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अकबर

सूची अकबर

जलाल उद्दीन मोहम्मद अकबर (१५ अक्तूबर, १५४२-२७ अक्तूबर, १६०५) तैमूरी वंशावली के मुगल वंश का तीसरा शासक था। अकबर को अकबर-ऐ-आज़म (अर्थात अकबर महान), शहंशाह अकबर, महाबली शहंशाह के नाम से भी जाना जाता है। अंतरण करने वाले के अनुसार बादशाह अकबर की जन्म तिथि हुमायुंनामा के अनुसार, रज्जब के चौथे दिन, ९४९ हिज़री, तदनुसार १४ अक्टूबर १५४२ को थी। सम्राट अकबर मुगल साम्राज्य के संस्थापक जहीरुद्दीन मुहम्मद बाबर का पौत्र और नासिरुद्दीन हुमायूं एवं हमीदा बानो का पुत्र था। बाबर का वंश तैमूर और मंगोल नेता चंगेज खां से संबंधित था अर्थात उसके वंशज तैमूर लंग के खानदान से थे और मातृपक्ष का संबंध चंगेज खां से था। अकबर के शासन के अंत तक १६०५ में मुगल साम्राज्य में उत्तरी और मध्य भारत के अधिकाश भाग सम्मिलित थे और उस समय के सर्वाधिक शक्तिशाली साम्राज्यों में से एक था। बादशाहों में अकबर ही एक ऐसा बादशाह था, जिसे हिन्दू मुस्लिम दोनों वर्गों का बराबर प्यार और सम्मान मिला। उसने हिन्दू-मुस्लिम संप्रदायों के बीच की दूरियां कम करने के लिए दीन-ए-इलाही नामक धर्म की स्थापना की। उसका दरबार सबके लिए हर समय खुला रहता था। उसके दरबार में मुस्लिम सरदारों की अपेक्षा हिन्दू सरदार अधिक थे। अकबर ने हिन्दुओं पर लगने वाला जज़िया ही नहीं समाप्त किया, बल्कि ऐसे अनेक कार्य किए जिनके कारण हिन्दू और मुस्लिम दोनों उसके प्रशंसक बने। अकबर मात्र तेरह वर्ष की आयु में अपने पिता नसीरुद्दीन मुहम्मद हुमायुं की मृत्यु उपरांत दिल्ली की राजगद्दी पर बैठा था। अपने शासन काल में उसने शक्तिशाली पश्तून वंशज शेरशाह सूरी के आक्रमण बिल्कुल बंद करवा दिये थे, साथ ही पानीपत के द्वितीय युद्ध में नवघोषित हिन्दू राजा हेमू को पराजित किया था। अपने साम्राज्य के गठन करने और उत्तरी और मध्य भारत के सभी क्षेत्रों को एकछत्र अधिकार में लाने में अकबर को दो दशक लग गये थे। उसका प्रभाव लगभग पूरे भारतीय उपमहाद्वीप पर था और इस क्षेत्र के एक बड़े भूभाग पर सम्राट के रूप में उसने शासन किया। सम्राट के रूप में अकबर ने शक्तिशाली और बहुल हिन्दू राजपूत राजाओं से राजनयिक संबंध बनाये और उनके यहाँ विवाह भी किये। अकबर के शासन का प्रभाव देश की कला एवं संस्कृति पर भी पड़ा। उसने चित्रकारी आदि ललित कलाओं में काफ़ी रुचि दिखाई और उसके प्रासाद की भित्तियाँ सुंदर चित्रों व नमूनों से भरी पड़ी थीं। मुगल चित्रकारी का विकास करने के साथ साथ ही उसने यूरोपीय शैली का भी स्वागत किया। उसे साहित्य में भी रुचि थी और उसने अनेक संस्कृत पाण्डुलिपियों व ग्रन्थों का फारसी में तथा फारसी ग्रन्थों का संस्कृत व हिन्दी में अनुवाद भी करवाया था। अनेक फारसी संस्कृति से जुड़े चित्रों को अपने दरबार की दीवारों पर भी बनवाया। अपने आरंभिक शासन काल में अकबर की हिन्दुओं के प्रति सहिष्णुता नहीं थी, किन्तु समय के साथ-साथ उसने अपने आप को बदला और हिन्दुओं सहित अन्य धर्मों में बहुत रुचि दिखायी। उसने हिन्दू राजपूत राजकुमारियों से वैवाहिक संबंध भी बनाये। अकबर के दरबार में अनेक हिन्दू दरबारी, सैन्य अधिकारी व सामंत थे। उसने धार्मिक चर्चाओं व वाद-विवाद कार्यक्रमों की अनोखी शृंखला आरंभ की थी, जिसमें मुस्लिम आलिम लोगों की जैन, सिख, हिन्दु, चार्वाक, नास्तिक, यहूदी, पुर्तगाली एवं कैथोलिक ईसाई धर्मशस्त्रियों से चर्चाएं हुआ करती थीं। उसके मन में इन धार्मिक नेताओं के प्रति आदर भाव था, जिसपर उसकी निजि धार्मिक भावनाओं का किंचित भी प्रभाव नहीं पड़ता था। उसने आगे चलकर एक नये धर्म दीन-ए-इलाही की भी स्थापना की, जिसमें विश्व के सभी प्रधान धर्मों की नीतियों व शिक्षाओं का समावेश था। दुर्भाग्यवश ये धर्म अकबर की मृत्यु के साथ ही समाप्त होता चला गया। इतने बड़े सम्राट की मृत्यु होने पर उसकी अंत्येष्टि बिना किसी संस्कार के जल्दी ही कर दी गयी। परम्परानुसार दुर्ग में दीवार तोड़कर एक मार्ग बनवाया गया तथा उसका शव चुपचाप सिकंदरा के मकबरे में दफना दिया गया। .

235 संबंधों: चांद बीबी, चित्तौड़गढ़ की घेराबंदी (१५६७–१५६८), चुनार का किला, टिल्ला जोगियाँ, टोडरमल, एलेन गिन्सबर्ग, तानसेन, तिलहर, तिलोकपुर, तजकिरात उल वाकियात, दबेस्तान-ए-मजाहेब, दानियाल, दामोदर स्वरूप 'विद्रोही', दिल्ली, दुल्ला भट्टी, दौलताबाद, देवनागरी, दीन-ए-इलाही, दीनार, दीपावली, नमक कोह, नगरी (चित्तौड़गढ़), पटना, पटना का इतिहास, पटवारी, पानीपत, पानीपत का द्वितीय युद्ध, पुरालेखविद्या, प्रवीणराय, पृथ्वीराज, फलक़ नाज़, फ़तेहपुर सीकरी, फ़र्रुख़ सियर, फ़ारसी साहित्य, फ़ैज़ी, फकीर अजिओं-दिन, बर्धमान जिला, बस्ती, उत्तर प्रदेश, बहादुर शाह ज़फ़र, बाबर, बाबरनामा, बाबरी मस्जिद, बाबा धर्मदास, बाज़ारक, पंजशीर, बांके बिहारी जी मन्दिर, बिहार का मध्यकालीन इतिहास, बिजनौर, बुरहानपुर, बुंदेलखंड के शासक, बैरम खां, ..., बैजू बावरा, बैजू बावरा (1952 फ़िल्म), बेगा बेगम, बीबी का मक़बरा, बीकानेर, बीकानेर की संस्कृति, भटनागर, भरतपुरा, भानगढ़, भारत में महिलाएँ, भारत में मापन प्रणालियों का इतिहास, भारत में यूरोपीय आगमन, भारत का वीर पुत्र – महाराणा प्रताप, भारत के राष्‍ट्रीय चिन्ह, भारत के सम्राट, भारतवर्ष (टीवी सीरीज), भारतीय चित्रकला, भारतीय नाप एवं तौल, भारतीय संगीत का इतिहास, भारतीय व्यक्तित्व, भारतीय आम, भारतीय इतिहास तिथिक्रम, भारमल, भक्ति आन्दोलन, भूचर मोरी की लड़ाई, मझौली राज, मधुकरसाह बुन्देला, मध्यकालीन भारत, मधेपुरा जिला, मरियम उज़-ज़मानी, महाराणा प्रताप, मानसेहरा ज़िला, माघ मेला, मिर्ज़ा मोहम्मद हाकीम, मंसबदारी, मुल्लाह दो पिअज़ा, मुहम्मद शाह (मुगल), मुगल रामायण, मुग़ल शासकों की सूची, मुग़ल साम्राज्य, मुग़ल वास्तुकला, मुंदोता दुर्ग और महल, मौर्य राजवंश, मेड़ता, मेरठ, मेवाड़, मीरा (1979 फ़िल्म), रणथम्भोर दुर्ग, रफी उद-दर्जत, रफी उद-दौलत, रसखान, रहीम, रहीम का मकबरा, राणा अमरसाल, राजपुताना, राजस्थान में जौहर और साके, राजा मान सिंह, राजा गिरधरदास खण्डेला, रज़्मनामा, रुक़य्या सुलतान बेगम, रूपमती, रूज़ा शरीफ, लोधी मार्ग, शाह जहाँ, शाह आलम द्वितीय, शाहजहां तृतीय, शाही किला, जौनपुर, शिला माता मन्दिर, शिवानन्द गोस्वामी, शिवाजी, शक्ति सिंह, शेर शाह सूरी, सफ़ेद बाघ, सलीम चिश्ती की दरगाह, सलीमा सुल्तान बेगम, सारन जिला, सालिहा बानो बेगम, सावर्ण रायचौधुरी परिवार, सिसोदिया (राजपूत), सिख धर्म और इस्लाम, सिकंदर शाह सूरी, संत रविदास नगर जिला, स्वामी हरिदास, सूरदास मदनमोहन, सोनपुर मेला, सीवान, हनुमान मंदिर, कनॉट प्लेस, हम्मीर चौहान, हमीदा बानो बेगम, हरि पर्वत, हरिद्वार जिला, हल्दीघाटी, हाजीपुर, हिसार, हज़रत निज़ामुद्दीन, हुमायूँ, हुमायूँ का मकबरा, हेमचन्द्र विक्रमादित्य, होली, जना बेगम, जमाल, जयमल, जरीब, जहाँगीर, जहाँगीर महल, जहांदार शाह, ज़ब्त, ज़रदोज़ी, ज़ेब-उन-निसा, जाना बेगम, जिनप्रभ सूरि, जगत गोसाई, जगमाल सिंह, जैन धर्म का इतिहास, जोधपुर रियासत, जोधा बाई, जोधा अकबर, जोधा अकबर (2008 फ़िल्म), जोधा अकबर (टीवी धारावाहिक), वारिस शाह, विट्ठलनाथ, विभिन्न भाषाओं में रामायण, विराटनगर (राजस्थान), विशाल जेठवा, खुली अर्थव्यवस्था, खूनी दरवाजा, गटका, गागरौन दुर्ग, गंग कवि, गुरु अर्जुन देव, गुरुग्राम, गौड़ (नगर), गोरखपुर, गोविंददेव मंदिर, ओड़िशा का इतिहास, औरंगज़ेब, आचार्य हिर्सुरीश्वरजी, आदिल शाह सूरी, आधम ख़ान का मकबरा, आलमगीर द्वितीय, आईन-ए-अकबरी, आगरा, आगरा जिला, आगरा का किला, इलाहाबाद, इलाहाबाद का इतिहास, इलाहाबाद किला, इलाहाबाद/आलेख, इस्लाम शाह सूरी, इस्लामी वास्तुकला, कड़ा-मानिकपुर, कणकुत प्रणाली, कन्नौज, करनेस (कवि), कलनौर, कलिंजर, कल्ला जी राठौड़, क़ुतुबुद्दीन बख़्तियार काकी, कालिंजर दुर्ग, काशी, कुम्भनदास, कुंडी भंडारा, कैथल, कोलकाता, कोश, कोहिनूर हीरा, अब्दुल क़ादिर बदायूंनी, अमरकोट, अष्टदिग्गज, अहमद शाह बहादुर, अकबर बीरबल, अकबर के नवरत्न, अकबरनामा, उत्तर प्रदेश, उत्तर प्रदेश का इतिहास, उदयपुर, उदयसिंह द्वितीय, उदाकिशुनगंज, ऋतिक रोशन के फ़िल्मों की सूची, १५ अक्टूबर, १५७३, १५७५, १७ दिसम्बर, २ सितम्बर, ३ मार्च सूचकांक विस्तार (185 अधिक) »

चांद बीबी

चांद बीबी हॉकिंग, एक 18 वीं सदी के चित्र चांद बीबी (1550-1599), जिन्हें चांद खातून या चांद सुल्ताना के नाम से भी जाना जाता है, एक भारतीय मुस्लिम महिला योद्धा थी। उन्होंने बीजापुर (1596-1599) और अहमदनगर (1580-1590) की संरक्षक के रूप में काम किया था। चांद बीबी को सबसे ज्यादा सम्राट अकबर की मुगल सेना से अहमदनगर की रक्षा के लिए जाना जाता है। जो आज भी जनता के लिए इतिहास के तौर पर अदभुत परीचय देता है .

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चित्तौड़गढ़ की घेराबंदी (१५६७–१५६८)

चित्तोड़गढ़ की घेराबंदी (20 अक्टूबर 1567 – 23 फ़रवरी 1568) वर्ष 1567 में मेवाड़ राज्य पर मुगल साम्राज्य द्वारा किया गया सैनिक अभियान था। इसमें अकबर की सेना ने चित्तौड़गढ़ दुर्ग में जयमल के नेतृत्व वाले 8000 राजपूतों और 40,000 किसानों की घेराबन्दी कर ली। .

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चुनार का किला

300px मिर्जापुर के चुनार में स्थित चुनार किला कैमूर पर्वत की उत्तरी दिशा में स्थित है। यह गंगा नदी के दक्षिणी किनारे पर बसा है। यह दुर्ग गंगा नदी के ठीक किनारे पर स्थित है। यह किला एक समय हिंदू शक्ति का केंद्र था। हिंदू काल के भवनों के अवशेष अभी तक इस किले में हैं, जिनमें महत्वपूर्ण चित्र अंकित हैं। इस किले में आदि-विक्रमादित्य का बनवाया हुआ भतृहरि मंदिर है जिसमें उनकी समाधि है। किले में मुगलों के मकबरे भी हैं। .

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टिल्ला जोगियाँ

नमक कोह के दुसरे सबसे ऊँचे पहाड़, टिल्ला जोगियाँ (यानि 'योगियों का टीला'), पर हिन्दू मंदिर योगियों की पाठशाला का मुख्य द्वार दूर से टिल्ला जोगियाँ का नज़ारा ढलान वाले रस्ते के साथ लगे दो बुर्ज टिल्ला जोगियाँ परिसर से दिखने वाला एक दृश्य टिल्ला जोगियाँ (ਟਿੱਲਾ ਜੋਗੀਆਂ, Tilla Jogian) पाकिस्तान के पंजाब प्रान्त के मध्य भाग में स्थित नमक कोह पर्वतमाला के पूर्वी भाग में एक ९७५ मीटर (३,२०० फ़ुट) ऊँचा पहाड़ है। यह नमक कोह शृंखला का सबसे ऊँचा पहाड़ भी है। प्रशासनिक रूप से टिल्ला जोगियाँ झेलम ज़िले में स्थित है और उस ज़िले का सबसे ऊँचा स्थान है। क्योंकि यह आसपास के सभी इलाक़ों से ऊँचा है इसलिए यहाँ से दूर-दूर तक देखा जा सकता है। नीचे से भी इसे चार ज़िलों - झेलम, चकवाल, गुजरात और मंडी बहाउद्दीन - के लोग देख सकते हैं। .

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टोडरमल

टोडरमल मुग़ल बादशाह अकबर के नवरत्नों में से थे। टोडरमल का जन्म लहरपुर में हुआ था परन्तु यह विवादस्पद है कि यह कहाँ स्थित था। अकबर के समय से प्रारंभ हुई भूमि पैमाइश का आयोजन टोडरमल के द्वारा ही किया गया था। बिहार के पटना सिटी के दीवान मोहल्ले में, नौजरघाट सिथत चित्रगुप्त मंदिर का पुर्ननिर्माण, राजा टोडरमल तथा उनके नायब रहे कुवर किशोर बहादुर ने करवाकर, कसौटी पत्थर की चित्रगुप्त की मूर्ति, हिजरी सन 980 तदानुसार र्इसवीं सन 1574 में स्थापित करार्इ थी। जनपद हरदोई में उत्तर प्रदेश राज्य के राजस्व अधिकारियों के लिये बनाये गये एकमात्र राजस्व प्रशिक्षण संस्थान का नाम इनके नाम पर राजा टोडरमल भूलेख प्रशिक्षण संस्थान रखा गया है जहां आईएएस, आईपीएस, पीसीएस, पीपीएस के अलावा राजस्व कर्मियों को भूलेख संबंधी प्रशिक्षण दिया जाता है। .

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एलेन गिन्सबर्ग

इर्विन एलेन गिन्सबर्ग (Irwin Allen Ginsberg; 3 जून 1926 – 5 अप्रैल 1997), अमेरिका के बीटनिक आंदोलन के प्रख्यात कवि हैं। इनके द्वारा लिखित लंबी कविता हाउल (१९५६) को बीट आंदोलन की महाकविता कहा जाता है। इस कविता को पूंजीवाद और नियन्त्रणवाद के खिलाफ अमेरिकी की नयी पीढ़ी की आवाज माना जाता है जिस समय अमेरिकी समाज को साम्यवादी भय ने जकड़ लिया था। प्रकाशित होते ही इसकी हजारों प्रतियां बिक गयीं और गिंसबर्ग रातों रात नयी पीढ़ी के मसीहा बन गये, जिस पीढ़ी को आज बीटनिक पीढ़ी कहा जाता है। आज तक इस काव्यग्रन्थ की लाखों प्रतियां बिक चुकी हैं। गिंसबर्ग द्वारा निवेदित हाउल की वीसीडी, सीडी और डीवीडी भी खूब बिकी हैं और आज तक उनकी यह पुस्तक और डीवीडी बिक रही हैं। अपनी इस कविता के लिये उन्होने एक नयी लेखन प्रणाली अपनायी जो सांस लेने और सांस छोड़ने के समय पर आधारित थी। यद्यपि उनके पिता एक गीतकार थे, पर गिंसबर्ग ने अपने पिता द्वारा दिखाये गये मार्ग पर चलना उचित नहीं समझा क्योंकि उन्हें महसूस हुआ कि अमेरिकी समाज बदल चुका है। गिंसबर्ग की माता नायोमी गिंसबर्ग का मानसिक सन्तुलन ठीक नहीं था और इसका प्रभाव किशोर गिंसबर्ग पर भी रहा। हाउल प्रकाशित होने के बाद उन्होने अपनी मां के याद मे कैडिश नाम की एक लंबी कविता हाउल के ही अनुरूप लिखी थी। ख्याति मिलने के बाद उन्हें बहुत सारे देशों में कविता पढ़ने के लिये आमंत्रित किया गया और वह भारत भी आये। भारत आकर वह दो साल तक यहीं रहे। बनारस, पटना, कोलकाता, चाइबासा आदि जगहों पर इन्होने कई दिन बिताये एवं यह स्थानीय कवियों से काफी घुलमिल गये। वह हिन्दु और बौद्ध साधुओं से भी मिले। अमेरिका लौटने के बाद गिंसबर्ग ने बौद्धधर्म अपना लिया। भारत से लौटने के बाद जो कवितायें इन्होने लिखीं उन पर भारतीय प्रभाव साफ झलकता है, यहां तक की उनकी किताबों-दस्तावेजों में दिये गये प्रतीक चिह्न असल में अकबर के मकबरे में अंकित तीन मछलियों का चित्र है। .

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तानसेन

तानसेन या मियां तानसेन या रामतनु पाण्डेय हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत के एक महान ज्ञाता थे। उन्हे सम्राट अकबर के नवरत्नों में भी गिना जाता है। संगीत सम्राट तानसेन की नगरी ग्वालियर के लिए कहावत प्रसिद्ध है कि यहाँ बच्चे रोते हैं, तो सुर में और पत्थर लुढ़कते हैं तो ताल में। इस नगरी ने पुरातन काल से आज तक एक से बढ़कर एक संगीत प्रतिभायें संगीत संसार को दी हैं और संगीत सूर्य तानसेन इनमें सर्वोपारि हैं। तानसेन को संगीत का ज्ञान कैसे प्राप्त हुआ? प्रारम्भ से ही तानसेन मे दूसरों की नकल करने की अपूर्व क्षमता थी। बालक तानसेन पशु-पक्षियों की तरह- तरह की बोलियों की सच्ची नकल करता था और हिंसक पशुओं की बोली से लोगों को डरवाया करता था। इसी बीच स्वामी हरिदास से उनकी भेंट हो गयी । मिलने की भी एक मनोरंजक घटना है। उनकी अलग-अलग बोलियों को बोलने की प्रतिभा को देखकर वो काफी प्रभावित हुए। स्वामी जी ने उन्हें उनके पिता से संगीत सिखाने के लिए माँग लिया। इस तरह तानसेन को संगीत का ज्ञान हुआ। .

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तिलहर

तिलहर (अंग्रेजी: Tilhar) भारतवर्ष के राज्य उत्तर प्रदेश में स्थित शाहजहाँपुर जिले का एक महत्वपूर्ण नगर होने के साथ-साथ तहसील भी है। केवल इतना ही नहीं, यह उत्तर प्रदेश विधान सभा का एक प्रमुख क्षेत्र भी है। मुगल काल में सेना के लिये तीर और कमान बनाने के कारण प्राचीन भारत में इसे कमान नगर के नाम से ही जाना जाता था। तीर कमान तो अब नहीं बनते पर यहाँ के परम्परागत कारीगर मजबूत बाँस की निचले हिस्से पर लोहे का खोल चढ़ी गुलाही लाठी बनाने में आज भी माहिर हैं। टेढ़े से टेढ़े बाँस को शीरा लगाकर तेज आँच में गरम करके सीधा करना जब उन्हें आता है तो निस्सन्देह सीधे बाँस को इसी तकनीक से धनुष का आकार देने की कला भी उनके पूर्वजों को अवश्य ही आती होगी। .

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तिलोकपुर

तिलोकपुर (अंग्रेजी:Tilokpur) भारतवर्ष के राज्य उत्तर प्रदेश के जिला शाहजहाँपुर का एक बहुत ही पुराना गाँव है। यह शाहजहाँपुर जिले के भौगोलिक क्षेत्र से बहने वाली शारदा नहर के किनारे बसा हुआ है। यह नहर मीरानपुर कटरा से तिलोकपुर और काँट होते हुए कुर्रिया कलाँ तक जाती है। काकोरी काण्ड के अभियुक्तों में से एक बनवारी लाल जो मुकदमें के दौरान वायदा माफ गवाह (अंगेजी में अप्रूवर) बन गया था, इसी गाँव का रहने वाला था। बाद में उसने ब्राह्मणों से जान का खतरा होने के कारण यह गाँव छोड़ दिया और पास के ही दूसरे गाँव केशवपुर में रहने लगा जहाँ उसकी कायस्थ बिरादरी के लोग रहते थे। मध्यम आकार के इस गाँव में कुल 167 घर हैं। इन घरों के परिवारों में 1036 लोग रहते हैं जिनमें स्त्री, पुरुष व बच्चे सभी शामिल हैं। .

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तजकिरात उल वाकियात

तजकिरात उल वाकियात पुस्तक की रचना अकबर के आदेश से हुमायूँ के सेवक जौहर आफताबची ने सन् १५८७ ई० में की थी। इस पुस्तक में हुमायूँ के जीवन की घटनाओं का वणॅन मिलता है। यह पुस्तक फारसी भाषा में लिखी गई थी। श्रेणी:पुस्तक.

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दबेस्तान-ए-मजाहेब

दबेस्तान-ए-मजाहेब 17वीं सदी के दक्षिण एशियाई धर्मों की तुलनात्मक कृति है। इसे सन् 1665 में फारसी भाषा में लिखा गया था। दबेस्तान-ए-मजाहेब दीन-ए-इलाही पर लिखे अध्याय के लिए सर्वाधिक जाना जाता है। दीन-ए-इलाही धर्म को मुगल शासक अकबर ने सन् 1581 से शुरू किया था। दबेस्तान-ए-मजाहेब इबादत खाना में होने वाली चर्चाओं के बारे में सबसे विश्वसनीय स्रोत है। .

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दानियाल

दानियाल मुगल सम्राट् अकबर का सबसे छोटा और प्रिय पुत्र। वह सितंबर १५७२ में अजमेर में उत्पन्न हुआ। १५९९ में वह दक्षिण प्रदेश का सैन्य अधिपति नियुक्त किया गया। १६०० में इसने अहमदनगर को जीत लिया। अकबर ने सन् १६०१ में खानदेश नाम का प्रांत इसे पुरस्कारस्वरूप प्रदान किया। उस प्रांत का नाम सुलतान दानियाल के नाम पर 'दानदेश' पड़ गया। अबुल फ़जल कृत आइने अकबरी में इसका उल्लेख मिलता है। यह कुशल घुड़सवार था और सात हजार की विशाल सैनिक संख्या का अधिपति था। कहते हैं, इसे कविता लिखने में भी रुचि थी। अप्रैल १६०५ में बुरहानपुर में इसकी मृत्यु हो गयी। श्रेणी:मुग़ल साम्राज्य.

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दामोदर स्वरूप 'विद्रोही'

दामोदर स्वरूप 'विद्रोही' (जन्म:2 अक्टूबर 1928 - मृत्यु: 11 मई 2008) अमर शहीदों की धरती के लिये विख्यात शाहजहाँपुर जनपद के चहेते कवियों में थे। यहाँ के बच्चे-बच्चे की जुबान पर विद्रोही जी का नाम आज भी उतना ही है जितना कि तब था जब वे जीवित थे। विद्रोही की अग्निधर्मा कविताओं ने उन्हें कवि सम्मेलन के अखिल भारतीय मंचों पर स्थापित ही नहीं किया अपितु अपार लोकप्रियता भी प्रदान की। उनका एक मुक्तक तो सर्वाधिक लोकप्रिय हुआ: सम्पूर्ण हिन्दुस्तान में उनकी पहचान वीर रस के सिद्धहस्त कवि के रूप में भले ही हुई हो परन्तु यह भी एक सच्चाई है कि उनके हृदय में एक सुमधुर गीतकार भी छुपा हुआ था। गीत, गजल, मुक्तक और छन्द के विधान पर उनकी जबर्दस्त पकड़ थी। भ्रष्टाचार, शोषण, अत्याचार, छल और प्रवचन के समूल नाश के लिये वे ओजस्वी कविताओं का निरन्तर शंखनाद करते रहे। उन्होंने चीन व पाकिस्तान युद्ध और आपातकाल के दिनों में अपनी आग्नेय कविताओं की मेघ गर्जना से देशवासियों में अदम्य साहस का संचार किया। हिन्दी साहित्य के आकाश में स्वयं को सूर्य-पुत्र घोषित करने वाले यशस्वी वाणी के धनी विद्रोही जी भौतिक रूप से भले ही इस नश्वर संसार को छोड़ गये हों परन्तु अपनी कालजयी कविताओं के लिये उन्हें सदैव याद किया जायेगा। .

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दिल्ली

दिल्ली (IPA), आधिकारिक तौर पर राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली (अंग्रेज़ी: National Capital Territory of Delhi) भारत का एक केंद्र-शासित प्रदेश और महानगर है। इसमें नई दिल्ली सम्मिलित है जो भारत की राजधानी है। दिल्ली राजधानी होने के नाते केंद्र सरकार की तीनों इकाइयों - कार्यपालिका, संसद और न्यायपालिका के मुख्यालय नई दिल्ली और दिल्ली में स्थापित हैं १४८३ वर्ग किलोमीटर में फैला दिल्ली जनसंख्या के तौर पर भारत का दूसरा सबसे बड़ा महानगर है। यहाँ की जनसंख्या लगभग १ करोड़ ७० लाख है। यहाँ बोली जाने वाली मुख्य भाषाएँ हैं: हिन्दी, पंजाबी, उर्दू और अंग्रेज़ी। भारत में दिल्ली का ऐतिहासिक महत्त्व है। इसके दक्षिण पश्चिम में अरावली पहाड़ियां और पूर्व में यमुना नदी है, जिसके किनारे यह बसा है। यह प्राचीन समय में गंगा के मैदान से होकर जाने वाले वाणिज्य पथों के रास्ते में पड़ने वाला मुख्य पड़ाव था। यमुना नदी के किनारे स्थित इस नगर का गौरवशाली पौराणिक इतिहास है। यह भारत का अति प्राचीन नगर है। इसके इतिहास का प्रारम्भ सिन्धु घाटी सभ्यता से जुड़ा हुआ है। हरियाणा के आसपास के क्षेत्रों में हुई खुदाई से इस बात के प्रमाण मिले हैं। महाभारत काल में इसका नाम इन्द्रप्रस्थ था। दिल्ली सल्तनत के उत्थान के साथ ही दिल्ली एक प्रमुख राजनैतिक, सांस्कृतिक एवं वाणिज्यिक शहर के रूप में उभरी। यहाँ कई प्राचीन एवं मध्यकालीन इमारतों तथा उनके अवशेषों को देखा जा सकता हैं। १६३९ में मुगल बादशाह शाहजहाँ ने दिल्ली में ही एक चारदीवारी से घिरे शहर का निर्माण करवाया जो १६७९ से १८५७ तक मुगल साम्राज्य की राजधानी रही। १८वीं एवं १९वीं शताब्दी में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने लगभग पूरे भारत को अपने कब्जे में ले लिया। इन लोगों ने कोलकाता को अपनी राजधानी बनाया। १९११ में अंग्रेजी सरकार ने फैसला किया कि राजधानी को वापस दिल्ली लाया जाए। इसके लिए पुरानी दिल्ली के दक्षिण में एक नए नगर नई दिल्ली का निर्माण प्रारम्भ हुआ। अंग्रेजों से १९४७ में स्वतंत्रता प्राप्त कर नई दिल्ली को भारत की राजधानी घोषित किया गया। स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात् दिल्ली में विभिन्न क्षेत्रों से लोगों का प्रवासन हुआ, इससे दिल्ली के स्वरूप में आमूल परिवर्तन हुआ। विभिन्न प्रान्तो, धर्मों एवं जातियों के लोगों के दिल्ली में बसने के कारण दिल्ली का शहरीकरण तो हुआ ही साथ ही यहाँ एक मिश्रित संस्कृति ने भी जन्म लिया। आज दिल्ली भारत का एक प्रमुख राजनैतिक, सांस्कृतिक एवं वाणिज्यिक केन्द्र है। .

