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इरावती नदी

सूची इरावती नदी

इरावती या इरावदी बर्मा की एक प्रमुख नदी है। यह नदी बर्मा के उत्तर से दक्षिण की दिशा मे बहते हुए बर्मा को दो भाग मे विभाजित करती है। इस नदी की लंबाई २१७० किलोमीटर है और यह बर्मा मे बहने वाली सबसे लंबी नदी है। इरावती नदी एक प्रमुख व्यापारिक नौका मार्ग भी है। .

22 संबंधों: ऐरावत, नेग्रेस अंतरीप, पथेइन, प्रथम आंग्ल-बर्मी युद्ध, बमा लोग, बंगाल की खाड़ी, माण्डले, म्यान्मा का इतिहास, म्यान्मार, म्यित्चीना, मोन लोग, यांगून, सगाइंग, सीतांग नदी, जयशंकर प्रसाद, आवा, इरावदी डालफिन, इरावदी मण्डल, कचिन राज्य, कलियुग, अराकान योमा, छिन्दविन नदी

ऐरावत

ऐरावत ऐरावत इंद्र का हाथी। समुद्रमंथन से प्राप्त 14 रत्नों में ऐरावत भी था। इसे शुक्लवर्ण और चार दाँतोवाला बताया गया है। रत्नों के बॅटवारे के समय इंद्र ने उक्त दिव्यगुणयुक्त हाथी को अपनी सवारी के लिए ले लिया था। इसलिए इसका इंद्रहस्ति अथवा इंद्रकुंजर नाम पड़ा। इसके अन्य नाम अभ्रमातंग, ऐरावण, अभ्रभूवल्लभ, श्वेतहस्ति, मल्लनाग, हस्तिमल्ल, सदादान, सुदामा, श्वेतकुंजर, गजाग्रणी तथा नागमल्ल हैं। धृतराष्ट्र नामक नाग का पैतृक नाम भी ऐरावत था। कद्रुपुत्र नागों को भी ऐरावत नाम से पुकारा गया है। 'इरा' का अर्थ जल है, अत: इरावत (समुद्र) से उत्पन्न हाथी को ऐरावत नाम दिया गया है और परवर्ती भारतीय वाङ्मय में ऐरावत नाग (नाग के सर्प और हाथी दोनों अर्थ होते हैं) का संबंध इंद्र के हाथी ऐरावत से जोड़ लिया गया होगा। .

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नेग्रेस अंतरीप

नेग्रेस अंतरीप (Cape Negrais), जो पगोडा पोइंट (Pagoda Point) और मौतिन पोइंट (Mawtin Point) भी कहलाता है, बर्मा का एक अंतरीप है। यह इरावदी नदी के नदीमुख (डेल्टा) से पश्चिम में स्थित है। यह प्रीपेरिस द्वीप से उत्तर-उत्तरपूर्व में १३३ किमी की दूरी पर और भारत के अंडमान व निकोबार द्वीपसमूह के निकटतम छोर से १९३ किमी की दूरी पर है। .

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पथेइन

पथेइन (बर्मी: ပုသိမ်မြို့), जिसे ब्रिटिश राज के काल में बसेइन (Bassein) कहते थे, बर्मा के इरावदी मण्डल की राजधानी है। यह बंगाल की खाड़ी पर स्थित एक बंदरगाह नगर है जो इरावदी नदी की एक पश्चिमी शाखा - पथेइन नदी - के किनारे बसा हुआ है। यह इतिहास में मोन लोगों की राजधानी हुआ करता था लेकिन वर्तमान में यहाँ बहुत कम मोन लोग रहते हैं। पथेइन में भारतीय मूल के बहुत से लोग बसे हुए हैं। .

