लोगो
यूनियनपीडिया
संचार
Google Play पर पाएं
नई! अपने एंड्रॉयड डिवाइस पर डाउनलोड यूनियनपीडिया!
मुक्त
ब्राउज़र की तुलना में तेजी से पहुँच!
 

अपस्मार

सूची अपस्मार

अपस्मार या मिर्गी (वैकल्पिक वर्तनी: मिरगी, अंग्रेजी: Epilepsy) एक तंत्रिकातंत्रीय विकार (न्यूरोलॉजिकल डिसॉर्डर) है जिसमें रोगी को बार-बार दौरे पड़ते है। मस्तिष्क में किसी गड़बड़ी के कारण बार-बार दौरे पड़ने की समस्या हो जाती है।, हिन्दुस्तान लाइव, १८ नवम्बर २००९ दौरे के समय व्यक्ति का दिमागी संतुलन पूरी तरह से गड़बड़ा जाता है और उसका शरीर लड़खड़ाने लगता है। इसका प्रभाव शरीर के किसी एक हिस्से पर देखने को मिल सकता है, जैसे चेहरे, हाथ या पैर पर। इन दौरों में तरह-तरह के लक्षण होते हैं, जैसे कि बेहोशी आना, गिर पड़ना, हाथ-पांव में झटके आना। मिर्गी किसी एक बीमारी का नाम नहीं है। अनेक बीमारियों में मिर्गी जैसे दौरे आ सकते हैं। मिर्गी के सभी मरीज एक जैसे भी नहीं होते। किसी की बीमारी मध्यम होती है, किसी की तेज। यह एक आम बीमारी है जो लगभग सौ लोगों में से एक को होती है। इनमें से आधों के दौरे रूके होते हैं और शेष आधों में दौरे आते हैं, उपचार जारी रहता है। अधिकतर लोगों में भ्रम होता है कि ये रोग आनुवांशिक होता है पर सिर्फ एक प्रतिशत लोगों में ही ये रोग आनुवांशिक होता है। विश्व में पाँच करोड़ लोग और भारत में लगभग एक करोड़ लोग मिर्गी के रोगी हैं। विश्व की कुल जनसँख्या के ८-१० प्रतिशत लोगों को अपने जीवनकाल में एक बार इसका दौरा पड़ने की संभावना रहती है।, वेब दुनिया, डॉ॰ वोनोद गुप्ता। १७ नवम्बर को विश्व भर में विश्व मिरगी दिवस का आयोजन होता है। इस दिन तरह-तरह के जागरुकता अभियान और उपचार कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है।।। द टाइम्स ऑफ इंडिया।, याहू जागरण, १७ नवम्बर २००९ .

21 संबंधों: एक्यूपंक्चर, तानिकाशोथ, तंत्रिकाविकृति विज्ञान, बच्चों में मिर्गी, बौद्धिक अशक्‍तता, भूत-प्रेत का अपसारण, मण्डूकपर्णी, मदिरा के हानिकारक प्रभाव, मनोविदलता, मनोविज्ञान की समयरेखा, मस्तिष्कखंडछेदन, मादकता, मिक्रोप्सिया, लिवोफ़्लॉक्सासिन, शतावर, शराबीपन, स्नायुशास्त्र, जॉन रॉबर्ट्स, गर्भावस्था, गोरखमुंडी, अरीठा

एक्यूपंक्चर

हुआ शउ से एक्यूपंक्चर चार्ट (fl. 1340 दशक, मिंग राजवंश). शि सी जिंग फ़ा हुई की छवि (चौदह मेरिडियन की अभिव्यक्ति). (टोक्यो: सुहाराया हेइसुके कंको, क्योहो गन 1716). एक्यूपंक्चर (Accupuncture) दर्द से राहत दिलाने या चिकित्सा प्रयोजनों के लिए शरीर के विभिन्न बिंदुओं में सुई चुभाने और हस्तकौशल की प्रक्रिया है।एक्यूपंक्चर: दर्द से राहत दिलाने, शल्यक बेहोशी और उपचारात्मक उद्देश्यों के लिए परिसरीय नसों के समानांतर शरीर के विशिष्ट भागों में बारीक सुईयां चुभाने का चीना अभ्यास.

नई!!: अपस्मार और एक्यूपंक्चर · और देखें »