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दुल्ला भट्टी

दुल्ला भट्टी (- मृत्यु-१५९९) भारत के मध्यकाल का एक वीर था जिसने अकबर के शासन काल में मुगलों के विरुद्ध विद्रोह का नेतृत्व किया। उसे पंजाब पुत्र' भी कहा जाता है। दुल्ला भट्टी की कथाएँ लोकगाथाओं में भरी पड़ी हैं। उसे 'उपकारी डाकू' की तरह याद किया जाता है। लोहड़ी का त्यौहार उसकी स्मृति में मनाया जाता है। .

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दौलताबाद

देवगिरि दुर्ग तथा चाँद मीनार दौलताबाद महाराष्ट्र का एक नगर है। इसका प्राचीन नाम देवगिरि है।। मुहम्म्द बिन तुगलक़ की राजधानी। यह औरंगाबाद जिले में स्थित है। यह शहर हमेशा शक्‍तिशाली बादशाहों के बहन लिए आकर्षण का केंद्र साबित हुआ है। दौलताबाद की सामरिक स्थिति बहुत ही महत्‍वपूर्ण थी। यह उत्तर और दक्षिण भारत के मध्‍य में पड़ता था। यहां से पूरे भारत पर शासन किया जा सकता था। इसी कारणवश बादशाह मुहम्‍मद बिन तुगलक ने इसे अपनी राजधानी बनाया था। उसने दिल्‍ली की समस्‍त जनता को दौलताबाद चलने का आदेश दिया था। लेकिन वहां की खराब स्थिति तथा आम लोगों की तकलीफों के कारण उसे कुछ वर्षों बाद राजधानी पुन: दिल्‍ली लानी पड़ी।बहन .

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देवनागरी

'''देवनागरी''' में लिखी ऋग्वेद की पाण्डुलिपि देवनागरी एक लिपि है जिसमें अनेक भारतीय भाषाएँ तथा कई विदेशी भाषाएं लिखीं जाती हैं। यह बायें से दायें लिखी जाती है। इसकी पहचान एक क्षैतिज रेखा से है जिसे 'शिरिरेखा' कहते हैं। संस्कृत, पालि, हिन्दी, मराठी, कोंकणी, सिन्धी, कश्मीरी, डोगरी, नेपाली, नेपाल भाषा (तथा अन्य नेपाली उपभाषाएँ), तामाङ भाषा, गढ़वाली, बोडो, अंगिका, मगही, भोजपुरी, मैथिली, संथाली आदि भाषाएँ देवनागरी में लिखी जाती हैं। इसके अतिरिक्त कुछ स्थितियों में गुजराती, पंजाबी, बिष्णुपुरिया मणिपुरी, रोमानी और उर्दू भाषाएं भी देवनागरी में लिखी जाती हैं। देवनागरी विश्व में सर्वाधिक प्रयुक्त लिपियों में से एक है। मेलबर्न ऑस्ट्रेलिया की एक ट्राम पर देवनागरी लिपि .

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दीन-ए-इलाही

फतेहपुर सीकरी का बुलंद दरवाजा, जिसके अंदर सीकरी में ही दीनेइलाही की स्थापना हुई दीन-ए-इलाही 1582 ईस्वी में मुगल सम्राट अकबर द्वारा समरूप एक समरूप धर्म था, जिसमें सभी धर्मों के मूल तत्वों को डाला, इसमे प्रमुखता हिंदू एवं इस्लाम धर्म थे। इनके अलावा पारसी, जैन एवं ईसाई धर्म के मूल विचारों को भी सम्मलित किया। हाँलाँकि इस धर्म के प्रचार के लिए उसने ज्यादा कुछ नही किया केवल आपने विश्वस्त लोगों को ही इसमें सम्मलित किया। कहा जाता हैं कि अकबर के अलावा केवल राजा बीरबल ही मृत्यु तक इस के अनुयायी थे। दबेस्तान-ए-मजहब के अनुसार अकबर के पश्चात केवल १९ लोगों ने एस धर्म को अपनाया कालांतर में अकबर ने एक नए पंचांग की रचना की जिसमें की उसने एक ईश्वरीय संवत को आरम्भ किया जो अकबर की राज्याभिषेक के दिन से प्रारम्भ होत था। उसने तत्कालीन सिक्कों के पीछे अल्लाहु-अकबर लिखवाया जो अनेकार्थी शब्द था। अकबर का शाब्दिक अर्थ है "महान" और अल्लाहु-अकबर शब्द के दो अर्थ हो सकते थे "अल्लाह महान हैं " या "अकबर ही अल्लाह हैं"। दीन-ऐ-इलाही सही मायनों में धर्म न होकर एक आचार सहिंता समान था। इसमें भोग, घमंड, निंदा करना या दोष लगाना वर्जित थे एवं इन्हें पाप कहा गया। दया, विचारशीलता और संयम इसके आधार स्तम्भ थे। .

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दीनार

वे देश जहाँ दिनार नाम से मुद्रा का प्रचलन है/था। गहरे हरे रंग से प्रदर्शित देशों में दिनार वर्तमान समय में भी प्रचलित है। हल्के हरे रंग वाले भागों में दिनार भूतकाल में प्रचलित था। दीनार: (अरबी دينار) (dīnār) वर्तमान समय में दीनार या दिनार विश्व के अनेक देशों की मुद्राओं का नाम है। मुसमालनों के आने के बहुत पहले से भारतवर्ष में दीनार चलता था। दीनार नामक सिक्के का प्रचार किसी समय एशिया और यूरोप के बहुत से भागों में था। यह कहीं सोने का, कहीं चाँदी का होता था। हिंदुस्तान की तरह अरब और फारस में भी प्राचीन काल में दीनार नाम का सिक्का प्रचलित था। अरबी फालकी के कोशकारों ने दीनार शब्द को अरबी लिखा है, पर फारस में दीनार का प्रचार बहुत प्राचीन काल में था। इसके अतिरिक्त रोमन (रोमक) लोगों में भी यह सिक्का दिनारियस के नाम से प्रचलित था। धात्वर्थ पर ध्यान देने से भी दीनार शब्द आर्यभाषा ही का प्रतीत होता है। अब प्रश्न यह होता है कि यह सिक्का भारत से फारस, अरब होते हुए रोम में गया अथवा रोम से इधर आया। यदि हरिवंश आदि संस्कृत ग्रंथों की अधिक प्राचीनता स्वीकार की जाय तो दीनार को भारत का मानना पडे़गा। .

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दीपावली

दीपावली या दीवाली अर्थात "रोशनी का त्योहार" शरद ऋतु (उत्तरी गोलार्द्ध) में हर वर्ष मनाया जाने वाला एक प्राचीन हिंदू त्योहार है।The New Oxford Dictionary of English (1998) ISBN 0-19-861263-X – p.540 "Diwali /dɪwɑːli/ (also Divali) noun a Hindu festival with lights...". दीवाली भारत के सबसे बड़े और प्रतिभाशाली त्योहारों में से एक है। यह त्योहार आध्यात्मिक रूप से अंधकार पर प्रकाश की विजय को दर्शाता है।Jean Mead, How and why Do Hindus Celebrate Divali?, ISBN 978-0-237-534-127 भारतवर्ष में मनाए जाने वाले सभी त्यौहारों में दीपावली का सामाजिक और धार्मिक दोनों दृष्टि से अत्यधिक महत्त्व है। इसे दीपोत्सव भी कहते हैं। ‘तमसो मा ज्योतिर्गमय’ अर्थात् ‘अंधेरे से ज्योति अर्थात प्रकाश की ओर जाइए’ यह उपनिषदों की आज्ञा है। इसे सिख, बौद्ध तथा जैन धर्म के लोग भी मनाते हैं। जैन धर्म के लोग इसे महावीर के मोक्ष दिवस के रूप में मनाते हैं तथा सिख समुदाय इसे बन्दी छोड़ दिवस के रूप में मनाता है। माना जाता है कि दीपावली के दिन अयोध्या के राजा राम अपने चौदह वर्ष के वनवास के पश्चात लौटे थे। अयोध्यावासियों का ह्रदय अपने परम प्रिय राजा के आगमन से प्रफुल्लित हो उठा था। श्री राम के स्वागत में अयोध्यावासियों ने घी के दीपक जलाए। कार्तिक मास की सघन काली अमावस्या की वह रात्रि दीयों की रोशनी से जगमगा उठी। तब से आज तक भारतीय प्रति वर्ष यह प्रकाश-पर्व हर्ष व उल्लास से मनाते हैं। यह पर्व अधिकतर ग्रिगेरियन कैलन्डर के अनुसार अक्टूबर या नवंबर महीने में पड़ता है। दीपावली दीपों का त्योहार है। भारतीयों का विश्वास है कि सत्य की सदा जीत होती है झूठ का नाश होता है। दीवाली यही चरितार्थ करती है- असतो माऽ सद्गमय, तमसो माऽ ज्योतिर्गमय। दीपावली स्वच्छता व प्रकाश का पर्व है। कई सप्ताह पूर्व ही दीपावली की तैयारियाँ आरंभ हो जाती हैं। लोग अपने घरों, दुकानों आदि की सफाई का कार्य आरंभ कर देते हैं। घरों में मरम्मत, रंग-रोगन, सफ़ेदी आदि का कार्य होने लगता है। लोग दुकानों को भी साफ़ सुथरा कर सजाते हैं। बाज़ारों में गलियों को भी सुनहरी झंडियों से सजाया जाता है। दीपावली से पहले ही घर-मोहल्ले, बाज़ार सब साफ-सुथरे व सजे-धजे नज़र आते हैं। दीवाली नेपाल, भारत, श्रीलंका, म्यांमार, मारीशस, गुयाना, त्रिनिदाद और टोबैगो, सूरीनाम, मलेशिया, सिंगापुर, फिजी, पाकिस्तान और ऑस्ट्रेलिया की बाहरी सीमा पर क्रिसमस द्वीप पर एक सरकारी अवकाश है। .

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नमक कोह

मियाँवाली ज़िले में नमक कोह का नज़ारा नमक कोह के दुसरे सबसे ऊँचे पहाड़, टिल्ला जोगियाँ (यानि 'योगियों का टीला') पर हिन्दू मंदिर नमक कोह या नमक सार या नमक पर्वत (सिलसिला कोह-ए-नमक; Salt Range, सॉल्ट रेन्ज) पाकिस्तान के पंजाब प्रान्त के उत्तरी भाग में स्थित एक पर्वत शृंखला है। यह पहाड़ झेलम नदी से सिन्धु नदी तक, यानि सिंध-सागर दोआब कहलाने वाले क्षेत्र में, फैले हुए हैं। नमक कोह के पहाड़ों में सेंधे नमक के बहुत से भण्डार क़ैद हैं, जिनसे इस शृंखला का नाम पड़ा है। नमक कोह का सबसे ऊँचा पहाड़ १,५२२ मीटर ऊँचा सकेसर पर्वत (Sakesar) और दूसरा सबसे ऊँचा पहाड़ ९७५ मीटर ऊँचा टिल्ला जोगियाँ (Tilla Jogian) है। यहाँ खबिक्की झील (Khabikki Lake) और ऊछाली झील (Uchhalli Lake) जैसे सरोवर और सून सकेसर जैसी सुन्दर वादियाँ भी हैं जो हर साल पर्यटकों को सैर करने के लिए खेंचती हैं। इन पहाड़ियों में बहुत सी नमक की खाने भी हैं जिनसे नमक खोदकर निकाला जाता है। इन खानों में खेवड़ा नमक खान मशहूर है लेकिन वरचा, कालाबाग़ और मायो की खाने भी जानीमानी हैं। यहाँ का नमक हज़ारों सालों से पूरे उत्तरी भारतीय उपमहाद्वीप में भेजा जाता रहा है और इसका ज़िक्र राजा हर्षवर्धन के काल में आए चीनी धर्मयात्री ह्वेन त्सांग ने भी अपनी लिखाईयों में किया था।, Tapan Raychaudhuri, Irfan Habib, Dharma Kumar, CUP Archive, 1982, ISBN 978-0-521-22692-9,...

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नगरी (चित्तौड़गढ़)

नगरी राजस्थान के चित्तौड़गढ़ जिले का एक ऐतिहासिक स्थान है। .

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पटना

पटना (पटनम्) या पाटलिपुत्र भारत के बिहार राज्य की राजधानी एवं सबसे बड़ा नगर है। पटना का प्राचीन नाम पाटलिपुत्र था। आधुनिक पटना दुनिया के गिने-चुने उन विशेष प्राचीन नगरों में से एक है जो अति प्राचीन काल से आज तक आबाद है। अपने आप में इस शहर का ऐतिहासिक महत्व है। ईसा पूर्व मेगास्थनीज(350 ईपू-290 ईपू) ने अपने भारत भ्रमण के पश्चात लिखी अपनी पुस्तक इंडिका में इस नगर का उल्लेख किया है। पलिबोथ्रा (पाटलिपुत्र) जो गंगा और अरेन्नोवास (सोनभद्र-हिरण्यवाह) के संगम पर बसा था। उस पुस्तक के आकलनों के हिसाब से प्राचीन पटना (पलिबोथा) 9 मील (14.5 कि॰मी॰) लम्बा तथा 1.75 मील (2.8 कि॰मी॰) चौड़ा था। पटना बिहार राज्य की राजधानी है और गंगा नदी के दक्षिणी किनारे पर अवस्थित है। जहां पर गंगा घाघरा, सोन और गंडक जैसी सहायक नदियों से मिलती है। सोलह लाख (2011 की जनगणना के अनुसार 1,683,200) से भी अधिक आबादी वाला यह शहर, लगभग 15 कि॰मी॰ लम्बा और 7 कि॰मी॰ चौड़ा है। प्राचीन बौद्ध और जैन तीर्थस्थल वैशाली, राजगीर या राजगृह, नालन्दा, बोधगया और पावापुरी पटना शहर के आस पास ही अवस्थित हैं। पटना सिक्खों के लिये एक अत्यंत ही पवित्र स्थल है। सिक्खों के १०वें तथा अंतिम गुरु गुरू गोबिंद सिंह का जन्म पटना में हीं हुआ था। प्रति वर्ष देश-विदेश से लाखों सिक्ख श्रद्धालु पटना में हरमंदिर साहब के दर्शन करने आते हैं तथा मत्था टेकते हैं। पटना एवं इसके आसपास के प्राचीन भग्नावशेष/खंडहर नगर के ऐतिहासिक गौरव के मौन गवाह हैं तथा नगर की प्राचीन गरिमा को आज भी प्रदर्शित करते हैं। एतिहासिक और प्रशासनिक महत्व के अतिरिक्त, पटना शिक्षा और चिकित्सा का भी एक प्रमुख केंद्र है। दीवालों से घिरा नगर का पुराना क्षेत्र, जिसे पटना सिटी के नाम से जाना जाता है, एक प्रमुख वाणिज्यिक केन्द्र है। .

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पटना का इतिहास

लोककथाओं के अनुसार, राजा पत्रक को पटना का जनक कहा जाता है, जिसने अपनी रानी पाटलि के लिये जादू से इस नगर का निर्माण किया। इसी कारण नगर का नाम पाटलिग्राम पड़ा। पाटलिपुत्र नाम भी इसी के कारण पड़ा। संस्कृत में पुत्र का अर्थ पुत्र या बेटा तथा ग्राम का अर्थ गांव होता है। पुरातात्विक अनुसंधानो के अनुसार पटना का इतिहास 490 ईसा पूर्व से होता है जब हर्यक वन्श के शासक अजातशत्रु ने अपनी राजधानी राजगृह से बदलकर यहां स्थापित की, क्योंकि वैशाली के लिच्छवियों से संघर्ष में उपयुक्त होने के कारण पाटलिपुत्र राजगृह की अपेक्षा सामरिक दृष्टि से अधिक रणनीतिक स्थान पर था। उसने गंगा के किनारे यह स्थान चुना और अपमा दुर्ग स्थापित कर लिया। उस समय से ही इस नगर का लगातार इतिहास रहा है - ऐसा गौरव दुनिया के बहुत कम नगरों को हासिल है। बौद्ध धर्म के प्रवर्तक गौतम बुद्ध अपने अन्तिम दिनों में यहां से गुजरे थे। उन्होने ये भविष्यवाणी की थी कि नगर का भविष्य उज्जवल होगा, पर कभी बाढ़, आग या आपसी संघर्ष के कारण यह बर्बाद हो जाएगा। मौर्य साम्राज्य के उत्कर्ष के बाद पाटलिपुत्र सत्ता का केन्द्र बन गया। चन्द्रगुप्त मौर्य का साम्राज्य बंगाल की खाड़ी से अफ़ग़ानिस्तान तक फैल गया था। शुरूआती पाटलिपुत्र लकड़ियों से बना था, पर सम्राट अशोक ने नगर को शिलाओं की संरचना मे तब्दील किया। चीन के फाहियान ने, जो कि सन् 399-414 तक भारत यात्रा पर था, अपने यात्रा-वृतांत में यहां के शैल संरचनाओं का जीवन्त वर्णन किया है। मेगास्थनीज़, जो कि एक युनानी इतिहासकार और चन्द्रगुप्त मौर्य के दरबार में एक राजदूत के नाते आया था, ने पाटलिपुत्र नगर का प्रथम लिखित विवरण दिया। ज्ञान की खोज में, बाद में कई चीनी यात्री यहां आए और उन्होने भी यहां के बारे में, अपने यात्रा-वृतांतों में लिखा है। इसके पश्चात नगर पर कई राजवंशों का राज रहा। इन राजाओं ने यहीं से भारतीय उपमहाद्वीप पर शासन किया। गुप्त वंश के शासनकाल को प्राचीन भारत का स्वर्ण युग कहा जाता है। पर इसके बाद नगर को वह गैरव नहीं मिल पाया जो एक समय मौर्य वंश के समय प्राप्त था। गुप्त साम्राज्य के पतन के बाद पटना का भविष्य काफी अनिश्चित रहा। 12 वीं सदी में बख़्तियार खिलजी ने बिहार पर अपना अधिपत्य जमा लिया और कई आध्यात्मिक प्रतिष्ठानों को ध्वस्त कर डाला। पटना देश का सांस्कृतिक और राजनैतिक केन्द्र नहीं रहा। मुगलकाल में दिल्ली के सत्ताधारियों ने यहां अपना नियंत्रण बनाए रखा। इस काल में सबसे उत्कृष्ठ समय तब आया जब शेरसाह सूरी ने नगर को पुनर्जीवित करने की कोशिश की। उसने गंगा के तीर पर एक किला बनाने की सोची। उसका बनाया कोई दुर्ग तो अभी नहीं है, पर अफ़ग़ान शैली में बना एक मस्जिद अभी भी है। मुगल बादशाह अकबर 1574 में अफ़गान सरगना दाउद ख़ान को कुचलने पटना आया। अकबर के राज्य सचिव एवं आइने अकबरी के लेखक (अबुल फ़जल) ने इस जगह को कागज, पत्थर तथा शीशे का सम्पन्न औद्योगिक केन्द्र के रूप में वर्णित किया है। पटना राइस के नाम से यूरोप में प्रसिद्ध चावल के विभिन्न नस्लों की गुणवत्ता का उल्लेख भी इन विवरणों में मिलता है। मुगल बादशाह औरंगजेब ने अपने प्रिय पोते मुहम्मद अज़ीम के अनुरोध पर 1704 में, शहर का नाम अजीमाबाद कर दिया। अज़ीम उस समय पटना का सूबेदार था। पर इस कालखंड में, नाम के अतिरिक्त पटना में कुछ विशेष बदलाव नहीं आया। मुगल साम्राज्य के पतन के साथ ही पटना बंगाल के नबाबों के शासनाधीन हो गया जिन्होंने इस क्षेत्र पर भारी कर लगाया पर इसे वाणिज्यिक केन्द्र बने रहने की छूट दी। १७वीं शताब्दी में पटना अंतर्राष्ट्रीय व्यापार का केन्द्र बन गया। अंग्रेज़ों ने 1620 में यहां रेशम तथा कैलिको के व्यापार के लिये यहां फैक्ट्री खोली। जल्द ही यह सॉल्ट पीटर (पोटेशियम नाइट्रेट) के व्यापार का केन्द्र बन गया जिसके कारण फ्रेंच और डच लोग से प्रतिस्पर्धा तेज हुई। बक्सर के निर्णायक युद्ध के बाद नगर इस्ट इंडिया कंपनी के अधीन चला गया और वाणिज्य का केन्द्र बना रहा। 1912, में बंगाल के विभाजन के बाद, पटना उड़ीसा तथा बिहार की राजधाान बना। It soon emerged as an important and strategic centre.

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पटवारी

पटवारी पटवारी राजस्व विभाग का कर्मचारी होता है। इन्हें विभिन्न स्थानों पर अन्य नामों से भी जाना जाता है जैसे:-, कारनाम अधिकारी, शानबोगरु आदि। यह भारतीय उपमहाद्वीप के ग्रामीण क्षेत्रों में सरकार का प्रशासनिक पद होता है। .

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पानीपत

हरियाणा में पानीपत पानीपत, भारतीय राज्य हरियाणा के पानीपत जिले में स्थित एक प्राचीन और ऐतिहासिक शहर है। यह दिल्ली-चंडीगढ राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या-१ पर स्थित है। यह राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र, दिल्ली के अन्तर्गत आता है और दिल्ली से ९० किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। भारत के इतिहास को एक नया मोड़ देने वाली तीन प्रमुख लड़ाईयां यहां लड़ी गयी थी। प्राचीन काल में पांडवों एवं कौरवों के बीच महाभारत का युद्ध इसी के पास कुरुक्षेत्र में हुआ था, अत: इसका धार्मिक महत्व भी बढ़ गया है। महाभारत युद्ध के समय में युधिष्ठिर ने दुर्योधन से जो पाँच स्थान माँगे थे उनमें से यह भी एक था। आधुनिक युग में यहाँ पर तीन इतिहासप्रसिद्ध युद्ध भी हुए हैं। प्रथम युद्ध में, सन्‌ 1526 में बाबर ने भारत की तत्कालीन शाही सेना को हराया था। द्वितीय युद्ध में, सन्‌ 1556 में अकबर ने उसी स्थल पर अफगान आदिलशाह के जनरल हेमू को परास्त किया था। तीसरे युद्ध में, सन्‌ 1761 में, अहमदशाह दुर्रानी ने मराठों को हराया था। यहाँ अलाउद्दीन द्वारा बनवाया एक मकबरा भी है। नगर में पीतल के बरतन, छुरी, काँटे, चाकू बनाने तथा कपास ओटने का काम होता है। यहाँ शिक्षा एवं अस्पताल का भी उत्तम प्रबंध है। .

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पानीपत का द्वितीय युद्ध

पानीपत का द्वितीय युद्ध उत्तर भारत के हिंदू शासक सम्राट हेमचंद्र विक्रमादित्य (लोकप्रिय नाम- हेमू) और अकबर की सेना के बीच 5 नवम्बर 1556 को पानीपत के मैदान में लड़ा गया था। अकबर के सेनापति खान जमान और बैरम खान के लिए यह एक निर्णायक जीत थी। इस युद्ध के फलस्वरूप दिल्ली पर वर्चस्व के लिए मुगलों और अफगानों के बीच चलने वाला संघर्ष अन्तिम रूप से मुगलों के पक्ष में निर्णीत हो गया और अगले तीन सौ वर्षों तक मुगलों के पास ही रहा। .

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पुरालेखविद्या

कागज का टुकड़ा जिस पर खरोष्टी में लिखा गया है (२री-५वीं शदी) प्राचीन लेखों को पढ़ना और उनके आधार पर इतिहास का पुनर्गठन करना पुरालेखविद्या (Palaeography) कहलाता है। पुरालेखविद्या के अन्तर्गत निम्नलिखित बातें आती हैं- 1.

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प्रवीणराय

प्रवीणराय एक वेश्या थी जो गायन और नृत्यकला में प्रवीण होने के साथ साथ काव्यरचना में भी चतुर थी। वह ओड़छा के महाराज इंद्रजीतसिंह के महल में रहती थी। वह महाकवि केशवदास की शिष्या थी। इसकी प्रशंसा सुनकर अकबर ने इसे अपने दरबार में बुला भेजा किंतु इंद्रजीतसिंह ने इसे वहाँ भेजने से इनकार कर दिया। इसपर उन्हें अकबर का कोपभाजन बनना पड़ा। अकबर ने उनपर एक करोड़ का जुरमाना ठोंक दिया और प्रवीणराय को जबरन बुलवा मँगाया। प्रवीणराय ने दरबार में उपस्थित होकर अपनी कविता सुनाई और शाह की धाक का वर्णन करते हुए अंत में निवेदन किया: इसपर अकबर बड़ा प्रसन्न हुआ और उसने प्रवीणराय को ओड़छा में ही रहने की अनुमति दे दी। प्रवीणराय द्वारा रचित कोई काव्यग्रंथ देखा नहीं गया किंतु उसके बनाए हुए कई छंद उपलब्ध हैं जिनसे उसका काव्य-कला-कौशल प्रकट होता है। .

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पृथ्वीराज

जुनाघर किला एक प्रसिद्ध किला है जहाँ बीकानेर के कई रजओं ने राज किया। पृथ्वीराज बीकानेरनरेश राजसिंह के भाई जो अकबर के दरबार में रहते थे। वे वीर रस के अच्छे कवि थे और मेवाड़ की स्वतंत्रता तथा राजपूतों की मर्यादा की रक्षा के लिये सतत संघर्ष करनेवाले महाराणा प्रताप के अनन्य समर्थक और प्रशंसक थे। जब आर्थिक कठिनाइयों तथा घोर विपत्तियों का सामना करते करते एक दिन राणा प्रताप अपनी छोटी लड़की को आधी रोटी के लिये बिलखते देखकर विचलित हो उठे तो उन्होंने सम्राट के पास संधि का संदेश भेज दिया। इसपर अकबर को बड़ी खुशी हुई और राणा का पत्र पृथ्वीराज को दिखलाया। पृथ्वीराज ने उसकी सचाई में विश्वास करने से इनकार कर दिया। उन्होंने अकबर की स्वीकृति से एक पत्र राणा प्रताप के पास भेजा, जो वीररस से ओतप्रोत, तथा अत्यंत उत्साहवर्धक कविता से परिपूर्ण था। उसमें उन्होंने लिखा हे राणा प्रताप ! तेरे खड़े रहते ऐसा कौन है जो मेवाड़ को घोड़ों के खुरों से रौंद सके ? हे हिंदूपति प्रताप ! हिंदुओं की लज्जा रखो। अपनी शपथ निबाहने के लिये सब तरह को विपत्ति और कष्ट सहन करो। हे दीवान ! मै अपनी मूँछ पर हाथ फेरूँ या अपनी देह को तलवार से काट डालूँ; इन दो में से एक बात लिख दीजिए।' यह पत्र पाकर महाराणा प्रताप पुन: अपनी प्रतिज्ञा पर दृढ़ हुए और उन्होंने पृथ्वीराज को लिख भेजा 'हे वीर आप प्रसन्न होकर मूछों पर हाथ फेरिए। जब तक प्रताप जीवित है, मेरी तलवार को तुरुकों के सिर पर ही समझिए।' पृथ्वीराज की पहली रानी लालादे बड़ी ही गुणवती पत्नी थी। वह भी कविता करती थी। युवास्था में ही उसकी मृत्यु हो गई जिससे उन्हें बड़ा सदमा बैठा। उसके शव को चिता पर जलते देखकर वे चीत्कार कर उठे: 'तो राँघ्यो नहिं खावस्याँ, रे वासदे निसड्ड। मो देखत तू बालिया, साल रहंदा हड्ड।' (हे निष्ठुर अग्नि, मैं तेरा राँघा हुआ भोजन न ग्रहण करुँगा, क्योंकि तूने मेरे देखते देखते लालादे को जला डाला और उसका हाड़ ही शेष रह गया)। बाद में स्वास्थ्य खराब होता देखकर संबंधियों ने जैसलमेर के राव की पुत्री चंपादे से उनका विवाह करा दिया। यह भी कविता करती थी। .

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फलक़ नाज़

फलक़ नाज़ एक भारतीय टेलिविज़न अभिनेत्री है। इन्होंने कई धारावाहिकों में कार्य किया है फलक़ ने कलर्स के लोकप्रिय धारावाहिक ससुराल सिमर का में "जानवी" का किरदार निभाया था। ये शफ़क़ नाज़ की छोटी बहन है जो टीवी अभिनेत्री है। इनके अलावा ये तारक मेहता का उल्टा चश्मा में भी कार्य कर चूकी है तथा वर्तमान में भारत का वीर पुत्र – महाराणा प्रताप में "रुकैया बेगम" का किरदार निभा रही है जो अकबर (कृप सूरी) की पत्नी है। .

