो। विस्फोट का कारण प्राकृतिक हो सकता है या कृत्रिम (जैसे की परमाणु बम का विस्फोट)। क्रेटर कई प्रकार के होते हैं -.

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कैनरी द्वीपसमूह

कैनरी द्वीपसमूह का नक़्शा कैनरी द्वीपसमूह अफ़्रीका के उत्तरपश्चिमी छोर से आगे अंध महासागर में स्थित हैं पिको देल तेइदे (तेनरीफ़) कैनरी द्वीपसमूह स्पेन द्वारा नियंत्रित द्वीपों का एक समूह है जो अफ़्रीका के उत्तरपश्चिमी छोर से आगे अंध महासागर में स्थित है। प्रशासनिक दृष्टि से यह स्पेन का एक स्वायत्त समुदाय है, जो लगभग एक राज्य जैसा दर्जा रखता है। इस द्वीपसमूह में (बड़े से छोटे) यह द्वीप आते हैं: तेनरीफ़ (Tenerife), ग्रान कानारिया (Gran Canaria), फ़्वेरतेवेन्तूरा (Fuerteventura), लान्सारोते (Lanzarote), ला पाल्मा (La Palma), ला गोमेरा (La Gomera), ला ईएरो (La Hierro), ला ग्रासीओसा (La Graciosa), आलेग्रान्सा (Alegranza), मोन्तान्या क्लारा (Montaña Clara), रोक दॅल एस्ते (Roque del Este), रोक दॅल ओएस्ते (Roque del Oeste) और इस्ला दे लोबोस (Isla de Lobos)। इस प्रदेश की दो राजधानियाँ हैं: तेनरीफ़ के द्वीप पर स्थित सान्ता क्रूस दे तेनरीफ़ (Santa Cruz de Tenerife) और ग्रान कानारिया द्वीप पर स्थित लास पालमास दे ग्रान कानारिया (Las Palmas de Gran Canaria)। तेनरीफ़ पर पिको देल तेइदे (Pico del Teide) नाम का ज्वालामुखी स्थित है जो आकार में विश्व का तीसरा सब से बड़ा ज्वालामुखी है। .

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कैरीबियाई प्लेट

कैरीबियाई तख़्ता इस नक़्शे के ठीक बीच में है कैरीबियाई प्लेट एक भौगोलिक प्लेट है जिसके ऊपर कैरीबियन सागर और मध्य अमेरिका के कुछ भाग स्थित हैं। इस प्लेट का क्षेत्रफल ३२ लाख वर्ग किमी है। इसकी सीमाएँ उत्तर अमेरिकी प्लेट, दक्षिण अमेरिकी प्लेट, नाज़का प्लेट और कोकोस प्लेट को लगती हैं। इन सीमाओं पर कई ज्वालामुखी स्थित हैं और कभी-कभी भूकंप भी आते हैं। .

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केप्लर-452बी

केप्लर-452बी यह केप्लर-452 तारे की परिक्रमा करने वाला एक ग़ैर-सौरीय ग्रह है। इसका खुलासा नासा ने 23 जुलाई 2015 को किया था। यह 1,400 प्रकाश वर्ष दूर है। यहाँ तक पहुँचने के लिए मानव द्वारा निर्मित अब तक के सबसे अधिक गति के यान के द्वारा 25 करोड़ 80 लाख वर्ष तक का समय लग जाएगा। .

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कोरिया का इतिहास

बुलगुक्सा मंदिर यूनेस्को द्वारा विश्व विरासत घोषित किया गया है। कोरिया, पूर्वी एशिया में मुख्य स्थल से संलग्न एक छोटा सा प्रायद्वीप जो पूर्व में जापान सागर तथा दक्षिण-पश्चिम में पीतसागर से घिरा है (स्थिति: ३४० ४३ उ. अ. से १२४० १३१ पू. दे.)। उसके उत्तरपश्चिम में मंचूरिया तथा उत्तर में रूस की सीमाएँ हैं। यह प्रायद्वीप दो खंडों में बँटा हुआ है। उत्तरी कोरिया का क्षेत्रफल १,२१,००० वर्ग किलोमीटर है। इसकी राजधनी पियांगयांग है। दक्षिणी कोरिया का क्षेत्रफल ९८,००० वर्ग किलोमीटर है। यहाँ पर ई. पू.