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प्रथम आंग्ल-बर्मी युद्ध

प्रथम आंग्ल-बर्मी युद्ध (5 मार्च 1824 - 24 फ़रवरी 1826), 19वीं शताब्दी में ब्रिटिश शासकों और बर्मी साम्राज्य के मध्य हुए तीन युद्धों में से प्रथम युद्ध था। यह युद्ध, जो मुख्यतया उत्तर-पूर्वी भारत पर अधिपत्य को लेकर शुरू हुआ था, पूर्व सुनिश्चित ब्रिटिश शासकों की विजय के साथ समाप्त हुआ, जिसके फलस्वरूप ब्रिटिश शासकों को असम, मणिपुर, कछार और जैनतिया तथा साथ ही साथ अरकान और टेनासेरिम पर पूर्ण नियंत्रण मिल गया। बर्मी लोगों को 1 मिलियन पाउंड स्टर्लिंग की क्षतिपूर्ति राशि की अदायगी और एक व्यापारिक संधि पर हस्ताक्षर के लिए भी विवश किया गया था। यह सबसे लम्बा तथा ब्रिटिश भारतीय इतिहास का सबसे महंगा युद्ध था। इस युद्ध में 15 हज़ार यूरोपीय और भारतीय सैनिक मारे गए थे, इसके साथ ही बर्मी सेना और नागरिकों के हताहतों की संख्या अज्ञात है। इस अभियान की लागत ब्रिटिश शासकों को 5 मिलियन पाउंड स्टर्लिंग से 13 मिलियन पाउंड स्टर्लिंग तक पड़ी थी, (2005 के अनुसार लगभग 18.5 बिलियन डॉलर से लेकर 48 बिलियन डॉलर), जिसके फलस्वरूप 1833 में ब्रिरिश भारत को गंभीर आर्थिक संकट का सामना करना पड़ा था। बर्मा के लिए यह अपनी स्वतंत्रता के अंत की शुरुआत थी। तीसरा बर्मी साम्राज्य, जिससे एक संक्षिप्त क्षण के लिए ब्रिटिश भारत भयाक्रांत था, अपंग हो चुका था और अब वह ब्रिटिश भारत के पूर्वी सीमांत प्रदेश के लिए किसी भी प्रकार से खतरा नहीं था। एक मिलियन पाउंड (उस समय 5 मिलियन यूएस डॉलर के बराबर) की क्षतिपूर्ति राशि अदा करने से, जोकि उस समय यूरोप के लिए भी एक बहुत बड़ी राशि थी, बर्मी लोग आने वाले कई वर्षों के लिए स्वतः ही आर्थिक रूप से नष्ट हो जाते.

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बमा लोग

१८९० के दशक का एक बमा पति-पत्नी का युग्म सन् १९२० के काल की एक सुसज्जित बमा स्त्री रंगून के एक घर के बाहर नाट देवताओं के लिए बना एक छोटा सा मंदिर बमा (बर्मी भाषा: ဗမာလူမျိုး / बमा लूम्योः) या बर्मन बर्मा का सबसे बड़ा जातीय समूह है। बर्मा के के दो-तिहाई लोग इसी समुदाय के सदस्य हैं। बमा लोग अधिकतर इरावती नदी के जलसम्भर क्षेत्र में रहते हैं और बर्मी भाषा बोलते हैं। प्रायः म्यन्मा के सभी लोगों को 'बमा' कह दिया जाता हैं, जो सही नहीं है क्योंकि बर्मा में और भी जातियाँ रहती हैं। विश्व भर में देखा जाए तो बमा लोगों की कुल सँख्या सन् २०१० में लगभग ३ करोड़ की थी। .

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बंगाल की खाड़ी

बंगाल की खाड़ी विश्व की सबसे बड़ी खाड़ी है और हिंद महासागर का पूर्वोत्तर भाग है। यह मोटे रूप में त्रिभुजाकार खाड़ी है जो पश्चिमी ओर से अधिकांशतः भारत एवं शेष श्रीलंका, उत्तर से बांग्लादेश एवं पूर्वी ओर से बर्मा (म्यांमार) तथा अंडमान एवं निकोबार द्वीपसमूह से घिरी है। बंगाल की खाड़ी का क्षेत्रफल 2,172,000 किमी² है। प्राचीन हिन्दू ग्रन्थों के अन्सुआर इसे महोदधि कहा जाता था। बंगाल की खाड़ी 2,172,000 किमी² के क्षेत्रफ़ल में विस्तृत है, जिसमें सबसे बड़ी नदी गंगा तथा उसकी सहायक पद्मा एवं हुगली, ब्रह्मपुत्र एवं उसकी सहायक नदी जमुना एवं मेघना के अलावा अन्य नदियाँ जैसे इरावती, गोदावरी, महानदी, कृष्णा, कावेरी आदि नदियां सागर से संगम करती हैं। इसमें स्थित मुख्य बंदरगाहों में चेन्नई, चटगाँव, कोलकाता, मोंगला, पारादीप, तूतीकोरिन, विशाखापट्टनम एवं यानगॉन हैं। .