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फ़तेहपुर सीकरी

फतेहपुर सीकरी (فتحپور سیکری), एक नगर है जो कि आगरा जिला का एक नगरपालिका बोर्ड है। यह भारत के उत्तर प्रदेश राज्य में स्थित है,। यह यहाँ के मुगल साम्राज्य में अकबर के राज्य में 1571 से 1585 तक, फिर इसे खाली कर दिया गया, शायद पानी की कमी के कारण। यह सिकरवार राजपूत राजा की रियासत थी जो बाद में इसके आसपास खेरागढ़ और मध्यप्रदेश के मुरैना जिले में बस गए ।फतेहपुर सीकरी हिंदू और मुस्लिम वास्‍तुशिल्‍प के मिश्रण का सबसे अच्‍छा उदाहरण है। फतेहपुर सीकरी मस्जिद के बारे में कहा जाता है कि यह मक्‍का की मस्जिद की नकल है और इसके डिजाइन हिंदू और पारसी वास्‍तुशिल्‍प से लिए गए हैं। मस्जिद का प्रवेश द्वार ५४ मीटर ऊँचा बुलंद दरवाजा है जिसका निर्माण 1573 ई० में किया गया था। मस्जिद के उत्तर में शेख सलीम चिश्‍ती की दरगाह है जहाँ नि:संतान महिलाएँ दुआ मांगने आती हैं। आंख मिचौली, दीवान-ए-खास, बुलंद दरवाजा, पांच महल, ख्‍वाबगाह, अनूप तालाब फतेहपुर सीकरी के प्रमुख स्‍मारक हैं। .

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फ़र्रुख़ सियर

फ़र्रुख़ सियर (जन्म: 20 अगस्त 1685 - मृत्यु: 19 अप्रैल 1719) एक मुग़ल बादशाह था जिसने 1713 से 1719 तक हिन्दुस्तान पर हुकूमत की। उसका पूरा नाम अब्बुल मुज़फ़्फ़रुद्दीन मुहम्मद शाह फ़र्रुख़ सियर था। आलिम अकबर सानी वाला, शान पादशाही बह्र-उर्-बार, तथा शाहिदे-मज़्लूम उसके शाही ख़िताबों के नाम हुआ करते थे। 1715 ई. में एक शिष्टमंडल जाॅन सुरमन की नेतृत्व में भारत आया। यह शिष्टमंडल उत्तरवर्ती मुग़ल शासक फ़र्रूख़ सियर की दरबार में 1717 ई. में पहुँचा। उस समय फ़र्रूख़ सियर जानलेवा घाव से पीड़ित था। इस शिष्टमंडल में हैमिल्टन नामक डाॅक्टर थे जिन्होनें फर्रखशियर का इलाज किया था।इससे फ़र्रूख़ सियर खुश हुआ तथा अंग्रेजों को भारत में कहीं भी व्यापार करने की अनुमति तथा अंग्रेज़ों द्वारा बनाऐ गए सिक्के को भारत में सभी जगह मान्यता प्रदान कर दिया गया। फ़र्रूख़ सियर द्वारा जारी किये गए इस घोषणा को ईस्ट इंडिया कंपनी का मैग्ना कार्टा कहा जाता है। मैग्ना कार्टा का सर्वप्रथम 1215 ई. में ब्रिटेन में जाॅन-II के द्वारा हुआ था। .

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फ़ारसी साहित्य

फारसी भाषा और साहित्य अपनी मधुरता के लिए प्रसिद्ध है। फारसी ईरान देश की भाषा है, परंतु उसका नाम फारसी इस कारण पड़ा कि फारस, जो वस्तुत: ईरान के एक प्रांत का नाम है, के निवासियों ने सबसे पहले राजनीतिक उन्नति की। इस कारण लोग सबसे पहले इसी प्रांत के निवासियों के संपर्क में आए अत: उन्होंने सारे देश का नाम 'पर्सिस' रख दिया, जिससे आजकल यूरोपीय भाषाओं में ईरान का नाम पर्शिया, पेर्स, प्रेज़ियन आदि पड़ गया। .

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फ़ैज़ी

शेख अबु अल-फ़ैज़, प्रचलित नाम:फ़ैज़ी (२४ सितंबर १५४७, आगरा–५ अक्टूबर १५९५, लाहौर) मध्यकालीन भारत का फारसी कवि था। १५८८ में वह अकबर का मलिक-उश-शु‘आरा (विशेष कवि) बन गया था।ब्लॉक्मैन, एच.

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फकीर अजिओं-दिन

फकीर अजिओं-दिन अकबर के सलाहकार थे। श्रेणी:अकबर के नवरत्न.

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बर्धमान जिला

वर्धमान भारतीय राज्य पश्चिम बंगाल का एक जिला है। इसका मुख्यालय दामोदर नदी के किनारे २३ डिग्री २५' उत्तरी अक्षांश तथा ८७ डिग्री ८५' पूर्वी देशान्तर पर स्थित वर्धमान शहर में हैं। प्रदेश की राजधानी कोलकाता से १०० किलोमीटर दूर स्थित इस नगर का गौरवशाली पौराणिक इतिहास है। इसका नामकरण २४वें जैन तीर्थंकर महावीर के नाम पर हुआ है। मुगल काल में इसका नाम शरिफाबाद हुआ करता था। मुगल बादशाह जहांगीर के फरमान पर १७वीं शताब्दी में एक व्यापारी कृष्णराम राय ने वर्धमान में अपनी जमींदारी शूरू की। कृष्णराम राय के वंशजों ने १९५५ तक वर्धमान पर शासन किया। वर्धमान जिले में मिले पाषाण काल के अवशेष तथा सिंहभूमि, पुरूलिया, धनबाद और बांकुड़ा जिले के अवशेषों में समानताएँ हैं। इससे पता चलता है कि यह सम्पूर्ण क्षेत्र एक ही प्रकार की सभ्यता और संस्कृति का पोषक था। वर्धमान नाम अपने आप में ही जैन धर्म के २४वें तीर्थंकर महावीर वर्धमान से जुड़ा हुआ है। पार्श्वनाथ की पहाड़िया जैनों का एक महत्वपूर्ण धार्मिक केन्द्र था। यह भी वर्धमान जिले के सीमा से लगा हुआ है। ऐसा विश्वास किया जाता है कि महावीर अपने धर्म के प्रचार एवं प्रसार के सिलसिले में वर्धमान आए थे। जिले में विभिन्न तीर्थंकरो की पत्थर की बनी प्रतिमाएँ प्राप्त हुई हैं। गुप्त काल एवं सेन युग में वर्धमान का एक महत्वपूर्ण स्थान था। सल्तनत काल एवं मुगलकालों में वर्धमान एक महत्वपूर्ण प्रशासनिक केन्द्र था। जहांगीर की पत्नी नूरजहां वर्धमान की ही थी। नूरजहाँ का पहला पति शेर अफगान वर्धमान का जागीरदार था। जहांगीर ने नूरजहाँ को हासिल करने के लिए कुतुबुद्दीन को वर्धमान का सूबेदार नियुक्त किया। कुतुबुद्दीन और शेर अफगान के बीच वर्तमान वर्धमान रेलने स्टेशन के निकट भयंकर संग्राम हुआ। अंततः दोनो ही मारे गए। आज भी इनकी समाधियो को एक दूसरे के पास वर्धमान में देखा जा सकता है। अकबर के समय में अबुल फजल और फैजी के षडयंत्रों का शिकार होने से बचने के लिए पीर बहराम ने दिल्ली छोड़ दिया। पीर बहराम को इसी वर्धमान शहर ने आश्रय दिया। आज भी यहाँ के हिन्दू और मुस्लिम उन्हें श्रद्धा-पूर्वक स्मरण करते हैं। वर्धमान में एक बहुत बड़ा आम का बगीचा है। यह बगीचा सैकड़ों हिन्दू औरतों के अपने पति के साथ उनकी चिता पर सती होने का गवाह है। मुगलों ने इस्ट इंडिया कम्पनी को तीन ग्राम- सुतानती, गोविन्दपुर तथा कलिकाता एक संधि के जरिए हस्तांतरित कर दिए थे। इस संधि पर हस्ताक्षर वर्धमान में ही हुआ था। कालांतर में यही तीनो ग्राम विकसीत होकर कोलकाता के रूप में जाने गए। .

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बस्ती, उत्तर प्रदेश

यह भारत के उत्तर प्रदेश प्रान्त का एक शहर और बस्ती जिला का मुख्यालय है। ऐतिहासिक दृष्टि से भी यह स्थान काफी महत्वपूर्ण माना जाता है। बस्ती जिला गोण्डा जिले के पूर्व और संत कबीर नगर के पश्चिम में स्थित है। क्षेत्रफल की दृष्टि से भी यह उत्तर प्रदेश का सातवां बड़ा जिला है। प्राचीन समय में बस्ती को 'कौशल' के नाम से जाना जाता था। Created by_Deepak Patel .

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बहादुर शाह ज़फ़र

बहादुर शाह ज़फ़र बहादुर शाह ज़फर (1775-1862) भारत में मुग़ल साम्राज्य के आखिरी शहंशाह थे और उर्दू के माने हुए शायर थे। उन्होंने १८५७ का प्रथम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में भारतीय सिपाहियों का नेतृत्व किया। युद्ध में हार के बाद अंग्रेजों ने उन्हें बर्मा (अब म्यांमार) भेज दिया जहाँ उनकी मृत्यु हुई। .

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बाबर

ज़हिर उद-दिन मुहम्मद बाबर (14 फ़रवरी 1483 - 26 दिसम्बर 1530) जो बाबर के नाम से प्रसिद्ध हुआ, एक मुगल शासक था, जिनका मूल मध्य एशिया था। वह भारत में मुगल वंश के संस्थापक था। वो तैमूर लंग के परपोते था, और विश्वास रखते था कि चंगेज़ ख़ान उनके वंश के पूर्वज था। मुबईयान नामक पद्य शैली का जन्मदाता बाबर को ही माना जाता है! .

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बाबरनामा

मुग़ल सम्राट बाबर की बाबरनामा नामक जीवनी में एक गेंडे के शिकार का चित्रण बाबरनामा से एक दृश्य बाबरनामा (चग़ताई/फ़ारसी) या तुज़्क-ए-बाबरी मुग़ल साम्राज्य के पहले सम्राट बाबर की आत्मलिखित जीवनी है। यह उन्होंने अपनी मातृभाषा चग़ताई तुर्की में लिखी थी। इसमें उन्होंने अपना उज़्बेकिस्तान की फ़रग़ना वादी में गुज़ारा हुआ बचपन और यौवन, बाद में अफ़्ग़ानिस्तान और भारतीय उपमहाद्वीप पर आक्रमण और क़ब्ज़ा और अन्य घटनाओं का विवरण दिया है। उन्होंने हर क्षेत्र की भूमि, राजनीति, अर्थव्यवस्था, प्राकृतिक वातावरण, शहरों-इमारतों, फलों, जानवरों, इत्यादि का बखान किया है। इसमें कुछ फ़ारसी भाषा के छोटे-मोटे छंद भी आते हैं, हालांकि फ़ारसी बोलने वाले इसे समझने में अक्षम हैं। हालांकि चग़ताई भाषा विलुप्त हो चुकी है आधुनिक उज़बेक भाषा उसी की वंशज है और उसे बोलने वाले उज़बेक लोग बाबरनामा पढ़ सकते हैं। इस किताब को चग़ताई और उज़बेक भाषाओं के साहित्य का एक महत्वपूर्ण अंग माना जाता है।, Calum MacLeod, Bradley Mayhew, Odyssey, 2008, ISBN 978-962-217-795-6,...

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बाबरी मस्जिद

बाबरी मस्जिद उत्तर प्रदेश के फ़ैज़ाबाद ज़िले के अयोध्या शहर में रामकोट पहाड़ी ("राम का किला") पर एक मस्जिद थी। रैली के आयोजकों द्वारा मस्जिद को कोई नुकसान नहीं पहुंचाने देने की भारत के सर्वोच्च न्यायालय से वचनबद्धता के बावजूद, 1992 में 150,000 लोगों की एक हिंसक रैली.

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बाबा धर्मदास

बाबा धर्मदास मुगल सम्राट अकबर के शासनकाल में एक जैन सन्त थे। वर्तमान रूप से पाकिस्तान के सियालकोट, पंजाब के पसरूर गाँव के सभी जैन उनकी पूर्वज के रूप में पूजा करते हैं। .

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बाज़ारक, पंजशीर

बाज़ारक (दरी फ़ारसी:, अंग्रेज़ी: Bazarak) उत्तर-पूर्वी अफ़ग़ानिस्तान के पंजशीर प्रान्त की राजधानी है। यह १०० किमी लम्बी पंजशीर वादी के लगभग मध्य में स्थित है और यहाँ पर बसने वाले अधिकतर लोग ताजिक समुदाय के हैं। यह प्रसिद्ध अफ़ग़ान नेता अहमद शाह मसूद का जन्मस्थान है और उनका मकबरा भी यहीं स्थित है।, Susan Vollmer, pp.

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बांके बिहारी जी मन्दिर

बांके बिहारी मंदिर भारत में मथुरा जिले के वृंदावन धाम में रमण रेती पर स्थित है। यह भारत के प्राचीन और प्रसिद्ध मंदिरों में से एक है। बांके बिहारी कृष्ण का ही एक रूप है जो इसमें प्रदर्शित किया गया है। इसका निर्माण १८६४ में स्वामी हरिदास ने करवाया था। .

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बिहार का मध्यकालीन इतिहास

बिहार का मध्यकालीन इतिहास का प्रारम्भ उत्तर-पश्‍चिम सीमा पर तुर्कों के आक्रमण से होता है। मध्यकालीन काल में भारत में किसी की भी मजबूत केन्द्रीय सत्ता नहीं थी। पूरे देश में सामन्तवादी व्यवस्था चल रही थी। सभी शासक छोटे-छोटे क्षेत्रीय शासन में विभक्‍त थे। मध्यकालीन बिहार की इतिहास की जानकारी के स्त्रोतों में अभिलेख, नुहानी राज्य के स्त्रोत, विभिन्न राजाओं एवं जमींदारों के राजनीतिक जीवन एवं अन्य सत्ताओं से उनके संघर्ष, दस्तावेज, मिथिला क्षेत्र में लिखे गये ग्रन्थ, यूरोपीय यात्रियों द्वारा दिये गये विवरण इत्यादि महत्वपूर्ण हैं।.

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बिजनौर

बिजनौर भारत के उत्तर प्रदेश का एक प्रमुख शहर एवं लोकसभा क्षेत्र है। हिमालय की उपत्यका में स्थित बिजनौर को जहाँ एक ओर महाराजा दुष्यन्त, परमप्रतापी सम्राट भरत, परमसंत ऋषि कण्व और महात्मा विदुर की कर्मभूमि होने का गौरव प्राप्त है, वहीं आर्य जगत के प्रकाश स्तम्भ स्वामी श्रद्धानन्द, अंतर्राष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त वैज्ञानिक डॉ॰ आत्माराम, भारत के प्रथम इंजीनियर राजा ज्वालाप्रसाद आदि की जन्मभूमि होने का सौभाग्य भी प्राप्त है। साहित्य के क्षेत्र में जनपद ने कई महत्त्वपूर्ण मानदंड स्थापित किए हैं। कालिदास का जन्म भले ही कहीं और हुआ हो, किंतु उन्होंने इस जनपद में बहने वाली मालिनी नदी को अपने प्रसिद्ध नाटक 'अभिज्ञान शाकुन्तलम्' का आधार बनाया। अकबर के नवरत्नों में अबुल फ़जल और फैज़ी का पालन-पोषण बास्टा के पास हुआ। उर्दू साहित्य में भी जनपद बिजनौर का गौरवशाली स्थान रहा है। क़ायम चाँदपुरी को मिर्ज़ा ग़ालिब ने भी उस्ताद शायरों में शामिल किया है। नूर बिजनौरी जैसे विश्वप्रसिद्ध शायर इसी मिट्टी से पैदा हुए। महारनी विक्टोरिया के उस्ताद नवाब शाहमत अली भी मंडावर,बिजनौर के निवासी थे, जिन्होंने महारानी को फ़ारसी की पढ़ाया। संपादकाचार्य पं. रुद्रदत्त शर्मा, बिहारी सतसई की तुलनात्मक समीक्षा लिखने वाले पं. पद्मसिंह शर्मा और हिंदी-ग़ज़लों के शहंशाह दुष्यंत कुमार,विख्यात क्रांतिकारी चौधरी शिवचरण सिंह त्यागी, पैजनियां - भी बिजनौर की धरती की देन हैं। वर्तमान में महेन्‍द्र अश्‍क देश विदेश में उर्दू शायरी के लिए विख्‍यात हैं। धामपुर तहसील के अन्‍तर्गत ग्राम किवाड में पैदा हुए महेन्‍द्र अश्‍क आजकल नजीबाबाद में निवास कर रहे हैं। .

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बुरहानपुर

बुरहानपुर भारत के मध्य प्रदेश का एक प्रमुख शहर है। बुरहानपुर मध्य प्रदेश में ताप्ती नदी के किनारे पर स्थित एक नगर है। यह ख़ानदेश की राजधानी था। इसको चौदहवीं शताब्दी में ख़ानदेश के फ़ारूक़ी वंश के सुल्तान मलिक अहमद के पुत्र नसीर द्वारा बसाया गया। .

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बुंदेलखंड के शासक

' बुंदेलखंड के ज्ञात इतिहास के अनुसार यहां ३०० ई. प सौरभ तिवारी ब्राह्मण सासक मौर्य शासनकाल के साक्ष्‍य उपलब्‍ध है। इसके पश्‍चात वाकाटक और गुप्‍त शासनकाल, कलचुरी शासनकाल, चंदेल शासनकाल, खंगार1खंगार शासनकाल, बुंदेल शासनकाल (जिनमें ओरछा के बुंदेल भी शामिल थे), मराठा शासनकाल और अंग्रेजों के शासनकाल का उल्‍लेख मिलता है। .

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बैरम खां

बैरम खां की हत्या एक अफ़्गान ने पाटन में १५६१ में की थी।:अकबरनामा बैरम खां की विधवा और बच्चे को १५६१ में उसकी हत्या के बाद अहमदाबाद, ले जाया गया था।: अकबरनामा बैरम खान(بيرام خان) अब्दुल रहीम खानेखाना के पिता जाने-माने योद्धा थे। वह अकबर के संरक्षक थे। याहू जागरण व तुर्किस्तान से आए थे। उन्हीं के संरक्षण में अकबर बड़े हुए लेकिन दरबार के कुछ लोगों ने अकबर को बैरम खान के खिलाफ भड़का दिया और उन्हें संरक्षक पद से हटा दिया गया, वह जब हज के लिए जा रहे थे तो रास्ते में उनकी हत्या कर दी गई। उस समय अब्दुल रहीम ५ साल के थे। उन्हें अकबर ने अपने पास रख लिया। बैरम खाँ तेरह वर्षीय अकबर के अतालीक (शिक्षक) तथा अभिभावक थे। बैरम खाँ खान-ए-खाना की उपाधि से सम्मानित थे। वे हुमायूँ के साढ़ू और अंतरंग मित्र थे। रहीम की माँ वर्तमान हरियाणा प्रांत के मेवाती राजपूत जमाल खाँ की सुंदर एवं गुणवती कन्या सुल्ताना बेगम थी। जब रहीम पाँच वर्ष के ही थे, तब गुजरात के पाटन नगर में सन १५६१ में इनके पिता बैरम खाँ की हत्या कर दी गई। रहीम का पालन-पोषण अकबर ने अपने धर्म-पुत्र की तरह किया।। अभिव्यक्ति। डॉ॰ दर्शन सेठी मध्य कालीन युद्धों के अरबी इतिहास ग्रंथ के प्रथम अध्याय में बैरम खां द्वारा बनवाई गई `कल्ला मीनार' का उल्लेख है। इस स्थान का नाम सर मंजिल रखा गया था। सिकंदर शाह सूरी के साथ लड़ने में जितने सिर कटे थे या सैनिक मरे थे, उन्हें बटोर कर उन्हें ईंट, पत्थरें की जगह काम में लाया गया और यह ऊंची मीनार खड़ी की गई थी। मुगल बादशाहों ने और भी कितनी ही ऐसी कल्ला मीनारें युद्ध विजय के दर्प-प्रदर्शन के लिए बनवाई थीं। कल्ला, फारसी में सिर को कहते हैं। बैरम ख़ाँ हुमायूँ का सहयोगी तथा उसके नाबालिग पुत्र अकबर का वली अथवा संरक्षक था। वह बादशाह हुमायूँ का परम मित्र तथा सहयोगी भी था। अपने समस्त जीवन में बैरम ख़ाँ ने मुग़ल साम्राज्य की बहुत सेवा की थी। हुमायूँ को उसका राज्य फिर से हासिल करने तथा कितने ही युद्धों में उसे विजित कराने में बैरम ख़ाँ का बहुत बड़ा हाथ था। अकबर को भी भारत का सम्राट बनाने के लिए बैरम ख़ाँ ने असंख्य युद्ध किए और हेमू जैसे शक्तिशाली राजा को हराकर भारत में मुग़ल साम्राज्य की स्थापना में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। मुग़ल साम्राज्य में अकबर की दूधमाता माहम अनगा ही थी, जो बैरम ख़ाँ के विरुद्ध साज़िश करती रहती थी। ये इन्हीं साज़िशों का नतीजा था कि बैरम को हज के लिए आदेश दिया गया, जहाँ 1561 ई. में उसकी हत्या कर दी गई। वंश परिचय बैरम ख़ाँ का सम्बन्ध तूरान (मध्य एशिया) की तुर्कमान जाति से था। हैदराबाद के निज़ाम भी तुर्कमान थे। इतिहासकार कासिम फ़रिश्ता के अनुसार वह ईरान के कराकुइलु तुर्कमानों के बहारलु शाखा से सम्बद्ध था। अलीशकर बेग तुर्कमान तैमूर के प्रसिद्ध सरदारों में से एक था, जिसे हमदान, दीनवर, खुजिस्तान आदि पर शासक नियुक्त किया गया था। अलीशकर की सन्तानों में शेरअली बेग हुआ। तैमूरी शाह हुसेन बायकरा के बाद जब तूरान में सल्तनत बरबाद हुई, तो शेरअली काबुल की तरफ भाग्य परीक्षा करने के लिए आया। उसका बेटा यारअली और पोता सैफअली अफ़ग़ानिस्तान चले आये। यारअली को बाबर ने ग़ज़नी का हाकिम नियुक्त किया। थोड़े ही दिनों के बाद उसके मरने पर बेटे सैफअली को वहीं दर्जा मिला। वह भी जल्दी ही मर गया। अल्प वयस्क बैरम अपने घरवालों के साथ बल्ख चला गया। हुमायूँ से मित्रता बल्ख में वह कुछ दिनों तक पढ़ता-लिखता रहा। फिर वह समवयस्क शाहज़ादा हुमायूँ का नौकर और बाद में उसका मित्र हो गया। बैरम ख़ाँ को साहित्य और संगीत से भी बहुत प्रेम था। वह जल्दी ही अपने स्वामी का अत्यन्त प्रिय हो गया था। 16 वर्ष की आयु में ही एक लड़ाई में बैरम ख़ाँ ने बहुत वीरता दिखाई, उसकी ख्याति बाबर तक पहुँच गई, तब बाबर ने खुद उससे कहा: शाहज़ादा के साथ दरबार में हाजिर करो। बाबर के मरने के बाद वह हुमायूँ बादशाह की छाया के तौर पर रहने लगा। हुमायूँ ने चांपानेर (गुजरात) के क़िले पर घेरा डाला। किसी तरह से दाल ग़लती न देखकर चालीस मुग़ल बहादुर सीढ़ियों के साथ क़िले में उतर गए, जिनमें बैरम ख़ाँ भी था। क़िला फ़तह कर लिया गया। शेरशाह से चौसा में लड़ते वक़्त बैरम ख़ाँ भी साथ ही था। कन्नौज में भी वह लड़ा। इन सभी घटनाओं ने हुमायूँ और बैरम ख़ाँ को एक अटूट मित्रता में बाँध दिया था। जीवन दान कन्नौज की लड़ाई में पराजय के बाद मुग़ल सेना में जिसकी सींग जिधर समाई, वह उधर भागा। बैरम ख़ाँ अपने पुराने दोस्त सम्भल के मियाँ अब्दुल वहाब के पास पहुँचा। फिर लखनऊ के राजा मित्रसेन के पास जंगलों में दिन गुज़ारता रहा। शेरशाही हाकिम नसीर ख़ाँ को पता लगा। उसने बैरम ख़ाँ को पकड़ मंगवाया। नसीर ख़ाँ चाहता था कि बैरम ख़ाँ को कत्ल कर दें, पर दोस्तों की कोशिश से बैरम ख़ाँ किसी प्रकार से बच गया। अन्त में उसे शेरशाह के सामने हाजिर होना पड़ा, जिसने एक मामूली मुग़ल सरदार को महत्व न देकर उसे माफ कर दिया और जीवन दान दे दिया। कंधार के हाकिम का पद बैरम ख़ाँ फिर से गुजरात के सुल्तान महमूद के पास गया, पर उसे अपने स्वामी से मिलने की धुन थी। जब हिजरी 950 (1543-1544 ई.) में हुमायूँ ईरान से लौटकर काबुल लेते सिंध की ओर बढ़ा, तो बैरम ख़ाँ अपने आदमियों के साथ हुमायूँ की ओर से लड़ने लगा। हुमायूँ को इसकी ख़बर लगी तो उसकी खुशी का ठिकाना नहीं रहा। हिन्दुस्तान में सफलता मिलने वाली नहीं थी, इसलिए हुमायूँ ने ईरान का रास्ता किया। बैरम ख़ाँ भी उसके साथ था। शाही काफिले में कुल मिलाकर सत्तर आदमी से ज़्यादा नहीं थे। ईरान से लौटकर हुमायूँ ने कंधार को घेरा। उसने चाहा, भाई कामराँ को समझा-बुझाकर ख़ून-ख़राबा रोका जाए। उसे समझाने के लिए हुमायूँ ने बैरम ख़ाँ को काबुल भेजा, लेकिन वह कहाँ होने वाला था। कंधार पर अधिकार करके बैरम ख़ाँ को वहाँ का हाकिम नियुक्त किया गया। कंधार विजय के बारे में हुमायूँ ने स्वयं कहा- “रोज नौरोज बैरम’स्त इमरोज”। दिले अहबाब बेगम’स्त इमरोज। (आज नववर्ष दिन बैरम है। आज मित्रों के दिल बेफिकर हैं। ख़ानख़ाना की उपाधि जब हुमायूँ हिन्दुस्तान की ओर बढ़ते समय सतलुज नदी के किनारे माछीवाड़ा पहुँचा था, तब पता लगा दूसरी पार बेजवाड़ा में तीस हज़ार पठान डेरा डाले पड़े हैं। पठान लकड़ी जलाकर ताप रहे थे। रात को रौशनी ने लक्ष्य बतलाने में सहायता की। अपने एक हज़ार सवारों के साथ बैरम ख़ाँ उनके ऊपर टूट पड़ा। दुश्मन की संख्या का उनको पता नहीं था। तीरों की वर्षा से पठान घबरा गए। वे अपना सारा माल वहीं पर छोड़कर भाग गए। इसी विजय के उपलक्ष्य में हुमायूँ ने उसे ‘ख़ानख़ाना’ की उपाधि प्रदान की। तर्दीबेग बैरम ख़ाँ का प्रतिद्वन्द्वी था, लेकिन हेमू से हारकर भागने के समय बैरम ख़ाँ को मौक़ा मिल गया और उसने इस काँटे को निकाल बाहर किया। अकबर के गद्दी पर बैठने के दिन अबुल मसानी ने कुछ गड़बड़ी करनी चाही थी, लेकिन बैरम ख़ाँ ने जैसी ख़ूबसूरती से इस गुत्थी को सुलझाया, वह उसका ही काम था। हेमचन्द्र (हेमू) से पराजित होकर मुग़ल अमीर निराश हो चुके थे। वह काबुल लौट जाना चाहते थे, पर बैरम ख़ाँ ने उन्हें रोक दिया। साज़िश अकबर की दूधमाता माहम अनगा नित्य ही बैरम ख़ाँ के ख़िलाफ़ साज़िशें रचती रहती थी। मुग़ल दरबार में माहम अनगा का एक समूह था, जो हमेशा ही बैरम को नीचा दिखाने में लगा रहता था। हिजरी 961 (1553-1554 ई.) में इन लोगों ने चुगली लगाई कि बैरम ख़ाँ स्वतंत्र होना चाहता है, लेकिन बैरम ख़ाँ नमक-हराम नहीं था। हुमायूँ एक दिन जब स्वयं कंधार पहुँचा था, तब बैरम ख़ाँ ने बहुत चाहा कि बादशाह उसे अपने साथ ले चले, लेकिन कंधार भी एक बहुत महत्त्वपूर्ण स्थान था, जिसके लिए बैरम ख़ाँ से बढ़कर अच्छा शासक नहीं मिल सक बैरम ख़ाँ हुमायूँ का सहयोगी तथा उसके नाबालिग पुत्र अकबर का वली अथवा संरक्षक था। वह बादशाह हुमायूँ का परम मित्र तथा सहयोगी भी था। अपने समस्त जीवन में बैरम ख़ाँ ने मुग़ल साम्राज्य की बहुत सेवा की थी। हुमायूँ को उसका राज्य फिर से हासिल करने तथा कितने ही युद्धों में उसे विजित कराने में बैरम ख़ाँ का बहुत बड़ा हाथ था। अकबर को भी भारत का सम्राट बनाने के लिए बैरम ख़ाँ ने असंख्य युद्ध किए और हेमू जैसे शक्तिशाली राजा को हराकर भारत में मुग़ल साम्राज्य की स्थापना में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। मुग़ल साम्राज्य में अकबर की दूधमाता माहम अनगा ही थी, जो बैरम ख़ाँ के विरुद्ध साज़िश करती रहती थी। ये इन्हीं साज़िशों का नतीजा था कि बैरम को हज के लिए आदेश दिया गया, जहाँ 1561 ई. में उसकी हत्या कर दी गई। वंश परिचय बैरम ख़ाँ का सम्बन्ध तूरान (मध्य एशिया) की तुर्कमान जाति से था। हैदराबाद के निज़ाम भी तुर्कमान थे। इतिहासकार कासिम फ़रिश्ता के अनुसार वह ईरान के कराकुइलु तुर्कमानों के बहारलु शाखा से सम्बद्ध था। अलीशकर बेग तुर्कमान तैमूर के प्रसिद्ध सरदारों में से एक था, जिसे हमदान, दीनवर, खुजिस्तान आदि पर शासक नियुक्त किया गया था। अलीशकर की सन्तानों में शेरअली बेग हुआ। तैमूरी शाह हुसेन बायकरा के बाद जब तूरान में सल्तनत बरबाद हुई, तो शेरअली काबुल की तरफ भाग्य परीक्षा करने के लिए आया। उसका बेटा यारअली और पोता सैफअली अफ़ग़ानिस्तान चले आये। यारअली को बाबर ने ग़ज़नी का हाकिम नियुक्त किया। थोड़े ही दिनों के बाद उसके मरने पर बेटे सैफअली को वहीं दर्जा मिला। वह भी जल्दी ही मर गया। अल्प वयस्क बैरम अपने घरवालों के साथ बल्ख चला गया। हुमायूँ से मित्रता बल्ख में वह कुछ दिनों तक पढ़ता-लिखता रहा। फिर वह समवयस्क शाहज़ादा हुमायूँ का नौकर और बाद में उसका मित्र हो गया। बैरम ख़ाँ को साहित्य और संगीत से भी बहुत प्रेम था। वह जल्दी ही अपने स्वामी का अत्यन्त प्रिय हो गया था। 16 वर्ष की आयु में ही एक लड़ाई में बैरम ख़ाँ ने बहुत वीरता दिखाई, उसकी ख्याति बाबर तक पहुँच गई, तब बाबर ने खुद उससे कहा: शाहज़ादा के साथ दरबार में हाजिर करो। बाबर के मरने के बाद वह हुमायूँ बादशाह की छाया के तौर पर रहने लगा। हुमायूँ ने चांपानेर (गुजरात) के क़िले पर घेरा डाला। किसी तरह से दाल ग़लती न देखकर चालीस मुग़ल बहादुर सीढ़ियों के साथ क़िले में उतर गए, जिनमें बैरम ख़ाँ भी था। क़िला फ़तह कर लिया गया। शेरशाह से चौसा में लड़ते वक़्त बैरम ख़ाँ भी साथ ही था। कन्नौज में भी वह लड़ा। इन सभी घटनाओं ने हुमायूँ और बैरम ख़ाँ को एक अटूट मित्रता में बाँध दिया था। जीवन दान कन्नौज की लड़ाई में पराजय के बाद मुग़ल सेना में जिसकी सींग जिधर समाई, वह उधर भागा। बैरम ख़ाँ अपने पुराने दोस्त सम्भल के मियाँ अब्दुल वहाब के पास पहुँचा। फिर लखनऊ के राजा मित्रसेन के पास जंगलों में दिन गुज़ारता रहा। शेरशाही हाकिम नसीर ख़ाँ को पता लगा। उसने बैरम ख़ाँ को पकड़ मंगवाया। नसीर ख़ाँ चाहता था कि बैरम ख़ाँ को कत्ल कर दें, पर दोस्तों की कोशिश से बैरम ख़ाँ किसी प्रकार से बच गया। अन्त में उसे शेरशाह के सामने हाजिर होना पड़ा, जिसने एक मामूली मुग़ल सरदार को महत्व न देकर उसे माफ कर दिया और जीवन दान दे दिया। कंधार के हाकिम का पद बैरम ख़ाँ फिर से गुजरात के सुल्तान महमूद के पास गया, पर उसे अपने स्वामी से मिलने की धुन थी। जब हिजरी 950 (1543-1544 ई.) में हुमायूँ ईरान से लौटकर काबुल लेते सिंध की ओर बढ़ा, तो बैरम ख़ाँ अपने आदमियों के साथ हुमायूँ की ओर से लड़ने लगा। हुमायूँ को इसकी ख़बर लगी तो उसकी खुशी का ठिकाना नहीं रहा। हिन्दुस्तान में सफलता मिलने वाली नहीं थी, इसलिए हुमायूँ ने ईरान का रास्ता किया। बैरम ख़ाँ भी उसके साथ था। शाही काफिले में कुल मिलाकर सत्तर आदमी से ज़्यादा नहीं थे। ईरान से लौटकर हुमायूँ ने कंधार को घेरा। उसने चाहा, भाई कामराँ को समझा-बुझाकर ख़ून-ख़राबा रोका जाए। उसे समझाने के लिए हुमायूँ ने बैरम ख़ाँ को काबुल भेजा, लेकिन वह कहाँ होने वाला था। कंधार पर अधिकार करके बैरम ख़ाँ को वहाँ का हाकिम नियुक्त किया गया। कंधार विजय के बारे में हुमायूँ ने स्वयं कहा- “रोज नौरोज बैरम’स्त इमरोज”। दिले अहबाब बेगम’स्त इमरोज। (आज नववर्ष दिन बैरम है। आज मित्रों के दिल बेफिकर हैं। ख़ानख़ाना की उपाधि जब हुमायूँ हिन्दुस्तान की ओर बढ़ते समय सतलुज नदी के किनारे माछीवाड़ा पहुँचा था, तब पता लगा दूसरी पार बेजवाड़ा में तीस हज़ार पठान डेरा डाले पड़े हैं। पठान लकड़ी जलाकर ताप रहे थे। रात को रौशनी ने लक्ष्य बतलाने में सहायता की। अपने एक हज़ार सवारों के साथ बैरम ख़ाँ उनके ऊपर टूट पड़ा। दुश्मन की संख्या का उनको पता नहीं था। तीरों की वर्षा से पठान घबरा गए। वे अपना सारा माल वहीं पर छोड़कर भाग गए। इसी विजय के उपलक्ष्य में हुमायूँ ने उसे ‘ख़ानख़ाना’ की उपाधि प्रदान की। तर्दीबेग बैरम ख़ाँ का प्रतिद्वन्द्वी था, लेकिन हेमू से हारकर भागने के समय बैरम ख़ाँ को मौक़ा मिल गया और उसने इस काँटे को निकाल बाहर किया। अकबर के गद्दी पर बैठने के दिन अबुल मसानी ने कुछ गड़बड़ी करनी चाही थी, लेकिन बैरम ख़ाँ ने जैसी ख़ूबसूरती से इस गुत्थी को सुलझाया, वह उसका ही काम था। हेमचन्द्र (हेमू) से पराजित होकर मुग़ल अमीर निराश हो चुके थे। वह काबुल लौट जाना चाहते थे, पर बैरम ख़ाँ ने उन्हें रोक दिया। साज़िश अकबर की दूधमाता माहम अनगा नित्य ही बैरम ख़ाँ के ख़िलाफ़ साज़िशें रचती रहती थी। मुग़ल दरबार में माहम अनगा का एक समूह था, जो हमेशा ही बैरम को नीचा दिखाने में लगा रहता था। हिजरी 961 (1553-1554 ई.) में इन लोगों ने चुगली लगाई कि बैरम ख़ाँ स्वतंत्र होना चाहता है, लेकिन बैरम ख़ाँ नमक-हराम नहीं था। हुमायूँ एक दिन जब स्वयं कंधार पहुँचा था, तब बैरम ख़ाँ ने बहुत चाहा कि बादशाह उसे अपने साथ ले चले, लेकिन कंधार भी एक बहुत महत्त्वपूर्ण स्थान था, जिसके लिए बैरम ख़ाँ से बढ़कर अच्छा शासक नहीं मिल सक .

