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अबु बक्र

सूची अबु बक्र

अबू बक्र का असली नाम अब्दुल्लाह इब्न अबू क़ुहाफ़ा (Abdullah ibn Abi Quhaafah अरबी عبد الله بن أبي قحافة), c. 573 ई – 23 अगस्त 634 ई, इनका मशहूर नाम अबू बक्र (أبو بكر) है।, from islam4theworld अबू बक्र पैगंबर मुहम्मद के ससुर और उनके प्रमुख साथियों में से थे। वह मुहम्मद साहब के बाद मुसल्मानों के पहले खलीफा चुने गये। सुन्नी मुसलमान इनको चार प्रमुख पवित्र खलीफाओं में अग्रणी मानतें हैं। ये पैगंबर मुहम्मद के प्रारंभिक अनुयायियों में से थे और इनकी पुत्री आयशा पैगंबर की चहेती पत्नी थी। .

22 संबंधों: तरीक़ा, दस्तगीर साहिब, देवबन्दी, मस्जिद ए नबवी, यमामाह, यर्मोक का युद्ध, राशिदून ख़लीफ़ा, राशिदून ख़िलाफ़त, शिया इस्लाम, शिया-सुन्नी विवाद, हिजरत, ख़लीफ़ा, ख़लीफ़ाओं की सूची, ख़िलाफ़त, ख़ैबर की लड़ाई, आइशा, इस्लाम, क़ुरआन, अबु बक्र, अम्र इब्न अल-आश, उमय्यद परिवार, उमर

तरीक़ा

एक तरीक़ा (या तरीक़ाह; अरबी: طريقة ṭarīqah) सूफ़ीवाद का एक स्कूल या तरीक़ा है, या विशेष रूप से हकीकत की तलाश के उद्देश्य से इस तरह के तरीक़े के रहस्यमय शिक्षण और आध्यात्मिक प्रथाओं के लिए एक अवधारणा है, जो "परम सत्य" के रूप में अनुवाद करता है। एक तरीक़ा में एक मुर्शिद (गाइड) है जो नेता या आध्यात्मिक निदेशक की भूमिका निभाता है। तरीक़े के सदस्यों या अनुयायियों को मुरीदैन (एकवचन मुरीद) के रूप में जाना जाता है, जिसका अर्थ है " वांछित "। "अल्लाह को जानने और अल्लाह से इश्क़ करने के ज्ञान की इच्छा" (जिसे फ़क़ीर भी कहा जाता है)। शरिया के सम्बन्ध में इस का अर्थ "रास्ता, पथ" का रूपक समझा जाना चाहिए, अधिक विशेष रूप से "अच्छी तरह से चलने वाला पथ; पानी बहने का सूराक या मार्ग का अर्थ हैं। तरीक़ा का मतलब "पथ" रूपक रहस्यमय द्वार लिया गया एक और मार्ग है, जो "अच्छी तरह से चलने वाले पथ" या शरिया के गूढ़ हकीकत की ओर से निकलता है । शरिया, तरीक़ा और हक़ीक़त के उत्तराधिकार के बाद चौथा "मक़ाम" मारिफ़ा कहा जाता है। यह पश्चिमी रहस्यवाद में यूनी मिस्टिका के अनुरूप, हकीकत का "अदृश्य केंद्र" है, और रहस्यवादी का अंतिम उद्देश्य है। तसव्वुफ़, अरबी शब्द जो रहस्यवाद और इस्लामिक गूढ़ता को संदर्भित करता है, पश्चिम में सूफ़ीवाद के रूप में जाना जाता है। .

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दस्तगीर साहिब

दस्तगीर साहिब (دستگیر صاحب) भारत के जम्मू व कश्मीर राज्य के श्रीनगर शहर के खानियार इलाके में स्थित एक प्रसिद्ध सूफ़ी तीर्थस्थल है। यह सूफ़ी संत अब्दुल क़ादिर जीलानी से सम्बंधित है क्योंकि यहाँ उनका एक बाल सुरक्षित है, हालांकि वह स्वयं यहाँ कभी नहीं आये थे। उनके इस केश को 'मो-ए-पाक' कहा जाता है (फ़ारसी भाषा में 'मू' या 'मो' शब्द का अर्थ 'बाल' होता है)। दस्तगीर साहिब का निर्माण सन् १८०६ में हुआ था और १८७७ में इसका कुछ विस्तार किया गया। केश के अलावा यहाँ हज़रत अबु बकर द्वारा लिखी गई क़ुरान की भी एक प्रति मौजूद है। .