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माण्डले

म्यांमार के मानचित्र में माण्डले की स्थिति मांडले का विहंगम दृष्य माण्डले (Mandalay / बर्मी भाषा में: မန္တလေးမြို့; / मन्तलेःम्रों) बर्मा का दूसरा सबसे बड़ा शहर एवं बर्मा का अन्तिम शाही राजधानी है। यह रंगून से ७१६ किमी उत्तर में इरावदी नदी के किनारे बसा है। मांडले ऊपरी बर्मा का आर्थिक केन्द्र एवं बर्मी संस्कृति का केन्द्र है। मांडले की जेल में ही बालगंगाधर तिलक, बहादुरशाह जफर आदि अनेक भारतीय नेताओं एवं क्रान्तिकारियों को ब्रिटिश सरकार ने बन्दी बना रखा था। .

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म्यान्मा का इतिहास

म्यांमार का इतिहास बहुत पुराना एवं जटिल है। इस क्षेत्र में बहुत से जातीय समूह निवास करते आये हैं जिनमें से मान (Mon) और प्यू संभवतः सबसे प्राचीन हैं। उन्नीसविं शताब्दी में बर्मन (बामार) लोग चीन-तीब्बत सीमा से विस्थापित होकर यहाँ इरावती नदी की घाटी में आ बसे। यही लोग आज के म्यांमार पर शासन करने वाले बहुसंख्यक लोग हैं। म्यांमार का क्रमबद्ध इतिहास सन्‌ 1044 ई. में मध्य बर्मा के 'मियन वंश' के अनावराहता के शासनकाल से प्रारंभ होता है जो मार्कोपोलो के यात्रा संस्मरण में भी उल्लिखित है। सन्‌ 1287 में कुबला खाँ के आक्रमण के फलस्वरूप वंश का विनाश हो गया। 500 वर्षों तक राज्य छोटे छोटे टुकड़ों में बँटा रहा। सन्‌ 1754 ई. में अलोंगपाया (अलोंपरा) ने शान एवं मॉन साम्राज्यों को जीतकर 'बर्मी वंश' की स्थापना की जो 19वीं शताब्दी तक रहा। बर्मा में ब्रिटिश शासन स्थापना की तीन अवस्थाएँ हैं। सन्‌ 1826 ई. में प्रथम बर्मायुद्ध में अँग्रेजों ने आराकान तथा टेनैसरिम पर अधिकार प्राप्त किया। सन्‌ 1852 ई. में दूसरे युद्ध के फलस्वरूप वर्मा का दक्षिणी भाग इनके अधीन हो गया तथा 1886 ई. में संपूर्ण बर्मा पर इनका अधिकार हो गया और इसे ब्रिटिश भारतीय शासनांतर्गत रखा गया। 1937 से पहले ब्रिटिश ने बर्मा को भारत का राज्य घोषित किया था लेकिन फिर अंगरेज सरकार ने बर्मा को भारत से अलग करके उसे ब्रिटिश क्राउन कालोनी (उपनिवेश) बना दिया। द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान जापान ने बर्मा के जापानियों द्वारा प्रशिक्षित बर्मा आजाद फौज के साथ मिल कर हमला किया। बर्मा पर जापान का कब्जा हो गया। बर्मा में सुभाषचंद्र बोस के आजाद हिन्द फौज की वहां मौजूदगी का प्रभाव पड़ा। 1945 में आंग सन की एंटीफासिस्ट पीपल्स फ्रीडम लीग की मदद से ब्रिटेन ने बर्मा को जापान के कब्जे से मुक्त किया लेकिन 1947 में आंग सन और उनके 6 सदस्यीय अंतरिम सरकार को राजनीतिक विरोधियों ने आजादी से 6 महीने पहले उन की हत्या कर दी। आज आंग सन म्यांमार के 'राष्ट्रपिता' कहलाते हैं। आंग सन की सहयोगी यू नू की अगुआई में 4 जनवरी, 1948 में बर्मा को ब्रिटिश राज से आजादी मिली। बर्मा 4 जनवरी 1948 को ब्रिटिश उपनिवेशवाद के चंगुल से मुक्त हुआ और वहाँ 1962 तक लोकतान्त्रिक सरकारें निर्वाचित होती रहीं। 2 मार्च, 1962 को जनरल ने विन के नेतृत्व में सेना ने तख्तापलट करते हुए सत्ता पर कब्ज़ा कर लिया और यह कब्ज़ा तबसे आजतक चला आ रहा है। 1988 तक वहाँ एकदलीय प्रणाली थी और सैनिक अधिकारी बारी-बारी से सत्ता-प्रमुख बनते रहे। सेना-समर्थित दल बर्मा सोशलिस्ट प्रोग्राम पार्टी के वर्चस्व को धक्का 1988 में लगा जब एक सेना अधिकारी सॉ मॉंग ने बड़े पैमाने पर चल रहे जनांदोलन के दौरान सत्ता को हथियाते हुए एक नए सैन्य परिषद् का गठन कर दिया जिसके नेतृत्व में आन्दोलन को बेरहमी से कुचला गया। अगले वर्ष इस परिषद् ने बर्मा का नाम बदलकर म्यांमार कर दिया। ब्रिटिश शासन के दौरान बर्मा दक्षिण-पूर्व एशिया के सबसे धनी देशों में से था। विश्व का सबसे बड़ा चावल-निर्यातक होने के साथ शाल (टीक) सहित कई तरह की लकड़ियों का भी बड़ा उत्पादक था। वहाँ के खदानों से टिन, चांदी, टंगस्टन, सीसा, तेल आदि प्रचुर मात्रा में निकले जाते थे। द्वितीय विश्वयुद्ध में खदानों को जापानियों के कब्ज़े में जाने से रोकने के लिए अंग्रेजों ने भारी मात्र में बमबारी कर उन्हें नष्ट कर दिया था। स्वतंत्रता के बाद दिशाहीन समाजवादी नीतियों ने जल्दी ही बर्मा की अर्थ-व्यवस्था को कमज़ोर कर दिया और सैनिक सत्ता के दमन और लूट ने बर्मा को आज दुनिया के सबसे गरीब देशों की कतार में ला खड़ा किया है। .