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कोर्दिल्येरा सेन्ट्रल (लूज़ोन)

कोर्दिल्येरा सेन्ट्रल (Cordillera Central) दक्षिणपूर्वी एशिया के फ़िलिपीन्ज़ देश की सबसे ऊँची पर्वतमाला है। यह लूज़ोन द्वीप के उत्तर-मध्य भाग में खड़ी है और कोर्दिल्येरा प्रशासनिक क्षेत्र के सभी प्रान्तों और कुछ अन्य प्रशासनिक क्षेत्रों के कुछ प्रान्तों पर विस्तृत है। उत्तर में यह लूज़ोन के उत्तरी तट पर समाप्त होती है और दक्षिणपूर्व में यह काराबालो पहाड़ियों से जुड़ी हुई है जो स्वयं आगे चलकर सियेर्रा माद्रे पहाड़ियों में मिल जाती हैं। कोर्दिल्येरा सेन्ट्रल में तीन सक्रीय ज्वालामुखी भी हैं। .

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अण्डमान

अंग्रेज़ी) अंडमान बंगाल की खाड़ी में स्थित भारत के अंडमान व निकोबार द्वीपसमूह का उत्तरी भाग है। अंडमान अपने आंचल में मूंगे (कोरल) की दीवारों, साफ-स्वच्छ सागर तट, पुरानी यादों से जुड़े खंडहर और अनेक प्रकार की दुर्लभ वनस्पतियां संजोए हैं। इस द्वीपसमूह में कुल 572 द्वीप हैं। अंडमान का लगभग 86 प्रतिशत क्षेत्रफल जंगलों से ढका हुआ है। समुद्री जीवन, इतिहास और जलक्रीड़ाओं में रूचि रखने वाले सैलानियों को यह द्वीप बहुत रास आता है। .

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अदन

अदन यमन का एक शहर है। यह उस देश का सबसे महत्त्वपूर्ण आर्थिक केंद्र और बंदरगाह है। अदन लाल सागर की अदन की खाड़ी पर बाब अल-मन्देब जलसन्धि से १७० किमी पूर्व में स्थित है। यहाँ लगभग १० लाख लोग रहते हैं। अदन बंदरगाह एक शांत ज्वालामुखी के क्रेटर में स्थित है। यहाँ १८३९ से १९६७ के काल में ब्रिटिश क़ब्ज़ा रहा और इस दौरान १९३७ तक इसे ब्रिटिश भारत का हिस्सा माना जाता था।, Shyam Singh Shashi Shashi, Anmol Publications, 1996, ISBN 978-81-7041-859-7,...

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अदन प्रान्त

अदन प्रान्त (अरबी:, अंग्रेज़ी: 'Adan) यमन का एक प्रान्त है। इस प्रान्त का अधिकतर भाग अदन का शहर है जो ऐतिहासिक महत्व रखता है। प्राचीनकाल में यह क्रेटर (Crater) कहलाया जाता था क्योंकि यह एक मृत ज्वालामुखी के मुख (क्रेटर) में स्थित है। १८३९ से १९६७ के काल में अदन पर ब्रिटिश क़ब्ज़ा हो गया। सालों के संघर्ष के बाद अदन और यमन के अन्य दक्षिणी प्रान्तों को आजादी मिली और अदन 'दक्षिण यमन' की राजधानी बना। १९९० में दक्षिण और उत्तरी यमन के दो राष्ट्रों का विलय हुआ और अदन नए 'यमन गणतंत्र' का सबसे महत्त्वपूर्ण आर्थिक केंद्र बन गया। सुक़ूत्रा का द्वीप समूह भी अदन प्रान्त का हिस्सा हुआ करता था लेकिन २००४ में इसे हदरामौत प्रान्त में डाल दिया गया। .

