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गर्भाशय

सूची गर्भाशय

गर्भाशय स्त्री जननांग है। यह 7.5 सेमी लम्बी, 5 सेमी चौड़ी तथा इसकी दीवार 2.5 सेमी मोटी होती है। इसका वजन लगभग 35 ग्राम तथा इसकी आकृति नाशपाती के आकार के जैसी होती है। जिसका चौड़ा भाग ऊपर फंडस तथा पतला भाग नीचे इस्थमस कहलाता है। महिलाओं में यह मूत्र की थैली और मलाशय के बीच में होती है तथा गर्भाशय का झुकाव आगे की ओर होने पर उसे एन्टीवर्टेड कहते है अथवा पीछे की तरफ होने पर रीट्रोवर्टेड कहते है। गर्भाशय के झुकाव से बच्चे के जन्म पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है। गर्भाशय का ऊपरी चौड़ा भाग बाडी तथा निचला भाग तंग भाग गर्दन या इस्थमस कहलाता है। इस्थमस नीचे योनि में जाकर खुलता है। इस क्षेत्र को औस कहते है। यह 1.5 से 2.5 सेमी बड़ा तथा ठोस मांसपेशियों से बना होता है। गर्भावस्था के विकास गर्भाशय का आकार बढ़कर स्त्री की पसलियों तक पहुंच जाता है। साथ ही गर्भाशय की दीवारे पतली हो जाती है। .

34 संबंधों: डिम्बग्रंथि, दुग्धपायन, नाभि, पात्रे निषेचन, प्रसूति(Childbirth), पीयूष ग्रन्थि, बंध्याकरण, बीजांडासन, भग, मलोत्सर्ग प्रणाली, मासिक धर्म, मैट्रिक्स, मेरुदण्ड, यौन अंग, शल्यचिकित्सा, श्रोणि जलन बीमारी, सर्पगन्धा, संततिनिरोध, स्त्री जननांग, स्त्री-रोग विज्ञान, जच्चा संक्रमण, गर्दन, गर्भनली, गर्भपात, गर्भावस्था, ग्रीवा, ऑस्टियोपोरोसिस, कष्टार्तव (डिसमेनोरीया), कृत्रिम वीर्यसेचन, अण्डोत्सर्ग, अनुर्वरता, अपरा (गर्भ), अंतः गर्भाशयी युक्ति, अंग तंत्र

डिम्बग्रंथि

डिम्बग्रंथि स्त्री जननांग या स्त्री प्रजनन प्रणाली का एक भाग हैं। महिलाओं में गर्भाशय के दोनों ओर डिम्बग्रंथियां होती है। यह देखने में बादाम के आकार की लगभग ३.५ सेमी लम्बी और २ सेमी चौड़ी होती है। इसके ऊपर ही डिम्बनलिकाओं कि तंत्रिकाएं होती है जो अंडों को अपनी ओर आकर्षित करती है। डिम्बग्रंथियों का रंग गुलाबी होता है। उम्र बढ़ने के साथ-साथ ये हल्के सफेद रंग की हो जाती है। वृद्वावस्था में यह सिकुड़कर छोटी हो जाती है। इनका प्रमुख कार्य अंडे बनाना तथा उत्तेजित द्रव और हार्मोन्स बनाना होता है। डिम्बग्रंथियों के मुख्य हार्मोन्स ईस्ट्रोजन और प्रोजैस्ट्रोन है। माहवारी (मासिक-धर्म) स्थापीत होने के पूर्व इसका कोई काम नहीं होता है। परन्तु माहवारी के बाद इसमें प्रत्येक महीने डिम्ब बनते और छोड़े जाते है, जो शुक्राणुओं के साथ मिलकर गर्भधारण करते है। .

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दुग्धपायन

बिल्ली के बच्चों का स्तनपान दुग्धपान या दुग्धस्रवन या लैक्टेशन, स्तन ग्रंथि से दूध निकलने, उस दूध को बच्चे को पिलाने की प्रक्रिया तथा एक माँ द्वारा अपने बच्चे को दूध पिलाने में लगने वाले समय को वर्णित करता है। यह प्रक्रिया सभी मादा स्तनपायी प्राणियों में होती है और मनुष्यों में इसे आम तौर पर स्तनपान या नर्सिंग कहा जाता है। अधिकांश प्रजातियों में माँ के निपल्स से दूध निकलता है; हालाँकि, प्लैटिपस (एक गैर-गर्भनालीय स्तनपायी प्राणी) के पेट की नलिकाओं से दूध निकलता है। स्तनपायी प्राणियों की केवल एक प्रजाति दयाक फ्रूट चमगादड़ में दूध उत्पन्न करना नर का एक सामान्य कार्य है। कुछ अन्य स्तनपायी प्राणियों में हार्मोन के असंतुलन की वजह से नर दूध उत्पन्न कर सकते हैं। इस घटना को नवजात शिशुओं में भी देखा जा सकता है (उदाहरण के लिए डायन का दूध (विचेज मिल्क))। गैलक्टोपोइएसिस दूध उत्पादन को बनाये रखने को कहते हैं। इस चरण में प्रोलैक्टिन (पीआरएल) और ऑक्सीटोसिन की जरूरत पड़ती है। .