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म्यान्मार

म्यांमार यो ब्रह्मदेश दक्षिण एशिया का एक देश है। इसका आधुनिक बर्मी नाम 'मयन्मा' (မြန်မာ .

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म्यित्चीना

म्यित्चीना (बर्मी: မြစ်ကြီးနားမြို့), जिसे स्थानीय जिन्गपो भाषा में म्यित्कीना कहते हैं, बर्मा के उत्तर में स्थित कचिन राज्य की राजधानी है। यह बर्मा की राष्ट्रीय राजधानी यांगोन से १,४८० किमी दूर और माण्डले से ७८५ किमी दूर, इरावती नदी के पश्चिमी किनारे पर स्थित है। यहाँ बर्मा का उत्तरतम रेल स्टेशन भी स्थित है। .

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मोन लोग

मोन दक्षिणपूर्वी एशिया में बसने वाला एक समुदाय है जो मुख्य रूप से बर्मा के मोन राज्य, बगो मण्डल और इरावती नदी के नदीमुख क्षेत्र में और थाईलैण्ड के बर्मा के साथ लगी सीमा के दक्षिणी भाग में रहता है। मोन लोग दक्षिणपूर्वी एशिया में बसने वाली सबसे प्राचीन जातियों में से थे और इस क्षेत्र में थेरवाद बौद्ध धर्म के विस्तार में इनकी बड़ी भूमिका रही है। थाईलैण्ड-बर्मा क्षेत्र में ऐतिहासिक द्वारवती राज्य की स्थापना इन्हीं के पूर्वजों ने की थी। .