तानिकाशोथ

केन्द्रीय तंत्रिका तंत्र की तानिकाएं (Meninges): '''दृढ़तानिका''' या ड्यूरा मैटर (dura mater), '''जालतानिका''' या अराकनॉयड (arachnoid), तथा '''मृदुतानिका''' या पिया मैटर (pia mater) तानिकाशोथ या मस्तिष्कावरणशोथ या मेनिन्जाइटिस (Meningitis) मस्तिष्क तथा मेरुरज्जु को ढंकने वाली सुरक्षात्मक झिल्लियों (मस्तिष्कावरण) में होने वाली सूजन होती है। यह सूजन वायरस, बैक्टीरिया तथा अन्य सूक्ष्मजीवों से संक्रमण के कारण हो सकती है साथ ही कम सामान्य मामलों में कुछ दवाइयों के द्वारा भी हो सकती है। इस सूजन के मस्तिष्क तथा मेरुरज्जु के समीप होने के कारण मेनिन्जाइटिस जानलेवा हो सकती है; तथा इसीलिये इस स्थिति को चिकित्सकीय आपात-स्थिति के रूप में वर्गीकृत किया गया है। मेनिन्जाइटिस के सबसे आम लक्षण सर दर्द तथा गर्दन की जकड़न के साथ-साथ बुखार, भ्रम अथवा परिवर्तित चेतना, उल्टी, प्रकाश को सहन करने में असमर्थता (फ़ोटोफोबिया) अथवा ऊंची ध्वनि को सहन करने में असमर्थता (फ़ोनोफोबिया) हैं। बच्चे अक्सर सिर्फ गैर विशिष्ट लक्षण जैसे, चिड़चिड़ापन और उनींदापन प्रदर्शित करते हैं। यदि कोई ददोरा भी दिख रहा है, तो यह मेनिन्जाइटिस के विशेष कारण की ओर संकेत हो सकता है; उदाहरण के लिये, मेनिन्गोकॉकल बैक्टीरिया के कारण होने वाले मेनिन्जाइटिस में विशिष्ट ददोरे हो सकते हैं। मेनिन्जाइटिस के निदान अथवा पहचान के लिये लंबर पंक्चर की आवश्यकता हो सकती है। स्पाइनल कैनाल में सुई डाल कर सेरिब्रोस्पाइनल द्रव (CSF) का एक नमूना निकाला जाता है जो मस्तिष्क तथा मेरुरज्जु को आवरण किये रहता है। सीएसएफ़ का परीक्षण एक चिकित्सा प्रयोगशाला में किया जाता है। तीव्र मैनिन्जाइटिस के प्रथम उपचार में तत्परता के साथ दी गयी एंटीबायोटिक तथा कुछ मामलों में एंटीवायरल दवा शामिल होती हैं। अत्यधिक सूजन से होने वाली जटिलताओं से बचने के लिये कॉर्टिकोस्टेरॉयड का प्रयोग भी किया जा सकता है। मेनिन्जाइटिस के गंभीर दीर्घकालिक परिणाम हो सकते हैं जैसे बहरापन, मिर्गी, हाइड्रोसेफॉलस तथा संज्ञानात्मक हानि, विशेष रूप से तब यदि इसका त्वरित उपचार न किया जाये। मेनिन्जाइटिस के कुछ रूपों से (जैसे कि मेनिन्जोकॉकी, ''हिमोफिलस इन्फ्लुएंजा'' टाइप बी, न्यूमोकोकी अथवा मम्स वायरस संक्रमणों से संबंधित) प्रतिरक्षण के द्वारा बचाव किया जा सकता है। .

नई!!: अपस्मार और तानिकाशोथ · और देखें »

तंत्रिकाविकृति विज्ञान

तंत्रिकाविकृति विज्ञान (Neuropathology) तंत्रिका तंत्र के ऊतकों के रोगों का अध्ययन है जिसमें छोटे शल्यक्रिया के द्वार बायोप्सी की जाती है या पूरे मस्तिष्क की आटोप्सी (autopsy) की जाती है। तंत्रिकाविकृति विज्ञान, शरीरविकृति विज्ञान (anatomic pathology) की उपशाखा है। .

नई!!: अपस्मार और तंत्रिकाविकृति विज्ञान · और देखें »

बच्चों में मिर्गी

मिर्गी किसी भी आयु के व्यक्ति को हो सकती है। बच्चों में मिर्गी से सम्बन्धित कुछ मुद्दे हैं जो उनके बचपन को प्रभावित कर सकते हैं। कुछ प्रकार की मिर्गी बचपन बीतने के बाद समाप्त हो जातीं हैं। लगभग 70% बच्चे जिनको बचपन में मिर्गी थी, बड़े होने पर इससे छुटकारा पा जाते हैं। कुछ मिर्गी के ऐसे भी दौरे हैं जैसे फेब्राइल दौरा (febrile seizures) जो बचपन में केवल एक बार आते हैं और बाद में कभी नहीं। .

नई!!: अपस्मार और बच्चों में मिर्गी · और देखें »

बौद्धिक अशक्‍तता

बौद्धिक अशक्‍तता (Intellectual disability) एक सामान्यीकृत मानसिक रोग है जिसमें व्यक्ति की संज्ञात्मक शक्ति (cognitive functioning) काफी हद तक न्यून होती है और दो या अधिक समायोजनात्मक व्यवहारों (adaptive behaviors) में कमी देखी जाती है। इसे पहले मानसिक मन्दता (Mental retardation) कहते थे। मानसिक मंदता विकास संबंधित एक मानसिक अवस्था है, जो की 02% तक लोगों में पाई जाती है। मानसिक मंदता किसी भी वर्ग, धर्म, जाति, या लिंग के व्यक्ति को हो सकती है। सामान्यतः इसके लक्षण बाल्यावस्था या 18 साल के पहले ही नजर आने लगते हैं। .