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देवबन्दी

देवबन्दी (उर्दू:, अंग्रेज़ी: Deobandi) सुन्नी इस्लाम के हनफ़ी पन्थ की एक प्रमुख विचारधारा है जिसमें कुरआन व शरियत का कड़ाई से पालन करने पर ज़ोर है। यह भारत के उत्तर प्रदेश राज्य में स्थित दारुल उलूम देवबन्द से प्रचारित हुई है जो विश्व में इस्लामी शिक्षा का दूसरा बड़ा केन्द्र है। इसके अनुयायी इसे एक विशुद्ध इस्लामी विचारधारा मानते हैं जो कर्मकांड-हीन है। ये इस्लाम के उस तरीके पर अमल करते हैं, जो अल्लाह के नबी हजरत मुहम्मद स० ले कर आये थे, तथा जिसे ख़ुलफ़ा-ए-राशिदीन (अबु बकर अस-सिद्दीक़​, उमर इब्न अल-ख़त्ताब​, उस्मान इब्न अफ़्फ़ान​ और अली इब्न अबू तालिब​), सहाबा-ए-कराम, ताबेईन ने अपनाया तथा प्रचार-प्रसार किया। .

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मस्जिद ए नबवी

मस्जिद-ए-नबवी (المسجد النبوي, अल-मस्जिद अल-नबवी, "पैगंबर की मस्जिद"), जिसे अक्सर पैगंबर की मस्जिद कहा जाता है, सऊदी अरब के शहर मदीना में स्थित इस्लाम का दूसरा पवित्र स्थान है। मक्का में मस्जिद-ए-हरम मुसलमानों के लिए पवित्र स्थान है। जबकि बैतुल मुक़द्दस में मस्जिद-ए-अक्सा इस्लाम का तीसरा पवित्र स्थान है। .

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यमामाह

अरबी इतिहासकार अल-हमदानी (१०वीं सदी) और याक़ूत (१३वीं सदी) के अनुसार यमामाह क्षेत्र का सर्वाधिक विस्तार यमामाह, जिसे अरबी विधि में अल-यमामाह कहते हैं (अंग्रेज़ी: Yamamah, अरबी) अरबी प्रायद्वीप के मध्य के नज्द पठार से पूर्व में स्थित एक ऐतिहासिक क्षेत्र है। कभी-कभी यह नाम केवल जौ अल-यमामाह (Jaww Al-Yamamah) के प्राचीन गाँव के लिए भी इस्तेमाल होता था जो आधुनिक अल-ख़र्ज शहर के पास स्थित है और जिसके पीछे पूरे क्षेत्र का नाम पड़ा था।, Martijn Theodoor Houtsma, pp.

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यर्मोक का युद्ध

यर्मोक का युद्ध बीजान्टिन साम्राज्य की सेना और रशीदुन खिलाफत की मुस्लिम अरब सेनाओं के बीच एक बड़ी लड़ाई थी। 6 मार्च, 636 में यर्मोक नदी के पास छह दिनों तक चलने वाली कई श्रृंखलाएं शामिल थीं, जो आज सीरिया - जॉर्डन और इजराइल की सीमाएं हैं, गलील सागर के पूर्व में हैं। युद्ध का परिणाम एक पूर्ण मुस्लिम विजय था जो सीरिया में बीजान्टिन शासन को समाप्त कर चुका था। यर्मोक के युद्ध को सैन्य इतिहास में सबसे निर्णायक लड़ाइयों में से एक माना जाता है। .

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राशिदून ख़लीफ़ा

खलीफ़ा राशिदून: (خلیفۃ راشدون) - रुष्द व हिदायत पाये खलीफ़ा। सुन्नी मुसलमानों के लिए पैगम्बर मुहम्मद की मृत्यु के बाद, सन् ६३२ से लकर सन् ६६१ के मध्य के खलीफ़ा (प्रधानों) को राशिदून या अल खलीफ़ उर्र-राशिदून (सही दिशा में चलते हुए) कहते हैं। कार्यकाल के अनुसार ये चार खलीफ़ा हैं। (इब्न माजा, अबी दाऊद).