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अनार (आतिशबाज़ी)

एक चलता हुआ अनार शंकुनुमा (कोन) अनार अनार एक आतिशबाज़ी होता है जिसे ज़मीन पर रख कर उसका सिरा जलाने से वह ऊपर की ओर आकर्षक चिंगारियों का फव्वारा छोड़ता है।, Nigel B. Hankin, India Presearch Press, 2003, ISBN 978-81-87943-04-4,...

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अफ़्रीका

अफ़्रीका वा कालद्वीप, एशिया के बाद विश्व का सबसे बड़ा महाद्वीप है। यह 37°14' उत्तरी अक्षांश से 34°50' दक्षिणी अक्षांश एवं 17°33' पश्चिमी देशान्तर से 51°23' पूर्वी देशान्तर के मध्य स्थित है। अफ्रीका के उत्तर में भूमध्यसागर एवं यूरोप महाद्वीप, पश्चिम में अंध महासागर, दक्षिण में दक्षिण महासागर तथा पूर्व में अरब सागर एवं हिन्द महासागर हैं। पूर्व में स्वेज भूडमरूमध्य इसे एशिया से जोड़ता है तथा स्वेज नहर इसे एशिया से अलग करती है। जिब्राल्टर जलडमरूमध्य इसे उत्तर में यूरोप महाद्वीप से अलग करता है। इस महाद्वीप में विशाल मरुस्थल, अत्यन्त घने वन, विस्तृत घास के मैदान, बड़ी-बड़ी नदियाँ व झीलें तथा विचित्र जंगली जानवर हैं। मुख्य मध्याह्न रेखा (0°) अफ्रीका महाद्वीप के घाना देश की राजधानी अक्रा शहर से होकर गुजरती है। यहाँ सेरेनगेती और क्रुजर राष्‍ट्रीय उद्यान है तो जलप्रपात और वर्षावन भी हैं। एक ओर सहारा मरुस्‍थल है तो दूसरी ओर किलिमंजारो पर्वत भी है और सुषुप्‍त ज्वालामुखी भी है। युगांडा, तंजानिया और केन्या की सीमा पर स्थित विक्टोरिया झील अफ्रीका की सबसे बड़ी तथा सम्पूर्ण पृथ्वी पर मीठे पानी की दूसरी सबसे बड़ी झीलहै। यह झील दुनिया की सबसे लम्बी नदी नील के पानी का स्रोत भी है। कुछ इतिहासकारों का मानना है कि इसी महाद्वीप में सबसे पहले मानव का जन्म व विकास हुआ और यहीं से जाकर वे दूसरे महाद्वीपों में बसे, इसलिए इसे मानव सभ्‍यता की जन्‍मभूमि माना जाता है। यहाँ विश्व की दो प्राचीन सभ्यताओं (मिस्र एवं कार्थेज) का भी विकास हुआ था। अफ्रीका के बहुत से देश द्वितीय विश्व युद्ध के बाद स्वतंत्र हुए हैं एवं सभी अपने आर्थिक विकास में लगे हुए हैं। अफ़्रीका अपनी बहुरंगी संस्कृति और जमीन से जुड़े साहित्य के कारण भी विश्व में जाना जाता है। .