नई!!: अपस्मार और बौद्धिक अशक्‍तता · और देखें »

भूत-प्रेत का अपसारण

सेंट फ्रांसिस ने अरेज्जो में राक्षसों का भूत-अपसारण किया; गिओटो द्वारा एक फ्रेस्को पर एक चित्रण में. भूत-प्रेत का अपसारण अर्थात एक्सॉसिज़्म (प्राचीन लैटिन शब्द exorcismus, ग्रीक शब्द exorkizein – शपथ देकर बांधना) किसी ऐसे व्यक्ति अथवा स्थान से भूतों या अन्य आत्मिक तत्त्वों को निकालने की प्रथा है। जिसके बारे में विश्वास किया जाता है कि भूत ने उसे शपथ दिलाकर अपने वश में कर लिया है। यह प्रथा अत्यंत प्राचीन है तथा अनेक संस्कृतियों की मान्यताओं का अंग रही है। प्राचीन काल से माना जाता है कि इस दुनिया से परे एक और दुनिया होती है और इस दुनियाँ को मौत कि दुनिया के नाम से जाना जाता हे। जैसे हम सब को पता हे कि मौत कि दुनिया मे मृत लोगो कि आत्माएं होती है लेकिन इसके परे इस मौत कि दुनिया मे राक्षस और आध्यत्मिक संस्था का साया भी होता है। लोग जब मरते है तब उनकी आत्मा का उध्धार नहीं होता या इसके विपरीत बहुत सारी शर्ते होती है। जैसे कि अगर कोइ इन्सान एक ऐसी मौत मरा है जिसमें उसको बहुत तक्लीफ हुई हो या फिर बे मौत मारा गया हो तो इस के कारण उस इन्सान का आत्मा उस जगह पर ही रह जाती है और आसानी से उस आत्मा का उद्धर नहि होता, कोइ ऐसे स्थान भी होते हे जिधर से मृत लोगो कि आत्मा उध्दार होता हैं, यह जगह कोइ घना जंगल मे होता हे यातो फिर कोइ सुन्सान जगह में। ऐसे ही जगह से मृत दुनिया से राक्षस और आध्यात्मिक सन्स्था हमारी दुनिया मे प्रवेश करते है, और जीवित इन्सानो कि आत्मा पर शिकार करते हैं और इसी अवस्था मे झाङ-फूँक कि सन्कल्पना आती हैं। झाड़-फूँक राक्षस और आध्यात्मिक सन्स्थाओ का हटाना उत्ना का अभ्यास होता हे। झाड़-फूँक ऐसे लोग या जगह या चीज़ों पर किया जाता हे जो राक्शस या किसी आध्याथ्मिक सन्स्थाओ के अधीन होते हे। झाड़-फूँक ओझा के आध्याथ्मिक विश्वासो के आधार पर किया जाता हे। धर्म के आधार पर झाड़-फूँक के अन्य तरीके होते हे। कुछ ऐसे दर्वाज़े होते हे जो खुल्ने पर बुरे सप्ने हकीकत मे बदल जाते हे। .

नई!!: अपस्मार और भूत-प्रेत का अपसारण · और देखें »

मण्डूकपर्णी

ब्राह्मी बूटी या मण्डूकपर्णी (वानस्पतिक नाम: Centella asiatica) एक औषधीय वनस्पति है। इसका फैलने वाला छोटा क्षुप होता है जो नमी वाले स्थानों पर होता है। पत्ते कुछ मांसल और छ्त्राकार होते हैं तथा किनारों पर दंतुर होते है। इसके पत्तों का व्यास लगभग आधा ईंच से लेकर एक ईंच तक होता है। उत्तरी भारत में यह लगभग हर जगह पर नमी वाली जगह पर छाया वाली जगह पर मिल जाता है। आयुर्वेद में इसे औषधीय क्षुप माना जाता है। यह वनस्पति मेध्य द्रव्य (मेधा शक्ति बढाने वाला) के रूप में गिना जाता है। पागलपन और मिर्गी की प्रसिद्ध औषधि सारस्वत चूर्ण में इसके स्वरस की भावना दी जाती है। .

नई!!: अपस्मार और मण्डूकपर्णी · और देखें »