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बैजू बावरा

बैजू बावरा (१५४२-१६१३) भारत के ध्रुपदगायक थे। उनको बैजनाथ प्रसाद और बैजनाथ मिश्र के नाम से भी जाना जाता है। वे ग्वालियर के राजा मानसिंह के दरबार के गायक थे और अकबर के दरबार के महान गायक तानसेन के समकालीन थे। उनके जीवन के बारे में बहुत सी किंवदन्तियाँ हैं जिनकी ऐतिहासिक रूप से पुष्टि नहीं की जा सकती है। .

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बैजू बावरा (1952 फ़िल्म)

बैजू बावरा हिन्दी भाषा की एक फ़िल्म है जो 1952 में प्रदर्शित हुई। यह प्रसिद्ध संगीतज्ञ बैजू बावरा के जीवन पर आधारित है हालांकि फ़िल्म की कहानी और बैजू बावरा पर प्रचलित दन्तकथाओं में काफ़ी असमानताएं हैं। फ़िल्म के निर्देशक हैं विजय भट्ट और मुख्य कलाकार हैं भारत भूषण और मीना कुमारी। फ़िल्म का काल सम्राट अकबर के समय का है और बैजू बावरा अपने पिता की मृत्यु का बदला संगीत सम्राट तानसेन से लेना चाहता है। तानसेन अकबर के दरबार के नव रत्नों में से एक था। .

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बेगा बेगम

बेगा बेगम (1511 – 17 जनवरी 1582).

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बीबी का मक़बरा

बीबी का मक़बरा एक निकट दृश्य बीबी के मक़बरे का निर्माण मुग़ल बादशाह औरंग़ज़ेब ने, अंतिम सत्रहवीं शताब्दी में करवाया था। यह उसकी बेगम, दिलरस बानो बेगम की याद में बनवाया गया था। दिलरस बानो बेगम को राबिया-उद-दौरानी के नाम से भी जाना जाता था। यह ताज महल की आकृति पर बनवाया गया था। यह औरंगाबाद, महाराष्ट्र में स्थित है। यह मक़बरा अकबर एवं शाहजहाँ के काल के शाही निर्माण से अंतिम मुग़लों के साधारण वास्तुकला के परिवर्तन को दर्शाता है। ताजमहल से तुलना के कारण ही यह उपेक्षा का कारण बना रहा। मुघल काल के दौरान यह वास्तु औरंगाबाद शहर का मध्य हुआ करता था। यह मुग़ल बादशाह औरंगज़ेब के निर्माण किये हुए वास्तु में सर्वोत्तम है। .

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बीकानेर

बीकानेर राजस्थान राज्य का एक शहर है। बीकानेर राज्य का पुराना नाम जांगल देश था। इसके उत्तर में कुरु और मद्र देश थे, इसलिए महाभारत में जांगल नाम कहीं अकेला और कहीं कुरु और मद्र देशों के साथ जुड़ा हुआ मिलता है। बीकानेर के राजा जंगल देश के स्वामी होने के कारण अब तक "जंगल धर बादशाह' कहलाते हैं। बीकानेर राज्य तथा जोधपुर का उत्तरी भाग जांगल देश था राव बीका द्वारा १४८५ में इस शहर की स्थापना की गई। ऐसा कहा जाता है कि नेरा नामक व्यक्ति गड़रिया था, जब राव बीका ने नेरा से एक शुभ जगह के बारे में पूछा तो उसने इस जगह के बारे में एक जवाब दिया उसने कहा की इस जगह पर मेरी एक भेड़ का मेमना ३ दिन तक भेड़ के साथ ७ सियारों के बीच एकला रहा और सियारों ने भेड़ और उसके बच्चे को कोई नुकसान नहीं पहुचायां और उसने इस बात के साथ एक शर्त रख दी की उसके नाम को नगर के नाम के साथ जोड़ा जाए। इसी कारण इसका नाम बीका+नेर, बीकानेर पड़ा। अक्षय तृतीया के यह दिन आज भी बीकानेर के लोग पतंग उड़ाकर स्मरण करते हैं। बीकानेर का इतिहास अन्य रियासतों की तरह राजाओं का इतिहास है। ने नवीन बीकानेर रेल नहर व अन्य आधारभूत व्यवस्थाओं से समृद्ध किया। बीकानेर की भुजिया मिठाई व जिप्सम तथा क्ले आज भी पूरे विश्व में अपनी विशिष्ट पहचान रखती हैं। यहां सभी धर्मों व जातियों के लोग शांति व सौहार्द्र के साथ रहते हैं यह यहां की दूसरी महत्वपूर्ण विशिष्टता है। यदि इतिहास की बात चल रही हो तो इटली के टैसीटोरी का नाम भी बीकानेर से बहुत प्रेम से जुड़ा हुआ है। बीकानेर शहर के ५ द्वार आज भी आंतरिक नगर की परंपरा से जीवित जुड़े हैं। कोटगेट, जस्सूसरगेट, नत्थूसरगेट, गोगागेट व शीतलागेट इनके नाम हैं। बीकानेर की भौगोलिक स्तिथि ७३ डिग्री पूर्वी अक्षांस २८.०१ उत्तरी देशंतार पर स्थित है। समुद्र तल से ऊंचाई सामान्य रूप से २४३मीटर अथवा ७९७ फीट है .

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बीकानेर की संस्कृति

कोई विवरण नहीं।

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भटनागर

महाराज चित्रगुप्त के परिवार में भटनागरों का स्थान भटनागर उत्तर भारत में प्रयुक्त होने वाला एक जातिनाम है, जो कि हिन्दुओं की कायस्थ जाति में आते है। इनका प्रादुर्भाव यमराज, मृत्यु के देवता, के पप पुण्य के अभिलेखक, श्री चित्रगुप्त जी की प्रथम पत्नी दक्षिणा नंदिनी के द्वितीय पुत्र विभानु के वंश से हुआ है। विभानु को चित्राक्ष नाम से भी जाना जाता है। महाराज चित्रगुप्त ने इन्हें भट्ट देश में मालवा क्षेत्र में भट नदी के पास भेजा था। इन्होंने वहां चित्तौर और चित्रकूट बसाये। ये वहीं बस गये और इनका वंश भटनागर कहलाया। .

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भरतपुरा

भरतपुरा गांव में प्रवेश करते ही दूर-दूर तक हरे-भरे खेत दिखाई देते है और उन्हीं के बीच एक ऊंचे टीले पर सरकारी सुरक्षा गार्डो से घिरी लाइब्रेरी की इमारत नजर आती है। लाइब्रेरीके साथ-साथ भरतपुरा का ऐतिहासिक महत्व है। लाइब्रेरी के संस्थापक गोपाल नारायण सिंह के पूर्वज राजा कान्हचन्द अपने वक्त के बहादुर और बुद्धिमान व्यक्ति थे।राजा गुलालचन्द राजा कांचन के दत्तक पुत्र थें। उनका परिवार महाराष्ट्र से चलकर बिहार में आकर बस गया था। यह मुगल बादशाह शाहजहां का वक्त था। बादशाह के यहां उनकी अच्छी प्रतिष्ठा थी। बाद में मुगल बादशाह फारूखशियर और शाह आलम ने फरमान के जरिए राजा गुलालचन्द को राजा साहब का खिताब दिया। उन्हीं के पुत्र राजा भरत सिंह ने रामपुर मोहकम में एक किला बनवाया जो कालान्तर में भरतपुरा गढ़ के नाम से प्रसिद्ध हुआ। पुस्तकालय की नींव 19वी सदी के उत्तरार्ध में राजा गुलाल नारायण सिंह ने रखी। बाद में 12 दिसंबर 1912 को उनके पुत्र बाबू गोपाल नारायण सिंह ने इसकी विधिवत स्थापना की। यह गुलामी के दिन थे। शिक्षा का घोर अभाव था। ऐसे समय में इस पुस्तकालय की स्थापना एक बड़ी घटना थी। पुस्तकालय का उदघाटन तत्कालीन जिलाधीश डब्लू.डी.आर.

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भानगढ़

भानगढ़ का गोपीनाथ मन्दिर भानगढ़, राजस्थान के अलवर जिले में सरिस्का राष्ट्रीय उद्यान के एक छोर पर है। यहाँ का किला बहुत प्रसिद्ध है जो 'भूतहा किला' माना जाता है। इस किले को आमेर के राजा भगवंत दास ने 1573 में बनवाया था। भगवंत दास के छोटे बेटे और मुगल शहंशाह अकबर के नवरत्नों में शामिल मानसिंह के भाई माधो सिंह ने बाद में इसे अपनी रिहाइश बना लिया। माधो सिंह के तीन बेटे थे— (१) सुजान सिंह (२) छत्र सिंह (३) तेज सिंह। माधो सिंह के बाद छत्र सिंह भानगढ़ का शासक हुआ। छत्र सिंह के बेटा अजब सिंह थे। यह भी शाही मनसबदार थे। अजब सिंह ने अपने नाम पर अजबगढ़ बसाये थे। अजब सिंह के बेटा काबिल सिंह और इनके बेटा जसवंत सिंह अजबगढ़ में रहे। अजब सिंह के बेटा हरी सिंह भानगढ़ में रहे (वि॰ सं॰ १७२२ माघ वदी भानगढ़ की गद्दी पर बैठे)। माधो सिंह के दो वंशज (हरी सिंह के बेटे) औरंग़ज़ेब के समय में मुसलमान हो गये थे। उन्हें भानगढ़ दे दिया गया था। मुगलों के कमज़ोर पड़ने पर महाराजा सवाई जय सिंह जी ने इन्हें मारकर भानगढ़ पर अपना अधिकार जमाया। .

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भारत में महिलाएँ

ताज परिसर में भारतीय महिलाएँऐश्वर्या राय बच्चन की अक्सर उनकी सुंदरता के लिए मीडिया द्वारा प्रशंसा की जाती है।"विश्व की सर्वाधिक सुंदर महिला?"cbsnews.com. अभिगमन तिथि २७ अक्टूबर २००७01 भारत में महिलाओं की स्थिति ने पिछली कुछ सदियों में कई बड़े बदलावों का सामना किया है। प्राचीन काल में पुरुषों के साथ बराबरी की स्थिति से लेकर मध्ययुगीन काल के निम्न स्तरीय जीवन और साथ ही कई सुधारकों द्वारा समान अधिकारों को बढ़ावा दिए जाने तक, भारत में महिलाओं का इतिहास काफी गतिशील रहा है। आधुनिक भारत में महिलाएं राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, लोक सभा अध्यक्ष, प्रतिपक्ष की नेता आदि जैसे शीर्ष पदों पर आसीन हुई हैं। .

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भारत में मापन प्रणालियों का इतिहास

समय-मापन की हिन्दू इकाइयाँ (लघुगणकीय पैमाने पर प्रदर्शित) भारत में मापन प्रणालियों का इतिहास बहुत पुराना है। सिन्धु घाटी की सभ्यता में प्राप्त कुछ सबसे प्राचीन मापक नमूने ५वीं सहराब्दी ईसापूर्व के हैं। संस्कृत कें 'शुल्ब' शब्द का अर्थ 'नापने की रस्सी' या डोरी होता है। अपने नाम के अनुसार शुल्ब सूत्रों में यज्ञ-वेदियों को नापना, उनके लिए स्थान का चुनना तथा उनके निर्माण आदि विषयों का विस्तृत वर्णन है। नीलकण्ठ सोमयाजि ने अपने ज'योतिर्मीमांसा' नामक ग्रन्थ में लिखा है कि ज्योतिष के ऐसे ग्रन्थ ही अनुसरण करना चाहिए जो वास्तविक प्रेक्षणों से मेल खाते हैं। .

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भारत में यूरोपीय आगमन

१५०१ से १७३९ के बीच भारत में यूरोपीय बस्तियाँ भारत के सामुद्रिक रास्तों की खोज 15वीं सदी के अन्त में हुई जिसके बाद यूरोपीयों का भारत आना आरंभ हुआ। यद्यपि यूरोपीय लोग भारत के अलावा भी बहुत स्थानों पर अपने उपनिवेश बनाने में सफल हुए पर इनमें से कइयों का मुख्य आकर्षण भारत ही था। सत्रहवीं शताब्दी के अंत तक यूरोपीय कई एशियाई स्थानों पर अपनी उपस्थिति दर्ज करा चुके थे और अठारहवीं सदी के उत्तरार्ध में वे कई जगहों पर अधिकार भी कर लिए थे। किन्तु उन्नासवीं सदी में जाकर ही अंग्रेजों का भारत पर एकाधिकार हो पाया था। भारत की समृद्धि को देखकर पश्चिमी देशों में भारत के साथ व्यापार करने की इच्छा पहले से थी। यूरोपीय नाविकों द्वारा सामुद्रिक मार्गों का पता लगाना इन्हीं लालसाओं का परिणाम था। तेरहवीं सदी के आसपास मुसलमानों का अधिपत्य भूमध्य सागर और उसके पूरब के क्षेत्रों पर हो गया था और इस कारण यूरोपी देशों को भारतीय माल की आपूर्ति ठप्प पड़ गई। उस पर भी इटली के वेनिस नगर में चुंगी देना उनको रास नहीं आता था। कोलंबस भारत का पता लगाने अमरीका पहुँच गया और सन् 1487-88 में पेडरा द कोविल्हम नाम का एक पुर्तगाली नाविक पहली बार भारत के तट पर मालाबार पहुँचा। भारत पहुचने वालों में पुर्तगाली सबसे पहले थे इसके बाद डच आए और डचों ने पुर्तगालियों से कई लड़ाईयाँ लड़ीं। भारत के अलावा श्रीलंका में भी डचों ने पुर्तगालियों को खडेड़ दिया। पर डचों का मुख्य आकर्षण भारत न होकर दक्षिण पूर्व एशिया के देश थे। अतः उन्हें अंग्रेजों ने पराजित किया जो मुख्यतः भारत से अधिकार करना चाहते थे। आरंभ में तो इन यूरोपीय देशों का मुख्य काम व्यापार ही था पर भारत की राजनैतिक स्थिति को देखकर उन्होंने यहाँ साम्राज्यवादी और औपनिवेशिक नीतियाँ अपनानी आरंभ की। .

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भारत का वीर पुत्र – महाराणा प्रताप

भारत का वीर पुत्र - महाराणा प्रताप एक सोनी टीवी पर प्रसारित होने वाला एक धारावाहिक है। यह २७ मई २०१३ से १० दिसम्बर २०१५ तक प्रसारित हो रहा था। इसे अभिमन्यु राज सिंह ने निर्देशित किया है। यह धारावाहिक १६वीं शताब्दी के मेवाड़ के राजपूत शासक, महाराणा प्रताप के जीवन पर आधारित एक भारतीय ऐतिहासिक नाटक है। यह ऐतिहासिक धारावाहिक १० दिसम्बर २०१५ को रात १० बजे अंतिम बार चला अर्थात अब यह पूरा हो चूका है इसके अंत में महाराणा प्रताप की बीमारी की वजह से मृत्यु हो जाती है। .

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भारत के राष्‍ट्रीय चिन्ह

Indian Signs .

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भारत के सम्राट

ऑर्डर ऑफ द स्टार ऑफ इंडिया का सितारा, जो ब्रिटिश साम्राज्यिक भारत के बिल्ले (चिह्न) के रूप में प्रयोग होता था। ”’भारत के सम्राट’”/”’साम्राज्ञी”, ”’ बादशाह-ए-हिं””, ”’ एम्परर/एम्प्रैस ऑफ इण्डिय”” वह उपाधि थी, जो कि अंतिम भारतीय मुगल शासक बहादुर_शाह_द्वितीय एवं भारत में ब्रिटिश राज के शासकों हेतु प्रयोग होती थी। कभी भारत के सम्राट उपाधि, भारतीय सम्राटों, जैसे मौर्य वंश के अशोक-महान। या मुगल_बादशाह अकबर-महान के लिये भी प्रयोग होती है। वैसे उन्होंने कभी भी यह उपाधियां अपने लिये नहीं घोषित कीं। .

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भारतवर्ष (टीवी सीरीज)

भारतवर्ष: महानायकों की गौरव कथा एक भारतीय टेलीविजन ऐतिहासिक वृत्तचित्र श्रृंखला (डॉक्यूमेन्टरी) है, हिंदी समाचार चैनल एबीपी न्यूज पर अभिनेता-निर्देशक अनुपम खेर द्वारा होस्ट किया गया। यह 20 अगस्त 2016 को शुरू हुआ। यह शो भारत के 5000 वर्षीय इतिहास में व्यक्तित्वों के विचारों और विचारों को प्रस्तुत करता है और प्राचीन भारत से 19वीं शताब्दी तक का सफर दर्शाता है। सीजन-1 23 अक्टूबर 2016 को समाप्त हुआ। कुछ अंतराल के बाद सीजन 2 शुरू होगा। .

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भारतीय चित्रकला

'''भीमवेटका''': पुरापाषाण काल की भारतीय गुफा चित्रकला भारत मैं चित्रकला का इतिहास बहुत पुराना रहा हैं। पाषाण काल में ही मानव ने गुफा चित्रण करना शुरु कर दिया था। होशंगाबाद और भीमबेटका क्षेत्रों में कंदराओं और गुफाओं में मानव चित्रण के प्रमाण मिले हैं। इन चित्रों में शिकार, शिकार करते मानव समूहों, स्त्रियों तथा पशु-पक्षियों आदि के चित्र मिले हैं। अजंता की गुफाओं में की गई चित्रकारी कई शताब्दियों में तैय्यार हुई थी, इसकी सबसे प्राचिन चित्रकारी ई.पू.

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भारतीय नाप एवं तौल

भारत में मापन का इतिहास बहुत पुराना है। वर्तमान में भारत में मापन की अन्तरराष्ट्रीय प्रणाली (SI) प्रचलित है। इसके पहले अंग्रेजों ने ब्रिटिश प्रणाली लागू की थी। उसके पूर्व अकबर के समय में एक अन्य प्रणाली लागू की गयी थी। किन्तु अकबर के पहले एक अन्य प्रणाली ही थी। .

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भारतीय संगीत का इतिहास

पाँच गन्धर्व (चौथी-पाँचवीं शताब्दी, भारत के उत्तर-पश्चिम भाग से प्राप्त) प्रगैतिहासिक काल से ही भारत में संगीत कीसमृद्ध परम्परा रही है। गिने-चुने देशों में ही संगीत की इतनी पुरानी एवं इतनी समृद्ध परम्परा पायी जाती है। माना जाता है कि संगीत का प्रारम्भ सिंधु घाटी की सभ्यता के काल में हुआ हालांकि इस दावे के एकमात्र साक्ष्य हैं उस समय की एक नृत्य बाला की मुद्रा में कांस्य मूर्ति और नृत्य, नाटक और संगीत के देवता रूद्र अथवा शिव की पूजा का प्रचलन। सिंधु घाटी की सभ्यता के पतन के पश्चात् वैदिक संगीत की अवस्था का प्रारम्भ हुआ जिसमें संगीत की शैली में भजनों और मंत्रों के उच्चारण से ईश्वर की पूजा और अर्चना की जाती थी। इसके अतिरिक्त दो भारतीय महाकाव्यों - रामायण और महाभारत की रचना में संगीत का मुख्य प्रभाव रहा। भारत में सांस्कृतिक काल से लेकर आधुनिक युग तक आते-आते संगीत की शैली और पद्धति में जबरदस्त परिवर्तन हुआ है। भारतीय संगीत के इतिहास के महान संगीतकारों जैसे कि स्वामी हरिदास, तानसेन, अमीर खुसरो आदि ने भारतीय संगीत की उन्नति में बहुत योगदान किया है जिसकी कीर्ति को पंडित रवि शंकर, भीमसेन गुरूराज जोशी, पंडित जसराज, प्रभा अत्रे, सुल्तान खान आदि जैसे संगीत प्रेमियों ने आज के युग में भी कायम रखा हुआ है। भारतीय संगीत में यह माना गया है कि संगीत के आदि प्रेरक शिव और सरस्वती है। इसका तात्पर्य यही जान पड़ता है कि मानव इतनी उच्च कला को बिना किसी दैवी प्रेरणा के, केवल अपने बल पर, विकसित नहीं कर सकता। .

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भारतीय व्यक्तित्व

यहाँ पर भारत के विभिन्न भागों एवं विभिन्न कालों में हुए प्रसिद्ध व्यक्तियों की सूची दी गयी है। .

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भारतीय आम

आम अत्यंत उपयोगी, दीर्घजीवी, सघन तथा विशाल वृक्ष है, जो भारत में दक्षिण में कन्याकुमारी से उत्तर में हिमालय की तराई तक (3,000 फुट की ऊँचाई तक) तथा पश्चिम में पंजाब से पूर्व में आसाम तक, अधिकता से होता है। अनुकूल जलवायु मिलने पर इसका वृक्ष 50-60 फुट की ऊँचाई तक पहुँच जाता है। वनस्पति वैज्ञानिक वर्गीकरण के अनुसार आम ऐनाकार्डियेसी कुल का वृक्ष है। आम के कुछ वृक्ष बहुत ही बड़े होते हैं। .

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भारतीय इतिहास तिथिक्रम

भारत के इतिहास की महत्वपूर्ण घटनाएं तिथिक्रम में।;भारत के इतिहास के कुछ कालखण्ड.

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भारमल

भारमल (शासन: 1 जून 1548 - 27 जनवरी 1574) राजा पृथ्वीराज कछवाहा के पुत्र थे। इतिहासकार 'टॉड' ने इन्हें 'बिहारीमल' लिखा है। ये आमेर के शासक थे। अकबर की अधीनता स्वीकार करनेवाले राजपूत राजाओं में ये सर्वप्रथम थे। इन्होंने हाजी खाँ विद्रोही के विरुद्ध मजनूँ खाँ की सहायता की थी, इसलिये मजनूँ खाँ ने मुगल सम्राट् अकबर से इन्हें दरबार में बुलवाने की प्रार्थना की। पहली भेंट में ही इनका बादशाह पर अच्छा प्रभाव पड़ा और इन्हें अकबर की सेवा का अवसर मिला। बाद में इनका भाई रूपसी भी मुगल सम्राट् की सेवा में उपस्थित हुआ। इन्होंने अपनी पुत्री का विवाह सम्राट् अकबर से कर दिया। इनके पुत्र भगवान्‌दास और पौत्र राजा मानसिंह भी बाद में अकबर के दरबार में पहुँच गए। सन्‌ 1569 के लगभग भारमल की मृत्यु हुई। .