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अफ़्रीका की भू-प्रकृति

अफ्रीका का भौतिक मानचित्र ड्रेकेन्सबर्ग पर्वत इथियोपिया का पठार अफ्रीका ऊँचे पठारों का महाद्वीप है, इसका निर्माण अत्यन्त प्राचीन एवं कठोर चट्टानों से हुआ है। इस लावा निर्मित पठार को ढाल (शील्ड) कहते हैं। जर्मनी के प्रसिद्ध जलवायुवेत्ता तथा भूशास्त्रवेत्ता अल्फ्रेड वेगनर ने पूर्व जलवायु शास्त्र, पूर्व वनस्पति शास्त्र, भूशास्त्र तथा भूगर्भशास्त्र के प्रमाणों के आधार पर यह प्रमाणित किया कि एक अरब वर्ष पहले समस्त स्थल भाग एक स्थल भाग के रूप में संलग्न था एवं इस स्थलपिण्ड का नामकरण पैंजिया (पूर्ण पृथ्वी) किया। कार्बन युग में पैंजिया के दो टुकड़े हो गये जिनमें से एक उत्तर तथा दूसरा दक्षिण में चला गया। पैंजिया का उत्तरी भाग लारेशिया तथा दक्षिणी भाग गोंडवाना लैंड को प्रदर्शित करता था।अफ्रीका महादेश का धरातल प्राचीन गोंडवाना लैंड का ही एक भाग है। बड़े पठारों के बीच अनेक छोटे-छोटे पठार विभिन्न ढाल वाले हैं। इसके उत्तर में विश्व का बृहत्तम शुष्क मरुस्थल सहारा उपस्थित है। इसके नदी बेसिनों का मानव सभ्यता के विकास में उल्लेखनीय योगदान रहा है, जिसमें नील नदी बेसिन का विशेष स्थान है। समुद्रतटीय मैदानों को छोड़कर किसी भी भाग की ऊँचाई ३२५ मीटर से कम नहीं है। महाद्वीप के उत्तरी-पश्चिमी भाग तथा सुदूर दक्षिण में मोड़दार पर्वत मिलते हैं। अफ्रीका के उत्तर-पश्चिम में एटलस पर्वत की श्रेणियाँ हैं, जो यूरोप के आल्प्स पर्वतमाला की ही एक शाखा है। ये पर्वत दक्षिण-पश्चिम से उत्तर-पूर्व दिशा में फैले हुए हैं और उत्तर की अपेक्षा दक्षिण में अधिक ऊँचे हैं। इसकी सबसे ऊँची चोटी जेबेल टूबकल है जिसकी ऊँचाई ४,१६७ मीटर है। यहाँ खारे पानी की कई झीलें हैं जिन्हें शॉट कहते हैं। मध्य का निम्न पठार भूमध्य रेखा के उत्तर पश्चिम में अन्ध महासागर तट से पूर्व में नील नदी की घाटी तक फैला हुआ है। इसकी ऊँचाई ३०० से ६०० मीटर है। यह एक पठार केवल मरुस्थल है जो सहारा तथा लीबिया के नाम से प्रसिद्ध है। यह एक प्राचीन पठार है तथा नाइजर, कांगो (जायरे), बहर एल गजल तथा चाड नदियों की घाटियों द्वारा कट-फट गया है। इस पठार के मध्य भाग में अहगर एवं टिबेस्टी के उच्च भाग हैं जबकि पूर्वी भाग में कैमरून, निम्बा एवं फूटा जालौन के उच्च भाग हैं। कैमरून के पठार पर स्थित कैमरून (४,०६९ मीटर) पश्चिमी अफ्रीका की सबसे ऊँचा चोटी है। कैमरून गिनि खाड़ी के समानान्तर स्थित एक शांत ज्वालामुखी है। पठार के पूर्वी किनारे पर ड्रेकेन्सबर्ग पर्वत है जो समुद्र तट की ओर एक दीवार की भाँति खड़ा है। ड्रेकेन्सबर्ग का स्थानीय नाम क्वाथालम्बा है एवं यह ३,००० मीटर तक ऊँचा है। केप प्रान्त में यह पठार दक्षिण की ओर चबूतरे के रूप में समुद्र तक नीचे उतरता है। इन चबूतरों को कारू कहते हैं। इनमें उत्तरी चबूतरे को महान कारू तथा दक्षिणी चबूतरे को लघु कारू कहते हैं। दक्षिणी-पश्चिमी भाग में कालाहारी का मरूस्थल है। पूर्व एवं दक्षिण का उच्च पठार भूमध्य रेखा के पूर्व तथा दक्षिण में स्थित है तथा अपेक्षाकृत अधिक ऊँचा है। प्राचीन समय में यह पठार दक्षिण भारत के पठार से मिला था। बाद में बीच की भूमि के धँसने के कारण यह हिन्द महासागर द्वारा अलग हो गया। इस पठार का एक भाग अबीसिनिया में लाल सागर के तटीय भाग से