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नाभि

नाभि (चिकित्सकीय भाषा में अम्बिलीकस के रूप में ज्ञात और बेली बटन के नाम से भी जानी जाती है) पेट पर एक गहरा निशान होती है, जो नवजात शिशु से गर्भनाल को अलग करने के कारण बनती है। सभी अपरा संबंधी स्तनपाइयों में नाभि होती है। यह मानव में काफी स्पष्ट होती है। मनुष्यों में यह निशान एक गड्ढे के समान दिख सकता है (अंग्रेज़ी में आम बोलचाल की भाषा में इसे अक्सर इन्नी कह कर संदर्भित किया जाता है) या एक उभार के रूप में दिख सकता है (आउटी).

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पात्रे निषेचन

पात्रे निषेचन (IVF) का सरलीकृत चित्रण जिसमें एकल-वीर्य इन्जेक्शन का चित्रण है। पात्रे निषेचन या इन विट्रो फर्टिलाइजेशन (आईवीएफ), निषेचन की एक कृत्रिम प्रक्रिया है जिसमें किसी महिला के अंडाशय से अंडे निकालकर उसका संपर्क द्रव माध्यम में शुक्राणुओं से (शरीर के बाहर किसी अन्य पात्र में) कराया जाता है। इसके बाद निषेचित अंडे को महिला के गर्भाशय में रख दिया जाता है। और इस तरह गर्भ-नलिकाओं का उपयोग नहीं होता है। यह महिलाओं में कृत्रिम गर्भाधान की सबसे प्रभावी तकनीक मानी जाती है। आमतौर पर इसका प्रयोग तब करते हैं जब महिला की अण्डवाही नलियाँ बन्द होने हैं या जब मर्द बहुत कम शुक्राणु (स्पर्म) पैदा कर पाता है। इस प्रक्रिया में कई बार दूसरों द्वारा दान में दिए गए अण्डों, दान में दिए वीर्य या पहले से फ्रोजन एमबरायस का उपयोग भी किया जाता है। दान में दिए गए अण्डों का प्रयोग उन स्त्रियों के लिए किया जाता है है जो कि अण्डा उत्पन्न नहीं कर पातीं। इसी प्रकार दान में दिए गए अण्डों या वीर्य का उपयोग कई बार ऐसे स्त्री पूरूष के लिए भी किया जाता है जिन्हें कोई ऐसी जन्मजात बीमारी होती है जिसका आगे बच्चे को भी लग जाने का भय होता है। ३५ वर्ष तक की आयु की स्त्रियों में इस की सफलता की औसत दर ३७ प्रतिशत देखी गई है। आयु वृद्धि के साथ साथ सफलता की दर घटने लगती है। आयु के अतिरिक्त भी सफलता की दर बदलती रहती है और अन्य कई बातों पर भी निर्भर करती है। तकनीक की सफलता की दर बदलती रहती है और अन्य कई बातों पर भी निर्भर करती है। तकनीक की सफलता दर को प्रभावित करने वाली चीज़ों में शामिल है -.

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प्रसूति(Childbirth)

प्रसूति (जिसे लेबर, बर्थ, पारटस अथवा पार्टयूरीशन भी कहते हैं) मानव गर्भावस्था अथवा गर्भकाल अवधी का समापन है जिसमें एक महिला के गर्भाशय से एक अथवा अधिक नवजात शिशुओं का जन्म होता है। मनुष्य की सामान्य प्रसूती की प्रक्रिया को प्रसव के तीन चरणों में विभाजित किया गया है:गर्भाशय ग्रीवा का छोटा होना और फैलना,शिशु का बाहर निकलना और शिशु जन्म, और गर्भनाल का बाहर निकलना.

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पीयूष ग्रन्थि

पीयूष ग्रन्थि या पीयूषिका, एक अंत:स्रावी ग्रंथि है जिसका आकार एक मटर के दाने जैसा होता है और वजन 0.5 ग्राम (0.02 आउन्स) होता है। यह मस्तिष्क के तल पर हाइपोथैलेमस (अध;श्चेतक) के निचले हिस्से से निकला हुआ उभार है और यह एक छोटे अस्थिमय गुहा (पर्याणिका) में दृढ़तानिका-रज्जु (diaphragma sellae) से ढंका हुआ होता है। पीयूषिका खात, जिसमें पीयूषिका ग्रंथि रहता है, वह मस्तिष्क के आधार में कपालीय खात में जतुकास्थी में स्थित रहता है। इसे एक मास्टर ग्रंथि माना जाता है। पीयूषिका ग्रंथि हार्मोन का स्राव करने वाले समस्थिति का विनियमन करता है, जिसमें अन्य अंत:स्रावी ग्रंथियों को उत्तेजित करने वाले ट्रॉपिक हार्मोन शामिल होते हैं। कार्यात्मक रूप से यह हाइपोथैलेमस से माध्यिक उभार द्वारा जुड़ा हुआ होता है। .

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बंध्याकरण

शल्यक्रिया के द्वारा किसी पुरुष, महिला या अन्य किसी पशु को प्रजनन करने के अयोग्य बना देना बंध्याकरण (Sterilization) कहलाता है। यह संतति निरोध का स्थाई तरीका है। बन्ध्याकरण की प्रमुख विधियाँ हैं -.