मदिरा के हानिकारक प्रभाव

मदिरा मानव के लिये वरदान और अभिशाप दोनों हैं। इसके अल्पमात्रिक व्यवहार से प्राय: मानसिक और शारीरिक आह्लाद होता है, जिसमें मनुष्य प्रसन्न, संतुष्ट और शांत रहता है। यदि मदिरा की मात्रा अधिक हो जाए, तो मनुष्य के मानसिक संतुलन का ह्रास होता है, सिर गरम, चेहरा लाल और कपोलास्थि प्रदेश की धमनियों का स्पंदन स्पष्ट दिखाई पड़ता है। यदि मदिरा की मात्रा और अधिक बढ़े, तो ऐल्कोहॉल विषाक्तता के लक्षण प्रकट होते हैं तथा मानसिक संतुलन पूर्णतया नष्ट हो जाता है। मद्यसेवी के पैर लड़खड़ाने लगते हैं, बातचीत अस्पष्ट, असंबद्ध तथा अनर्गल हो जाती है। उसे उचित या अनुचित का ज्ञान नहीं रहता और यही स्थिति आगे चलकर बेहोशी का रूप धारण कर लेती है। मचली और वमन भी हो सकता है तथा चेहरा पीला पड़ जाता है। पेशियाँ शिथिल पड़ जाती हैं, जिससे अनजाने में मल-मूत्र का त्याग हो सकता है। वस्तुत: इससे शरीर की प्राय: समस्त प्रतिवर्ती क्रियाएँ (reflex actions) बंद हो जाती हैं, नाड़ी मंद पड़ जाती है, शरीर का ताप गिर जाता है, साँस में घरघराहट होने लगती है तथा श्वसनकेंद्र का कार्य बंद हो जाने से मृत्यु तक हो सकती है। परिणाह तंत्रिका (peripheral nerves) पर मदिरा का कोई प्रभाव नहीं पड़ता, पर दीर्घकालीन मदात्यय (alcoholism) की दशा में आँतों द्वारा विटामिन बी का पूरा अवशोषण न हो सकने का कारण परिणाह शोथ और हृत्पेशी विस्तारण (myocardial dilatation) के लक्षण मिलने लगते हैं। कुछ व्यक्तियों में प्रमस्तिष्क-मेरु-द्रव (cerebro-spinal fluid) का स्राव दबाव को बढाता है, जिससे प्रमस्तिष्क शोथ की अवस्था उत्पन्न हो सकती है। मदिरासेवन से यक्ष्मा और न्यूमोनिया सदृश रोगों से और शल्य क्रियाओं के परिणाम से बचने की क्षमता घट जाती है। कुछ रोग भी उत्पन्न हो सकते हैं, जिनमें निम्नलिखित उल्लेखनीय हैं: (1) जीर्ण आमाशय शोथ (gastritis) में ऐल्कोहॉल से आमाशय का शोथ होता है, जिससे वह स्थायी रूप में क्षतिग्रस्त हो जाता है, पाचनशक्ति का ह्रास हो जाता है और व्यक्ति दिन प्रति दिन दुबला पतला होता जाता है तथा (2) यकृत का सूत्रण रोग (cirrhosis of the liver)। ऐसे रोग उत्पन्न करने में विभिन्न व्यक्तियों को ऐल्कोहॉल की विभिन्न मात्रा प्रभावित करती है। कुछ व्यक्ति अल्प मात्रा में ही शीघ्र आक्रांत होते हैं और कुछ लोगों के आक्रांत होने में वर्षों लग जाते हैं। मदिरा से यकृत का जीर्ण प्रदाह होता है, जिससे रेशेदार ऊतक बहुत बढ़ जाता है। रेशेदार ऊतक के संकोचन (contraction) से यकृत की कोशिकाएँ दबाव पड़ने से नष्ट हो जाती हैं, जिससे शिराओं (veins) में रुधिर का बहाव अवरुद्ध हो जाता है। इससे यकृत का आकार साधारणतया छोटा हो जाता है। इस संकोचन का परिणाम यह होता है कि विस्तारित और संपीडित शिराओं से द्रव का स्पंदन (effusion) पर्युदर्या गुहा (peritoneal cavity) में होता है, जिससे एक प्रकार का जलोदर रोग हो जाता है। मद्यसेवी धीरे धीरे अधिक रोगी होने लगता है और जलोदर होने के कुछ मास बाद उसकी मृत्यु हो जाती है। .

नई!!: अपस्मार और मदिरा के हानिकारक प्रभाव · और देखें »

मनोविदलता

मनोविदलता (Schizophrenia/स्किज़ोफ्रेनिया) एक मानसिक विकार है। इसकी विशेषताएँ हैं- असामान्य सामाजिक व्यवहार तथा वास्तविक को पहचान पाने में असमर्थता। लगभग 1% लोगो में यह विकार पाया जाता है। इस रोग में रोगी के विचार, संवेग तथा व्यवहार में आसामान्य बदलाव आ जाते हैं जिनके कारण वह कुछ समय लिए अपनी जिम्मेदारियों तथा अपनी देखभाल करने में असमर्थ हो जाता है। 'मनोविदलता' और 'स्किज़ोफ्रेनिया' दोनों का शाब्दिक अर्थ है - 'मन का टूटना'। .