होकर मिस्र देश तक पहुँचती है। इसमें इथोपिया, पूर्वी अफ्रीका एवं दक्षिणी अफ्रीका के पठार सम्मिलित हैं। अफ्रीका के उत्तर-पश्चिम में इथोपिया का पठार है। इस पठार का अधिकांश भाग २,४०० मीटर से ऊँचा है तथा प्राचीनकालीन ज्वालामुखी के उद्गार से निकले हुए लावा से निर्मित है। इसी पठार से नील नदी की सहायक नीली नील नदी निकलती है। नील नदी की कई सहायक नदियों ने इस पठार को काट कर घाटियाँ बना दी हैं। इथोपिया की पर्वतीय गाँठ से कई उच्च श्रेणियाँ निकलकर पूर्वी अफ्रीका के झील प्रदेश से होती हुई दक्षिण की ओर जाती हैं। इथोपिया की उच्च भूमि के दक्षिण में पूर्वी अफ्रीका की उच्च भूमि है। इस पठार का निर्माण भी ज्वालामुखी की क्रिया द्वारा हुआ है। इस श्रेणी में किलिमांजारो (५,८९५ मीटर), रोबेनजारो (५,१८० मीटर) और केनिया (५,४९० मीटर) की बर्फीली चोटियाँ भूमध्यरेखा के समीप पायी जाती हैं। ये तीनों ज्वालामुखी पर्वत हैं। केनिया तथा किलिमांजारो गुटका पर्वत भी हैं। किलिमंजारो अफ्रीका का सबसे ऊँचा पर्वत एवं चोटी है। अफ्रीका के दरार घाटी की कुछ झीलों का आकाशीय दृश्य दक्षिण अफ्रीका के तट का उपग्रह से खींचा गया चित्र अफ्रीका महाद्वीप की एक मुख्य भौतिक विशेषता पृथ्वी की आन्तरिक हलचलों के कारण अफ्रीका के पठार के पूर्वी भाग में भ्रंश घाटियों की उपस्थिति है। यह दरार घाटी पूर्वी अफ्रीका की महान दरार घाटी के नाम से प्रसिद्ध है तथा उत्तर से दक्षिण फैली है। भ्रंश घाटी एक लम्बी, संकरी एवं गहरी घाटी है जिसके किनारे के ढाल खड़े हैं। प्राचीन काल में पृथ्वी की आन्तरिक शक्तियों के कारण इस पठार पर दो विपरीत दिशाओं से दबाव पड़ा जिससे उसमें कई समानान्तर दरारें पड़ गयीं। जब दो समानान्तर दरारों के बीच का भाग नीचे धँस गया तो उस धँसे भाग को दरार घाटी कहते हैं। इनके दोनों किनारे दीवार की तरह ढाल वाले होते हैं। यह विश्व की सबसे लम्बी दरार घाटी है तथा ४,८०० किलोमीटर लम्बी है। अफ्रीका की महान दरार घाटी की दो शाखाएँ हैं- पूर्वी एवं पश्चिमी। पूर्वी शाखा दक्षिण में मलावी झील से रूडाल्फ झील तथा लाल सागर होती हुई सहारा तक फैली हुई है तथा पश्चिमी शाखा मलावी झील से न्यासा झील एवं टांगानिका झील होती हुई एलबर्ट झील तक चली गयी है। भ्रंश घाटियों में अनेक गहरी झीलें हैं। रुकवा, कियू, एडवर्ड, अलबर्ट, टाना व न्यासा झीलें भ्रंश घाटी में स्थित हैं। अफ्रीका महाद्वीप के चारो ओर संकरे तटीय मैदान हैं जिनकी ऊँचाई १८० मीटर से भी कम है। भूमध्य सागर एवं अन्ध महासागर के तटों के समीप अपेक्षाकृत चौड़े मैदान हैं। अफ्रीका महाद्वीप में तटवर्ती प्रदेश सीमित एवं अनुपयोगी हैं क्योंकि अधिकांश भागों में पठारी कगार तट तक आ गये हैं और शेष में तट में दलदली एवं प्रवाल भित्ति से प्रभावित हैं। मॉरीतानिया और सेनेगल का तटवर्ती प्रदेश काफी विस्तृत है, गिनी की खाड़ी का तट दलदली एवं अनूप झीलों से प्रभावित है। जगह-जगह पर रेतीले टीले हैं तथा अच्छे पोताश्रयों का अभाव है। पश्चिमी अफ्रीका का तट की सामान्यतः गिनी तट के समान है जिसमें लैगून एवं दलदलों की अधिकता है। दक्षिणी अफ्रीका में पठार एवं तट में बहुत ही कम अन्तर है। पूर्वी अफ्रीका में प्रवालभित्तियों की अधिकता है। अफ्रीका में निम्न मैदानों का अभाव है। केवल कांगो, जेम्बेजी, ओरेंज, नाइजर तथा नील नदियों के संकरे बेसिन हैं। .