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बीजांडासन

बीजाण्डासन (प्लेसेन्टा) बीजाण्डासन या अपरा (Placenta) वह अंग है जिसके द्वारा गर्भाशय में स्थित भ्रूण के शरीर में माता के रक्त का पोषण पहुँचता रहता है और जिससे भ्रूण की वृद्धि होती है। यह अंग माता और भ्रूण के शरीरों में संबंध स्थापित करनेवाला है। यद्यपि माता का रक्त भ्रूण के शरीर में कहीं पर नहीं जाने पाता, दोनों के रक्त पूर्णतया पृथक्‌ रहते हैं और दोनों की रक्तवाहिनियों के बीच एक पतली झिल्ली या दीवार रहती है, तो भी उस दीवार के द्वारा माता के रक्त के पोषक अवयव छनकर भ्रूण की रक्तवाहिकाओं में पहुँचते रहते है। .

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भग

भग भग स्तनधारी मादा (मनुष्यों मे महिला) के एक शरीर का हिस्सा है। भग का अर्थ बाहर से दिखाई देने वाले मादा जननांग है। मारवाडी भाषा मे भोसिया, सिसिया, भोसरा, भोल, वारसा और अतार कहते है| भग की रचना मे सामान्य रूप से दिखाई देने वाले दो मांसल संरचनायें होती हैं जिन्हें भगोष्ट (भग+होठ) (लेबिया) कहते है। बाहरी भगोष्ट (लेबिया मेजोरा) जो गद्देदार होते हैं आंतरिक जननांग संरचनाओं को सुरक्षा प्रदान करते हैं। भीतरी भगोष्ट (लेबिया माइनोरा) भगशेफ के हुड से जुड़े हुए होते हैं और यह योनि को आवरण प्रदान करते हैं और संभोग के दौरान शिश्न के स्नेहन में सहायता करते हैं। बहुत से लोगों समझते हैं कि भग ही योनि होती है पर योनि शब्द उस नलिका को परिभाषित करता है जो गर्भाशय से भग को जोड़ती है। .

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मलोत्सर्ग प्रणाली

मलोत्सर्ग प्रणाली एक निष्क्रिय जैविक प्रणाली है जो जीवों के भीतर से अतिरिक्त, अनावश्यक या खतरनाक पदार्थों को हटाती है, ताकि जीव के भीतर होमीयोस्टेसिस को बनाए रखने में मदद मिल सके और शरीर के नुकसान को रोका जा सके। यह चयापचय के अपशिष्ट उत्पादों और साथ ही साथ अन्य तरल और गैसीय अपशिष्ट के उन्मूलन के लिए जिम्मेदार है। चूंकि अधिकांश स्वस्थ रूप से कार्य करने वाले अंग चयापचय सम्बंधी और अन्य अपशिष्ट उत्पादित करते हैं, संपूर्ण जीव इस प्रणाली के कार्य करने पर निर्भर करता है; हालांकि, केवल वे अंग जो विशेष रूप से उत्सर्जन प्रक्रिया के लिए होते हैं उन्हें मलोत्सर्ग प्रणाली का एक हिस्सा माना जाता है। चूंकि इसमें कई ऐसे कार्य शामिल हैं जो एक दूसरे से केवल ऊपरी तौर पर संबंधित हैं, इसका उपयोग आमतौर पर शरीर रचना या प्रकार्य के और अधिक औपचारिक वर्गीकरण में नहीं किया जाता है। .

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मासिक धर्म

माहवारी (पीरियड्स) का चक्र 10 से 15 साल की आयु की लड़की के अंडाशय हर महीने एक विकसित डिम्ब (अण्डा) उत्पन्न करना शुरू कर देते हैं। वह अण्डा अण्डवाहिका नली (फैलोपियन ट्यूव) के द्वारा नीचे जाता है जो कि अंडाशय को गर्भाशय से जोड़ती है। जब अण्डा गर्भाशय में पहुंचता है, उसका अस्तर रक्त और तरल पदार्थ से गाढ़ा हो जाता है। ऐसा इसलिए होता है कि यदि अण्डा उर्वरित हो जाए, तो वह बढ़ सके और शिशु के जन्म के लिए उसके स्तर में विकसित हो सके। यदि उस डिम्ब का पुरूष के शुक्राणु से सम्मिलन न हो तो वह स्राव बन जाता है जो कि योनि से निष्कासित हो जाता है। इसी स्राव को मासिक धर्म, पीरियड्स या रजोधर्म या माहवारी (Menstural Cycle or MC) कहते हैं। .

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मैट्रिक्स

कोई विवरण नहीं।

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मेरुदण्ड

बाहर से मेरूदंड का दृष्य मेरूदंड के विभिन्न भाग मेरूदंड के विभिन्न भाग (रंगीन) मानव शरीर रचना में 'रीढ़ की हड्डी' या मेरुदंड (vertebral column या backbone या spine)) पीठ की हड्डियों का समूह है जो मस्तिष्क के पिछले भाग से निकलकर गुदा के पास तक जाती है। इसमें ३३ खण्ड (vertebrae) होते हैं। मेरुदण्ड के भीतर ही मेरूनाल (spinal canal) में मेरूरज्जु (spinal cord) सुरक्षित रहता है। .

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यौन अंग

यौन अंग, शरीर के वह अंग होते हैं, जो किसी जीव की प्रजनन प्रकिया में सम्मिलित होने के साथ साथ उसके प्रजनन तंत्र का रचना भी करते हैं। स्तनधारियों के प्रमुख यौन अंग हैं: -.