नई!!: अपस्मार और मनोविदलता · और देखें »

मनोविज्ञान की समयरेखा

कोई विवरण नहीं।

नई!!: अपस्मार और मनोविज्ञान की समयरेखा · और देखें »

मस्तिष्कखंडछेदन

परानेत्रगोलकीय मस्तिष्कखंडछेदन, में प्रयुक्त ओरबिटोक्लास्टवॉल्टर फ्रीमैन ने अपने ल्यूकोटोमी के संशोधित रूप, जिसे उन्होंने परानेत्रगोलकीय मस्तिष्कखंडछेदन नाम दिया, में मूलतः बर्फ तोड़ने के सुए का इस्तेमाल किया था। हालांकि, इस तथ्य के कारण कि बर्फ तोड़ने के सुए कभी रोगी के सिर के अंदर टूट सकते थे और उनको निकालना पड़ता, उनके पास बहुत टिकाऊ, 1948 में प्रमाणित ओरबिटोक्लास्ट थे। आचार्य, हेर्निश जे. (2004).फ्रंटल ल्यूकोटॉमी के उतार और चढ़ाव.व्हाइट लॉ, डब्ल्यू.ए. में चिकित्सा दिन के 13 वीं वार्षिक इतिहास की कार्यवाही.कैलगरी: पृष्ठ. 40. मस्तिषकखंडछेदन (लोबोटॉमी) (λοβός – lobos: "लोब (मस्तिष्क का)"; τομή - टोम: "काटना/फांक") एक तंत्रिकाशल्यक्रिया संबंधी प्रक्रिया है, मनःशल्यचिकित्सा का एक रूप, जिसे ल्यूकोटॉमी या ल्यूकोटामी (यूनानी λευκός से - ल्यूकोस: "स्पष्ट/सफेद" तथा टोम). इसमे मस्तिष्क के ललाट खंड के अग्रभाग, मस्तिष्काग्र प्रान्तस्था का और से संबंध काटना शामिल है। आरंभ में इस शल्यक्रिया को ल्यूकोटॉमी कहा गया था, जो 1935 में इसकी शुरुआत से ही विवादास्पद रहा है, मनोविकारी (और कभी-कभी अन्य) अवस्थाओं के लिए निर्धारित- इसके लगातार और गंभीर दुष्प्रभावों की आम मान्यता के बावजूद, दो दशकों से अधिक तक यह मुख्यधारा की शल्यक्रिया थी। 1949 का शरीरक्रियाविज्ञान या आयुर्विज्ञान का नोबेल पुरस्कार एंतोनियो इगास मोनिज को “उनकी निश्चित मनोविक्षिप्तियों में मस्तिष्कखंडछेदन के चिकित्साशास्त्रीय महत्त्व की खोज के लिए” दिया गया था। इसका उपयोग 1940 के दशक के आरंभ से 1950 के दशक के मध्य तक जोरों पर था, जब आधुनिक मनोवियोजी (मनोविक्षिप्तिरोधी) औषधियां पेश की गईं. 1951 तक संयुक्त राज्य अमेरिका में लगभग 20,000 मस्तिष्कखंडछेदन किए जा चुके थे। इस शल्यक्रिया में गिरावट एक दम से न आकर क्रमिक रूप से आई. उदाहरण के लिए, ओटावा में मनोरोग अस्पतालों में 1953 में 153 मस्तिष्कखंडछेदन हुए थे जो 1954 में कनाडा में मनोरोगरोधी औषधि क्लोरप्रोमाजिन के आगमन के बाद 1961 में 58 रह गए थे। .

नई!!: अपस्मार और मस्तिष्कखंडछेदन · और देखें »

मादकता

मादक पदार्थों के सेवन से उत्पन्न स्थिति को दव्य मादकता (Substance intoxication) कहते हैं। व्यसन शब्द अंग्रेजी के ‘एडिक्ट‘ शब्द का रूपान्तरण है जिससे शारीरिक निर्भरता की स्थिति प्रकट हेती है। व्यसन का अभिप्राय शरीर संचालन के लिए मादक पदार्थ का नियमित प्रयोग करना है अन्यथा शरीर के संचालन में बाधा उत्पन्न होती है। व्यसन न केवल एक विचलित व्यवहार है अपितु एक गम्भीर सामाजिक समस्या भी है। तनावों, विशदों, चिन्ताओं एवं कुण्ठाओं से छुटकारा पाने के लिए व्यक्ति कई बार असामाजिक मार्ग अपनाकर नशों की और बढ़ने लगता है, जो कि उसे मात्र कुछ समय के लिए उसे आराम देते हैं। किसी प्रकार का व्यसन (नशा) न केवल व्यक्ति की कार्यक्षमता को कम करता है अपितु यह समाज और राष्ट्र दोनों के लिए हानिकारक है। नशीले पदार्थो की प्राप्ति हेतु व्यक्ति, घर, मित्र और पड़ोस तकमें चोरी एवं अपराधी क्रियाओं को अंजाम देने लगता है। स्वास्थ्य की दृष्टि से देखा जाए तो व्यसन विभिन्न बिमारियों को आमंत्रण देता है। राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर यह तस्करी, आतंकवाद एवं देशद्रोही गतिविधियों को बढ़ावा देता है। सामाजिक दृष्टि से जुआ, वेश्यावृति, आतंकवाद, डकैती, मारपीट, दंगे अनुशासनहीनता जैसी सामाजिक समस्याएँ व्यसन से ही संबंधित हैं। व्यसनी व्यक्ति दीर्घकालीन नशों की स्थिति में उन्मत्त रहता है तथा नशीले पदार्थ पर व्यक्ति मानसिक एवं शारीरिक तौर पर पूर्णतया आश्रित हो जाता है, जिसके हानिकारक प्रभाव केवल व्यक्ति ही नहीं अपितु उसके परिवार और समाज पर भी पड़ते हैं। .