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भक्ति आन्दोलन

भक्ति आन्दोलन मध्‍यकालीन भारत का सांस्‍कृतिक इतिहास में एक महत्‍वपूर्ण पड़ाव था। इस काल में सामाजिक-धार्मिक सुधारकों की धारा द्वारा समाज विभिन्न तरह से भगवान की भक्ति का प्रचार-प्रसार किया गया। यह एक मौन क्रान्ति थी। यह अभियान हिन्‍दुओं, मुस्लिमों और सिक्‍खों द्वारा भारतीय उप महाद्वीप में भगवान की पूजा के साथ जुड़े रीति रिवाजों के लिए उत्तरदायी था। उदाहरण के लिए, हिन्‍दू मंदिरों में कीर्तन, दरगाह में कव्‍वाली (मुस्लिमों द्वारा) और गुरुद्वारे में गुरबानी का गायन, ये सभी मध्‍यकालीन इतिहास में (800 - 1700) भारतीय भक्ति आंदोलन से उत्‍पन्‍न हुए हैं। .

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भूचर मोरी की लड़ाई

नवानगर रियासत के राजकीय कवी, मावदनजी भीमजी रतनु द्वारा रचित, यदुवंशप्रकाश में अंकित भूचर मोरी की लड़ाई का चित्र भूचर मोरी की लड़ाई, जिसे ध्रोल युद्ध भी कहा जाता है, जुलाई १५९१(विक्रम संवत १६४८) में, मुगल साम्राज्य की सेना, और नवानगर रियासत के नेतृत्व में, काठियावाड़ी राज्यों की संयुक्त सेना के बीच लगा गया एक युद्ध था। यह लड़ाई ध्रोल राज्य में भूचर मोरी नामक स्थान पर लड़ी गई थी। इसमें नवानगर और काठियावाड़ी सेना की हार हुई थी और मुग़ल सेना की निर्णायक जीत हुई थी, जसके कारणवश, काठियावाड़, मुग़ल साम्राज्य के अधीन आ गया था। .

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मझौली राज

मझौली राज, उत्तर प्रदेश के देवरिया जिला में स्थित एक कस्बा एवं जिला पंचायत है। यह बिहार सीमा से सटा हुआ है। इसका इतिहास बहुत प्राचीन है। यह बिसेन राजपूतों के लिए प्रसिद्ध है। बिसेन राजपूतों का इतिहास सोलह महाजनपदों तक जाता है। बिसेन राजपूतों का उद्भव सूर्यवंशी राजकुमारी सूर्यप्रभा तथा राजा विरसेन से हुआ। मझौली के भग्नावशेष इसके गौरवपूर्ण इतिहास के साक्षी हैं। इसके आसपास अनेक पवित्र स्थान हैं जैसे भागदा मन्दिर आदि। यहाँ छठ पूजा बड़े धूमधाम से मनायी जाती है। बाबा दीर्घेश्वर नाथ का प्रसिद्ध मन्दिर पास में ही है। कहा जाता है कि इसकी स्थापना अश्वत्थामा ने की थी। यहाँ के राजपरिवार मल्ल-विशेन को मुगल शासक अकबर ने 'शाही' की उपाधि प्रदान की थी। वर्तमान में मझौली राज के अतिरिक्त सुकेत (हिमाचल प्रदेश), उन्नाव, गोंडा, कालाकांकर, प्रतापगढ़, मऊ में लाखों की संख्या में विशेन है। श्रेणी:उत्तर प्रदेश के ऐतिहासिक स्थल.

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मधुकरसाह बुन्देला

राजा मधुकरसाह बुंदेला के पिता प्रतापरुद्र या रुद्रप्रताप ने ओड़छा नगर की नींव डाली। मधुकरसाह ने सत्तारूढ़ होकर आस-पास की छोटी छोटी बस्तियों को अपने अधिकार में कर लिया। स्वाभिमान के कारण इसने मुगल सम्राट् अकबर के विरुद्ध विद्रोह कर दिया। अकबर ने इसके विरुद्ध सादिक खॉ हर्वी और राजा आसकरण को भेजा। युद्ध में परास्त होकर मधुकर ने आत्मसमर्पण कर दिया। जब मालवा का सेनाध्यक्ष शहाबुद्दीन अहमद खाँ मिर्जा कोका के साथ दक्षिण की चढ़ाई पर नियुक्त हुआ, तो इसे भी साथ भेजा गया, किंतु इसने अजीज कोका का साथ नहीं दिया। इसपर शहाबुद्दीन अहमद खाँ ने इसे दंड देना निश्चित किया। बाद में यह पुन: राजा आसकरन की मध्यस्थता से राजी हुआ। लेकिन सेना के पास पहुँचते ही जैसे इसमें फिर से उन्माद आया और यह भाग खड़ा हुआ। इसकी सारी संपत्ति लूट ली गई। किसी प्रकार फिर दरबार में आया और राजकुमार की सेवा में नियुक्त हुआ। 1592 में इसकी मृत्यु हो गई। श्रेणी:भारत के राजा.

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मध्यकालीन भारत

मध्ययुगीन भारत, "प्राचीन भारत" और "आधुनिक भारत" के बीच भारतीय उपमहाद्वीप के इतिहास की लंबी अवधि को दर्शाता है। अवधि की परिभाषाओं में व्यापक रूप से भिन्नता है, और आंशिक रूप से इस कारण से, कई इतिहासकार अब इस शब्द को प्रयोग करने से बचते है। अधिकतर प्रयोग होने वाले पहली परिभाषा में यूरोपीय मध्य युग कि तरह इस काल को छठी शताब्दी से लेकर सोलहवीं शताब्दी तक माना जाता है। इसे दो अवधियों में विभाजित किया जा सकता है: 'प्रारंभिक मध्ययुगीन काल' 6वीं से लेकर 13वीं शताब्दी तक और 'गत मध्यकालीन काल' जो 13वीं से 16वीं शताब्दी तक चली, और 1526 में मुगल साम्राज्य की शुरुआत के साथ समाप्त हो गई। 16वीं शताब्दी से 18वीं शताब्दी तक चले मुगल काल को अक्सर "प्रारंभिक आधुनिक काल" के रूप में जाना जाता है, लेकिन कभी-कभी इसे "गत मध्ययुगीन" काल में भी शामिल कर लिया जाता है। एक वैकल्पिक परिभाषा में, जिसे हाल के लेखकों के प्रयोग में देखा जा सकता है, मध्यकालीन काल की शुरुआत को आगे बढ़ा कर 10वीं या 12वीं सदी बताया जाता है। और इस काल के अंत को 18वीं शताब्दी तक धकेल दिया गया है, अत: इस अवधि को प्रभावी रूप से मुस्लिम वर्चस्व (उत्तर भारत) से ब्रिटिश भारत की शुरुआत के बीच का माना जा सकता है। अत: 8वीं शताब्दी से 11वीं शताब्दी के अवधि को "प्रारंभिक मध्ययुगीन काल" कहा जायेगा। .

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मधेपुरा जिला

मधेपुरा भारत के बिहार राज्य का जिला है। इसका मुख्यालय मधेपुरा शहर है। सहरसा जिले के एक अनुमंडल के रूप में रहने के उपरांत ९ मई १९८१ को उदाकिशुनगंज अनुमंडल को मिलाकर इसे जिला का दर्जा दे दिया गया। यह जिला उत्तर में अररिया और सुपौल, दक्षिण में खगड़िया और भागलपुर जिला, पूर्व में पूर्णिया तथा पश्चिम में सहरसा जिले से घिरा हुआ है। वर्तमान में इसके दो अनुमंडल तथा ११ प्रखंड हैं। मधेपुरा धार्मिक एवं ऐतिहासिक दृष्टि से समृद्ध जिला है। चंडी स्थान, सिंघेश्‍वर स्थान, श्रीनगर, रामनगर, बसन्तपुर, बिराटपुर और बाबा करु खिरहर आदि यहां के प्रमुख दर्शनीय स्थलों में से हैं। .

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मरियम उज़-ज़मानी

मरियम उज़-ज़मानी बेगम साहिबा (नस्तालीक़:; जन्म 1 अक्टूबर 1542, दीगर नाम: रुकमावती साहिबा,राजकुमारी हिराकुँवारी और हरखाबाई) एक राजपूत शहज़ादी थीं जो मुग़ल बादशाह जलाल उद्दीन मुहम्मद अकबर से शादी के बाद मलिका हिन्दुस्तान बनीं। वे जयपुर की राजपूत आमेर रियासत के राजा भारमल की सब से बड़ी बेटी थीं। उनके गर्भ से सल्तनत के वलीअहद और अगले बादशाह नूरुद्दीन जहाँगीर पैदा हुए। .

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महाराणा प्रताप

महाराणा प्रताप सिंह (ज्येष्ठ शुक्ल तृतीया रविवार विक्रम संवत १५९७ तदानुसार ९ मई १५४०–१९ जनवरी १५९७) उदयपुर, मेवाड में सिसोदिया राजवंश के राजा थे। उनका नाम इतिहास में वीरता और दृढ प्रण के लिये अमर है। उन्होंने कई सालों तक मुगल सम्राट अकबर के साथ संघर्ष किया। महाराणा प्रताप सिंह ने मुगलों को कईं बार युद्ध में भी हराया। उनका जन्म राजस्थान के कुम्भलगढ़ में महाराणा उदयसिंह एवं माता राणी जयवंत कँवर के घर हुआ था। १५७६ के हल्दीघाटी युद्ध में २०,००० राजपूतों को साथ लेकर राणा प्रताप ने मुगल सरदार राजा मानसिंह के ८०,००० की सेना का सामना किया। शत्रु सेना से घिर चुके महाराणा प्रताप को झाला मानसिंह ने आपने प्राण दे कर बचाया ओर महाराणा को युद्ध भूमि छोड़ने के लिए बोला। शक्ति सिंह ने आपना अश्व दे कर महाराणा को बचाया। प्रिय अश्व चेतक की भी मृत्यु हुई। यह युद्ध तो केवल एक दिन चला परन्तु इसमें १७,००० लोग मारे गए। मेवाड़ को जीतने के लिये अकबर ने सभी प्रयास किये। महाराणा की हालत दिन-प्रतिदिन चिंताजनक होती चली गई । २५,००० राजपूतों को १२ साल तक चले उतना अनुदान देकर भामा शाह भी अमर हुआ। .

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मानसेहरा ज़िला

मानसेहरा (उर्दू:, पश्तो:, अंग्रेज़ी: Mansehra) पाकिस्तान के ख़ैबर-पख़्तूनख़्वा प्रांत का एक ज़िला है। इसके उत्तर में शांगला, बट्टग्राम, कोहिस्तान ज़िले, दक्षिण में ऐब्टाबाद​ और हरिपुर ज़िले, पश्चिम में बुनेर ज़िला और पूर्व में जम्मू और कश्मीर पड़ते हैं। यह एक रमणीय पहाड़ी इलाक़ा है और इस ज़िले की काग़ान वादी पर्यटन के लिए लोकप्रीय है। चीन और पाकिस्तान के दरम्यान चलने वाला काराकोरम राजमार्ग भी इस ज़िले से गुज़रता है। .

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माघ मेला

माघ मेला हिन्दुओं का सर्वाधिक प्रिय धार्मिक एवं सांस्कृतिक मेला है। हिन्दू पंचांग के अनुसार १४ या १५ जनवरी को मकर संक्रांति के दिन माघ महीने में यह मेला आयोजित होता है। यह भारत के सभी प्रमुख तीर्थ स्थलों में मनाया जाता है। नदी या सागर स्नान इसका मुख्य उद्देश्य होता है। धार्मिक गतिविधियों, सांस्कृतिक कार्यक्रमों तथा पारंपरिक हस्त शिल्प, भोजन और दैनिक उपयोग की पारंपरिक वस्तुओं की बिक्री भी की जाती है। धार्मिक महत्त्व के अलावा यह मेला एक विकास मेला भी है तथा इसमें राज्य सरकार विभिन्न विभागों के विकास योजनाओं को प्रदर्शित करती है। प्रयाग, उत्तरकाशी, हरिद्वार इत्यादि स्थलों का माघ मेला प्रसिद्ध है। कहते हैं, माघ के धार्मिक अनुष्ठान के फलस्वरूप प्रतिष्ठानपुरी के नरेश पुरुरवा को अपनी कुरूपता से मुक्ति मिली थी। वहीं भृगु ऋषि के सुझाव पर व्याघ्रमुख वाले विद्याधर और गौतम ऋषि द्वारा अभिशप्त इंद्र को भी माघ स्नान के महाम्त्य से ही श्राप से मुक्ति मिली थी। पद्म पुराण के महात्म्य के अनुसार-माघ स्नान से मनुष्य के शरीर में स्थित उपाताप जलकर भस्म हो जाते हैं। इस प्रकार माघमेले का धार्मिक महत्त्व भी है। .

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मिर्ज़ा मोहम्मद हाकीम

मिर्ज़ा मोहम्मद हाकीम (उर्दू:مرزا محمد حکیم/अंग्रेजी:Mirza Mohammad Hakim) (जन्मकाल 09 अप्रैल 1553 - 10 अक्टूबर 1585), कभी कभी मिर्ज़ा हकीम, लघु रूप में भी जाने जाते थे, मिर्ज़ा मुगल सम्राट हुमायूं के दूसरे पुत्र थे।इन्होंने अफगानिस्तान में काबुल पर शासन किया था, और अक्सर उनके बड़े भाई सम्राट अकबर के साथ ही रहते थे ' मिर्ज़ा हाकीम ने सम्राट अकबर का काफी साथ दिया था ' ये माह चुचक बेगम का बेटे थे ' .

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मंसबदारी

फ़ारसी में 'मंसबदार' का अर्थ है मंसब (पद या श्रेणी) रखनेवाला। मुगल साम्राज्य में मंसब से तात्पर्य उस पदस्थिति से था जो बादशाह अपने पदाधिकारियों को प्रदान करता था। मंसब दो प्रकार के होते थे, 'जात' और 'सवार'। मंसब की प्रथा का आरंभ सर्वप्रथम अकबर ने सन् 1575 में किया। 'जात' से तात्पर्य मंसबदार की उस स्थिति से था जो उसे प्रशासकीय पदश्रेणी में प्राप्त थी। उसका वेतन भी उसी अनुपात में उन वेतन सूचियों के आधार पर जो कि उस समय लागू थीं निर्धारित होता था। सवार श्रेणी से अभिप्राय था कि कितना सैनिक दल एक मंसबदार को बनाए रखना है; और इसके लिये उसे कितना वेतन मिलेगा। इसका निर्धारण प्रचलित वेतनक्रम को सवारों की संख्या से गुणा करके होता था। कहा जाता है, मंसब प्रथा की उत्पत्ति प्रारंभिक तुर्की और मंगोल सेना के 'दशमलवात्मक' संगठन में देखी जा सकती है और इसी को आधार मानकर अकबर न केवल वर्तमान सैनिक श्रेणी को 'जात' श्रेणी में परिवर्तित किया और एक नई 'सवार' श्रेणी को जन्म देकर उस उद्देश्य को पूरा किया जो कि प्राचीन श्रेणी करती थी। लेकिन इस बात का कोई प्रमाण नहीं है कि 1575 से पूर्व भी मंसब दिए जाते थे। इससे यही प्रतीत होता है कि 'जात' तथा 'सवार' श्रेणियों का आरम्भ एक साथ ही उसी वर्ष किया गया। अकबर के समय में सवार श्रेणी प्राय: या तो जात श्रेणी के बराबर अथवा कम ही होती थी। जहाँगीर ने मंसबदारी पद्धति में एक महत्वपूर्ण प्रयोग किया अर्थात् दो अश्व और तीन अश्व श्रेणी का प्रारंभ। दो अश्व व तीन अश्व श्रेणी को सवार श्रेणी का ही भाग माना जाता था। दो अश्व तीन अश्व श्रेणी प्राप्त करनेवाले का वेतन तथा सैनिक जिम्मेदारियाँ दोनो ही दोहरे हो जाते थे। 'जात' श्रेणी पर वेतन प्रत्येक श्रेणी के लिये अलग-अलग निर्धारित था। वेतन में वृद्धि श्रेणी में वृद्धि होने के समानुपात में नहीं हाती थी। पाँच हजार से नीचे की जात श्रेणी पर वेतन तीन वर्गो में अलग अलग निर्धारित था- प्रथम, जब सवार श्रेणी जात श्रेणी के बराबर हो; द्वितीय, जब 'सवार' श्रेणी 'जात' श्रेणी से कम तो हो परंतु आधे से कम न हो; तृतीय जब आधे से भी कम हो। प्रथम वर्गवालों का वेतन द्वितीय वर्ग से, तथा द्वितीय वर्गवालों का वेतन तृतीय वर्ग से अधिक होता था। सवार श्रेणी पर वेतन श्रेणियों के अनुसार अलग अलग निश्चित नहीं था; लेकिन प्रति इकाई पर वेतन की दर स्थायी रूप से बताई गई है। शाहजहाँ से लेकर बाद तक 'सवार' श्रेणी के प्रति इकाई की वेतन की दर आठ हजार दाम थी। सवार श्रेणी का वेतन इस योग (8 हजार दाम) को सवार संख्या से गुणा करके निकाला जा सकता है। मंसबदार को वेतन या तो नकद अथवा जागीर के रूप में दिया जाता था। शाहजहाँ के राज्यकाल में 'मासिक अनुपात' व्यवस्था का जन्म हुआ। यह व्यवस्था नकद वेतनों पर भी लागू की गई। इसके परिणामस्वरूप मंसबदारों के वेतन, सुविधाओं तथा कर्तव्यों में कमी आ गई। 'निश्चित वेतन' में बहुत सी कटौतियाँ होती थीं। सबसे अधिक कटौती दक्खिनी मंसबदारों के वेतनों में की जाती थी और यह दामों में एक चौथाई की कमी होती थी। विशेष रूप से न माफ होने पर निम्नलिखित कटौतियाँ सभी मंसबदारों पर लागू की जाती थीं- पशुओं के लिये चारा, रसद के लिये माँग तथा रूपए में दो दाम। मंसब के साथ-साथ अकबर ने 1575 में दागने की प्रथा का प्रारंभ किया। इसका उद्देश्य प्रतयेक मंसबदार को उतने घोड़े तथा घुड़सवार वास्तविक रूप में बनाए रखने के लिये मजबूर करना था, जितने उससे राजकीय सेवा के लिये अपेक्षित थे। फलस्वरूप सैनिक जिम्मेदारियों से बचाव को रोकने के लिये अकबर ने घोड़ों को दागने तथा व्यक्तियों के लिये 'चेहरा' की प्रथा को अपनाया। अबुलफ़ज्ल के विवरण से पता चलता है कि अकबर के समय में मंसबदार से उम्मीद की जाती थी कि वह उतने सैनिक प्रस्तुत करेगा जितनी कि उसकी 'सवार' श्रेणी हो। ऐसा न करने पर उसे दंडित किया जाता था। विचारणीय बात रह जाती है कि मंसबदार से उसकी 'सवार' श्रेणी के अनुरूप जो संख्या प्रत्याशित होती थी वह घोड़ों की थी अथवा सैनिकों की ? शाहजहाँ के समय में 'तृतीयांश' नियम के अंतर्गत, 100 सवार श्रेणी वाले मंसबदार को 33 सवार और 66 घोड़े रखने पड़ते थे। इससे यही प्रतीत होता है कि अकबर के समय में 100 'सवार' श्रेणी के लिये 50 सवार और 100 घोड़ों से अधिक नहीं माँगे जाते होंगे। शाहजहाँ ने नए सिरे से मंसबदारी पद्धति को संगठित किया। जो मंसबदार उन प्रदेशों में ही नियुक्त थे जहाँ उनको जागीरें प्राप्त थीं, उनसे यह उम्मीद की जाती थी कि वे अपनी 'सवार' श्रेणी के एक तिहाई सवार प्रस्तुत करेंगे; ऐसे प्रदेशों में नियुक्त होने पर जहाँ उनकी जागीरें नहीं थीं केवल एक चौथाई; और बल्ख या बदकशाँ में नियुक्त होने पर पंचमांश। जिन मंसबदारों को वेतन नकद मिलता था उनपर भी पांचवें हिस्से का नियम लागू होता था। पंचमांश नियम के अंतर्गत वार्षिक व्यवस्था में 5000 'सवार' श्रेणी पर 1000 सवार तथा 2200 घोड़े रहेंगे। सिद्धांतरूप में समस्त मंसबदारों की नियुक्ति बादशाह द्वारा होती थी। प्राय: मुगलों की सैनिक भर्ती जाति अथवा वंश के आधार पर ही की जाती थी, योग्यता के लिये कोई विशेष स्थान नहीं था। उच्चवंशीय न होने पर व्यक्ति के राजकीय सेवा में प्रवेश के अवसर सीमित थे। श्रेणी:मुगल शासन.

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मुल्लाह दो पिअज़ा

मुल्लाह दो पिअज़ा अकबर के सलाहकार थे। श्रेणी:अकबर के नवरत्न.

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मुहम्मद शाह (मुगल)

मुहम्मद शाह ((1748 – १७०२) जिन्हें रोशन अख्तर भी कहते थे, मुगल सम्राट था। इनका शासन काल १७१९-१७४८ रहा। Available on Project Gutenberg. मुहम्मद शह की मृत्यु १७४८ में ४६ वर्ष की आयु में हुई थी। .

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मुगल रामायण

मुगल बादशाह अकबर द्वारा रामायण का फारसी अनुवाद करवाया था। उसके बाद हमीदाबानू बेगम, रहीम और जहाँगीर ने भी अपने लिये रामायण का अनुवाद करवाया था। .

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मुग़ल शासकों की सूची

मुग़ल सम्राटों की सूची कुछ इस प्रकार है।.

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मुग़ल साम्राज्य

मुग़ल साम्राज्य (फ़ारसी:, मुग़ल सलतनत-ए-हिंद; तुर्की: बाबर इम्परातोरलुग़ु), एक इस्लामी तुर्की-मंगोल साम्राज्य था जो 1526 में शुरू हुआ, जिसने 17 वीं शताब्दी के आखिर में और 18 वीं शताब्दी की शुरुआत तक भारतीय उपमहाद्वीप में शासन किया और 19 वीं शताब्दी के मध्य में समाप्त हुआ। मुग़ल सम्राट तुर्क-मंगोल पीढ़ी के तैमूरवंशी थे और इन्होंने अति परिष्कृत मिश्रित हिन्द-फारसी संस्कृति को विकसित किया। 1700 के आसपास, अपनी शक्ति की ऊँचाई पर, इसने भारतीय उपमहाद्वीप के अधिकांश भाग को नियंत्रित किया - इसका विस्तार पूर्व में वर्तमान बंगलादेश से पश्चिम में बलूचिस्तान तक और उत्तर में कश्मीर से दक्षिण में कावेरी घाटी तक था। उस समय 40 लाख किमी² (15 लाख मील²) के क्षेत्र पर फैले इस साम्राज्य की जनसंख्या का अनुमान 11 और 13 करोड़ के बीच लगाया गया था। 1725 के बाद इसकी शक्ति में तेज़ी से गिरावट आई। उत्तराधिकार के कलह, कृषि संकट की वजह से स्थानीय विद्रोह, धार्मिक असहिष्णुता का उत्कर्ष और ब्रिटिश उपनिवेशवाद से कमजोर हुए साम्राज्य का अंतिम सम्राट बहादुर ज़फ़र शाह था, जिसका शासन दिल्ली शहर तक सीमित रह गया था। अंग्रेजों ने उसे कैद में रखा और 1857 के भारतीय विद्रोह के बाद ब्रिटिश द्वारा म्यानमार निर्वासित कर दिया। 1556 में, जलालुद्दीन मोहम्मद अकबर, जो महान अकबर के नाम से प्रसिद्ध हुआ, के पदग्रहण के साथ इस साम्राज्य का उत्कृष्ट काल शुरू हुआ और सम्राट औरंगज़ेब के निधन के साथ समाप्त हुआ, हालाँकि यह साम्राज्य और 150 साल तक चला। इस समय के दौरान, विभिन्न क्षेत्रों को जोड़ने में एक उच्च केंद्रीकृत प्रशासन निर्मित किया गया था। मुग़लों के सभी महत्वपूर्ण स्मारक, उनके ज्यादातर दृश्य विरासत, इस अवधि के हैं। .

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मुग़ल वास्तुकला

मुगल वास्तुकला, जो कि भारतीय, इस्लामी एवं फारसी वास्तुकला का मिश्रण है, एक विशेष शैली, जो कि मुगल भारत में 16वीं 17वीं एवं 18वीं सदी में लाए|मुगल वास्तुकला का चरम ताजमहल है। .

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मुंदोता दुर्ग और महल

मुंदोता दुर्ग और महल लगभग १५५० में बनाया गया एक दुर्ग तथा महल है। यह दुर्ग राजपूती वास्तुकला तथा मुग़ल वास्तुकला में निर्मित है यह जयपुर के मुंदोता कस्बे में स्थित है। मुंदोता पर नथावत वंश के कच्छहवा राजवंश के शासकों ने शासन किया था। Mandawa, Devi Singh.

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मौर्य राजवंश

मौर्य राजवंश (३२२-१८५ ईसापूर्व) प्राचीन भारत का एक शक्तिशाली एवं महान राजवंश था। इसने १३७ वर्ष भारत में राज्य किया। इसकी स्थापना का श्रेय चन्द्रगुप्त मौर्य और उसके मन्त्री कौटिल्य को दिया जाता है, जिन्होंने नन्द वंश के सम्राट घनानन्द को पराजित किया। मौर्य साम्राज्य के विस्तार एवं उसे शक्तिशाली बनाने का श्रेय सम्राट अशोक को जाता है। यह साम्राज्य पूर्व में मगध राज्य में गंगा नदी के मैदानों (आज का बिहार एवं बंगाल) से शुरु हुआ। इसकी राजधानी पाटलिपुत्र (आज के पटना शहर के पास) थी। चन्द्रगुप्त मौर्य ने ३२२ ईसा पूर्व में इस साम्राज्य की स्थापना की और तेजी से पश्चिम की तरफ़ अपना साम्राज्य का विकास किया। उसने कई छोटे छोटे क्षेत्रीय राज्यों के आपसी मतभेदों का फायदा उठाया जो सिकन्दर के आक्रमण के बाद पैदा हो गये थे। ३१६ ईसा पूर्व तक मौर्य वंश ने पूरे उत्तरी पश्चिमी भारत पर अधिकार कर लिया था। चक्रवर्ती सम्राट अशोक के राज्य में मौर्य वंश का बेहद विस्तार हुआ। सम्राट अशोक के कारण ही मौर्य साम्राज्य सबसे महान एवं शक्तिशाली बनकर विश्वभर में प्रसिद्ध हुआ। .

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मेड़ता

मेड़ता नगर राजस्थान राज्य के मध्यवर्ती नगर जोधपुर से 100 मील दूर है। लगभग 1480 में स्थापित यह शहर एक समय में महत्त्वपूर्ण व्यापार का केन्द्र था। मेड़ता प्रसिद्ध कृष्ण भक्त-कवयित्री मीरांबाई का जन्म स्थान माना जाता है। यहाँ राजपूत काल का एक क़िला है। 1562 ई. में इस दुर्ग को अकबर ने जीता था। नन्दलाल डे के अनुसार इसका प्राचीन भाग मार्तिकावत है। इसके आस-पास के क्षेत्रों में कई युद्ध हुए थे, जिनमें 1790 ई. में जयपुर और जोधपुर राज्यों की सेनाओं पर मराठों की विजय शामिल है। यहाँ पर कई स्मारक प्रस्तर स्तम्भ स्थित हैं। यहाँ अकबर द्वारा निर्मित एक मस्जिद भी स्थित है। श्रेणी:राजस्थान के शहर.

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मेरठ

मेरठ भारत के उत्तर प्रदेश राज्य का एक शहर है। यहाँ नगर निगम कार्यरत है। यह प्राचीन नगर दिल्ली से ७२ कि॰मी॰ (४४ मील) उत्तर पूर्व में स्थित है। मेरठ राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (ऍन.सी.आर) का हिस्सा है। यहाँ भारतीय सेना की एक छावनी भी है। यह उत्तर प्रदेश के सबसे तेजी से विकसित और शिक्षित होते जिलों में से एक है। मेरठ जिले में 12 ब्लॉक,34 जिला पंचायत सदस्य,80 नगर निगम पार्षद है। मेरठ जिले में 4 लोक सभा क्षेत्र सम्मिलित हैं, सरधना विधानसभा, मुजफ्फरनगर लोकसभा में हस्तिनापुर विधानसभा, बिजनौर लोकसभा में,सिवाल खास बागपत लोकसभा क्षेत्र में और मेरठ कैंट,मेरठ दक्षिण,मेरठ शहर,किठौर मेरठ लोकसभा क्षेत्र में है .

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मेवाड़

राजस्थान के अन्तर्गत मेवाड़ की स्थिति मेवाड़ राजस्थान के दक्षिण-मध्य में एक रियासत थी। इसे 'उदयपुर राज्य' के नाम से भी जाना जाता था। इसमें आधुनिक भारत के उदयपुर, भीलवाड़ा, राजसमंद, तथा चित्तौडगढ़ जिले थे। सैकड़ों सालों तक यहाँ रापपूतों का शासन रहा और इस पर गहलौत तथा सिसोदिया राजाओं ने १२०० साल तक राज किया। बाद में यह अंग्रेज़ों द्वारा शासित राज बना। १५५० के आसपास मेवाड़ की राजधानी थी चित्तौड़। राणा प्रताप सिंह यहीं का राजा था। अकबर की भारत विजय में केवल मेवाड़ का राणा प्रताप बाधक बना रहा। अकबर ने सन् 1576 से 1586 तक पूरी शक्ति के साथ मेवाड़ पर कई आक्रमण किए, पर उसका राणा प्रताप को अधीन करने का मनोरथ सिद्ध नहीं हुआ स्वयं अकबर, प्रताप की देश-भक्ति और दिलेरी से इतना प्रभावित हुआ कि प्रताप के मरने पर उसकी आँखों में आंसू भर आये। उसने स्वीकार किया कि विजय निश्चय ही राणा की हुई। यह एक ऐतिहासिक सत्य है कि देश के स्वतंत्रता संग्राम में प्रताप जैसे महान देशप्रेमियों के जीवन से ही प्रेरणा प्राप्त कर अनेक देशभक्त हँसते-हँसते बलिवेदी पर चढ़ गए। महाराणा प्रताप की मृत्यु पर उसके उत्तराधिकारी अमर सिंह ने मुगल सम्राट जहांगीर से संधि कर ली। उसने अपने पाटवी पुत्र को मुगल दरबार में भेजना स्वीकार कर लिया। इस प्रकार १०० वर्ष बाद मेवाड़ की स्वतंत्रता का भी अन्त हुआ। .