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राशिदून ख़िलाफ़त

रशीदुन खिलाफ; الخلافة الراشدية '‏‎: अल.

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शिया इस्लाम

अरबी लिपि में लिखा शब्द-युग्म "मुहम्मद अली" इस शिया विश्वास को दिखाता है कि मुहम्मद और अली में निष्ठा दिखाना एक समान ही है। इसको उलटा घुमा देने पर यह "अली मुहम्मद" बन जाता है। शिया एक मुसलमान सम्प्रदाय है। सुन्नी सम्प्रदाय के बाद यह इस्लाम का दूसरा सबसे बड़ा सम्प्रदाय है जो पूरी मुस्लिम आबादी का केवल १५% है। सन् ६३२ में हजरत मुहम्मद की मृत्यु के पश्चात जिन लोगों ने अपनी भावना से हज़रत अली को अपना इमाम (धर्मगुरु) और ख़लीफा (नेता) चुना वो लोग शियाने अली (अली की टोली वाले) कहलाए जो आज शिया कहलाते हैं। लेकिन बहोत से सुन्नी इन्हें "शिया" या "शियाने अली" नहीं बल्कि "राफज़ी" (अस्वीकृत लोग) नाम से बुलाते हैं ! इस धार्मिक विचारधारा के अनुसार हज़रत अली, जो मुहम्मद साहब के चचेरे भाई और दामाद दोनों थे, ही हजरत मुहम्मद साहब के असली उत्तराधिकारी थे और उन्हें ही पहला ख़लीफ़ा (राजनैतिक प्रमुख) बनना चाहिए था। यद्यपि ऐसा हुआ नहीं और उनको तीन और लोगों के बाद ख़लीफ़ा, यानि प्रधान नेता, बनाया गया। अली और उनके बाद उनके वंशजों को इस्लाम का प्रमुख बनना चाहिए था, ऐसा विशवास रखने वाले शिया हैं। सुन्नी मुसलमान मानते हैं कि हज़रत अली सहित पहले चार खलीफ़ा (अबु बक़र, उमर, उस्मान तथा हज़रत अली) सतपथी (राशिदुन) थे जबकि शिया मुसलमानों का मानना है कि पहले तीन खलीफ़ा इस्लाम के गैर-वाजिब प्रधान थे और वे हज़रत अली से ही इमामों की गिनती आरंभ करते हैं और इस गिनती में ख़लीफ़ा शब्द का प्रयोग नहीं करते। सुन्नी मुस्लिम अली को (चौथा) ख़लीफ़ा भी मानते है और उनके पुत्र हुसैन को मरवाने वाले ख़लीफ़ा याजिद को कई जगहों पर पथभ्रष्ट मुस्लिम कहते हैं। इस सम्प्रदाय के अनुयायियों का बहुमत मुख्य रूप से इरान,इराक़,बहरीन और अज़रबैजान में रहते हैं। इसके अलावा सीरिया, कुवैत, तुर्की, अफ़ग़ानिस्तान, पाकिस्तान, ओमान, यमन तथा भारत में भी शिया आबादी एक प्रमुख अल्पसंख्यक के रूप में है। शिया इस्लाम के विश्वास के तीन उपखंड हैं - बारहवारी, इस्माइली और ज़ैदी। एक मशहूर हदीस मन्कुनतो मौला फ़ हा जा अली उन मौला, जो मुहम्मद साहब ने गदीर नामक जगह पर अपने आखरी हज पर खुत्बा दिया था, में स्पष्ट कह दिया था कि मुसलमान समुदाय को समुदाय अली के कहे का अनुसरण करना है। .