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अरख़ानगई प्रांत

अरख़ानगई (मंगोल: Архангай; अंग्रेज़ी: Arkhangai) मंगोलिया के पश्चिम-मध्य में स्थित उस देश का एक अइमग (यानि प्रांत) है।, Michael Kohn, Lonely Planet, 2005,...

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अर्कनोइड (खगोलभूविज्ञान)

अर्कनोइड (arachnoid), खगोलभूविज्ञान में अज्ञात मूल की एक बड़ी संरचना है और वे मात्र शुक्र ग्रह की सतह पर ही पाई गई हैं। अर्कनोइड ने अपना नाम मकड़ी के जाले से समानता से पाया है। वे ऐसी दिखाई देती है जैसे संकेंद्रित अंडे को दरारों के एक जटिल नेटवर्क ने चारों ओर से घेर रखा हों और यह 200 किलोमीटर तक फैली हो सकती हैं। शुक्र पर अब तक तीस से अधिक अर्कनोइड की पहचान की जा चुकी है। अर्कनोइड ज्वालामुखी के अनोखे संबंधी हो सकते है, लेकिन संभवतः अलग अलग अर्कनोइड विभिन्न प्रक्रियाओं से बनते हैं।This article contains text from the Astronomy Picture of the Day.

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अल्बाय प्रान्त

अल्बाय (Albay) दक्षिणपूर्वी एशिया के फ़िलिपीन्ज़ देश के बिकोल प्रशासनिक क्षेत्र का एक प्रान्त है। यह लूज़ोन द्वीप के दक्षिणपूर्व में स्थित है और मायोन ज्वालामुखी के लिए जाना जाता है जो लगभग त्रुटिहीन शंकु आकृति का सक्रीय ज्वालामुखी है। .

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अग्नि वृत्त

विश्व के लगभग दो तिहाई ज्वालामुखी प्रशांत महासागर के वृत्त में पाये जाते हैं, जिसको ज्वाला-वृत्त अथवा अग्नि-वृत्त कहते हैं। .

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अंतरिक्ष विज्ञान

गैलेक्सी के एक भाग को प्रदर्शित करता हुआ एक तस्वीर अंतरिक्ष विज्ञान एक व्यापक शब्द है जो ब्रह्मांड के अध्ययन से जुड़े विभिन्न विज्ञान क्षेत्रों का वर्णन करता है तथा सामान्य तौर पर इसका अर्थ "पृथ्वी के अतिरिक्त" तथा "पृथ्वी के वातावरण से बाहर" भी है। मूलतः, इन सभी क्षेत्रों को खगोल विज्ञान का हिस्सा माना गया था। हालांकि, हाल के वर्षों में खगोल के कुछ क्षेत्रों, जैसे कि खगोल भौतिकी, का इतना विस्तार हुआ है कि अब इन्हें अपनी तरह का एक अलग क्षेत्र माना जाता है। कुल मिला कर आठ श्रेणियाँ हैं, जिनका वर्णन अलग से किया जा सकता है; खगोल भौतिकी, गैलेक्सी विज्ञान, तारकीय विज्ञान, पृथ्वी से असंबंधित ग्रह विज्ञान, अन्य ग्रहों का जीव विज्ञान, एस्ट्रोनॉटिक्स/ अंतरिक्ष यात्रा, अंतरिक्ष औपनिवेशीकरण और अंतरिक्ष रक्षा.