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मीरा (1979 फ़िल्म)

मीरा (अंग्रेजी: Meera)1979 में प्रेमजी निर्मित गुलज़ार निर्देशित हिन्दी भाषा की फिल्म है। प्रमुख राजपूत संत-कवयित्री एवं कृष्ण भक्त मीरा बाई की जीवनी पर आधारित इस फिल्म में हेमामालिनी ने मीरा का पात्र निभाया है| गुलज़ार ने इस फिल्म में मीरा की जीवनी पौराणिक एवं भक्ति की परिदृष्टि से नहीं अपितु एक ऐतिहासिक एवं सामाजिक दृष्टिकोण से दर्शाया है| समकालीन समाज में नारी अपनी गरिमा, मुक्ति तथा अध्यात्मिक आनन्द के लिए करते प्रयत्नों को मीरा के रूप में दर्शाया है| मीरा बाई की प्रमुख भक्ति रचनाओं को इस फिल्म में गीत के रूप में लिया एवं प्रमुख सितार वादक पंडित रवि शंकर ने इसमें संगीत दिया है| इन गीतों को विख्यात गायिका वाणी जयराम ने स्वर दिया है| फिल्म गुड्डी से हिंदी फिल्म जगत में विख्यात वाणी जयराम को इस फिल्म का गीत "मेरे तो गिरिधर गोपाल" के लिए 'फिल्मफेयर सर्वश्रेष्ठ पार्श्वगायिका पुरस्कार' तथा अन्य राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया गया| संक्षेप .

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रणथम्भोर दुर्ग

रणथंभोर दुर्ग दिल्ली-मुंबई रेल मार्ग के सवाई माधोपुर रेल्वे स्टेशन से १३ कि॰मी॰ दूर रन और थंभ नाम की पहाडियों के बीच समुद्रतल से ४८१ मीटर ऊंचाई पर १२ कि॰मी॰ की परिधि में बना एक दुर्ग है। दुर्ग के तीनो और पहाडों में प्राकृतिक खाई बनी है जो इस किले की सुरक्षा को मजबूत कर अजेय बनाती है। यूनेस्को की विरासत संबंधी वैश्विक समिति की 36वीं बैठक में 21 जून 2013 को रणथंभोर को विश्व धरोहर घोषित किया गया। यह राजस्थान का एक महत्वपूर्ण पर्यटन स्थल है। .

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रफी उद-दर्जत

रफी उद-दर्जत(३० नवम्बर १६९९-१७१९), रफ़ी-उस-शहान का कनिष्ठ पुत्र (अज़ीम उश शान का भाई) दसवां मुगल सम्राट था। यह फर्रुख्शियार के बाद २८ फ़रवरी १७१९ को सैयद भ्राता द्वारा बादशाह घोषित किया गया। रफी-उद-दज्रत की मौत Lung Cancer से या फिर उसे सैयद भाइयों ने १७१९ में मार डाला था। .

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रफी उद-दौलत

रफी उद-दौलत (رفی الدولت) जिसे शाहजहां द्वितीय (شاه جہان ۲) भी कहा गया है (जन्म १६९६) १७१९ में अति लघु-काल के लिए मुगल सम्राट बना था। यह अपने भाई रफी उल-दर्जत की मृत्यु उपरांट गद्दी पर बैठा था। इसे भि उसी की तरह सैयद भ्राता ने बाद्शाह घोषित किया था। १७१९ में ही इसकी हत्या कर दी गयी थी। .

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रसखान

रसखान (जन्म: १५४८ ई) कृष्ण भक्त मुस्लिम कवि थे। हिन्दी के कृष्ण भक्त तथा रीतिकालीन रीतिमुक्त कवियों में रसखान का अत्यंत महत्त्वपूर्ण स्थान है। रसखान को 'रस की खान' कहा गया है। इनके काव्य में भक्ति, शृंगार रस दोनों प्रधानता से मिलते हैं। रसखान कृष्ण भक्त हैं और उनके सगुण और निर्गुण निराकार रूप दोनों के प्रति श्रद्धावनत हैं। रसखान के सगुण कृष्ण वे सारी लीलाएं करते हैं, जो कृष्ण लीला में प्रचलित रही हैं। यथा- बाललीला, रासलीला, फागलीला, कुंजलीला आदि। उन्होंने अपने काव्य की सीमित परिधि में इन असीमित लीलाओं को बखूबी बाँधा है। मथुरा जिले में महाबन में इनकी समाधि हैं| भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने जिन मुस्लिम हरिभक्तों के लिये कहा था, "इन मुसलमान हरिजनन पर कोटिन हिन्दू वारिए" उनमें रसखान का नाम सर्वोपरि है। बोधा और आलम भी इसी परम्परा में आते हैं। सय्यद इब्राहीम "रसखान" का जन्म अन्तर्जाल पर उपलब्ध स्रोतों के अनुसार सन् १५३३ से १५५८ के बीच कभी हुआ था। कई विद्वानों के अनुसार इनका जन्म सन् १५९० ई. में हुआ था। चूँकि अकबर का राज्यकाल १५५६-१६०५ है, ये लगभग अकबर के समकालीन हैं। इनका जन्म स्थान पिहानी जो कुछ लोगों के मतानुसार दिल्ली के समीप है। कुछ और लोगों के मतानुसार यह पिहानी उत्तरप्रदेश के हरदोई जिले में है। मृत्यु के बारे में कोई जानकारी नहीं मिल पाई। यह भी बताया जाता है कि रसखान ने भागवत का अनुवाद फारसी और हिंदी में किया है। .

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रहीम

अब्दुल रहीम ख़ान-ए-ख़ाना या सिर्फ रहीम, एक मध्यकालीन कवि, सेनापति, प्रशासक, आश्रयदाता, दानवीर, कूटनीतिज्ञ, बहुभाषाविद, कलाप्रेमी, एवं विद्वान थे। वे भारतीय सामासिक संस्कृति के अनन्य आराधक तथा सभी संप्रदायों के प्रति समादर भाव के सत्यनिष्ठ साधक थे। उनका व्यक्तित्व बहुमुखी प्रतिभा से संपन्न था। वे एक ही साथ कलम और तलवार के धनी थे और मानव प्रेम के सूत्रधार थे। जन्म से एक मुसलमान होते हुए भी हिंदू जीवन के अंतर्मन में बैठकर रहीम ने जो मार्मिक तथ्य अंकित किये थे, उनकी विशाल हृदयता का परिचय देती हैं। हिंदू देवी-देवताओं, पर्वों, धार्मिक मान्यताओं और परंपराओं का जहाँ भी आपके द्वारा उल्लेख किया गया है, पूरी जानकारी एवं ईमानदारी के साथ किया गया है। आप जीवन भर हिंदू जीवन को भारतीय जीवन का यथार्थ मानते रहे। रहीम ने काव्य में रामायण, महाभारत, पुराण तथा गीता जैसे ग्रंथों के कथानकों को उदाहरण के लिए चुना है और लौकिक जीवन व्यवहार पक्ष को उसके द्वारा समझाने का प्रयत्न किया है, जो भारतीय सांस्कृति की वर झलक को पेश करता है। .

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रहीम का मकबरा

अब्दुर्रहीम ख़ान-ए-ख़ाना मुगल बादशाह अकबर के नवरत्नों में से एक हिंदी के सुप्रसिद्ध कवि थे। रहीम का मकबरा दिल्ली के निजामुद्दीन पूर्व में मथुरा रोड पर स्थित है। इस मकबरे का निर्माण रहीम की पत्नी द्वारा करवाया गया था जिसका निर्माण कार्य सन् 1598 ई में पूर्ण हुआ। सन् 1627 में आगरा में मृत्यु के बाद रहीम को इस मकबरे में बनी कब्र में दफनाया गया था। इंडियन एक्सप्रेस, 4 December 2008.

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राणा अमरसाल

राणा अमरसाल एक राजपूत राजा थे। महान मुगल बादशाह अकबर का जन्म इन्हीं के घर हुआ था। श्रेणी:राजपूत शासक.

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राजपुताना

राजस्थान पहले राजपुताना के रूप में जाना जाता था। 1909 का ब्रिटिशकालीन नक्शा मौजूदा राजस्थान के ज़िलों का मानचित्र राजपुताना जिसे रजवाड़ा भी कहा जाता है। राजपूतों की राजनीतिक सत्ता आयी तथा ब्रिटिशकाल में यह राजपुताना (राजपूतों का देश) नाम से जाने जाना लगा। इस प्रदेश का आधुनिक नाम राजस्थान है, जो उत्तर भारत के पश्चिमी भाग में अरावली की पहाड़ियों के दोनों ओर फैला हुआ है। इसका अधिकांश भाग मरुस्थल है। यहाँ वर्षा अत्यल्प और वह भी विभिन्न क्षेत्रों में असमान रूप से होती है। यह मुख्यत: वर्तमान राजस्थान राज्य की भूतपूर्व रियासतों का समूह है, जो भारत का एक महत्त्वपूर्ण हिस्सा है। .

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राजस्थान में जौहर और साके

जौहर का एक काल्पनिक दृश्य प्राचीन काल में राजस्थान में बहुत बार साके और कई बार जौहर हुए हैं। जौहर पुराने समय में भारत में राजपूत स्त्रियों द्वारा की Kaushik Roy (2012), Hinduism and the Ethics of Warfare in South Asia: From Antiquity to the Present, Cambridge University Press, ISBN-978-1107017368, pages 182-184जाने वाली क्रिया थी। जब युद्ध में हार निश्चित हो जाती थी तो पुरुष मृत्युपर्यन्त युद्ध हेतु तैयार होकर वीरगति प्राप्त करने निकल जाते थे तथा स्त्रियाँ जौहर कर लेती थीं अर्थात जौहर कुंड में आग लगाकर खुद भी उसमें कूद जाती थी। जौहर कर लेने का कारण युद्ध में हार होने पर शत्रु राजा द्वारा हरण किये जाने का भय होता था। .

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राजा मान सिंह

राजा मान सिंह आमेर का राजमहल राजा मान सिंह आमेर (आम्बेर) के कच्छवाहा राजपूत राजा थे। उन्हें 'मान सिंह प्रथम' के नाम से भी जाना जाता है। राजा भगवन्त दास इनके पिता थे। वह अकबर की सेना के प्रधान सेनापति, थे। उन्होने आमेर के मुख्य महल के निर्माण कराया। महान इतिहासकार कर्नल जेम्स टॉड ने लिखा है- " भगवान दास के उत्तराधिकारी मानसिंह को अकबर के दरबार में श्रेष्ठ स्थान मिला था।..मानसिंह ने उडीसा और आसाम को जीत कर उनको बादशाह अकबर के अधीन बना दिया.

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राजा गिरधरदास खण्डेला

गिरधरदास खण्डेला के राजा थे, इन्होने अकबर के दक्षिण भारतीय युद्ध अभियानों में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई तथा कई युद्ध इनकी वीरता से जीते गए। इनके वंशज ही आज गिरधरदासोत शेखावत ने उपनाम से जाने जाते है। .

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रज़्मनामा

रज़्मनामा (फ़ारसी: رزم نامہ, जंग की किताब) महाभारत का फ़ारसी अनुवाद है जो कि मुग़ल बादशाह अकबर के समय में करवाया गया था। 1574 में अकबर ने फ़तेहपुर सीकरी में मकतबख़ाना (अनुवादघर) शुरू किया। इसके साथ अकबर ने राजतरंगिणी, रामायण, वग़ैरा जैसे संस्कृत ग्रंथों को फ़ारसी में अनुवाद करने के लिए हिमायत दी। रज़्मनामा की तीन प्रतियाँ है प्रथम जयपुर अजायबघर में, दुसरी 1599 में तैयार जो वर्तमान समय में विविध संग्रहालय में रखी गई है और अंतिम रज़्मनामा रहीम का है जो 1616 में पुरा हुआ था। रज़्मनामा अपने चित्रों के कारण महत्त्वपूर्ण है। जयपुर प्रत के मुख्य चित्रकार दशवंत, वशावंत और लाल है। ई.स. 1599 की प्रत के मुख्य चित्रकार असी, धनु और फटु है। .

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रुक़य्या सुलतान बेगम

रुक़ैया सुल्तान बेगम (वैकल्पिक हिज्जे: रुक़य्या, रुक़ैय्याह) (1542 – 19 जनवरी 1626) 1557 से 1605 तक मुग़ल साम्राज्य की मलिका थीं। वे तीसरे मुग़ल बादशाह अकबर की पहली बीवी और मुख्य साथी थीं। 1557 से 27 अक्टूबर 1605, 48 साल तक वे सबसे लंबे समय तक मुग़ल साम्राज्ञी भी रहीं।Her tenure, from 1557 to 27 October 1605, was 48 years .

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रूपमती

माण्डू का रूपमती मण्डप रूपमती मालवा के अंतिम स्वाधीन अफगान सुलतान बाजबहादुर की प्रेयसी थी। बाजबहादुर और रूपमति के प्रेम कथानक को लेकर 1599 ई. में अहमद-उल्‌-उमरी ने फारसी में एक प्रेम-काव्य की रचना की थी और मुगल काल के अनेकानेक सुप्रसिद्ध चितेरों ने उसकी घटनाओं पर कई भावपूर्ण सुंदर चित्र बनाए थे। परंतु इस इतिहासप्रसिद्ध प्रेमिका की जीवनी का कोई भी प्रामाणिक विवरण प्राप्य नहीं है। प्राप्य ऐतिहासिक आधारग्रंथों में तद्विपयक उल्लेख अस्पष्ट या परस्पर विरोधी हैं। रूपमती को कहीं सारंगपुर की ब्राह्मण कन्या अथवा कहीं वहीं की नर्तकी लिखा है। परंतु नर्मदा घाटी में प्रचलित आख्यानों के अनुसार रूपमती धरमपुरी या टांडापुर की राजपूत कन्या थी। बाजबहादुर और रूपमति का मकबरा अवश्य ही सारंगपुर (मालवा) में एक तालाब के बीच में बना हुआ है। यह तो सर्वस्वीकृत है कि रूपमती अपार सुंदरी थी; उसकी स्वरलहरी बहुत मधुर थी और वह गायन-वादन-कला में भी पूर्ण निष्णात थी। बाजबहादुर स्वयं भी गायन-वादन-कला का उस्ताद था। रूपमती के इन्हीं गुणों के कारण वह उसकी ओर आकर्षित हुआ था और तब उनमें परस्पर अगाध प्रेम हो गया। उस समय मालवा में संगीतविद्या बहुत ही बढ़ी चढ़ी थी; और अब तो बाजबहादुर और रूपमती दोनों ही उसकी उन्नति तथा साधना में ऐसे लीन हो गए कि जब अकबर के सेनानायक आदम खाँ के नेतृत्व में मुगल सेनाएँ मालवा पर चढ़ आई और सारंगपुर के पास तक जा पहुँची तभी उन्हें उनका पता लगा। अंत में सन्‌ 1561 ई. में सारंगपुर के युद्ध में पराजित होकर बाजबहादुर को भागना पड़ा। तब रूपमती आदम खाँ की बंदिनी बनी। उसके रूप और संगीत से मुग्ध आदम खाँ ने जब रूपमती को अपनी प्रेयसी बनाना चाहा तब रूपमती ने विष खाकर बाजबहादुर के नाम पर जान दे दी और अपनी प्रेमकहानी को अमर कर दिया। रूपमती द्वारा रचित अनेक गीत और पद्य जनसाधारण में तब से प्रचलित हैं तथा अब तक मालवा के कई भागों में लोकगीतों के रूप में गाए जाते हैं। .

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रूज़ा शरीफ

रोज़ा शरीफ या शेख अहमद फारुकी सरहिंद (दरियाह के मुजदाद, अल्फ-सानी) के रूप में जाना जाता हैगुरुद्वारा फतेहगढ़ साहिब के उत्तर में एक छोटे से दूरी पर सरहिंद -बस्सी पठाना रोड पर स्थित है। शेख अहमद फारूकी 1563 से 1624 तक अकबर और जहांगीर के समय इस स्थान पर रहते थे। .

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लोधी मार्ग

यह मार्ग दक्षिण-मध्य दिल्ली का एक प्रमुख मार्ग है। इस मार्ग पर दिल्ली के भूतपूर्व शासक खिलजी वँश के कई मकबरे हैं, जिन्हेँ बागोँ की शकल दे दी गई है, व अब लोधी बाग या लोधी गार्डन के नाम से प्रसिद्ध हैं। इन्हीँ के कारण इस मार्ग का यह नाम पङा। यह मार्ग सफदरजंग का मकबरा से लेकर निजामुद्दीन की दरगाह तक जाता है। .

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शाह जहाँ

शाह जहाँ (उर्दू: شاہجہان)पांचवे मुग़ल शहंशाह था। शाह जहाँ अपनी न्यायप्रियता और वैभवविलास के कारण अपने काल में बड़े लोकप्रिय रहे। किन्तु इतिहास में उनका नाम केवल इस कारण नहीं लिया जाता। शाहजहाँ का नाम एक ऐसे आशिक के तौर पर लिया जाता है जिसने अपनी बेग़म मुमताज़ बेगम के लिये विश्व की सबसे ख़ूबसूरत इमारत ताज महल बनाने का यत्न किया। सम्राट जहाँगीर के मौत के बाद, छोटी उम्र में ही उन्हें मुगल सिंहासन के उत्तराधिकारी के रूप में चुन लिया गया था। 1627 में अपने पिता की मृत्यु होने के बाद वह गद्दी पर बैठे। उनके शासनकाल को मुग़ल शासन का स्वर्ण युग और भारतीय सभ्यता का सबसे समृद्ध काल बुलाया गया है। .

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शाह आलम द्वितीय

The Mughal Emperor Shah Alam II, negotiates territorial changes with a member of the British East India Company शाह आलम द्वितीय (१७२८-१८०६), जिसे अली गौहर भी कहा गया है, भारत का मुगल सम्राट रहा। इसे गद्दी अपने पिता, आलमगीर द्वितीय से १७६१ में मिली। १४ सितंबर १८०३ को इसका राज्य ब्रिटिश साम्राज्य के अधीन आ गया और ये मात्र कठपुतली बनकर रह गया। १८०५ में इसकी मृत्यु हुई। इसकी कब्र १३ शताब्दी के संत कुतुबुद्दीन बख्तियार काकी की महरौली में दरगाह के निकट एक संगमर्मर के परिसर में बहादुर शाह प्रथम (जिसे शाह आलम प्रथम भी कहा जाता है) एवं अकबर द्वितीय के साथ बनी है। .

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शाहजहां तृतीय

शाहजहां तृतीय (شاه جہان ۳) जिसे मुही-उल-मिल्लत भू कहा गया है, मुगल सम्राट थे। ये मुही उस-सुन्नत का पुत्र और मुहम्मद कम बख्श का ज्येष्ठ पुत्र था, जो औरंगज़ेब का कनिष्ठ पुत्र था। इसे १७५९ में गद्दी पर बैठाया गया किंतु १७६० में ही अपने ही वज़ीर द्वारा हटा दित्या गया। १७५९ में दिल्ली पर मराठा सेनाओं का कुछ कब्ज़ा हो गया था। .

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शाही किला, जौनपुर

शाही किला (Royal Fort) गोमती के बाएं किनारे पर शहर के दिल में स्थित है। शाही किला फिरोजशाह ने १३६२ ई. में बनाया था इस किले के भीतरी गेट की ऊचाई २६.५ फुट और चौड़ाई १६ फुट है। केंद्रीय फाटक ३६ फुट उचा है। इसके एक शीर्ष पर वहाँ एक विशाल गुंबद है। शाही किला में कुछ आदि मेहराब रहते हैं जो अपने प्राचीन वैभव की कहानी बयान करते है। .

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शिला माता मन्दिर

शिला देवी मंदिर भारत के राजस्थान राज्य के जयपुर नगर में आमेर महल में स्थित एक मंदिर है। इसकी स्थापना यहां सवाई मानसिंह द्वितीय द्वारा की गयी थी। स्थानीय लोगों से मिली सूचनानुसार शिला देवी जयपुर के कछवाहा राजपूत राजाओं की कुल देवी रही हैं। इस मंदिर में लक्खी मेला लगता है जो काफ़ी प्रसिद्ध है। इस मेले में नवरात्र में यहां भक्तों की भारी भीड़ माता के दर्शनों के लिए आती है। शिला देवी की मूर्ति के पास में भगवान गणेश और मीणाओं की कुलदेवी हिंगला की मूर्तियाँ भी स्थापित हैं। कहते हैं कि यहां पहले मीणाओं का राज हुआ करता था। नवरात्रों में यहाँ दो मेले लगते हैं एवं देवी को प्रसन्न करने के लिए पशु बलि दी जाती है। आमेर दुर्ग के महल में जलेब चौक है जिसके दक्षिणी भाग में शिला माता का ऐतिहासिक मंदिर स्थित है। ये शिला माता राजपरिवार की कुल देवी भी मानी जाती हैं। यह मंदिर जलेब चौक से दूसरे उच्च स्तर पर मौजूद है अतः यहां से कुछ सीढ़ियाँ चढ़ कर मंदिर तक पहुंचना होता है। ये शिला देवी मूलतः अम्बा माता का ही रूप हैं एवं कहा जाता है कि आमेर या आंबेर का नाम इन्हीं अम्बा माता के नाम पर ही अम्बेर पड़ा था जो कालान्तर में आम्बेर या आमेर हो गया। माता की प्रतिमा एक शिला पर उत्कीर्ण होने के कारण इसे शिला देवी कहा जाता है। .

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शिवानन्द गोस्वामी

शिवानन्द गोस्वामी | शिरोमणि भट्ट (अनुमानित काल: संवत् १७१०-१७९७) तंत्र-मंत्र, साहित्य, काव्यशास्त्र, आयुर्वेद, सम्प्रदाय-ज्ञान, वेद-वेदांग, कर्मकांड, धर्मशास्त्र, खगोलशास्त्र-ज्योतिष, होरा शास्त्र, व्याकरण आदि अनेक विषयों के जाने-माने विद्वान थे। इनके पूर्वज मूलतः तेलंगाना के तेलगूभाषी उच्चकुलीन पंचद्रविड़ वेल्लनाडू ब्राह्मण थे, जो उत्तर भारतीय राजा-महाराजाओं के आग्रह और निमंत्रण पर राजस्थान, मध्यप्रदेश, उत्तर प्रदेश और उत्तर भारत के अन्य प्रान्तों में आ कर कुलगुरु, राजगुरु, धर्मपीठ निर्देशक, आदि पदों पर आसीन हुए| शिवानन्द गोस्वामी त्रिपुर-सुन्दरी के अनन्य साधक और शक्ति-उपासक थे। एक चमत्कारिक मान्त्रिक और तांत्रिक के रूप में उनकी साधना और सिद्धियों की अनेक घटनाएँ उल्लेखनीय हैं। श्रीमद्भागवत के बाद सबसे विपुल ग्रन्थ सिंह-सिद्धांत-सिन्धु लिखने का श्रेय शिवानंद गोस्वामी को है।" .

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शिवाजी

छत्रपति शिवाजी महाराज या शिवाजी राजे भोसले (१६३० - १६८०) भारत के महान योद्धा एवं रणनीतिकार थे जिन्होंने १६७४ में पश्चिम भारत में मराठा साम्राज्य की नींव रखी। उन्होंने कई वर्ष औरंगज़ेब के मुगल साम्राज्य से संघर्ष किया। सन १६७४ में रायगढ़ में उनका राज्याभिषेक हुआ और छत्रपति बने। शिवाजी महाराज ने अपनी अनुशासित सेना एवं सुसंगठित प्रशासनिक इकाइयों की सहायता से एक योग्य एवं प्रगतिशील प्रशासन प्रदान किया। उन्होंने समर-विद्या में अनेक नवाचार किये तथा छापामार युद्ध (Gorilla War) की नयी शैली (शिवसूत्र) विकसित की। उन्होंने प्राचीन हिन्दू राजनीतिक प्रथाओं तथा दरबारी शिष्टाचारों को पुनर्जीवित किया और फारसी के स्थान पर मराठी एवं संस्कृत को राजकाज की भाषा बनाया। भारत के स्वतन्त्रता संग्राम में बहुत से लोगों ने शिवाजी के जीवनचरित से प्रेरणा लेकर भारत की स्वतन्त्रता के लिये अपना तन, मन धन न्यौछावर कर दिया। .

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शक्ति सिंह

शक्ति सिंह सिसोदिया, जिन्हें शक्ति तथा सगत नामों से भी जाना जाता था, राणा उदय सिंह द्वितीय तथा रानी सज्जा बाई सोलंकिनी के पुत्र तथा महाराणा प्रताप के छोटे भाई थे। अपने पिता से शत्रुतापूर्ण सम्बन्धों के कारण उन्होंने मुग़ल शासक अकबर के पाले में चले गये तथा बाद में उन्हें "मीर" की उपाधि प्रदान की गयी। १५६७ ईस्वी में धौलपुर से भाग गये जब अकबर ने वहाँ पड़ाव डाला था। उन्होंने अकबर की चित्तौड़ पर आधिपत्य जमाने की योजना अपने पिता को बता दी जिससे अकबर बहुत नाराज हो गया। हल्दीघाटी के युद्ध के दौरान वे अपने भाई महाराणा प्रताप के पक्ष में आ गये। उनके वंशज शक्तवत नाम से जाने जाते हैं। .

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शेर शाह सूरी

शेरशाह सूरी (1472-22 मई 1545) (फारसी/पश्तो: فريد خان شير شاہ سوري, जन्म का नाम फ़रीद खाँ) भारत में जन्मे पठान थे, जिन्होनें हुमायूँ को 1540 में हराकर उत्तर भारत में सूरी साम्राज्य स्थापित किया था। शेरशाह सूरी ने पहले बाबर के लिये एक सैनिक के रूप में काम किया था जिन्होनें उन्हे पदोन्नति कर सेनापति बनाया और फिर बिहार का राज्यपाल नियुक्त किया। 1537 में, जब हुमायूँ कहीं सुदूर अभियान पर थे तब शेरशाह ने बंगाल पर कब्ज़ा कर सूरी वंश स्थापित किया था। सन् 1539 में, शेरशाह को चौसा की लड़ाई में हुमायूँ का सामना करना पड़ा जिसे शेरशाह ने जीत लिया। 1540 ई. में शेरशाह ने हुमायूँ को पुनः हराकर भारत छोड़ने पर मजबूर कर दिया और शेर खान की उपाधि लेकर सम्पूर्ण उत्तर भारत पर अपना साम्रज्य स्थापित कर दिया। एक शानदार रणनीतिकार, शेर शाह ने खुद को सक्षम सेनापति के साथ ही एक प्रतिभाशाली प्रशासक भी साबित किया। 1540-1545 के अपने पांच साल के शासन के दौरान उन्होंने नयी नगरीय और सैन्य प्रशासन की स्थापना की, पहला रुपया जारी किया है, भारत की डाक व्यवस्था को पुनः संगठित किया और अफ़गानिस्तान में काबुल से लेकर बांग्लादेश के चटगांव तक ग्रांड ट्रंक रोड को बढ़ाया। साम्राज्य के उसके पुनर्गठन ने बाद में मुगल सम्राटों के लिए एक मजबूत नीव रखी विशेषकर हुमायूँ के बेटे अकबर के लिये। .

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सफ़ेद बाघ

सफ़ेद बाघ (व्हाइट टाइगर/white tiger) एक ऐसा बाघ है जिसका प्रतिसारी पित्रैक (रिसेसिव पित्रैक) इसे हल्का रंग प्रदान करता है। एक अन्य आनुवंशिक अभिलक्षण बाघ की धारियों को बहुत हल्का रंग प्रदान करता है; इस प्रकार के सफ़ेद बाघ को बर्फ-सा सफ़ेद या "शुद्ध सफे़द" कहते हैं। सफ़ेद बाघ विवर्ण नहीं होते हैं और इनकी कोई अलग उप-प्रजाति नहीं है और इनका संयोग नारंगी रंग के बाघों के साथ हो सकता है, हालांकि (लगभग) इस संयोग के परिणामस्वरूप जन्म ग्रहण करने वाले शावकों में से आधे शावक प्रतिसारी सफ़ेद पित्रैक की वजह से विषमयुग्मजी हो सकते हैं और इनके रोएं नारंगी रंग के हो सकते हैं। इसमें एकमात्र अपवाद तभी संभव है जब खुद नारंगी रंग वाले माता/पिता पहले से ही एक विषमयुग्मजी बाघ हो, जिससे प्रत्येक शावक को या तो दोहरा प्रतिसारी सफ़ेद या विषमयुग्मजी नारंगी रंग के होने का 50 प्रतिशत अवसर मिलेगा.

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सलीम चिश्ती की दरगाह

शेख सलीम चिश्ती की समाधि। शेख सलीम चिश्ती की समाधि भारत के आगरा जिले में नगर से ३५ किलो मीटर दूर फतेहपुर सीकरी शहर में, ज़नाना रौजा के निकट, दक्षिण में बुलन्द दरवाजे़ की ओर मुख किये हुये, जामी मस्जिद की भीतर स्थित है। शेख सलीम चिश्ती एक सूफी संत थे उन्होंने अकबर और उसके बेटे को आशीर्वाद दिया था कि भविष्य में सलीम, जहांगीर के नाम से पहचाना जाएगा। जून १५७३ में अकबर ने गुजरात विजय के साथ इस क्षेत्र को भी जीत लिया तो इसका नाम फतेहपुर सीकरी रखा गया और अकबर ने इस समाधि का निर्माण संत के सम्मान में वर्ष १५८० और १५८१ के बीच करवाया। आज यह समाधि वास्तुकला और धर्म निरपेक्षता का अनुपम उदाहरण है जहाँ इसके दर्शनार्थ विभिन्न समुदायों के लोग आते हैं। .