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शिया-सुन्नी विवाद

शिया-सुन्नी विवाद इस्लाम के सबसे पुरानी और घातक लड़ाइयों में से एक है। इसकी शुरुआत इस्लामी पैग़म्बर मुहम्मद की मृत्यु के बाद, सन ६३२ में, इस्लाम के उत्तराधिकारी पद की लड़ाई को लेकर हुई। कुछ लोगों का कहना था कि मुहम्मद साहब ने अपने चचेरे भाई और दामाद अली को इस्लाम का वारिस बनाया है (शिया) जबकि अन्य लोगों ने माना कि मुहम्मद साहब ने सिर्फ़ हज़रत अली का ध्यान रखने को कहा है और असली वारिस अबू बकर को होना चाहिए (सुन्नी)। जो लोग अली के उत्तराधिकार के समर्थक थे उन्हें शिया कहा गया जबकि अबू बकर के नेता बनाने के समर्थकों को सुन्नी कहा गया। ध्यान दें कि वास्तव में अबु बकर को ख़लीफ़ा बनाया गय़ा और इसके दो ख़लीफ़ाओं के बाद ही अली को ख़लीफ़ा बनाया गया। इससे दोनों पक्षों में लड़ाई जारी रही। दूसरे, तीसरे और चौथे ख़लीफ़ाओं की हत्या कर दी गई थी - इन खलीफ़ाओं के नाम हैं उमर, उस्मान और अली। शिया, अली से अपने नेताओं की गिनती करते हैं और अपने नेता को खलीफ़ा के बदले इमाम कहते हैं। मुहम्मद के नेतृत्व में पूरा अरबी प्रायद्वीप एक मत और साम्राज्य के अधीन पहली बार आया था। इतने बड़े साम्राज्य के अधिकारी बनने की होड़ से इस मतभेद का जन्म हुआ। हज़रत अली, जो मुहम्मद साहब के चचेरे भाई और दामाद दोनों थे, ही हजरत मुहम्मद साहब के असली उत्तराधिकारी थे और उन्हें ही पहला ख़लीफ़ा बनना चाहिए था। यद्यपि ऐसा हुआ नहीं और उनको तीन और लोगों के बाद ख़लीफ़ा, यानि प्रधान नेता, बनाया गया। अली और उनके बाद उनके वंशजों को इस्लाम का प्रमुख बनना चाहिए था, ऐसा विशवास रखने वाले शिया हैं। सुन्नी मुसलमान मानते हैं कि हज़रत अली सहित पहले चार खलीफ़ा (अबु बक़र, उमर, उस्मान तथा हज़रत अली) सतपथी (राशिदुन) थे जबकि शिया मुसलमानों का मानना है कि पहले तीन खलीफ़ा इस्लाम के गैर-वाजिब प्रधान थे और वे हज़रत अली से ही इमामों की गिनती आरंभ करते हैं और इस गिनती में ख़लीफ़ा शब्द का प्रयोग नहीं करते। सुन्नी अली को (चौथा) ख़लीफ़ा मानते है और उनके पुत्र हुसैन को मरवाने वाले ख़लीफ़ा याजिद को कई जगहों पर पथभ्रष्ट मुस्लिम कहते हैं। हाँलांकि ये सिर्फ उत्तराधिकार का मामला था और हजरत अली भी कई वर्षों के बाद ख़लीफ़ा बने पर इससे मुस्लिम समुदाय में विभेद आ गया जो सदियों तक चला। आज दुनिया में, सुन्नी बहुमत में हैं पर शिया विश्वास ईरान, इराक़ समेत कई देशों में प्रधान है। .

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हिजरत

हिज्राह या हिजरत (Hegira or Hijrah (هِجْرَة) हज़रत मुहम्मद का अपने अनुयाइयों (सहाबा) के साथ, शहर मक्का से शहर मदीना जिस का पुराना नाम यस्रिब था, को सन ६२२ ई में प्रवास है। In June 622 ई में, शहर मक्का में हज़रत मुहम्मद को पता चला कि उनकी हत्या का प्रयास किया जारहा है, इस सन्दर्भ में, शहर मक्का छोड़ कर यस्रिब (मदीना) प्रवास किये। इनके साथ इनके दोस्त और सहाबी अबू बक्र भी थे। यस्रिब को 'मदीनत-अन-नबी' का नाम दिया गया। अर्थात प्रेशित का नगर। बाद में अन-नबी बोलना कम होगया, सिर्फ मदीना कहलाने लगा। मदीना क मतलब "शहर" है। F. A. Shamsi, "The Date of Hijrah", Islamic Studies 23 (1984): 189-224, 289-323 (+). हिजरी और हिज्राह में अंतर है, अक्सर यह दोनों शब्दों को लेकर एक ही शब्द समझ जाते हैम, जब कि ऐसा नहीं है, दोनों अलग अलग शब्द हैं। हिज्री इस्लामी केलंडर है तो हिज्रत हज़रत मुहम्मद का मदीना को सफ़र करना है। .