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शल्यचिकित्सा

अति प्राचीन काल से ही चिकित्सा के दो प्रमुख विभाग चले आ रहे हैं - कायचिकित्सा (Medicine) एवं शल्यचिकित्सा (Surgery)। इस आधार पर चिकित्सकों में भी दो परंपराएँ चलती हैं। एक कायचिकित्सक (Physician) और दूसरा शल्यचिकित्सक (Surgeon)। यद्यपि दोनों में ही औषधो पचार का न्यूनाधिक सामान्यरूपेण महत्व होने पर भी शल्यचिकित्सा में चिकित्सक के हस्तकौशल का महत्व प्रमुख होता है, जबकि कायचिकित्सा का प्रमुख स्वरूप औषधोपचार ही होता है। .

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श्रोणि जलन बीमारी

यह आमतौर पर तब होता है जब यौन संचारित बैक्टीरिया गर्भ (गर्भाशय), फैलोपियन ट्यूब, अंडाशय या योनि से फैल गया। श्रोणि जलन बीमारी ('पीआईडी') एक सामान्य शब्द है जो गर्भाशय (बच्चेदानी), गर्भनली (अंडाशय से गर्भाशय तक अंडों को ले जाने वाला ट्यूब) और अन्य प्रजनन इंद्रियों के संक्रमण से संबंधित है। श्रोणि जलन बीमारी (पीआईडी) तब होती है जब जीवाणु महिला की जननेद्रिय या ग्रीवा (सर्विक्स) से जननेद्रिय अंग में ऊपर की ओर प्रवेश करती है। बहुत से अलग-अलग अवयवों से श्रोणि जलन बीमारी (पीआईडी) होती है किंतु अनेक मामले सुजाक (गानोरिया) और क्लैमिडिया से संबंधित हैं और दोनों ही जीवाणु यौन संचारित बीमारी (एसटीडी) नहीं हैं। कामेन्द्रियों में लिप्त महिलाओं को अपने प्रजनन वर्ष के दौरान अत्यंत खतरा होता है और जिनकी आयु 25 वर्ष से कम है, उनको 25 वर्ष से अधिक वालों से अधिक खतरा होता है और उनमें श्रोणि जलन बीमारी (पीआईडी) विकसित हो सकती है। इसका कारण यह होता है कि बीस वर्ष से कम आयु की लड़कियों और युवतियों का ग्रीवा (सर्विक्स) पूरी तरह परिपक्व नहीं होता है और वे यौन संचारित बीमारी (एसटीडी) के लिए संवेदनशील होती हैं जो कि श्रोणि जलन बीमारी (पीआईडी) से संबद्ध होती हैं। .

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सर्पगन्धा

सर्पगन्धा एपोसाइनेसी परिवार का द्विबीजपत्री, बहुवर्षीय झाड़ीदार सपुष्पक और महत्वपूर्ण औषधीय पौधा है। इस पौधे का पता सर्वप्रथम लियोनार्ड राल्फ ने १५८२ ई. में लगाया था। भारत तथा चीन के पारंपरिक औषधियों में सर्पगन्धा एक प्रमुख औषधि है। भारत में तो इसके प्रयोग का इतिहास ३००० वर्ष पुराना है। सर्पगन्धा के पौधे की ऊँचाई ६ इंच से २ फुट तक होती है। इसकी प्रधान जड़ प्रायः २० से.