नई!!: अपस्मार और मादकता · और देखें »

मिक्रोप्सिया

मिक्रोप्सिया मानव के दृश्य धारणा की स्थिति को संबोधित करता है। जिसमे वस्तुओं को वास्तव से छोटी आकार में देखना माना जाता है। मिक्रोप्सिया आँख में ऑप्टिकल छवियों के विरूपण से (चश्मे से या कुछ ओकुलर स्थिति के कारन) या एक स्नायविक रोग द्वारा भी हो सकता है। मिक्रोप्सिया दृश्य विरूपण के अलावा किसी भी अन्य कारकों के द्वारा हो सकता है। मिक्रोप्सिया होने के कारणों मैं मस्तिष्क चोट, कारकों को दवा कॉर्निया पर सूजन, मिरगी, माइग्रेन, औषध विधि और औषध का अवैध उपयोग, रेटिनल एडम, धब्बेदार अध: पतन, केंद्रीय तरल चोरिओरेतिनोपथ्य, मस्तिष्क घावों और मनोवैज्ञानिक घटक शामिल है। अलग करनेवाला घटना मिक्रोप्सिया के साथ जुड़े हुए हैं, जिसका परिणाम मस्तिष्क लतेरलिज़तिओन अशांति हो सकता है। विशिष्ट प्रकार के मिक्रोप्सिया में एस हेमिमिक्रोप्सिया शामिल है, यह मिक्रोप्सिया का भाग है जो मस्तिष्क के गोलार्द्ध स्थानीयकृत है, जिसेके द्वारा मस्तिष्क घावा हो सकता है। संबंधित दृश्य विरूपण शर्तों मक्रोप्सिया शामिल मक्रोप्सिया शर्त के साथ रिवर्स आम, एक कम प्रभाव मिक्रोप्सिया और दोनों और ऐलिस वोंदेर्लंद सिंड्रोम में शामिल कर सकते हैं कि एक शर्त यह है कि लक्षण है। .

नई!!: अपस्मार और मिक्रोप्सिया · और देखें »

लिवोफ़्लॉक्सासिन

लिवोफ़्लॉक्सासिन फ़्लोरोक्विनोलोन दवा वर्ग का एक कृत्रिम रसायनोपचार एंटीबायोटिक है और गंभीर या प्राणघातक जीवाणु संक्रमण या अन्य प्रतिजैविकी वर्गों के प्रति प्रतिक्रिया दिखाने में विफल जीवाणु संक्रमणों के इलाज के लिए प्रयुक्त होता है। यह विभिन्न ब्रांड नाम के तहत बेचा जाता है, जैसे सबसे सामान्य लेवाक्विन और तावानिक.

नई!!: अपस्मार और लिवोफ़्लॉक्सासिन · और देखें »

शतावर

शतावर (वानस्पतिक नाम: Asparagus officinalis / एस्पैरागस ऑफ़ीशिनैलिस) एक औषधीय पौधा है जिसका उपयोग सिद्धा तथा होम्योपैथिक दवाइयों में होता है। यह आकलन किया गया है कि भारत में विभिन्न औषधियों को बनाने के लिए प्रति वर्ष 500 टन सतावर की जड़ों की जरूरत पड़ती है। यह यूरोप एवं पश्चिमी एशिया का देशज है। इसकी खेती २००० वर्ष से भी पहले से की जाती रही है। भारत के ठण्डे प्रदेशों में इसकी खेती की जाती है। इसकी कंदिल जडें मधुर तथा रसयुक्त होती हैं। यह पादप बहुवर्षी होता है। इसकी जो शाखाएँ निकलतीं हैं वे बाद में पत्तियों का रूप धारण कर लेतीं हैं, इन्हें क्लैडोड (cladodes) कहते हैं। .

नई!!: अपस्मार और शतावर · और देखें »