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ख़लीफ़ा

ख़लीफ़ा (अरबी:, अंग्रेज़ी: Caliph या Khalifa) अरबी भाषा में ऐसे शासक को कहते हैं जो किसी इस्लामी राज्य या अन्य शरिया (इस्लामी क़ानून) से चलने वाली राजकीय व्यवस्था का शासक हो। पैग़म्बर मुहम्मद की ६३२ ईसवी में मृत्यु के बाद वाले ख़लीफ़ा पूरे मुस्लिम क्षेत्र के राजनैतिक नेता माने जाते थे। ख़लीफ़ाओं का सिलसिला अंत में जाकर उस्मानी साम्राज्य के पतन पर १९२५ में ही ख़त्म हुआ।, David Nicolle, pp.

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ख़लीफ़ाओं की सूची

यह उन शासकों की एक सूची है जिन्हें ख़लीफ़ा का शीर्षक (पद), इस्लामी राज्य के सर्वोच्च धार्मिक और राजनीतिक नेता होते हैं, जिन्हें ख़लीफ़ा के रूप में जाना जाता है, ख़लीफ़ा हजरत मुहम्मद साहब के राजनीतिक उत्तराधिकारी के रूप में शासन करते थे। .

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ख़िलाफ़त

इस्लाम की विजय यात्रा मुहम्मद साहब की मृत्यु के बाद इस्लाम के प्रमुख को खलीफ़ा कहते थे। इस विचारधारा को खिलाफ़त कहा जाता है। प्रथम चार खलीफाओं को राशिदुन कहते हैं। उम्मयद, अब्बासी और फ़ातिमी खलीफा क्रमशः दमिश्क, बग़दाद और काहिरा से शासन करते थे। इसके बाद उस्मानी (ऑटोमन तुर्क) खिलाफ़त आया। मुहम्मद साहब के नेतृत्व में अरब बहुत शक्तिशाली हो गए थे। उन्होंने एक बड़े साम्राज्य पर अधिकार कर लिया था जो इससे पहले अरबी इतिहास में शायद ही किसी ने किया हो। खलीफ़ा बनने का अर्थ था - इतने बड़े साम्राज्य का मालिक। अतः इस पद को लेकर विवाद होना स्वाभाविक था। .

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ख़ैबर की लड़ाई

ख़ैबर का युद्ध (सन् 629, मई) इस्लाम के प्रारंभिक इतिहास की एक महत्वपूर्ण घटना थी जिससे शुरुआती मुसलमानों और हिजाज़ के यहूदियों के बीच के निर्णायक युद्ध के रूप में देखा जाता है जिसमें यहूदियों ने हथियार डाल दिये थे। इस लड़ाई में इस्लामी पैग़म्बर मुहम्मद के भतीजे और चौथे खलीफ़ा अली की बहादुरी भी स्मरणीय थी। यहूदियों के साथ हुई एक पिछली संधि का यहूदियों द्वारा उल्लंघन करने से इस्लामी पक्ष ख़फ़ा थे। पहले अबू बकर और उमर को इसके ख़िलाफ़ भेजा गया, लेकिन उनकी असफलता के बाद अली के नेतृत्व में सेना भेजी गई जिसमें निर्णायक विजय प्राप्त हुई। ध्यान रहे कि पैग़म्बर के मरने के बाद, पहले भेजे गए सेनानायक - अबू बकर और उमर - पहले और दूसरे ख़लीफ़ा (प्रधान) बने, लेकिन अली को चौथा ख़लीफ़ा बनाया गया। इस लड़ाई का इस कारण शिया-सुन्नी विवाद में भी महत्व है, क्योंकि शिया पहले वाले दोनो नायकों को वाजिब खलीफ़ा नहीं मानते और अली से ही गिनती शुरु करते हैं। श्रेणी:मुहम्मद और यहूदी धर्म श्रेणी:हेजाज़ का इतिहास श्रेणी:सातवीं सदी के संघर्ष.