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संततिनिरोध

जन्म नियंत्रण को गर्भनिरोध और प्रजनन क्षमता नियंत्रण के नाम से भी जाना है ये गर्भधारण को रोकने के लिए विधियां या उपकरण हैं। जन्म नियंत्रण की योजना, प्रावधान और उपयोग को परिवार नियोजन कहा जाता है। सुरक्षित यौन संबंध, जैसे पुरुष या महिला निरोध का उपयोग भीयौन संचरित संक्रमण को रोकने में भी मदद कर सकता है। जन्म नियंत्रण विधियों का इस्तेमाल प्राचीन काल से किया जा रहा है, लेकिन प्रभावी और सुरक्षित तरीके केवल 20 वीं शताब्दी में उपलब्ध हुए। कुछ संस्कृतियां जान-बूझकर गर्भनिरोधक का उपयोग सीमित कर देती हैं क्योंकि वे इसे नैतिक या राजनीतिक रूप से अनुपयुक्त मानती हैं। जन्म नियंत्रण की प्रभावशाली विधियां पुरूषों मेंपुरूष नसबंदी के माध्यम से नसबंदी और महिलाओं में ट्यूबल लिंगेशन, अंतर्गर्भाशयी युक्ति (आईयूडी) और प्रत्यारोपण योग्य गर्भ निरोधकहैं। -->इसे मौखिक गोलियों, पैचों, योनिक रिंग और इंजेक्शनों सहित अनेकोंहार्मोनल गर्भनिरोधकोंद्वारा इसे अपनाया जाता है। --> कम प्रभावी विधियों में बाधा जैसे कि निरोध, डायाफ्रामऔर गर्भनिरोधक स्पंज और प्रजनन जागरूकता विधियां शामिल हैं। --> बहुत कम प्रभावी विधियां स्पर्मीसाइडऔर स्खलन से पहले निकासी। --> नसबंदी के अत्यधिक प्रभावी होने पर भी यह आम तौर पर प्रतिवर्ती नहीं है; बाकी सभी तरीके प्रतिवर्ती हैं, उन्हें जल्दी से रोका जा सकता हैं। आपातकालीन जन्म नियंत्रण असुरक्षित यौन संबंधों के कुछ दिन बाद की गर्भावस्था से बचा सकता है। नए मामलों में जन्म नियंत्रण के रूप में यौन संबंध से परहेज लेकिन जब इसे गर्भनिरोध शिक्षा के बिना दिया जाता है तो यहकेवल-परहेज़ यौन शिक्षा किशोरियों में गर्भावस्थाएँ बढ़ा सकती है। किशोरोंमें गर्भावस्था में खराब नतीजों के खतरे होते हैं। --> व्यापक यौन शिक्षा और जन्म नियंत्रण विधियों का प्रयोग इस आयु समूह में अनचाही गर्भावस्थाओं को कम करता है। जबकि जन्म नियंत्रण के सभी रूपों युवा लोगों द्वारा प्रयोग किया जा सकता है, दीर्घकालीन क्रियाशील प्रतिवर्ती जन्म नियंत्रण जैसे प्रत्यारोपण, आईयूडी, या योनि रिंग्स का किशोर गर्भावस्था की दरों को कम करने में विशेष रूप से फायदा मिलता हैं। प्रसव के बाद, एक औरत जो विशेष रूप से स्तनपान नहीं करवा रही है, वह चार से छह सप्ताह के भीतर दोबारा गर्भवती हो सकती है।--> जन्म नियंत्रण की कुछ विधियों को जन्म के तुरंत बाद शुरू किया जा सकता है, जबकि अन्य के लिए छह महीनों तक की देरी जरूरी होती है।--> केवल स्तनपान करवाने वाली प्रोजैस्टिन महिलाओं में ही संयुक्त मौखिक गर्भनिरोधकों के प्रयोग को ज्यादा पसंद किया जाता हैं।--> वे सहिलाएं जिन्हे रजोनिवृत्ति हो गई है, उन्हे अंतिम मासिक धर्म से लगातार एक साल तक जन्म नियंत्रण विधियां अपनाने की सिफारिश की जाती है। विकासशील देशों में लगभग 222 मिलियन महिलाएं ऐसी हैं जो गर्भावस्था से बचना चाहती हैं लेकिन आधुनिक जन्म नियंत्रण विधि का प्रयोग नहीं कर रही हैं। विकासशील देशों में गर्भनिरोध के प्रयोग से मातृत्व मृत्यु में 40% (2008 में लगभग 270,000 लोगों को मौत से बचाया गया) की कमी आयी है और यदि गर्भनिरोध की मांग को पूरा किया जाए तो 70% तक मौतों को रोका जा सकता है। गर्भधारण के बीच लम्बी अवधि से जन्म नियंत्रण व्यस्क महिलाओं के प्रसव के परिणामों और उनके बच्चों उत्तरजीविता में सुधार करेगा। जन्म नियंत्रण के ज्यादा से ज्यादा उपयोग से विकासशील देशों में महिलाओं की आय, संपत्तियों, वजन और उनके बच्चों की स्कूली शिक्षा और स्वास्थ्य सभी में सुधार होगा। कम आश्रित बच्चों, कार्य में महिलाओं की ज्यादा भागीदारी और दुर्लभ संसाधनों की कम खपत के कारण जन्म नियंत्रण, आर्थिक विकास को बढ़ाता है। .

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स्त्री जननांग

स्त्री प्रजनन तंत्र का योजनामूलक चित्र मानवों में प्रजनन हेतु जननांग होते हैं, जो स्त्रियों और पुरुषों में भिन्न होते हैं। स्त्री के जननांगो में सबसे पहले बाल होते है जिसे प्यूबिक बाल कहा जाता है। ये बाल स्त्री जननागं को चारों ओर से घेरे रहते है। ऊपर की तरफ एक अंग जो उल्टे वी के आकार की होती है उसे क्लाईटोरिस कहते है। यह भाग काफी संवेदनशील होता है। क्लाइटोरिस के नीचे एक छोटा सा छेद होता है जोकि मूत्रद्वार होता है। मूत्रद्वार के नीचे एक बड़ा छिद्र होता है जिसको जनन छिद्र कहते है। इसी के रास्ते प्रत्येक महीने महिलाओं को मासिक स्राव (माहवारी) होती है। इसी रास्ते के द्वारा ही बच्चे का जन्म भी होता है। इसकी दीवारे लचीली होती है जो बच्चे के जन्म समय फैल जाती है। इसके नीचे थोड़ी सी दूरी पर एक छिद्र होता है जिसे मलद्वार या मल निकास द्वार कहते है। .

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स्त्री-रोग विज्ञान

स्त्रीरोगविज्ञान (Gynaccology), चिकित्साविज्ञान की वह शाखा है जो केवल स्त्रियों से संबंधित विशेष रोगों, अर्थात् उनके विशेष रचना अंगों से संबंधित रोगों एवं उनकी चिकित्सा विषय का समावेश करती है। स्त्री-रोग विज्ञान, एक महिला की प्रजनन प्रणाली (गर्भाशय, योनि और अंडाशय) के स्वास्थ्य हेतु अर्जित की गयी शल्यक (सर्जिकल) विशेषज्ञता को संदर्भित करता है। मूलतः यह 'महिलाओं की विज्ञान' का है। आजकल लगभग सभी आधुनिक स्त्री-रोग विशेषज्ञ, प्रसूति विशेषज्ञ भी होते हैं। .