शराबीपन

शराबीपन, जिसे शराब निर्भरता भी कहते हैं, एक निष्क्रिय कर देने वाला नशीला विकार है जिसे बाध्यकारी और अनियंत्रित शराब की लत के रूप में निरूपित किया जाता है जबकि पीन वाले के स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव पड़ता है और उसके जीवन में नकारात्मक सामाजिक परिणाम देखने को मिलते हैं। अन्य नशीली दवाओं की लत की तरह शराबीपन को चिकित्सा की दृष्टि से एक इलाज़ योग्य बीमारी के रूप में परिभाषित किया गया है। 19वीं सदी और 20वीं सदी की शुरुआत में, शराब पर निर्भरता को शराबीपन शब्द के द्वारा प्रतिस्थापित किये जाने से पूर्व इसे मदिरापान कहा जाता था। शराबीपन को सहारा देने वाले जैविक तंत्र अनिश्चित हैं, लेकिन फिर भी, जोखिम के कारकों में सामाजिक वातावरण, तनाव, मानसिक स्वास्थ्य, अनुवांशिक पूर्ववृत्ति, आयु, जातीय समूह और लिंग शामिल हैं। लम्बे समय तक चलने वाली शराब पीने की लत मस्तिष्क में शारीरिक बदलाव, जैसे - सहनशीलता और शारीरिक निर्भरता, लाती है, जिससे पीना बंद होने पर शराब वापसी सिंड्रोम का परिणाम सामने आता है। ऐसा मस्तिष्क प्रक्रिया बदलाव पीना बंद करने के लिए शराबी की बाध्यकारी अक्षमता को बनाए रखता है। शराब प्रायः शरीर के प्रत्येक अंग को क्षतिग्रस्त कर देती है जिसमें मस्तिष्क भी शामिल है; लम्बे समय से शराब पीने की लत के संचयी विषाक्त प्रभावों के कारण शराबी को चिकित्सा और मनोरोग सम्बन्धी कई विकारों का सामना करने का जोखिम उठाना पड़ता है। शराबीपन की वजह से शराबियों और उनके जीवन से जुड़े लोगों को गंभीर सामाजिक परिणामों का सामना करना पड़ता है। शराबीपन सहनशीलता, वापसी और अत्यधिक शराब के सेवन की चक्रीय उपस्थिति है; अपने स्वास्थ्य को शराब से होने वाली क्षति की जानकारी होने के बावजूद ऐसी बाध्यकारी पियक्कड़ी को नियंत्रित करने में पियक्कड़ की अक्षमता इस बात का संकेत देती है कि व्यक्ति एक शराबी हो सकता है। प्रश्नावली पर आधारित जांच शराबीपन सहित नुकसानदायक पीने के तरीकों का पता लगाने की एक विधि है। वापसी के लक्षणों को प्रबंधित करने के लिए आम तौर पर सहनशीलता-विरोधी दवाओं, जैसे - बेंज़ोडायज़ेपींस, के साथ शराब पीने से शराबी व्यक्ति को उबारने के लिए शराब विषहरण की व्यवस्था की जाती है। शराब से संयम करने के लिए आम तौर पर चिकित्सा के बाद की जानी वाली देखभाल, जैसे - समूह चिकित्सा, या स्व-सहायक समूह, की आवश्यकता है। शराबी अक्सर अन्य नशों, खास तौर पर बेंज़ोडायज़ेपींस, के भी आदि होते हैं, जिसके लिए अतिरिक्त चिकित्सीय इलाज की आवश्यकता हो सकती है। एक शराबी होने के नाते पुरुषों की अपेक्षा शराब पीने वाली महिलाएं शराब के हानिकारक शारीरिक, दिमागी और मानसिक प्रभावों और वर्धित सामाजिक कलंक के प्रति अधिक संवेदनशील होती हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन का अनुमान है कि दुनिया भर में शराबियों की संख्या 140 मिलियन है। .

नई!!: अपस्मार और शराबीपन · और देखें »

स्नायुशास्त्र

तंत्रिकाविज्ञान या स्नायुशास्त्र (Neurology) तंत्रिका तंत्र के रोगों से सम्बन्धित चिकित्सकीय विशेषज्ञा का क्षेत्र है। इसके संगत शल्यक्रिया का क्षेत्र स्नायुशल्यक्रिया (neurosurgery) कहलाती है। .

नई!!: अपस्मार और स्नायुशास्त्र · और देखें »

जॉन रॉबर्ट्स

जॉन ग्लोवर रॉबर्ट्स, जूनियर (जन्म 27 जनवरी 1955) संयुक्त राज्य अमेरिका के 17वें और वर्तमान मुख्य न्यायाधीश हैं। मुख्य न्यायाधीश विलियम रैनक्विस्ट की मृत्यु के पश्चात राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू. बुश द्वारा नामित किये जाने के बाद से वे वर्ष 2005 से सेवारत हैं। अपने न्यायशास्त्र में वे रूढ़िवादी न्यायिक दर्शन शास्त्र के पक्षधर माने जाते हैं। रॉबर्ट्स उत्तरी इंडियाना में पले-बढ़े हैं एवं हार्वर्ड कॉलेज एवं हार्वर्ड लॉ स्कूल में प्रवेश के पूर्व, जहां वे हार्वर्ड लॉ रिव्यू के प्रबंध संपादक थे, उन्होंने निजी विद्यालय में शिक्षा ग्रहण की है। रीगन प्रशासन के दौरान महान्यायवादी (अटार्नी जनरल) कार्यालय में सेवा के पूर्व बार में प्रवेश लेने के बाद उन्होंने विलियम रेनक्विस्ट के लॉ क्लर्क के रूप में कार्य किया। 14 वर्ष तक निजी रूप से कानून का अभ्यास करने के पूर्व उन्होंने रीगन प्रशासन और जॉर्ज एच.डब्ल्यू.

नई!!: अपस्मार और जॉन रॉबर्ट्स · और देखें »

गर्भावस्था

गर्भवती महिला प्रजनन सम्बन्धी अवस्था, एक मादा के गर्भाशय में भ्रूण के होने को गर्भावस्था (गर्भ + अवस्था) कहते हैं, तदुपरांत महिला शिशु को जन्म देती है। आमतौर पर यह अवस्था मां बनने वाली महिलाओं में ९ माह तक रहती है, जिसे गर्भवधी कहते है। कभी कभी संयोग से एकाधिक गर्भावस्था भी अस्तित्व में आ जति है जिस्से जुडवा एक से अधिक सन्तान कि उपस्थिति होती है। .