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आइशा

आइशा बिन्त अबू बक्र (613/614 - 678 सीई; अरबी: عائشة بنت أبي بكر या عائشة, लिप्यंतरण: ' Ā'ishah, जिन्हें ऐशा, आऐस्याह, आयशा, ए के रूप में भी लिखा गया है 'ईशा, आऐशह, आऐशा, या आयेशा / ɑː i ʃ ɑː /) हज़रत मुहम्मद की पत्नियों में से एक थी। इस्लामी लेखन में, कुरान में मुहम्मद की पत्नियों के विवरण के अनुसार, उसका नाम अक्सर "उम् उल मोमिनीन" "विश्वासियों की मां" शीर्षक (अरबी: أم المؤمنين umm al- mu'min īn) से उपसर्ग किया जाता है। इस्लाम के पहले ख़लीफ़ा अबू बक्र की बेटी थीं। मुहम्मद के जीवन और उनकी मृत्यु के बाद दोनों के प्रारंभिक इस्लामी इतिहास में ऐशा की अहम भूमिका थी। सुन्नी परंपरा में, ऐशा को विद्वान और जिज्ञासु माना जाता है। उन्होंने मुहम्मद के संदेश के फैलाव में योगदान दिया और उनकी मृत्यु के 44 साल बाद मुस्लिम समुदाय की सेवा की। वह मुहम्मद के निजी जीवन से संबंधित मामलों पर, बल्कि विरासत, तीर्थयात्रा और eschatology जैसे विषयों पर भी 2210 हदीस, के वर्णन के लिए भी जाना जाता है। कविता और चिकित्सा समेत विभिन्न विषयों में उनकी बुद्धि और ज्ञान, अल-जुहरी और उनके छात्र उर्व इब्न अल- जुबयर जैसे शुरुआती चमकदार लोगों द्वारा अत्यधिक प्रशंसा की गई थी। उनके पिता, अबू बकर, मुहम्मद के सफल होने के लिए पहला खलीफा बन गए, और उमर द्वारा दो साल बाद उनका उत्तराधिकारी बन गया। तीसरे खलीफ उथमान के समय, आइशा के खिलाफ विपक्ष में एक प्रमुख भूमिका थी जो उनके खिलाफ बढ़ी, हालांकि वह या तो उनकी हत्या के लिए जिम्मेदार लोगों के साथ सहमत नहीं थीं और न ही अली की पार्टी के साथ। अली के शासनकाल के दौरान, वह उथमान की मृत्यु का बदला लेना चाहती थी, जिसे उसने ऊंट की लड़ाई में करने का प्रयास किया था। उन्होंने अपने ऊंट के पीछे भाषण और प्रमुख सैनिकों को देकर युद्ध में भाग लिया। वह लड़ाई हार गई, लेकिन उसकी भागीदारी और दृढ़ संकल्प ने एक स्थायी प्रभाव छोड़ा। बाद में, वह बीस साल से अधिक समय तक मदीना में चुपचाप रहती थी, राजनीति में कोई हिस्सा नहीं लेती थी, अली से मिलकर बन गई और खलीफ मुआविया का विरोध नहीं किया। पारंपरिक हदीस के अधिकांश स्रोतों में कहा गया है कि आइशा की शादी छः या सात वर्ष की आयु में मुहम्मद से हुई थी, लेकिन वह नौ वर्ष की आयु तक अपने माता-पिता के घर में रहती थीं, या दस इब्न हिशम के अनुसार, जब विवाह समाप्त हो गया था मुथान के साथ, 53, मदीना में । आधुनिक समय में कई विद्वानों द्वारा इस समयरेखा को चुनौती दी गई है। शिया का आम तौर पर आइशा का नकारात्मक विचार है । उन्होंने ऊंट की लड़ाई में अपने खलीफा के दौरान अली से घृणा करने और उसे अपमानित करने का आरोप लगाया, जब उसने बसरा में अली की सेना से पुरुषों से लड़ा। .