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जच्चा संक्रमण

जच्चा संक्रमण, प्रसवोत्तर संक्रमण,जच्चा ज्वर या प्रसूति ज्वर, के नाम से भी जाना जाता है, प्रसव या गर्भपात के बाद महिला प्रजनन नली का कोई बैक्टीरिया संक्रमणहै। --> संकेत और लक्षण में आम तौर पर ज्वर, से अधिक ठंड लगना, पेट के निचले भाग में दर्द, और संभवतः खराब महक वाला योनि स्राव शामिल होता है। यह आम तौर पर पहले 24 घंटों के बाद और प्रसव के बाद दस दिनों के भीतर होता है। गर्भाशय और आस-पास के ऊतकों जिसे ज़च्चा पूति (puerperal sepsis) या प्रसवोत्तर गर्भाशयशोथ (Postpartum Metritis) के रूप में जाना जाता है, सबसे आम संक्रमण है। --> जोखिम कारकों में अन्य के साथ शल्‍यजनन (Cesarean section), कुछ बैक्टीरिया जैसे कि योनि में समूह बी स्ट्रेप्टोकोकस की जैसे मौजूदगी, झिल्ली के समय से पहले फटना, और लंबे समय का प्रसव शामिल है। --> अधिकांश संक्रमण में कई प्रकार के बैक्टीरिया शामिल होते हैं। --> संवर्धन योनि या रक्त द्वारा निदान में शायद ही कभी मदद मिलती है। --> उन में जिन में सुधार नहीं होता है, मेडिकल इमेजिंग की आवश्यकता हो सकती है। --> प्रसव के बाद ज्वर के अन्य कारणों में शामिल है:स्तन अधिरक्तता, मूत्र नली का संक्रमण, पेट चीरा के संक्रमण या भगछेदन (Episiotomy), और श्वासरोध (Atelectasis)। शल्‍यजनन के बाद के जोखिम के कारण यह अनुशंसा की जाती है कि सभी महिलाओं को शल्य के समय एंटीबायोटिक जैसे एम्पीसिलीन की खुराक प्राप्त करें। --> स्थापित संक्रमण का उपचार एंटीबायोटिक दवाओं के से होता है जिसमें ज्यादातर महिलाएँ दो से तीन दिनों में सुधार प्राप्त करती हैं। --> उन हल्के रोगों वालों में मौखिक एंटीबायोटिक दवाओं का इस्तेमाल किया जा सकता है अन्यथा अन्तःशिरा एंटीबायोटिक दवाओं की अनुशंसा की जाती है। --> सामान्य एंटीबायोटिक दवाओं में योनि प्रसव के बाद एम्पीसिलीन और जेंटामाइसीन या जिन का शल्‍यजनन हुआ हो उन के लिए क्लिंडामाइसीन और जेंटामाइसीन का संयोजन शामिल है। --> जिन महिलाओं में उचित इलाज से सुधार नहीं हो रहा है, अन्य जटिलताओं जैसे पस पर ध्यान दिया जाना चाहिए। विकसित दुनिया में एक से दो प्रतिशत के बीच योनि प्रसव के बाद गर्भाशय में संक्रमण होता है। --> यह उन के बीच जिनके अधिक मुश्किल प्रसव होते हैं, पांच से तेरह प्रतिशत और निरोधक एंटीबायोटिक के उपयोग से पहले शल्‍यजनन में पचास तक बढ़ जाता है। इन संक्रमणों के कारण 2013 में 24,000 मृत्यु हुई थी जो 1990 के 34,000 की मौतों से कम है। इस स्थिति का पहला ज्ञात विवरण कम से कम 5 वीं शताब्दी ईसा पूर्व हिप्पोक्रेट्स के लेखन में मिलता है। कम से कम 18 वीं शताब्दी में शुरु और 1930 तक जब एंटीबायोटिक पेश किए गए थे, बच्चों के जन्म के समय यह संक्रमण मौत का एक बहुत ही सामान्य कारण थे। 1847 में, ऑस्ट्रिया में, इग्नाज सेमीमेलवेस ने क्लोरीन से हाथ धोने के माध्यम से बीमारी से मृत्यु में बीस प्रतिशत से दो प्रतिशत तक कमी की। .

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गर्दन

गर्दन सिर को धड़ से जोड़ती है गर्दन शरीर का वह हिस्सा होती है जो मानव और अन्य रीढ़-वाले जीवों में सिर को धड़ से जोड़ती है। लातिन भाषा में गर्दन से सम्बंधित चीज़ों के लिए "सर्विकल" शब्द इस्तेमाल किया जाता है। .

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गर्भनली

गर्भनलियां या डिम्बवाहिनियां गर्भाशय के ऊपरी भाग के दोनों ओर से निकलती है तथा दोनों तरफ कूल्हे की हडिड्यों तक जाती है। इनकी लम्बाई लगभग १० सेमी और मोटाई लगभग आधा सेमी तक लम्बी होती है। दोनों ओर इसका आकार एक कीप की तरह का होता है। इस कीप का अंतिम छोर लम्बी-लम्बी अंगुलियों की तरफ होता है जिसको तंत्रिकाएं कहते है। इनका प्रमुख कार्य डिम्बग्रंथियों से निकले अंडे को घेरकर उसे वाहिनियों मे भेजना होता है। यह नलियां मांसपेशियों से बनी, तथा इनके अंदर की दीवार एक झिल्ली की बनी होती है जिसको म्यूकस झिल्ली कहते है। डिम्बग्रंथियों से पकड़े अंडे, वाहिनियों के आगे के भाग में जाकर रूकते है। जहां ये पुरूष के शुक्राणु के साथ मिलकर एक नये जीवन का निर्माण होता है। स्त्री जनन अंग में इस संरचना को जाइगोट कहते है। जाइगोट के चारों तरफ एक खास परत उत्पन्न होती है। .