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यांगून

रंगून का रेलवे स्टेशन यांगून म्यानमार देश की पुराना राजधानी है। इसका पुराना नाम रंगून था। (आधुनिक बर्मी में 'र' के स्थान पर 'य' का उच्चारण होता है।)। बहादुर शाह ज़फ़र यहीं दफ़न हैं। आजाद हिन्द फौज जिसके सर्वोच्च कमाण्डर नेताजी सुभाषचंद्र बोस थे उस फौज का मुख्यालय यहीं था। रंगून दक्षिणी वर्मा के मध्यवर्ती भाग में, रंगून नदी के किनारे, मर्तबान की खाड़ी तथा इरावदी नदी के मुहाने से ३० किमी उत्तर, सागरतल से केवल २० फुट की ऊँचाई पर स्थित है। यह बर्मा की राजधानी, सबसे बड़ा नगर तथा प्रमुख बंदरगाह है। यहाँ औसत वार्षिक वर्षा १०० इंच होती है। समीपवर्ती क्षेत्र में धान की कृषि अधिक होती है। बंदरगाह से चावल, टीक तथा अन्य लकड़ियाँ, खालें, पेट्रोलियम से निर्मित पदार्थ तथा चाँदी, सीसा, जस्ता, ताँबे की वस्तुओं का निर्यात होता है। वायुमार्ग, नदीमार्ग तथा रेलमार्ग यातायात के प्रमुख साधन हैं। विद्युत् संस्थान, रेशमी एवं ऊनी कपड़े, लकड़ी चिराई का काम, रेलवे के सामान, जलयाननिर्माण तथा मत्स्य उद्योग में काफी उन्नति हो गई है। यहाँ पर सभी आधुनिक वस्तुएँ जैसे बड़े बड़े होटल, सिनेमाघर, भंडार (storage), पगोडा, गिरजाघर, पार्क, वनस्पतिक उद्यान, अजायबघर तथा विश्वविद्यालय आदि हैं। यहाँ की सबसे प्रमुख इमारत श्वेड्रैगन पगोडा है, जो सागरतल से १६८ फुट की ऊँचाई पर बना है। यह पगोडा ३६८ फुट ऊँचा, ९०० फुट लंबा तथा ६८५ फुट चौड़ा है तथा इसके ऊपर सोने की पन्नी चढ़ी हुई है। नगर को युद्ध तथा ज्वालामुखी से काफी हानि उठानी पड़ी है। .

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सगाइंग

सगाइंग (बर्मी: စစ်ကိုင်းမြို့) बर्मा के सगाइंग मण्डल की राजधानी है। यह इरावदी नदी के किनारे माण्डले शहर से २० किमी दक्षिण-पश्चिम में बसा हुआ है - दोनो शहर नदी के विपरीत तटों पर हैं। ऐतिहासिक रूप से सगाइंग नगर एक महत्वपूर्ण बौद्ध धार्मिक केन्द्र रहा है। .

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सीतांग नदी

सीतांग नदी दक्षिण मध्य बर्मा में प्रवाहित होने वाली एक नदी है। बागो योमा पर्वत श्रृंखला इस नदी को ऎयारवाडी नदी से अलग करता है। यह नदी शान पठार के छोर से शुरु होकर, ४२० किलोमीटर प्रवाहित होकर मरतबन की खाड़ी में गिरती है। श्रेणी:म्यान्मार.