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इस्लाम

इस्लाम (अरबी: الإسلام) एक एकेश्वरवादी धर्म है, जो इसके अनुयायियों के अनुसार, अल्लाह के अंतिम रसूल और नबी, मुहम्मद द्वारा मनुष्यों तक पहुंचाई गई अंतिम ईश्वरीय पुस्तक क़ुरआन की शिक्षा पर आधारित है। कुरान अरबी भाषा में रची गई और इसी भाषा में विश्व की कुल जनसंख्या के 25% हिस्से, यानी लगभग 1.6 से 1.8 अरब लोगों, द्वारा पढ़ी जाती है; इनमें से (स्रोतों के अनुसार) लगभग 20 से 30 करोड़ लोगों की यह मातृभाषा है। हजरत मुहम्मद साहब के मुँह से कथित होकर लिखी जाने वाली पुस्तक और पुस्तक का पालन करने के निर्देश प्रदान करने वाली शरीयत ही दो ऐसे संसाधन हैं जो इस्लाम की जानकारी स्रोत को सही करार दिये जाते हैं। .

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क़ुरआन

'''क़ुरान''' का आवरण पृष्ठ क़ुरआन, क़ुरान या कोरआन (अरबी: القرآن, अल-क़ुर्'आन) इस्लाम की पवित्रतम किताब है और इसकी नींव है। मुसलमान मानते हैं कि इसे अल्लाह ने फ़रिश्ते जिब्रील द्वारा हज़रत मुहम्मद को सुनाया था। मुसलमान मानते हैं कि क़ुरआन ही अल्लाह की भेजी अन्तिम और सर्वोच्च किताब है। यह ग्रन्थ लगभग 1400 साल पहले अवतरण हुई है। इस्लाम की मान्यताओं के मुताबिक़ क़ुरआन अल्लाह के फ़रिश्ते जिब्रील (दूत) द्वारा हज़रत मुहम्मद को सन् 610 से सन् 632 में उनकी मौत तक ख़ुलासा किया गया था। हालांकि आरंभ में इसका प्रसार मौखिक रूप से हुआ पर पैग़म्बर मुहम्मद की मौत के बाद सन् 633 में इसे पहली बार लिखा गया था और सन् 653 में इसे मानकीकृत कर इसकी प्रतियाँ इस्लामी साम्राज्य में वितरित की गईं थी। मुसलमानों का मानना है कि ईश्वर द्वारा भेजे गए पवित्र संदेशों के सबसे आख़िरी संदेश क़ुरआन में लिखे गए हैं। इन संदेशों की शुरुआत आदम से हुई थी। हज़रत आदम इस्लामी (और यहूदी तथा ईसाई) मान्यताओं में सबसे पहला नबी (पैग़म्बर या पयम्बर) था और इसकी तुलना हिन्दू धर्म के मनु से एक हद तक की जा सकती है। जिस तरह से हिन्दू धर्म में मनु की संतानों को मानव कहा गया है वैसे ही इस्लाम में आदम की संतानों को आदमी कहा जाता है। तौहीद, धार्मिक आदेश, जन्नत, जहन्नम, सब्र, धर्म परायणता (तक्वा) के विषय ऐसे हैं जो बारम्बार दोहराए गए। क़ुरआन ने अपने समय में एक सीधे साधे, नेक व्यापारी इंसान को, जो अपने ‎परिवार में एक भरपूर जीवन गुज़ार रहा था। विश्व की दो महान शक्तियों ‎‎(रोमन तथा ईरानी) के समक्ष खड़ा कर दिया। केवल यही नहीं ‎उसने रेगिस्तान के अनपढ़ लोगों को ऐसा सभ्य बना दिया कि पूरे विश्व पर ‎इस सभ्यता की छाप से सैकड़ों वर्षों बाद भी इसके निशान पक्के मिलते हैं। ‎क़ुरआन ने युध्द, शांति, राज्य संचालन इबादत, परिवार के वे आदर्श प्रस्तुत ‎किए जिसका मानव समाज में आज प्रभाव है। मुसलमानों के अनुसार कुरआन में दिए गए ज्ञान से ये साबित होता है कि हज़रत मुहम्मद एक नबी है | .