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गर्भपात

गर्भपात परिपक्वता अवधि अथवा व्यवहार्यता से पूर्व गर्भ के समापन की अवस्था है जिसमें गर्भाशय से भ्रूण स्वत: निष्काषित हो जाता है या कर दिया जाता है। इसके परिणामस्वरूप गर्भावस्था (pregnancy) की समाप्ति हो जाती है। किसी कारण भ्रूण के स्वतः समाप्त हो जाने को गर्भ विफलता (miscarriage) कहा जाता है। सामान्यतः गर्भपात मानव गर्भ को जबरन समाप्त किये जाने को इंगित करता है। .

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गर्भावस्था

गर्भवती महिला प्रजनन सम्बन्धी अवस्था, एक मादा के गर्भाशय में भ्रूण के होने को गर्भावस्था (गर्भ + अवस्था) कहते हैं, तदुपरांत महिला शिशु को जन्म देती है। आमतौर पर यह अवस्था मां बनने वाली महिलाओं में ९ माह तक रहती है, जिसे गर्भवधी कहते है। कभी कभी संयोग से एकाधिक गर्भावस्था भी अस्तित्व में आ जति है जिस्से जुडवा एक से अधिक सन्तान कि उपस्थिति होती है। .

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ग्रीवा

ग्रीवा गर्भाशय का मुख है। स्त्री के शरीर में बाहर से दिखने वाली संरचना को योनि द्वार कहा जाता है। योनि के जितने भाग में पुरुष का लिंग प्रवेश करता है, उतना भाग योनि है। लिंग से निकलने वाला वीर्य इस ग्रीवा से अंदर प्रवेश करके गर्भाशय में पहुँचता है। .

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ऑस्टियोपोरोसिस

अस्थिसुषिरता या ऑस्टियोपोरोसिस (osteoporosis) हड्डी का एक रोग है जिससे फ़्रैक्चर का ख़तरा बढ़ जाता है। ऑस्टियोपोरोसिस में अस्थि खनिज घनत्व (BMD) कम हो जाता है, अस्थि सूक्ष्म-संरचना विघटित होती है और अस्थि में असंग्रहित प्रोटीन की राशि और विविधता परिवर्तित होती है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने महिलाओं में ऑस्टियोपोरोसिस को DXA के मापन अनुसार अधिकतम अस्थि पिंड (औसत 20 वर्षीय स्वस्थ महिला) से नीचे अस्थि खनिज घनत्व 2.5 मानक विचलन के रूप में परिभाषित किया है; शब्द "ऑस्टियोपोरोसिस की स्थापना" में नाज़ुक फ़्रैक्चर की उपस्थिति भी शामिल है। ऑस्टियोपोरोसिस, महिलाओं में रजोनिवृत्ति के बाद सर्वाधिक सामान्य है, जब उसे रजोनिवृत्तोत्तर ऑस्टियोपोरोसिस कहते हैं, पर यह पुरुषों में भी विकसित हो सकता है और यह किसी में भी विशिष्ट हार्मोन संबंधी विकार तथा अन्य दीर्घकालिक बीमारियों के कारण या औषधियों, विशेष रूप से ग्लूकोकार्टिकॉइड के परिणामस्वरूप हो सकता है, जब इस बीमारी को स्टेरॉयड या ग्लूकोकार्टिकॉइड-प्रेरित ऑस्टियोपोरोसिस (SIOP या GIOP) कहा जाता है। उसके प्रभाव को देखते हुए नाज़ुक फ़्रैक्चर का ख़तरा रहता है, हड्डियों की कमज़ोरी उल्लेखनीय तौर पर जीवन प्रत्याशा और जीवन की गुणवत्ता को प्रभावित कर सकती है। ऑस्टियोपोरोसिस को जीवन-शैली में परिवर्तन और कभी-कभी दवाइयों से रोका जा सकता है; हड्डियों की कमज़ोरी वाले लोगों के उपचार में दोनों शामिल हो सकती हैं। जीवन-शैली बदलने में व्यायाम और गिरने से रोकना शामिल हैं; दवाइयों में कैल्शियम, विटामिन डी, बिसफ़ॉसफ़ोनेट और कई अन्य शामिल हैं। गिरने से रोकथाम की सलाह में चहलक़दमी वाली मांसपेशियों को तानने के लिए व्यायाम, ऊतक-संवेदी-सुधार अभ्यास; संतुलन चिकित्सा शामिल की जा सकती हैं। व्यायाम, अपने उपचयी प्रभाव के साथ, ऑस्टियोपोरोसिस को उसी समय बंद या उलट सकता है। .

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कष्टार्तव (डिसमेनोरीया)

कष्टार्तव (या डिसमेनोरीया) एक स्त्रीरोग संबंधी चिकित्सा अवस्था है जिसकी विशेषता है माहवारी के दौरान गर्भाशय में असहनीय पीड़ा.

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कृत्रिम वीर्यसेचन

कृत्रिम वीर्यसेचन (English: Artificial insemination) Intrauterine insemination (IUI) गर्भधारण कराने के उद्देश्य से मैथुन के बजाय अन्य तरीके से मादा के गर्भाशय में नर का शुक्राणु पहुँचाना होता है। मानवों में यह कार्य मुख्यतः बाँझपन की चिकित्सा के रूप में प्रयोग किया जाता है जबकि गाय-भैस एवं अन्य पशुओं में प्रजनन के सामान्य विधि के रूप में प्रयुक्त होता है। .