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जयशंकर प्रसाद

जयशंकर प्रसाद (30 जनवरी 1890 - 15 नवम्बर 1937)अंतरंग संस्मरणों में जयशंकर 'प्रसाद', सं०-पुरुषोत्तमदास मोदी, विश्वविद्यालय प्रकाशन, वाराणसी; संस्करण-2001ई०,पृ०-2(तिथि एवं संवत् के लिए)।(क)हिंदी साहित्य का बृहत् इतिहास, भाग-10, नागरी प्रचारिणी सभा, वाराणसी; संस्करण-1971ई०, पृ०-145(तारीख एवं ईस्वी के लिए)। (ख)www.drikpanchang.com (30.1.1890 का पंचांग; तिथ्यादि से अंग्रेजी तारीख आदि के मिलान के लिए)।, हिन्दी कवि, नाटककार, कहानीकार, उपन्यासकार तथा निबन्धकार थे। वे हिन्दी के छायावादी युग के चार प्रमुख स्तंभों में से एक हैं। उन्होंने हिंदी काव्य में एक तरह से छायावाद की स्थापना की जिसके द्वारा खड़ी बोली के काव्य में न केवल कमनीय माधुर्य की रससिद्ध धारा प्रवाहित हुई, बल्कि जीवन के सूक्ष्म एवं व्यापक आयामों के चित्रण की शक्ति भी संचित हुई और कामायनी तक पहुँचकर वह काव्य प्रेरक शक्तिकाव्य के रूप में भी प्रतिष्ठित हो गया। बाद के प्रगतिशील एवं नयी कविता दोनों धाराओं के प्रमुख आलोचकों ने उसकी इस शक्तिमत्ता को स्वीकृति दी। इसका एक अतिरिक्त प्रभाव यह भी हुआ कि खड़ीबोली हिन्दी काव्य की निर्विवाद सिद्ध भाषा बन गयी। आधुनिक हिन्दी साहित्य के इतिहास में इनके कृतित्व का गौरव अक्षुण्ण है। वे एक युगप्रवर्तक लेखक थे जिन्होंने एक ही साथ कविता, नाटक, कहानी और उपन्यास के क्षेत्र में हिंदी को गौरवान्वित होने योग्य कृतियाँ दीं। कवि के रूप में वे निराला, पन्त, महादेवी के साथ छायावाद के प्रमुख स्तंभ के रूप में प्रतिष्ठित हुए हैं; नाटक लेखन में भारतेंदु के बाद वे एक अलग धारा बहाने वाले युगप्रवर्तक नाटककार रहे जिनके नाटक आज भी पाठक न केवल चाव से पढ़ते हैं, बल्कि उनकी अर्थगर्भिता तथा रंगमंचीय प्रासंगिकता भी दिनानुदिन बढ़ती ही गयी है। इस दृष्टि से उनकी महत्ता पहचानने एवं स्थापित करने में वीरेन्द्र नारायण, शांता गाँधी, सत्येन्द्र तनेजा एवं अब कई दृष्टियों से सबसे बढ़कर महेश आनन्द का प्रशंसनीय ऐतिहासिक योगदान रहा है। इसके अलावा कहानी और उपन्यास के क्षेत्र में भी उन्होंने कई यादगार कृतियाँ दीं। विविध रचनाओं के माध्यम से मानवीय करुणा और भारतीय मनीषा के अनेकानेक गौरवपूर्ण पक्षों का उद्घाटन। ४८ वर्षो के छोटे से जीवन में कविता, कहानी, नाटक, उपन्यास और आलोचनात्मक निबंध आदि विभिन्न विधाओं में रचनाएँ की। उन्हें 'कामायनी' पर मंगलाप्रसाद पारितोषिक प्राप्त हुआ था। उन्होंने जीवन में कभी साहित्य को अर्जन का माध्यम नहीं बनाया, अपितु वे साधना समझकर ही साहित्य की रचना करते रहे। कुल मिलाकर ऐसी बहुआयामी प्रतिभा का साहित्यकार हिंदी में कम ही मिलेगा जिसने साहित्य के सभी अंगों को अपनी कृतियों से न केवल समृद्ध किया हो, बल्कि उन सभी विधाओं में काफी ऊँचा स्थान भी रखता हो। .

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आवा

ईंट से निर्मित रानी का मठ आवा या इन्वा या रतनपुर (बर्मी भाषा: အင်းဝမြို့ / ang:wa.mrui., IPA: या.

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इरावदी डालफिन

इरावदी डॉल्फ़िन (Orcaella brevirostris) एक यूरीहैलाइन प्रजाति होती है, जो सागर तटों के निकट और ईस्टुअरी तथा नदियों में पायी जाती है। इसका आवास स्थान बंगाल की खाड़ी दक्षिण पूर्वी एशिया है। इस प्रजाति का नाम बर्मा की प्रमुख नदी ऎयारवाडी के नाम पर पड़ा है जहॉ यह बहुतयात मे पायी जाती है। सुंदरवन का उपग्रह चित्र .

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इरावदी मण्डल

इरावदी मण्डल (बर्मी: ချင်းပြည်နယ်) बर्मा के दक्षिणपूर्व में स्थित एक प्रशासनिक मण्डल है। इसका नाम इरावदी नदी पर रखा गया है और उस नदी का नदीमुख (डेल्टा) इस मण्डल के भूक्षेत्र का एक बड़ा भाग है। .