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सलीमा सुल्तान बेगम

सलीमा सुल्तान बेगम (23 फ़रवरी 1539 - 15 दिसम्बर 1612) सम्राट अकबर की पत्नी तथा मुगल साम्राज्य की महारानी थी। सलीमा पहले बैरम खां की पत्नी थीं और 1561 में उनकी हत्या के बाद, उनकी शादी सम्राट अकबर से हुई। .

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सारन जिला

सारण भारत गणराज्य के बिहार प्रान्त में स्थित एक प्रमंडल (कमिशनरी) एवं जिला है। यहाँ का प्रशासनिक मुख्यालय छपरा है। गंगा, गंडक एवं घाघरा नदी से घिरा यह जिला भारत में मानव बसाव के सार्वाधिक प्राचीन केंद्रों में एक है। संपूर्ण जिला एक समतल एवं उपजाऊ प्रदेश है। भोजपुरी भाषी क्षेत्र की पूर्वी सीमा पर स्थित यह जिला सोनपुर मेला, चिरांद पुरातत्व स्थल एवं राजनीतिक चेतना के लिए प्रसिद्ध है। .

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सालिहा बानो बेगम

सालिहा बानो बेगम (नस्तालीक़:; मौत 10 जून 1620) जहाँगीर की बीवी और मुग़लिया सल्तनत की मलिका थी। वह पादशाह बानो बेगम या पादशाह महल के नामों से भी जानी जाती है। .

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सावर्ण रायचौधुरी परिवार

सावर्ण रायचौधुरी परिवार कोलकाता शहर का प्रथम परिवार कहलाता है क्योंकि इस परिवार से ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने तीनन गांव खरीद कर कोलकाता शहर को बसाना चालू किया था। औरंगजेब के पौत्र आजिम उस शान के हुकुम से १० नवम्बर १६९८ को कोलकाता, सुतानुटि और गोबिन्दपुर - इन तीन गांव के प्रजास्वत्व ईस्ट इण्डिया कम्पनी को हस्तान्तर किये थे। सावर्णचौधुरीयों को सुंदरवन इलाके में जो जागिरदारी मिली थी, उसका एक अंश थे ये तीन गांव। उन लोगों को यह इलाका मिला था जहांगीर से। हालांकि वे लोग ब्राह्मण परिवार थे, उनके सदस्यों ने मुगलों के सेना में उच्च पद पर आसीन थे। परिवार के पहला सदस्य जो गंगोपाध्याय से रायचौधुरी हुये वह थे लक्ष्मीकान्त (१५७०-१६४९)। उनको अकबर से राय खिताब और जहांगीर से चौधुरी खिताब मिला था। .

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सिसोदिया (राजपूत)

सिसोदिया राजवंश की कुलदेवी सिसोदिया या गेहलोत मांगलिया यासिसोदिया एक राजपूत राजवंश है, जिसका राजस्थान के इतिहास में महत्वपूर्ण स्थान है। यह सूर्यवंशी राजपूत थे। सिसोदिया राजवंश में कई वीर शासक हुए हैं। 'गुहिल' या 'गेहलोत' 'गुहिलपुत्र' शब्द का अपभ्रष्ट रूप है। कुछ विद्वान उन्हें मूलत: ब्राह्मण मानते हैं, किंतु वे स्वयं अपने को सूर्यवंशी क्षत्रिय कहते हैं जिसकी पुष्टि पृथ्वीराज विजय काव्य से होती है। मेवाड़ के दक्षिणी-पश्चिमी भाग से उनके सबसे प्राचीन अभिलेख मिले है। अत: वहीं से मेवाड़ के अन्य भागों में उनकी विस्तार हुआ होगा। गुह के बाद भोज, महेंद्रनाथ, शील ओर अपराजित गद्दी पर बैठे। कई विद्वान शील या शीलादित्य को ही बप्पा मानते हैं। अपराजित के बाद महेंद्रभट और उसके बाद कालभोज राजा हुए। गौरीशंकर हीराचंद ओझा ने कालभोज को चित्तौड़ दुर्ग का विजेता बप्पा माना है। किंतु यह निश्चित करना कठिन है कि वास्तव में बप्पा कौन था। कालभोज के पुत्र खोम्माण के समय अरब आक्रान्ता मेवाड़ तक पहुंचे। अरब आक्रांताओं को पीछे हटानेवाले इन राजा को देवदत्त रामकृष्ण भंडारकर ने बप्पा मानने का सुझाव दिया है। कुछ समय तक चित्तौड़ प्रतिहारों के अधिकार में रहा और गुहिल उनके अधीन रहे। भर्तृ पट्ट द्वितीय के समय गुहिल फिर सशक्त हुए और उनके पुत्र अल्लट (विक्रम संवत् १०२४) ने राजा देवपाल को हराया जो डा.

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सिख धर्म और इस्लाम

सिख धर्म और इस्लाम का प्रारंभ से ही एक अभिन्न एवं विचित्र संबंध रहा है। सिख धर्म का उदय पंजाब क्षेत्र (वर्तमान भारत व पाकिस्तान) में हुआ जहाँ हिंदू व मुस्लिम दोनों धर्मों के अनुयायी काफी मात्रा में थे। सिख धर्म के संस्थापक गुरु नानक के बारे में कहा गया: जहाँ प्रारंभ से ही मुस्लिम लोगों का भी पर्याप्त समर्थन सिख धर्म को मिला, वहीं बाद के समय में मुस्लिम शासकों ने इस धर्म व इसके अनुयायियों का दमन करने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी। .

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सिकंदर शाह सूरी

सिकंदर शाह सूरी सूर वंश का छठा शासक था। इसका असली नाम अहमद खान था। १५५५ में इसे हुमायुं से मात खानी पड़ी और मुगल साम्राज्य की पुनर्स्थापना हुई। हार के बाद सूरी शिवालिक की पहाड़ियों में भाग गया। इसके भ्राता आदिल शाह सूरी ने अकबर से युद्ध किया, परंतु हार गया। श्रेणी:सूर वंश श्रेणी:पश्तून लोग श्रेणी:१६वीं शताब्दी के लोग.

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संत रविदास नगर जिला

भदोही ज़िला भारतीय राज्य उत्तर प्रदेश का एक ज़िला है। जिले का मुख्यालय ज्ञानपुर में है। पहले यह वाराणसी जिले में था।भदोही ज़िला इलाहाबाद और वाराणसी के बीच मे स्थित है| यहा का कालीन उद्योग विश्व प्रसिद्ध है और कृषी के बाद दूसरा प्रमुख रोजगार का श्रोत है| .

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स्वामी हरिदास

स्वामी हरिदास (1480 - 1575) भक्त कवि, शास्त्रीय संगीतकार तथा कृष्णोपासक सखी संप्रदाय के प्रवर्तक थे। इन्हें ललिता सखी का अवतार माना जाता है। वे वैष्णव भक्त थे तथा उच्च कोटि के संगीतज्ञ भी थे। वे प्राचीन शास्त्रीय संगीत के उद्भट विद्वान एवम् चतुष् ध्रुपदशैली के रचयिता हैं। प्रसिद्ध गायक तानसेन इनके शिष्य थे। अकबर इनके दर्शन करने वृन्दावन गए थे। ‘केलिमाल’ में इनके सौ से अधिक पद संग्रहित हैं। इनकी वाणी सरस और भावुक है। स्वामी हरिदास का जन्म 1490 में हुआ था। इनके जन्म स्थान और गुरु के विषय में कई मत प्रचलित हैं। इनका जन्म समय कुछ ज्ञात नहीं है। ये महात्मा वृन्दावन में निंबार्क सखी संप्रदाय के संस्थापक थे और अकबर के समय में एक सिद्ध भक्त और संगीत-कला-कोविद माने जाते थे। कविताकाल सन् 1543 से 1560 ई. ठहरता है। प्रसिद्ध गायनाचार्य तानसेन इनका गुरूवत् सम्मान करते थे। यह प्रसिद्ध है कि अकबर बादशाह साधु के वेश में तानसेन के साथ इनका गाना सुनने के लिए गया था। कहते हैं कि तानसेन इनके सामने गाने लगे और उन्होंने जानबूझकर गाने में कुछ भूल कर दी। इसपर स्वामी हरिदास ने उसी गाना को शुद्ध करके गाया। इस युक्ति से अकबर को इनका गाना सुनने का सौभाग्य प्राप्त हो गया। पीछे अकबर ने बहुत कुछ पूजा चढ़ानी चाही पर इन्होंने स्वीकार नहीं की। .

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सूरदास मदनमोहन

सूरदास मदनमोहन की गौड़ीय सम्प्रदाय के प्रमुख भक्त कवियों में गणना की जाती है। http://hindisahityainfo.blogspot.in/2017/05/blog-post_9.html .

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सोनपुर मेला

सोनपुर मेला बिहार के सोनपुर में हर साल कार्तिक पूर्णिमा (नवंबर-दिसंबर) में लगता हैं। यह एशिया का सबसे बड़ा पशु मेला हैं। मेले को 'हरिहर क्षेत्र मेला' के नाम से भी जाना जाता है जबकि स्थानीय लोग इसे छत्तर मेला पुकारते हैं। बिहार की राजधानी पटना से लगभग 25 किमी तथा वैशाली जिले के मुख्यालय हाजीपुर से ३ किलोमीटर दूर सोनपुर में गंडक के तट पर लगने वाले इस मेले ने देश में पशु मेलों को एक अलग पहचान दी है। इस महीने के बाकी मेलों के उलट यह मेला कार्तिक पूर्णिमा पर स्नान के बाद शुरू होता है। एक समय इस पशु मेले में मध्य एशिया से कारोबारी आया करते थे। अब भी यह एशिया का सबसे बडा पशु मेला माना जाता है। सोनपुर पशु मेला में आज भी नौटंकी और नाच देखने के लिए भीड़ उमड़ती है। एक जमाने में यह मेला जंगी हाथियों का सबसे बड़ा केंद्र था। मौर्य वंश के संस्थापक चन्द्रगुप्त मौर्य (340 ई॰पु॰ -298 ई॰पु), मुगल सम्राट अकबर और 1857 के गदर के नायक वीर कुँवर सिंह ने भी से यहां हाथियों की खरीद की थी। सन् 1803 में रॉबर्ट क्लाइव ने सोनपुर में घोड़े के बड़ा अस्तबल भी बनवाया था। एक दौर में सोनपुर मेले में नौटंकी की मल्लिका गुलाब बाई का जलवा होता था। सोनपुर मेला में भू-राजस्व विभाग का स्टॉल से बिहार के सभी राजस्व ग्रामों का डिजिटल मानचित्र 150 रूपये मात्र सरकारी शुल्क के द्वारा कोई भी नागरिक तीन मिनट के अन्दर प्राप्त कर सकते हैं। यह कार्य राष्ट्रीय सूचना विज्ञान केन्द्र पटना के तकनीकी सहयोग के द्वारा किया गया है। समय के बदलते प्रभाव के असर से हरिहर क्षेत्र सोनपुर मेला, पशु बाजारों से हटकर अब आटो एक्स्पो मेले का रूप लेता जा रहा है। पिछले कई वर्षों से इस मेले में कई कंपनियों के शोरूम तथा बिक्री केंद्र यहां खुल रहे हैं। मेले में रेल ग्राम प्रदर्शनी लगी। रेलग्राम में टॉय ट्रेन चलाई जा रही। सोनपुर मेले के प्रति विदेशी पर्यटकों में भी खास आकर्षण देखा जाता है। जर्मनी, अमेरिका, फ्रांस एवं अन्य विदेशी पर्यटकों को आकर्षित करने के लिए स्विस कॉटेजों का निर्माण किया जाता है। पर्यटकों को पटना एयरपोर्ट से सोनपुर मेला आने व जाने के लिए प्रीपेड टैक्सी भी उपलब्ध कराई जायेगी। मेलों से जुडे तमाम आयोजन तो यहां होते ही हैं। यहां हाथियों व घोडों की खरीद हमेशा से सुर्खियों में रहती है। पहले यह मेला हाजीपुर में होता था। सिर्फ हरिहर नाथ की पूजा सोनपुर में होती थी लेकिन बाद में मुगल बादशाह औरंगजेब के आदेश से मेला भी सोनपुर में ही लगने लगा। 2001 में, सोनपुर मेला में लाया गया हाथियों की संख्या 92 थी, जबकि 2016 में 13 हाथियों ने इसे मेले में बनाया, केवल प्रदर्शन के लिए, बिक्री के लिए नहीं। 2017 में, मेले में 3 टस्कर था। हरिहर क्षेत्र 2017 सोनपुर मेला 32 दिनों का होगा। सोनपुर मेले का उदघाटन इस बार 2 नवंबर को तथा समापन 3 दिसंबर को किया जाएगा। मेला में नौका दौड़, दंगल, वाटर सर्फिंग, वाटर के¨नग सहित विभिन्न प्रकार के खेल व प्रतियोगिता का भी आयोजन किया जाएगा। .

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सीवान

सीवान या सिवान भारत गणराज्य के बिहार प्रान्त में सारन प्रमंडल के अंतर्गत एक जिला तथा शहर है। यह बिहार के उत्तर पश्चिमी छोर पर उत्तर प्रदेश का सीमावर्ती जिला है। जिला मुख्यालय सिवान शहर दाहा नदी के किनारे बसा है। इसके उत्तर तथा पूर्व में क्रमश: बिहार का गोपालगंज तथा सारण जिला तथा दक्षिण एवं पश्चिम में क्रमश: उत्तर प्रदेश का देवरिया और बलिया जिला है। भारत के प्रथम राष्ट्रपति डा॰ राजेन्द्र प्रसाद तथा कई अग्रणी स्वतंत्रता सेनानियों की जन्मभूमि एवं कर्मस्थली के लिए सिवान को जाना जाता है। .

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हनुमान मंदिर, कनॉट प्लेस

नई दिल्ली के हृदय कनॉट प्लेस में महाभारत कालीन श्री हनुमान जी का एक प्राचीन मंदिर है। यहाँ पर उपस्थित हनुमान जी स्वयंभू हैं। बालचन्द्र अंकित शिखर वाला यह मंदिर आस्था का महान केंद्र है।। हनुमान जयंती इसके साथ बने शनि मंदिर का भी प्राचीन इतिहास है। एक दक्षिण भारतीय द्वारा बनवाए गए कनॉट प्लेस शनि मंदिर में दुनिया भर के दक्षिण भारतीय दर्शनों के लिए आते हैं।। नवभारत टाइम्स। १८ अप्रैल २००७। पीयुष के जैन प्रत्येक मंगलवार एवं विशेषतः हनुमान जयंती के पावन पर्व पर यहां भजन संध्या और भंडारे लगाकर श्रद्धालुओं को प्रसाद वितरित किया जाता है। इसके साथ ही भागीरथी संस्था के तत्वाधान में संध्या का आयोजन किया जाता है, साथ ही क्षेत्र में झांकी निकाली जाती है।। याहू जागरण। .

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हम्मीर चौहान

हम्मीर देव चौहान, पृथ्वीराज चौहान के वंशज थे। उन्होने रणथंभोर पर १२८२ से १३०१ तक राज्य किया। वे रणथम्भौर के सबसे महान शासकों में सम्मिलित हैं। हम्मीर देव का कालजयी शासन चौहान काल का अमर वीरगाथा इतिहास माना जाता है। हम्मीर देव चौहान को चौहान काल का 'कर्ण' भी कहा जाता है। पृथ्वीराज चौहान के बाद इनका ही नाम भारतीय इतिहास में अपने हठ के कारण अत्यंत महत्व रखता है। राजस्थान के रणथम्भौर साम्राज्य का सर्वाधिक शक्तिशाली एवं प्रतिभा सम्पन शासक हम्मीर देव को ही माना जाता है। इस शासक को चौहान वंश का उदित नक्षत्र कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा। डॉ॰ हरविलास शारदा के अनुसार हम्मीर देव जैत्रसिंह का प्रथम पुत्र था और इनके दो भाई थे जिनके नाम सूरताना देव व बीरमा देव थे। डॉक्टर दशरथ शर्मा के अनुसार हम्मीर देव जैत्रसिंह का तीसरा पुत्र था वहीं गोपीनाथ शर्मा के अनुसार सभी पुत्रों में योग्यतम होने के कारण जैत्रसिंह को हम्मीर देव अत्यंत प्रिय था। हम्मीर देव के पिता का नाम जैत्रसिंह चौहान एवं माता का नाम हीरा देवी था। यह महाराजा जैत्रसिंह चौहान के लाडले एवं वीर बेटे थे। .

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हमीदा बानो बेगम

हमीदा बानो (१५२७-१६०४) प्रसिद्ध मुगल सम्राट हुमायुं की बेगम और तीसरे मुगल सम्राट अकबर की मां थी। हिदांल के गुरु की बेटी थी वो शिया थी किंतु उसका पति सुन्नी था। .

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हरि पर्वत

हरि पर्वत भारत के उत्तरतम राज्य जम्मू-कश्मीर की राजधानी श्रीनगर में डल झील के पश्चिम ओर स्थित है। इस छोटी पहाड़ी के शिखर पर इसी नाम का एक किला बना है जिसका अनुरक्षण जम्मू कश्मीर सरकार का पुरातत्व विभाग के अधीन है। इस किले में भ्रमण हेतु पर्यटकों को पहले पुरातत्त्व विभाग से अनुमति लेनी होती है। क़िले का निर्माण एक अफ़ग़ान गर्वनर मुहम्मद ख़ान ने १८वीं शताब्दी में करवाया था। उसके बाद १५९० ई॰ में मुग़ल सम्राट अकबर द्वारा इस क़िले की चहारदीवारी का निर्माण करवाया गया। .

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हरिद्वार जिला

हरिद्वार, जिसे हरद्वार भी कहा जाता है, भारतीय राज्य उत्तराखण्ड का एक जिला है, जिसके मुख्यालय हरिद्वार नगर में स्थित हैं। इस जिले के उत्तर में देहरादून जिला, पूर्व में पौड़ी गढ़वाल जिला, पश्चिम में उत्तर प्रदेश राज्य का सहारनपुर जिला तथा दक्षिण में उत्तर प्रदेश राज्य के ही मुजफ्फरनगर तथा बिजनौर जिले हैं। हरिद्वार जिले की स्थापना २८ दिसंबर १९८८ को उत्तर प्रदेश राज्य के सहारनपुर मण्डल के अंतर्गत सहारनपुर जिले की हरिद्वार और रुड़की तहसीलों, मुजफ्फरनगर जिले की सदर तहसील के ५३ गांवों और बिजनौर जिले की नजीबाबाद तहसील के २५ गांवों को मिलाकर हुई थी। ९ नवंबर २००० को हरिद्वार नवगठित उत्तराखण्ड राज्य का हिस्सा बन गया। २०११ में १८,९०,४२२ की जनसंख्या के साथ यह उत्तराखण्ड का सबसे अधिक जनसंख्या वाला जिला है। हरिद्वार, भेल रानीपुर, रुड़की, मंगलाौर, धन्देरा, झबरेड़ा, लक्सर, लन्ढौरा और मोहनपुर-मोहम्मदपुर जिले के महत्वपूर्ण शहर हैं। .

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हल्दीघाटी

हल्दीघाटी इतिहास में महाराणा प्रताप और अकबर के बीच हुए युद्ध के लिए प्रसिद्ध है। यह राजस्थान में एकलिंगजी से 18 किलोमीटर की दूरी पर है। यह अरावली पर्वत शृंखला में एक दर्रा (pass) है। यह राजसमन्द और पाली जिलों को जोड़ता है। यह उदयपुर से ४० किमी की दूरी पर है। इसका नाम 'हल्दीघाटी' इसलिये पड़ा क्योंकि यहाँ की मिट्टी हल्दी जैसी पीली है। .

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हाजीपुर

हाजीपुर (Hajipur) भारत गणराज्य के बिहार प्रान्त के वैशाली जिला का मुख्यालय है। हाजीपुर भारत की संसदीय व्यवस्था के अन्तर्गत एक लोकसभा क्षेत्र भी है। 12 अक्टुबर 1972 को मुजफ्फरपुर से अलग होकर वैशाली के स्वतंत्र जिला बनने के बाद हाजीपुर इसका मुख्यालय बना। ऐतिहासिक महत्त्व के होने के अलावा आज यह शहर भारतीय रेल के पूर्व-मध्य रेलवे मुख्यालय है, इसकी स्थापना 8 सितम्बर 1996 को हुई थी।, राष्ट्रीय स्तर के कई संस्थानों तथा केले, आम और लीची के उत्पादन के लिए प्रसिद्ध है। .

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हिसार

हिसार भारत के उत्तर पश्चिम में स्थित हरियाणा प्रान्त के हिसार जिले का प्रशासनिक मुख्यालय है। यह भारत की राजधानी नई दिल्ली के १६४ किमी पश्चिम में राष्ट्रीय राजमार्ग क्रमांक १० एवं राष्ट्रीय राजमार्ग क्रमांक ६५ पर पड़ता है। यह भारत का सबसे बड़ा जस्ती लोहा उत्पादक है। इसीलिए इसे इस्पात का शहर के नाम से भी जाना जाता है। पश्चिमी यमुना नहर पर स्थित हिसार राजकीय पशु फार्म के लिए विशेष विख्यात है। अनिश्चित रूप से जल आपूर्ति करनेवाली घाघर एकमात्र नदी है। यमुना नहर हिसार जिला से होकर जाती है। जलवायु शुष्क है। कपास पर आधारित उद्योग हैं। भिवानी, हिसार, हाँसी तथा सिरसा मुख्य व्यापारिक केंद्र है। अच्छी नस्ल के साँड़ों के लिए हिसार विख्यात है। हिसार की स्थापना सन १३५४ ई. में तुगलक वंश के शासक फ़िरोज़ शाह तुग़लक ने की थी। घग्गर एवं दृषद्वती नदियां एक समय हिसार से गुजरती थी। हिसार में महाद्वीपीय जलवायु देखने को मिलती है जिसमें ग्रीष्म ऋतु में बहुत गर्मी होती है तथा शीत ऋतु में बहुत ठंड होती है। यहाँ हिन्दी एवं अंग्रेज़ी सर्वाधिक बोली जाने वाली भाषाएँ हैं। यहाँ की औसत साक्षरता दर ८१.०४ प्रतिशत है। १९६० के दशक में हिसार की प्रति व्यक्ति आय भारत में सर्वाधिक थी। .

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हज़रत निज़ामुद्दीन

हजरत निज़ामुद्दीन (حضرت خواجة نظام الدّین اولیا) (1325-1236) चिश्ती घराने के चौथे संत थे। इस सूफी संत ने वैराग्य और सहनशीलता की मिसाल पेश की, कहा जाता है कि 1303 में इनके कहने पर मुगल सेना ने हमला रोक दिया था, इस प्रकार ये सभी धर्मों के लोगों में लोकप्रिय बन गए। हजरत साहब ने 92 वर्ष की आयु में प्राण त्यागे और उसी वर्ष उनके मकबरे का निर्माण आरंभ हो गया, किंतु इसका नवीनीकरण 1562 तक होता रहा। दक्षिणी दिल्ली में स्थित हजरत निज़ामुद्दीन औलिया का मकबरा सूफी काल की एक पवित्र दरगाह है। .

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हुमायूँ

मिर्जा मुहम्मद हाकिम, पुत्र अकीकेह बेगम, पुत्री बख्शी बानु बेगम, पुत्री बख्तुन्निसा बेगम, पुत्री | --> हुमायूँ एक मुगल शासक था। प्रथम मुग़ल सम्राट बाबर के पुत्र नसीरुद्दीन हुमायूँ (६ मार्च १५०८ – २२ फरवरी, १५५६) थे। यद्यपि उन के पास साम्राज्य बहुत साल तक नही रहा, पर मुग़ल साम्राज्य की नींव में हुमायूँ का योगदान है। बाबर की मृत्यु के पश्चात हुमायूँ ने १५३० में भारत की राजगद्दी संभाली और उनके सौतेले भाई कामरान मिर्ज़ा ने काबुल और लाहौर का शासन ले लिया। बाबर ने मरने से पहले ही इस तरह से राज्य को बाँटा ताकि आगे चल कर दोनों भाइयों में लड़ाई न हो। कामरान आगे जाकर हुमायूँ के कड़े प्रतिद्वंदी बने। हुमायूँ का शासन अफ़गानिस्तान, पाकिस्तान और उत्तर भारत के हिस्सों पर १५३०-१५४० और फिर १५५५-१५५६ तक रहा। भारत में उन्होने शेरशाह सूरी से हार पायी। १० साल बाद, ईरान साम्राज्य की मदद से वे अपना शासन दोबारा पा सके। इस के साथ ही, मुग़ल दरबार की संस्कृति भी मध्य एशियन से इरानी होती चली गयी। हुमायूँ के बेटे का नाम जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर था। .

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हुमायूँ का मकबरा

हुमायूँ का मकबरा इमारत परिसर मुगल वास्तुकला से प्रेरित मकबरा स्मारक है। यह नई दिल्ली के दीनापनाह अर्थात् पुराने किले के निकट निज़ामुद्दीन पूर्व क्षेत्र में मथुरा मार्ग के निकट स्थित है। गुलाम वंश के समय में यह भूमि किलोकरी किले में हुआ करती थी और नसीरुद्दीन (१२६८-१२८७) के पुत्र तत्कालीन सुल्तान केकूबाद की राजधानी हुआ करती थी। यहाँ मुख्य इमारत मुगल सम्राट हुमायूँ का मकबरा है और इसमें हुमायूँ की कब्र सहित कई अन्य राजसी लोगों की भी कब्रें हैं। यह समूह विश्व धरोहर घोषित है- अभिव्यक्ति। १७ अप्रैल २०१०।, एवं भारत में मुगल वास्तुकला का प्रथम उदाहरण है। इस मक़बरे में वही चारबाग शैली है, जिसने भविष्य में ताजमहल को जन्म दिया। यह मकबरा हुमायूँ की विधवा बेगम हमीदा बानो बेगम के आदेशानुसार १५६२ में बना था। इस भवन के वास्तुकार सैयद मुबारक इब्न मिराक घियाथुद्दीन एवं उसके पिता मिराक घुइयाथुद्दीन थे जिन्हें अफगानिस्तान के हेरात शहर से विशेष रूप से बुलवाया गया था। मुख्य इमारत लगभग आठ वर्षों में बनकर तैयार हुई और भारतीय उपमहाद्वीप में चारबाग शैली का प्रथम उदाहरण बनी। यहां सर्वप्रथम लाल बलुआ पत्थर का इतने बड़े स्तर पर प्रयोग हुआ था। १९९३ में इस इमारत समूह को युनेस्को द्वारा विश्व धरोहर स्थल घोषित किया गया। इस परिसर में मुख्य इमारत मुगल सम्राट हुमायूँ का मकबरा है। हुमायूँ की कब्र के अलावा उसकी बेगम हमीदा बानो तथा बाद के सम्राट शाहजहां के ज्येष्ठ पुत्र दारा शिकोह और कई उत्तराधिकारी मुगल सम्राट जहांदर शाह, फर्रुख्शियार, रफी उल-दर्जत, रफी उद-दौलत एवं आलमगीर द्वितीय आदि की कब्रें स्थित हैं। देल्ही थ्रु एजेज़। एस.आर.बख्शी। प्रकाशक:अनमोल प्रकाशन प्रा.लि.। १९९५।ISBN 81-7488-138-7। पृष्ठ:२९-३५ इस इमारत में मुगल स्थापत्य में एक बड़ा बदलाव दिखा, जिसका प्रमुख अंग चारबाग शैली के उद्यान थे। ऐसे उद्यान भारत में इससे पूर्व कभी नहीं दिखे थे और इसके बाद अनेक इमारतों का अभिन्न अंग बनते गये। ये मकबरा मुगलों द्वारा इससे पूर्व निर्मित हुमायुं के पिता बाबर के काबुल स्थित मकबरे बाग ए बाबर से एकदम भिन्न था। बाबर के साथ ही सम्राटों को बाग में बने मकबरों में दफ़्न करने की परंपरा आरंभ हुई थी। हिस्ट‘ओरिक गार्डन रिव्यु नंबर १३, लंदन:हिस्टॉरिक गार्डन फ़ाउडेशन, २००३ अपने पूर्वज तैमूर लंग के समरकंद (उज़्बेकिस्तान) में बने मकबरे पर आधारित ये इमारत भारत में आगे आने वाली मुगल स्थापत्य के मकबरों की प्रेरणा बना। ये स्थापत्य अपने चरम पर ताजमहल के साथ पहुंचा। .

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हेमचन्द्र विक्रमादित्य

सम्राट हेमचंद्र विक्रमादित्य सम्राट हेमचंद्र विक्रमादित्य या केवल हेमू (१५०१-१५५६) एक हिन्दू राजा था, जिसने मध्यकाल में १६वीं शताब्दी में भारत पर राज किया था। यह भारतीय इतिहास का एक महत्त्वपूर्ण समय रहा जब मुगल एवं अफगान वंश, दोनों ही दिल्ली में राज्य के लिये तत्पर थे। कई इतिहसकारों ने हेमू को 'भारत का नैपोलियन' कहा है। .