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उड़नेवाला स्पघेटी दानव

उड़नेवाला स्पघेटी दानव पास्ताफ़ारी धर्म (पास्ता और रस्ताफ़ारी शब्दों का जोड़) का ईश्वर है। इसे अमेरिका के सरकारी विद्यालयों में इंटेलिजेंट डिज़ाइन और क्रिएशनिस्म पढ़ाने का विरोध करने के लिए सन् 2005 में बनाया गया था। इसके माध्यम से ये दर्शाया जाता है कि दर्शनशास्त्रिय सबूत का बोझ उस व्यक्ति पर है जो वैज्ञानिक दृष्टि से झूठाया न जा सकने वाला दावा कर रहा हो, बजाय उस व्यक्ति के जो उस दावे को अस्वीकार कर रहा हो। हालांकि इस धर्म के अनुयायी इसे एक असली धर्म बताते हैं, पर मीडिया में इसे एक व्यंग्य धर्म की तरह देखा जाता है। .

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उष्णकटिबंधीय सदाबहार वन

उष्णकटिबंधीय सदाबहार वन ऐसे वन क्षेत्र हैं जो भूमध्य रेखा के दक्षिण या उत्तर में लगभग 28 डिग्री के भीतर पाए जाते हैं। ये एशिया, ऑस्ट्रेलिया, अफ्रीका, दक्षिण अमेरिका, मध्य अमेरिका, और प्रशांत द्वीपों पर पाए जाते हैं। विश्व वन्यजीव निधि के बायोम वर्गीकरण के भीतर उष्णकटिबंधीय सदाबहार वन को उष्णकटिबंधीय वर्षावन वन (या उष्णकटिबंधीय नम चौड़े पत्ते के वन) का एक प्रकार माना जाता है और उन्हें विषुवतीय सदाबहार तराई वन के रूप में भी निर्दिष्ट किया जा सकता है। इस जलवायु क्षेत्र में न्यूनतम सामान्य वार्षिक वर्षा 175 cm (69 इंच) और 200 cm (79 इंच) के बीच होती है। औसत मासिक तापमान वर्ष के सभी महीनों के दौरान 18 °से.

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उष्णोत्स

उष्णोत्स (geyser, गीज़र या गाइज़र दोनों स्वीकार्य) एक प्रकार का पानी का चश्मा होता है जिसमें समय-समय पर पानी ज़ोरों से धरती से शक्तिशाली फव्वारे की भांति फूटता है और साथ में भाप निकलती है। यह पृथ्वी पर कम स्थानों में ही मिलते हैं क्योंकि इनके निर्माण के लिए विशेष भूतापीय व अन्य भूवैज्ञानिक परिस्थितियों की ज़रूरत होती है। .

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उस्यन्त पठार

ऐसे पठारों की उत्पत्ति ज्वालामुखी उद्दगार के समय लावा के धरातल पर फैलकर जमा हो जाने के कारण होती हैं। श्रेणी:बहिर्जात बलों से उत्पन्न पठार श्रेणी:पठारों का वर्गिकरण.

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१९१९

1919 ग्रेगोरी कैलंडर का एक साधारण वर्ष है। .

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२ दिसम्बर

2 दिसंबर ग्रेगोरी कैलंडर के अनुसार वर्ष का 336वॉ (लीप वर्ष मे 337 वॉ) दिन है। साल में अभी और 29 दिन बाकी है। .

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२५ मई

25 मई ग्रेगोरी कैलंडर के अनुसार वर्ष का 145वॉ (लीप वर्ष मे 146 वॉ) दिन है। साल मे अभी और 220 दिन बाकी है। .

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यहां पुनर्निर्देश करता है:

मृत ज्वालामुखी, शान्त ज्वालामुखी, सक्रीय ज्वालामुखी, सुप्त ज्वालामुखी, ज्वालामुखियों, ज्वालामुखी पर्वत, ज्वालामुखी शिखर, ज्वालामुखीय, ज्वालामुखीय विस्फोट

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