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अबु बक्र

अबू बक्र का असली नाम अब्दुल्लाह इब्न अबू क़ुहाफ़ा (Abdullah ibn Abi Quhaafah अरबी عبد الله بن أبي قحافة), c. 573 ई – 23 अगस्त 634 ई, इनका मशहूर नाम अबू बक्र (أبو بكر) है।, from islam4theworld अबू बक्र पैगंबर मुहम्मद के ससुर और उनके प्रमुख साथियों में से थे। वह मुहम्मद साहब के बाद मुसल्मानों के पहले खलीफा चुने गये। सुन्नी मुसलमान इनको चार प्रमुख पवित्र खलीफाओं में अग्रणी मानतें हैं। ये पैगंबर मुहम्मद के प्रारंभिक अनुयायियों में से थे और इनकी पुत्री आयशा पैगंबर की चहेती पत्नी थी। .

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अम्र इब्न अल-आश

अम्र इब्न अल आश: Amr ibn al-‘As: (عمرو بن العاص;‏‎ (जन्म: 14 फरवरी 585, मृत्यु: 664) एक अरब सैन्य कमांडर थे जो 640 की मुस्लिम विजय प्राप्त करने के लिए सबसे प्रसिद्ध है। हजरत मुहम्मद सहाब के समकालीन और एक सहाबा (साथी) थे जिन्होने 8 हिजरी में इस्लाम धर्म स्वीकार करने के बाद मुस्लिम पदानुक्रम के माध्यम से प्रांरभ में मिस्र पर मुस्लिम विजय प्राप्त की थी जहाँ इन्होंने तत्ताकलीन राजधानी फस्टट की स्थापना की और अम्र इब्न अल-मस्जिद का निर्माण कराया जो मुस्लिमों की अफ्रीका में प्रथम मस्जिद थी और वर्तमान में भी मौजूद है। .

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उमय्यद परिवार

उमय्यद परिवार या उमय्यद वंश, जिसका नाम उमय्या इब्न अब्द शम्स से निकला है। उमाय्या के महान-पोते मुआवियाह ने 661 ईस्वी में उमाय्याद खिलाफत की स्थापना की, और अपनी राजधानी दमिश्क, सीरिया को स्थानांतरित कर दी। मुअवियाह की शाखा जो मुअवियाह की थी, वह 684 में मुआविया द्वितीय के पदोन्नति के बाद शक्ति का अभ्यास करने के लिए बंद हो गई थी। और खिलाफत को मारवानिद शाखा में स्थानांतरित कर दिया गया था, जो कि खिलाफत पर शासन करना जारी रखा था और 750 में अब्बासी खलिफाओ द्वारा हत्या उमय्यद खलीफा कर दी जाती थी।। जिसके बाद अब्द अल-रहमान नामित उमायद खलीफा ने नरसंहार से भाग कर इबेरियन प्रायद्वीप (अल-आँडालस) में एक अमीर रूप शासन किया, जहां उन्होंने कॉर्डोबा शहर से एक स्वतंत्र अमीरात का शासन किया। उनके वंश ने कोर्डोबा के अमीरात पर शासन करना जारी रखा जो 11 वीं शताब्दी तक रहा, .

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उमर

हजरत उमर इब्न अल-ख़त्ताब (अरबी में عمر بن الخطّاب), ई. (586–590 – 644) मुहम्मद साहब के प्रमुख चार सहाबा (साथियों) में से थे। वह हज़रत अबु बक्र के बाद मुसलमानों के दूसरे खलीफा चुने गये। मुहम्मद साहब ने फारूक नाम की उपाधि दी थी। जिसका अर्थ सत्य और असत्य में फर्क करने वाला। मुहम्मद साहब के अनुयाईयों में इनका रुतबा हज़रत अबू बक्र के बाद आता है। उमर ख़ुलफा-ए-राशीदीन में दूसरे ख़लीफा चुने गए। उमर ख़ुलफा-ए-राशीदीन में सबसे सफल ख़लीफा साबित हुए। मुसलमान इनको फारूक-ए-आज़म तथा अमीरुल मुमिनीन भी कहते हैं। युरोपीय लेखकों ने इनके बारे में कई किताबें लिखी हैं तथा उमर महान (Umar The Great) की उपाधी दी है। प्रसिद्ध लेखक माइकल एच.

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यहां पुनर्निर्देश करता है:

हजरत अबू बकर सिद्दीक रजितालाह आन्हु, अबु बकर, अबु बकर अस-सिद्दीक़, अबु बकर अस-सिद्दीक़​, अबु बक़र, अबु बक्र सिद्दीक़, अबू बकर, अबू बक्र

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