नई!!: अपस्मार और गर्भावस्था · और देखें »

गोरखमुंडी

गोरखमुंडी गोरखमुंडी (वानस्पतिक नाम: स्फ़ीरैंथस इंडिकस Sphaeranthus Indicus) कंपोज़िटी (Compositae) कुल की वनस्पति है। इसे मुंडी या गोरखमुंडी (प्रादेशिक भाषाओं में) और मुंडिका अथवा श्रावणी (संस्कृत में) कहते हैं। गोरखमुंडी एकवर्षा आयु वाली, प्रसर, वनस्पति धान के खेतों तथा अन्य नम स्थानों में वर्षा के बाद निकलती है। यह किंचित् लसदार, रोमश और गंधयुक्त होती है। कांड पक्षयुक्त, पत्ते विनाल, कांडलग्न और प्राय: व्यस्तलट्वाकार (Obovate) और पुष्प सूक्ष्म किरमजी (Magenta-coloured) रंग के और मुंडकाकार व्यूह में पाए जाते हैं। इसके मूल, पुष्पव्यूह अथवा पंचाग का चिकित्सा में व्यवहार होता है। यह कटुतिक्त, उष्ण, दीपक, कृमिघ्न (कीड़े मारने वाली), मूत्रजनक रसायन और वात तथा रक्तविकारों में उपयोगी मानी जाती है। इसमें कालापन लिए हुए लाल रंग का तैल और कड़वा सत्व होता है। तैल त्वचा और वृक्क द्वारा नि:सारित होता है, अत: इसके सेवन से पसीने और मूत्र में एक प्रकार की गंध आने लगती है। मूत्रजनक होने और मूत्रमार्ग का शोधन करने के कारण मूत्रेंद्रिय के रोगों में इससे अच्छा लाभ होता है। अधिक दिन सेवन करने से फोड़े फुन्सी का बारंबार निकलना बंद हो जाता है। यह अपची, अपस्मार, श्लीपद और प्लीहा रोगों में भी उपयोगी मानी जाती है। .

नई!!: अपस्मार और गोरखमुंडी · और देखें »

अरीठा

अरीठा का वृक्ष अरीठा का फल और उसकी आन्तरिक रचना रीठा या अरीठा (soap nut) एक वृक्ष है जो लगभग हरजगह भारतवर्ष में पाया जाता है। इसके पत्ते गूलर के पत्तों से बड़े, छाल भूरी तथा फल गुच्छों में होते हैं। इसकी दो जातियाँ हैं। पहली सापीन्दूस् मूकोरोस्सी (Sapindus Mukorossi) और दूसरी सापीन्दूस् त्रीफ़ोल्यातूस् (Sapindus Trifoliatus)। सापीन्दूस् मूकोरोस्सी के जंगली पेड़ हिमालय के क्षेत्र में अधिक पाये जाते जाते हैं। इसके अतिरिक्त उत्तर भारत में तथा आसाम आदि में लगाये हुए पेड़ बाग-बगीचों में या गांवों के आसपास पाये जाते हैं। इसके फलों को पानी में भिगोने और मथने से फेन उत्पन्न होता है और इससे सूती, ऊनी तथा रेशमी सब प्रकार के कपड़े तथा बाल धोए जा सकते हैं। आयुर्वेद के मत में यह फल त्रिदोषनाशक, गरम, भारी, गर्भपातक, वमनकारक, गर्भाशय को निश्चेष्ट करनेवाला तथा अनेक विषों का प्रभाव नष्ट करेनवाला है। संभवत: वमनकारक होने कारण ही यह विषनाशक भी है। वमन के लिए इसकी मात्रा दो से चार माशे तक बताई जाती है। फल के चूर्ण के गाढ़े घोल की बूंदोंको नाक में डालने से अधकपारी, मिर्गी और वातोन्माद में लाभ होना बताया गया है। सापीन्दूस् त्रीफ़ोल्यातूस् के पेड़ दक्षिण भारत में पाए जाते हैं, इसमें 3-3 फल एक साथ जुड़े होते हैं। इसके फलों की आकृति वृक्काकार होती है और अलग होने पर जुड़े हुए स्थान पर हृदयाकार चिन्ह पाया जाता है। ये पकने पर लालिमा लिए भूरे रंग के होते हैं। दूसरे प्रकार के वृक्ष से प्राप्त बीजों से तेल निकाला जाता है, जो औषधि के काम आता है। इस वृक्ष से गोंद भी मिलता है। .

नई!!: अपस्मार और अरीठा · और देखें »

यहां पुनर्निर्देश करता है:

Epilepsy, प्रयोगपृष्ठ, मिरगी, मिर्गी

निवर्तमानआने वाली
अरे! अब हम फेसबुक पर हैं! »