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कचिन राज्य

कचिन राज्य (बर्मी: ကချင်ပြည်နယ်) बर्मा का उत्तरतम राज्य है। इसके पूर्वी और उत्तरी सरहदें चीन से मिलती हैं, और इसके पश्चिमोत्तर में भारत स्थित है। प्रान्तीय राजधानी म्यित्चीना के अलावा भामो और पुताओ यहाँ के मुख्य शहर हैं। कचिन राज्य का ५८८९ मीटर ऊँचा खाकाबो राज़ी पर्वत भारत-बर्मा की सीमा पर स्थित है और बर्मा का सबसे ऊँचा पर्वत है। दक्षिणपूर्वी एशिया की सबसे बड़ी झीलों में से एक, इन्दौजी झील, भी इसी प्रान्त में पड़ती है। .

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कलियुग

कलियुग पारम्परिक भारत का चौथा युग है। आर्यभट के अनुसार महाभारत युद्ध ३१३७ ईपू में हुआ। कलियुग का आरम्भ कृष्ण के इस युद्ध के ३५ वर्ष पश्चात निधन पर हुआ। के अनुसार भगवान श्री कृष्ण के इस पृथ्वी से प्रस्थान के तुंरत बाद 3102 ईसा पूर्व से कलि युग आरम्भ हो गया। .

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अराकान योमा

अराकान योमा (Arakan Yoma), जिसे अराकान पर्वतमाला और रखाइन पर्वतमाला भी कहते हैं, पश्चिमी बर्मा की एक पर्वतमाला है जो उस देश की भारत से सीमा निर्धारित करती है। यह रखाइन राज्य के तट और इरावदी नदी की जलसम्भर द्रोणी के बीच में स्थित है। यह भारत व बर्मा के इस क्षेत्र में समानांतर चलने वाली कई पर्वतमालाओं में से सबसे विशाल है, जिसमें से कुछ भारत के असम, नागालैण्ड और मिज़ोरम राज्यों में भी चलती हैं। इन सामानांतर पर्वत श्रेणियों में नागा पहाड़ियाँ, चिन पहाड़ियाँ और पटकाई पर्वतमाला (जिनमें लुशाई पहाड़ियाँ भी आती हैं) शामिल हैं। दक्षिण में यह पर्वत बंगाल की खाड़ी में जल के भीतर चलते रहते हैं और बहुत आगे जाकर भारत के अंडमान व निकोबार द्वीपसमूह के रूप में फिर पानी से बाहर उभरते हैं। इसका विक्टोरिया नामक सर्वोच्च शिखर १०,०१८ फुट ऊँचा है। .

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छिन्दविन नदी

छिंदविन (बर्मी भाषा: ချင်းတွင်းမြစ်) उत्तरी वर्मा के सांगइंग मंडल (Division) में बहने वाली नदी है, जो इरावदी की मुख्य सहायक है। यह लगभग 885 किलोमीटर लंबी है। छिंदविन नदी तनाई (Tanai), ताबान (Tawan) और तारून (Taron) नदियों के मिलने से बनी है। किंतु इनमें से कौन मुख्य धारा है, यह संदेहास्पद है। इन नदियों के स्रोत हूकांग (Hukawug) घाटी के पार्श्ववर्ती पहाड़ों में हैं। मिंजिन नगर के निकट छिंदविन पूर्ववाहिनी हो जाती है, परंतु कुछ ही दूर बाद पुन: दक्षिण-पूर्व की ओर बहने लगती हैं और गानी, अलोन तथा मोनिवा नामक नगरों से होती हुई इरावदी में मिल जाती है। मुहाने से लगभग 322 किलोमीटर दूर किंडार नगर के पास तक नदी वर्ष भर नौपरिवहनीय रहती है ओर बाढ़ की अवस्था में नौकाएँ 209 किलोमीटर ऊपर होमालिन नगर तक चलती हैं। .

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यहां पुनर्निर्देश करता है:

ऎयारवाडी नदी, ईरावती, ईरावदी नदी, इरावती, इरावदी, इरावदी नदी

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