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अण्डोत्सर्ग

गर्भाशय से अन्डों का निकलना अंडोत्सर्ग (Ovulation) कहलाता है। मानवों में यह घटना तब होती है जब ता है जब डी ग्राफ पुटक (de Graaf's follicles) फटकर द्वितीयक अंडक गर्भाशय कोशिका निकालते हैं। श्रेणी:मानव प्रजनन.

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अनुर्वरता

अनुर्वरता, नपुंसकता या बाँझपन (Infertility) मूलरूप में संतानोत्पत्ति की स्थायी अक्षमता की अवस्था है। मनुष्यों में एक वर्ष तक प्रयास करते रहने के बाद अगर गर्भधारण नहीं होता तो उसे बन्ध्यता या अनुर्वरता कहते हैं। यह केवल स्त्री के कारण नहीं होती। केवल एक तिहाई मामलों में अनुर्वरता स्त्री के कारण होती है। दूसरे एक तिहाई में पुरूष के कारण होती है। शेष एक तिहाई में स्त्री और पुरुष के मिले जुले कारणों से या अज्ञात कारणों से होती है। .

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अपरा (गर्भ)

अपरा स्तनधारियों के लिए एक अनूठा अंग है जो गर्भाशय भित्ति को विकासशील भ्रूण से जोड़ता है। अपरा भ्रूण को ऑक्सीजन और भोजन की आपूर्ति करती है और भ्रूण के अपशिष्ट पदार्थों को माता के गुर्दों के माध्यम से उत्सर्जित करने मे सहायता करती है। अपरा गर्भनाल के द्वारा भ्रूण से जुड़ी रहती है। अपरा भी उन ही शुक्राणु और डिम्ब कोशिकाओं से निर्मित होती है जिनसे भ्रूण का निर्माण होता है और दो घटकों क्रमश: भ्रूण भाग (कोरिओन फ्रोंडोसम) और मातृ भाग (डेसिडुआ बेसालिस) के साथ एक फेटोमेटरनल अंग के रूप में कार्य करती है। .

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अंतः गर्भाशयी युक्ति

ताँबे की टी-आकार वाली अंतःगर्भाशयी युक्ति, जिसे निकालने के लिये डोरियाँ लगी हैं। अंतः गर्भाशयी युक्ति (इंट्रा यूट्राइन डिवाइस - आई यू डी) गर्भधारण को रोकने वाला एक उपकरण है। यह छोटा, अक्सर T-आकार का होता है जिसे महिला के गर्भाशय में डाला जाता है। ये युक्तियाँ डॉक्टरों या अनुभवी नर्सों द्वारा योनि मार्ग से गर्भाशय में लगाई जाती हैं। यह युक्ति एक लंबे समय तक काम करने वाली प्रतिवर्ती जन्म नियंत्रण का एक रूप है। जन्म नियंत्रण विधियों में, आईयूडी, गर्भनिरोधक प्रत्यारोपण के साथ, उपयोगकर्ताओं के बीच सबसे अधिक संतुष्टि देने वाली साबित हुई है। साक्ष्य, किशोरों में इसकी प्रभावशीलता और सुरक्षा का समर्थन करते हैं और उनमें भी समर्थन करते हैं जिनके पास पहले से या तो बच्चे थे या नहीं थे। एक बार इसे हटाने के बाद, लंबी अवधि के उपयोग के बाद भी, प्रजननशीलता जल्द ही सामान्य रूप में वापस आती है। विफलता दर तांबे के उपकरणों के साथ 0.8% और उपयोग के पहले वर्ष में हार्मोनल (लेवोनोर्जेस्ट्रल) उपकरणों के साथ 0.2% हैं। तांबे की आईयूडी से मासिक धर्म में खून बह रहा हो सकता है और अधिक दर्दनाक ऐंठन में वृद्धि हो सकती है, जबकि हार्मोनल युक्ति मासिक धर्म के खून बहने को कम कर सकती है या मासिक धर्म पूरी तरह बंद कर सकती है। क्रैम्पिंग का गैर स्टेरॉयडल सूजन-विरोधी दवा के साथ इलाज किया जा सकता है। अन्य संभावित जटिलताओं में निष्कासन (2-5%) और कभीकभार ही गर्भाशय में छिद्र (0.7% से भी कम) शामिल हैं। अंतः गर्भाशयी युक्तियाँ स्तनपान को प्रभावित नहीं करती है और डिलीवरी के तुरंत बाद डाली जा सकती हैं। गर्भपात के तुरंत बाद भी उनका इस्तेमाल किया जा सकता है। .

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अंग तंत्र

तंत्र का एक उदाहरण - तंत्रिका तंत्र; इस चित्र में दिखाया गया है कि यह तंत्र मूलत: चार अंगों से मिलकर बना है: मस्तिष्क, प्रमस्तिष्क (cerebellum), मेरुदण्ड (spinal cord) तथा तंत्रिकाएं (nerve) नाना प्रकार के ऊतक (tissue) मिलकर शरीर के विभिन्न अंगों (organs) का निर्माण करते हैं। इसी प्रकार, एक प्रकार के कार्य करनेवाले विभिन्न अंग मिलकर एक अंग तंत्र (organ system) का निर्माण करते हैं। कई अंग तंत्र मिलकर जीव (जैसे, मानव शरीर) की रचना करते हैं। .

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यहां पुनर्निर्देश करता है:

मैट्रिक्स (जीव विज्ञान)

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