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होली

होली (Holi) वसंत ऋतु में मनाया जाने वाला एक महत्वपूर्ण भारतीय और नेपाली लोगों का त्यौहार है। यह पर्व हिंदू पंचांग के अनुसार फाल्गुन मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है। रंगों का त्यौहार कहा जाने वाला यह पर्व पारंपरिक रूप से दो दिन मनाया जाता है। यह प्रमुखता से भारत तथा नेपाल में मनाया जाता है। यह त्यौहार कई अन्य देशों जिनमें अल्पसंख्यक हिन्दू लोग रहते हैं वहाँ भी धूम-धाम के साथ मनाया जाता है। पहले दिन को होलिका जलायी जाती है, जिसे होलिका दहन भी कहते हैं। दूसरे दिन, जिसे प्रमुखतः धुलेंडी व धुरड्डी, धुरखेल या धूलिवंदन इसके अन्य नाम हैं, लोग एक दूसरे पर रंग, अबीर-गुलाल इत्यादि फेंकते हैं, ढोल बजा कर होली के गीत गाये जाते हैं और घर-घर जा कर लोगों को रंग लगाया जाता है। ऐसा माना जाता है कि होली के दिन लोग पुरानी कटुता को भूल कर गले मिलते हैं और फिर से दोस्त बन जाते हैं। एक दूसरे को रंगने और गाने-बजाने का दौर दोपहर तक चलता है। इसके बाद स्नान कर के विश्राम करने के बाद नए कपड़े पहन कर शाम को लोग एक दूसरे के घर मिलने जाते हैं, गले मिलते हैं और मिठाइयाँ खिलाते हैं। राग-रंग का यह लोकप्रिय पर्व वसंत का संदेशवाहक भी है। राग अर्थात संगीत और रंग तो इसके प्रमुख अंग हैं ही पर इनको उत्कर्ष तक पहुँचाने वाली प्रकृति भी इस समय रंग-बिरंगे यौवन के साथ अपनी चरम अवस्था पर होती है। फाल्गुन माह में मनाए जाने के कारण इसे फाल्गुनी भी कहते हैं। होली का त्यौहार वसंत पंचमी से ही आरंभ हो जाता है। उसी दिन पहली बार गुलाल उड़ाया जाता है। इस दिन से फाग और धमार का गाना प्रारंभ हो जाता है। खेतों में सरसों खिल उठती है। बाग-बगीचों में फूलों की आकर्षक छटा छा जाती है। पेड़-पौधे, पशु-पक्षी और मनुष्य सब उल्लास से परिपूर्ण हो जाते हैं। खेतों में गेहूँ की बालियाँ इठलाने लगती हैं। बच्चे-बूढ़े सभी व्यक्ति सब कुछ संकोच और रूढ़ियाँ भूलकर ढोलक-झाँझ-मंजीरों की धुन के साथ नृत्य-संगीत व रंगों में डूब जाते हैं। चारों तरफ़ रंगों की फुहार फूट पड़ती है। गुझिया होली का प्रमुख पकवान है जो कि मावा (खोया) और मैदा से बनती है और मेवाओं से युक्त होती है इस दिन कांजी के बड़े खाने व खिलाने का भी रिवाज है। नए कपड़े पहन कर होली की शाम को लोग एक दूसरे के घर होली मिलने जाते है जहाँ उनका स्वागत गुझिया,नमकीन व ठंडाई से किया जाता है। होली के दिन आम्र मंजरी तथा चंदन को मिलाकर खाने का बड़ा माहात्म्य है। .

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जना बेगम

जना बेगम मुगलकालीन भारत में उर्दू की लेखिका और पहली भारतीय विद्वान थी, जिन्होनें सत्रहवीं शताब्दी में कुरआन की कॉमंट्री (तफ़सीर) लिखी। वे अकबर के नवरत्नों में से एक अब्दुल रहीम खान-ऐ-खाना की पुत्री थीं। .

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जमाल

जमाल हिन्दी के कवि थे। .

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जयमल

;जयमल 1 पौराणिक विष्णोपासक राजा। विष्णु की पूजा में लीन रहने के कारण वह राजकाज से विरत-सा हो गया। कथा है कि उसके पूजा व्यस्त रहते जब शत्रु ने आक्रमण कर दिया भगवानविष्णु ने स्वयं लड़ाई लड़ी और शत्रु को पराजित किया। यह जानकर आक्रमणकारी भी विष्णुभक्त हो गया।; जयमल 2 प्रसिद्ध राजपूत सामंत। राणा संग्रामसिंह के पुत्र उदयसिंह के भाग जाने पर जयमल और केलावा के पुत्र ने मुगल सम्राट् अकबर के विरुद्ध चित्तौड़ की रक्षा का भार सँभाला। 1568 में अकबर के हाथों उनकी हत्या हुई। फिर भी गुणाग्राहक अकबर इन दो वीरों को नहीं भूला। उसने दोनों की प्रस्तर मूर्तियाँ बनवाकर अपने महल के सिंहद्वार पर स्थापित करवाई। श्रेणी:राजा.

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जरीब

गुंटर्स जरीब, जिसे सर्वेक्षकों की जरीब भी कहते हैं 66 फीट लम्बी होती है और इसमें सौ कड़ियाँ होती हैं। जरीब लम्बाई नापने की एक इकाई है, साथ ही जिस जंजीर से यह दूरी नापी जाती है उसे भी जरीब कहते हैं। एक जरीब की मानक लम्बाई 66 फीट अथवा 22 गज अथवा 4 लट्ठे (Rods) होती है। जरीब में कुल 100 कड़ियाँ होती हैं, इस प्रकार प्रत्येक कड़ी की लम्बाई 0.6 फ़ुट या 7.92 इंच होती है। 10 जरीब की दूरी 1 फर्लांग के बराबर और 80 जरीब की दूरी 1 मील के बराबर होती है। .

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जहाँगीर

अकबर के तीन लड़के थे। सलीम, मुराद और दानियाल (मुग़ल परिवार)। मुराद और दानियाल पिता के जीवन में शराब पीने की वजह से मर चुके थे। सलीम अकबर की मृत्यु पर नुरुद्दीन मोहम्मद जहांगीर के उपनाम से तख्त नशीन हुआ। १६०५ ई. में कई उपयोगी सुधार लागू किए। कान और नाक और हाथ आदि काटने की सजा रद्द कीं। शराब और अन्य नशा हमलावर वस्तुओं का हकमा बंद। कई अवैध महसूलात हटा दिए। प्रमुख दिनों में जानवरों का ज़बीहह बंद.

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जहाँगीर महल

जहांगीर महलआगरा किले में स्थित जहांगीर महल का निर्माण अकबर ने कराया था। आगरा किले में यह सबसे बड़ा आवासीय भवन है। इस भवन में हिन्दू और एशियाई वास्तुकला का बेहतरीन मिश्रण देखने को मिलता है। .

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जहांदार शाह

जहांदार शाह (१६६१-१७१३) हिन्दुस्तान का मुगल सम्राट था। इसने यहां १७१२-१७१३ तक राज्य किया। बहादुरशाह का ज्येष्ठ पुत्र जहाँदारशाह १६६१ में उत्पन्न हुआ। पिता की मृत्यु के पश्चात् सत्ता के लिये इसे अपने भाइयों से संघर्ष करना पड़ा। मीर बख्शी जुल्फिकार खाँ ने इसे सहायता दी। इसका एक भाई अजीम-अल-शान लाहौर के निकट युद्ध में मारा गया। शेष दो भाइयों- जहानशाह और रफी-अल-शान को पदच्युतकर सम्राट् बनने में यह सफल हुआ। विलासी प्रकृति के जहाँदारशाह ने समूचे राज्य के प्रति उपेक्षा बरती। १७१२ में अब्दुल्लाखाँ, हुसेन अलीखाँ और फर्रुखसियर ने इसके विरुद्ध पटना से कूच किया। आगरा में जहाँदारशाह ने टक्कर ली। पराजित होकर इसने दिल्ली में जुल्फिकार खाँ के पिता असदखाँ के यहाँ शरण ली। असदखाँ ने इसे दिल्ली के किले में कैद कर लिया। फर्रुखसियर ने विजयी होते ही इसकी हत्या करवा दी। .

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ज़ब्त

ज़ब्त या ज़ब्ती मध्यकाल में भारत में भूमि राजस्व के निर्धारण की एक पद्धति जो माप पर आधारित थी। यह भारत में सूरों और मुगलों के समय में प्रचलित थी। साधाणत: ज़ब्त, परंतु कभी-कभी ज़ब्ती तथा जरीब या 'अमल-ए-जरीब' कहलाती थी। अबुल फज़ल के अनुसार सूर राजा शेरशाह (१५४०-४५) और इस्लाम शाह (१५४५-५४) इस पद्धति के प्रवर्तक थे। इसकी जो प्रमुख विशेषता थी, अन्य पद्धतियों (प्राचीन पद्धतियों) से भिन्न, जो माप पर आधारित थी अर्थात् 'कनकूत' प्रति बीघा फसलों की दर (रयी) पूर्व से ही निर्धारित हो जाती थी न कि फसल की कटाई के समय। वास्तविक भूमि राजस्व की दर (रयी) की १/३ (एक तिहाई) थी, और यह नियम नापी हुई भूमि पर राजस्व प्राप्ति के लिए लागू किया जाता था। वह राजस्व पहले जिंस में ही लिया जाता था, तदुपरांत तत्कालीन मूल्यों के आधार पर नकद में परिवर्तित कर दिया जाता था। परिवर्तन वास्तव में भ्रष्टाचार एवं अयोग्यता का स्रोत था। अस्तु, अकबर (१५५६-१६०५) ने भूमि राजस्व को नकद में ही निर्धारित कराया। उपज तथा तत्कालीन दस वर्षों (१५७१-८१) के प्रचलित मूल्य दरों का विस्तृत निरीक्षण करने के पश्चात् नकद भूमि राजस्व (दस्तूर, दस्तूर-उल-अमल) प्रति बीघा विभिन्न फसलों के लिए प्रत्येक क्षेत्र (परगनों का संघ) में निर्धारित होता था। ज़ब्त में भूमि राजस्व, बोई हुई आराजी दस्तूर से गुणा करके नकद निर्धारित होता था। दस्तूर जिनमें समय समय पर परिवर्तन होता था, प्राय: प्रति वर्ष उपज और मूल्यों की दरों को देखे बिना लागू होता था। दैवी विपत्ति पड़ने पर माँग में कटौती, बिना दस्तूर में परिवर्तन के आपत्तिग्रस्त क्षेत्र (नाबुद) को आराजी में से घटाकर किया जाता था। ऐसा प्रतीत होता है कि वास्तव में, भूमि की पैमाइश प्रत्येक वर्ष नहीं होती थी, बल्कि पूर्व वर्षों की संख्याओं को ही, स्वेच्छा से परिवर्तन कर, ग्रहण कर लेते थे। पैमाइश केवल तभी होती थी जब किसान अथवा अधिकारी पहले की पैमाइश से संतुष्ट न हो, अगर वह वर्तमान उपज पर आधारित न रही हो (देखिए, 'नसक')। शेरशाह ने ज़ब्त पद्धति को, मुल्तान और कदाचित बंगाल को छोड़कर अपने संपूर्ण साम्राज्य में लागू किया था। अकबर के अधीन जब्त क्षेत्र का और अधिक विकास हुआ, यद्यपि इसमें सन्देह है कि दिल्ली और प्रांतों के बाहर विस्तृत खेतिहर भूमि की नाप तथा निर्धारण हुआ हो। मोरलैंड की विचारधारा के प्रतिकूल १७वीं शताब्दी में जब्त पद्धति का ह्रास नहीं हुआ था। वास्तव में, इसका मुर्शीद कुली खां (१६५२-५८) के द्वारा दक्षिण के मुगल प्रांतों में अधिक विस्तार हुआ था। उत्तरी भारत के प्रांतों में भी माप किए हुए क्षेत्र का विस्तार औरंगजेब (१६५९-१७०७) के अधीन, आइने अकबरी (१५९५) में लिखित क्षेत्र से काफी अधिक हुआ। मुगल साम्राज्य के पतन के साथ यह पद्धति, जिसको केंद्रित शासन के लिए बढ़ावा दिया गया था, या तो त्याग दी गई या परिवर्तित कर दी गई। परंतु कुछ समय पूर्व तक पंजाब और उत्तर प्रदेश में 'जब्ती लगान' की प्रथा थी, जो कुछ फसलों पर आराजी के आधार पर नकद में वसूल होता था। .

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ज़रदोज़ी

ज़रदोज़ी का काम रेशम पर ज़रदोज़ी फारसी एवं उर्दु: زردوزی) का काम एक प्रकार की कढ़ाई होती ह ऐ, जो भारत एवं पाकिस्तान में प्रचलित है। यह काम भारत में ऋगवेद के समय से प्रचलित है। यह मुगल बादशाह अकबर के समय में और समृद्ध हुई, किंतु बाद में राजसी संरक्षण के अभाव और औद्योगिकरण के दौर में इसका पतन होने लगा। वर्तमान में यह फिर उभरी है। अब यह भारत के लखनऊ, भोपाल और चेन्नई आदि कई शहरों में हो रही है। ज़रदोज़ी का नाम फासरी से आया है, जिसका अर्थ है: सोने की कढ़ाई। .

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ज़ेब-उन-निसा

जे़ब-अल-निसा (15 फरवरी 1638 – 26 मई 1702) एक मुग़ल शहज़ादी और बादशाह औरंगज़ेब (3 नवंबर, 1618 – 3 मार्च 1707) और उसकी मुख्य मलिका दिलरस बानो बेगम की सबसे बड़ी औलाद थी। वह एक कवित्री भी थी, जो "मख़फ़ी" (مخفی) के छद्म नाम के तहत लिखा करती था। उसके जीवन के पिछले 20 वर्षों में उसे सलीमगढ़ क़िला, दिल्ली में उसके पिता द्वारा क़ैद रखा गया है। शहज़ादी जे़ब-उन-निसा को एक कवि के रूप में याद किया जाता है, और उसका लेखन दीवान-ए-मख़फ़ी के रूप में मरणोपरांत एकत्रित किया गया था। .

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जाना बेगम

जाना बेगम एक मुग़ल महिला और विद्वान थीं। 17 वीं सदी में, वह क़ुरआन पर टिप्पणी (अरबी: तफ़सीर) करने वाली पहिली महिलाओं में से एक थीं। वह अब्दुल रहीम खान-ए-खाना, जो कि विद्वान और मुग़ल सम्राट अकबर के शासन में जनर्ल थे, की बेटी हैं। .

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जिनप्रभ सूरि

जिनप्रभ सूरि ईसवी सन् की १४वीं शताब्दी में एक असाधारण प्रतिभाशाली जैन आचार्य हो गए हैं। मुगल बादशाह अकबर के दरबार में जो स्थान जगद्गुरु हीरविजय सूरि को प्राप्त था, वही स्थान तुगलक सुलतान मुहम्मदशाह के दरबार में जिनप्रभ सूरि का था। जिनप्रभ सूरि लघु खरतर गच्छ के प्रवर्तक जिनसिंह सूरि के प्रधान शिष्य थे। संस्कृत, प्राकृत और अपभ्रंश में विविध विषयों पर इन्होंने महत्वपूर्ण ग्रंथ लिखे हैं। प्रतिदिन किसी अभिनव काव्य की रचना करने के पश्चात् ही आहारग्रहण करने का उनका नियम था। उनके जीवनकाल में बघेला वंश का अंत, गुजरात का मुसलमान बादशाहों के अधिकार में चला जाना, दिल्ली में मुगल सल्तनत का आरंभ आदि अनेक रोमांचकारी ऐतिहासिक घटनाएँ घटी थीं। जिनप्रभ सूरि को भ्रमण का बहुत शौक था तथा गुजरात, राजस्थान, मालवा, मध्यप्रदेश, बरार, दक्षिण, कर्णाटक, तेलंगाना, बिहार, अवध, उत्तर प्रदेश और पंजाब आदि स्थानों की यात्राएँ इन्होंने की थीं। अपने विविध तीर्थकाल में इस भ्रमण का विस्तृत वृतांत जिनप्रभ सूरि संकलित किया है। इस वृत्तांत के अनुसार विक्रम संवत् १२५ (११९९ ई.) में सुलतान अलाउद्दीन के छोटे भाई उल्लू खाँ (अलफ खाँ) ने दिल्ली से गुजरात पर आक्रमण किया। उस समय चित्तौड़ के नरेश समरसिंह ने उल्लू खाँ को दंड देकर मेवाड़ की रक्षा की। विविध तीर्थकल्प में बनारस के मणिकणिंकाघाट तथा देववाराणसी, राजधानी वाराणसी, मदन वाराणसी और विजयवाराणसी का उल्लेख है। राजधानी वाराणसी में यवन रहते थे। आजकल का मदनपुरा ही मदन वाराणसी हो सकता है। श्रेणी:जैन आचार्य.

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जगत गोसाई

जगत गोसाई (नस्तालीक़:, अन्य नाम: जोधाबाई, राजकुमारी मानवती बाईजी लाल सहिबा, राजकुमारी मनमती, मनभावती बाई) जोधपुर की मारवाड़ रियासत की राजपूत राजकुमारी थी, जो मुग़ल बादशाह जहाँगीर की पत्नी और पाँचवें मुग़ल बादशाह शाहजहाँ की माँ के तौर पर जानी जाती हैं। उनकी मृत्यु के बाद उन्हें बिलक़िस मकानी के नाम से सम्मानित किया गया था। .

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जगमाल सिंह

उदयसिंह द्वितीय एक भारतीय शासक था। .

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जैन धर्म का इतिहास

उदयगिरि की रानी गुम्फा जैन धर्म भारत की श्रमण परम्परा से निकला प्राचीन धर्म और दर्शन है। जैन अर्थात् कर्मों का नाश करनेवाले 'जिन भगवान' के अनुयायी। सिन्धु घाटी से मिले जैन अवशेष जैन धर्म को सबसे प्राचीन धर्म का दर्जा देते है। http://www.umich.edu/~umjains/jainismsimplified/chapter20.html  संभेद्रिखर, राजगिर, पावापुरी, गिरनार, शत्रुंजय, श्रवणबेलगोला आदि जैनों के प्रसिद्ध तीर्थ हैं। पर्यूषण या दशलाक्षणी, दिवाली और रक्षाबंधन इनके मुख्य त्योहार हैं। अहमदाबाद, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश और बंगाल आदि के अनेक जैन आजकल भारत के अग्रगण्य उद्योगपति और व्यापारियों में गिने जाते हैं। जैन धर्म का उद्भव की स्थिति अस्पष्ट है। जैन ग्रंथो के अनुसार धर्म वस्तु का स्वाभाव समझाता है, इसलिए जब से सृष्टि है तब से धर्म है, और जब तक सृष्टि है, तब तक धर्म रहेगा, अर्थात् जैन धर्म सदा से अस्तित्व में था और सदा रहेगा। इतिहासकारो द्वारा Helmuth von Glasenapp,Shridhar B. Shrotri.

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जोधपुर रियासत

सरदार सिंह, जोधपुर के महाराजा (लगभग 1900) दौलत खाना में महाराजा की सेवा में एक पुराना सैनिक नौबत खान कलवन्त (जोधपुर के राजकुमार) का भित्तिचित्र चित्र, ब्रिटिश संग्रहालय लंदन अजीत सिंह के मारवाड़ का मरणोपरांत चित्र'', 1762, ब्रुकलीन संग्रहालय से। ''मारवाड़ के महाराजा जसवंत सिंह द्वितीय, '' 1880, ब्रुकलीन संग्रहालय से। आम्बेर के महाराजा जय सिंह और मारवाड़ के महाराजा गज सिंह - आम्बेर अल्बम से फोलियो, लगभग 1630 पेंटिंग जोधपुर रियासत  मारवाड़ क्षेत्र में १२५० से १९४९ तक चली रियासत थी। इसकी राजधानी वर्ष १९५० से  जोधपुर नगर में रही। लगभग  क्षेत्रफल के साथ, जोधपुर रियासत राजपूताना की सबसे बड़ी रियासत थी। इसके अन्तिम शासक ने इसके भारत में विलय पर १ नवम्बर १९५६ को हस्ताक्षर किये। .

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जोधा बाई

'जोधा बाई' या 'जोध बाई' से निम्नलिखित व्यक्तियों का बोध होता है-.

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जोधा अकबर

यह अकबर और जोधा बाई से जुड़ा एक बहुविकल्पी लेख है, जो निम्नलिखित लेखों से जुड़ा है।..

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जोधा अकबर (2008 फ़िल्म)

जोधा अकबर 2008 में बनी हिन्दी भाषा की फिल्म है। .

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जोधा अकबर (टीवी धारावाहिक)

जोधा अकबर ज़ी टीवी पर प्रसारित होने वाला एक ऐतहासिक धारावाहिक है। कार्यक्रम का प्रथम प्रसारण 18 जून 2013 को हुआ था। मशहूर चलचित्र निर्माता एकता कपूर ने इस धारावाहिक का उत्पादन किया है। रजत टोकस एवं परिधि शर्मा मुख्य भूमिका में है। .

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वारिस शाह

वारिस शाह (पंजाबी:, ਵਾਰਿਸ ਸ਼ਾਹ) एक पंजाबी कवि थे जो मुख्य रूप से अपने "हीर राँझा" नामक काव्य-कथा के लिये मशहूर हैं। कहा जाता है कि उन्होंने हीर को "वारिस की हीर" बना कर अमर कर दिया। .

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विट्ठलनाथ

विट्टलनाथ के पिता वल्लभचार्य की तस्वीर विट्ठलनाथ वल्लभ संप्रदाय के प्रवर्तक श्री वल्लभाचार्य जी के द्वितीय पुत्र थे। गुसाईं विट्ठलनाथ का जन्म काशी के निकट चरणाट ग्राम में पौष कृष्ण नवमी को संवत्‌ १५७२ (सन्‌ १५१५ ई.) में हुआ। इनका शैशव काशी तथा प्रयाग के निकट अरैल नामक स्थान में व्यतीत हुआ। काशी में रहकर इन्होंने अपने शास्त्रगुरु श्री माधव सरस्वती से वेदांत आदि शास्त्रों का अध्ययन किया। अपने ज्येष्ठ भ्राता गोपीनाथ जी के अकाल कवलित हो जाने पर संवत्‌ १५९५ में संप्रदाय की गद्दी के स्वामी बनकर उसे नया रूप देने में लीन हो गए। धर्मप्रचार के लिए इन्होंने दो बार गुजरात की यात्रा की और अनेक धर्मप्रेमियों का वैष्णव धर्म में दीक्षित किया। वल्लभ संप्रदाय को सुसंगठित एवं व्यवस्थित रूप देने में विट्ठलनाथ का विशेष योगदान है। श्रीनाथ जी के मंदिर में सेवा पूजा की नूतन विधि, वार्षिक उत्सव, व्रतोपवास आदि की व्यवस्था कर उन्हें अत्यंत आकर्षक बनाने का श्रेय इन्हीं को है। संगीत, साहित्य, कला आदि के सम्मिश्रण द्वारा इन्होंने भक्तों के लिए अद्भुत आकर्षण की सामग्री श्रीनाथ जी के मंदिर में जुटा दी थी। अपने पिता के चार शिष्य कुंभनदास, परमानंददास तथा कृष्णदास के साथ अपने चार शिष्य चतुर्भुजदास, गोविंद स्वामी, छीतस्वामी और नंददास को मिलाकर इन्होंने अष्टछाप की स्थापना की। इन्हीं आठ सखाओं के पद श्रीनाथ जी के मंदिर में सेवा पूजा के समय गाए जाते थे। भक्तमाल में नाभादास ने लिखा है - विट्ठलनाथ का अपने समय में अत्यधिक प्रभाव था। अकबर बादशाह ने इनके अनुरोध से गोकुल में वानर, मयूर, गौ आदि के वध पर प्रतिबंध लगाया था और गोकुल की भूमि अपने फरमान से माफी में प्रदान की थी। विट्ठलनाथ जी के सात पुत्र थे जिन्हें गुसाइर्ं जी ने सात स्थानों में भेजकर संप्रदाय की सात गद्दियाँ स्थापित कर दीं। अपनी संपत्ति का भी उन्होंने अपने जीवनकाल में ही विभाजन कर दिया था। सात पुत्रों को पृथक्‌ स्थानों पर भेजने से संप्रदाय का व्यापक रूप से प्रचार संभव हुआ। इनके चौथे पुत्र गुसाई गोकुलनाथ ने चौरासी वैष्णवन की बार्ता तथा दो सौ बावन वैष्णवन की वार्ता का प्रणयन किया। कुछ विद्वान्‌ मानते हैं कि ये वार्ताएँ प्रारंभ में मौखिक रूप में कही गई थीं, बाद में इन्हें लिखित रूप मिला। विट्ठलनाथ जी के लिखे ग्रंथों में अणुभाष्य, यमुनाष्टक, सुबोधिनी की टीका, विद्वन्मंडल, भक्तिनिर्णय और शृंगाररसमंडन प्रसिद्ध हैं। शृंगाररसमंडन ग्रंथ द्वारा माधुर्य भक्ति की स्थापना में बहुत योग मिला। संवत्‌ १६४२ वि.

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विभिन्न भाषाओं में रामायण

म्यांमार के रामायण (रामजात्तौ) पर आधारित नृत्य भिन्न-भिन्न प्रकार से गिनने पर रामायण तीन सौ से लेकर एक हजार तक की संख्या में विविध रूपों में मिलती हैं। इनमें से संस्कृत में रचित वाल्मीकि रामायण (आर्ष रामायण) सबसे प्राचीन मानी जाती है। साहित्यिक शोध के क्षेत्र में भगवान राम के बारे में आधिकारिक रूप से जानने का मूल स्रोत महर्षि वाल्मीकि द्वारा रचित रामायण है। इस गौरव ग्रंथ के कारण वाल्मीकि दुनिया के आदि कवि माने जाते हैं। श्रीराम-कथा केवल वाल्मीकीय रामायण तक सीमित न रही बल्कि मुनि व्यास रचित महाभारत में भी 'रामोपाख्यान' के रूप में आरण्यकपर्व (वन पर्व) में यह कथा वर्णित हुई है। इसके अतिरिक्त 'द्रोण पर्व' तथा 'शांतिपर्व' में रामकथा के सन्दर्भ उपलब्ध हैं। बौद्ध परंपरा में श्रीराम से संबंधित दशरथ जातक, अनामक जातक तथा दशरथ कथानक नामक तीन जातक कथाएँ उपलब्ध हैं। रामायण से थोड़ा भिन्न होते हुए भी ये ग्रन्थ इतिहास के स्वर्णिम पृष्ठ हैं। जैन साहित्य में राम कथा संबंधी कई ग्रंथ लिखे गये, जिनमें मुख्य हैं- विमलसूरि कृत 'पउमचरियं' (प्राकृत), आचार्य रविषेण कृत 'पद्मपुराण' (संस्कृत), स्वयंभू कृत 'पउमचरिउ' (अपभ्रंश), रामचंद्र चरित्र पुराण तथा गुणभद्र कृत उत्तर पुराण (संस्कृत)। जैन परंपरा के अनुसार राम का मूल नाम 'पद्म' था। अन्य अनेक भारतीय भाषाओं में भी राम कथा लिखी गयीं। हिन्दी में कम से कम 11, मराठी में 8, बाङ्ला में 25, तमिल में 12, तेलुगु में 12 तथा उड़िया में 6 रामायणें मिलती हैं। हिंदी में लिखित गोस्वामी तुलसीदास कृत रामचरित मानस ने उत्तर भारत में विशेष स्थान पाया। इसके अतिरिक्त भी संस्कृत,गुजराती, मलयालम, कन्नड, असमिया, उर्दू, अरबी, फारसी आदि भाषाओं में राम कथा लिखी गयी। महाकवि कालिदास, भास, भट्ट, प्रवरसेन, क्षेमेन्द्र, भवभूति, राजशेखर, कुमारदास, विश्वनाथ, सोमदेव, गुणादत्त, नारद, लोमेश, मैथिलीशरण गुप्त, केशवदास, गुरु गोविंद सिंह, समर्थ रामदास, संत तुकडोजी महाराज आदि चार सौ से अधिक कवियों तथा संतों ने अलग-अलग भाषाओं में राम तथा रामायण के दूसरे पात्रों के बारे में काव्यों/कविताओं की रचना की है। धर्मसम्राट स्वामी करपात्री ने 'रामायण मीमांसा' की रचना करके उसमें रामगाथा को एक वैज्ञानिक आयामाधारित विवेचन दिया। वर्तमान में प्रचलित बहुत से राम-कथानकों में आर्ष रामायण, अद्भुत रामायण, कृत्तिवास रामायण, बिलंका रामायण, मैथिल रामायण, सर्वार्थ रामायण, तत्वार्थ रामायण, प्रेम रामायण, संजीवनी रामायण, उत्तर रामचरितम्, रघुवंशम्, प्रतिमानाटकम्, कम्ब रामायण, भुशुण्डि रामायण, अध्यात्म रामायण, राधेश्याम रामायण, श्रीराघवेंद्रचरितम्, मन्त्र रामायण, योगवाशिष्ठ रामायण, हनुमन्नाटकम्, आनंद रामायण, अभिषेकनाटकम्, जानकीहरणम् आदि मुख्य हैं। विदेशों में भी तिब्बती रामायण, पूर्वी तुर्किस्तानकी खोतानीरामायण, इंडोनेशिया की ककबिनरामायण, जावा का सेरतराम, सैरीराम, रामकेलिंग, पातानीरामकथा, इण्डोचायनाकी रामकेर्ति (रामकीर्ति), खमैररामायण, बर्मा (म्यांम्मार) की यूतोकी रामयागन, थाईलैंड की रामकियेनआदि रामचरित्र का बखूबी बखान करती है। इसके अलावा विद्वानों का ऐसा भी मानना है कि ग्रीस के कवि होमर का प्राचीन काव्य इलियड, रोम के कवि नोनस की कृति डायोनीशिया तथा रामायण की कथा में अद्भुत समानता है। विश्व साहित्य में इतने विशाल एवं विस्तृत रूप से विभिन्न देशों में विभिन्न कवियों/लेखकों द्वारा राम के अलावा किसी और चरित्र का इतनी श्रद्धा से वर्णन न किया गया। .

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विराटनगर (राजस्थान)

नेपाल के विराटनगर के लिये देखें, विराटनगर विराट नगर (बैराठ) राजस्थान प्रान्त के जयपुर जिले का एक शहर है। इसका पुराना नाम बैराठ है। विराट नगर राजस्थान में उत्तर में स्थित है। यह नगरी प्राचीन मत्स्य राज की राजधानी रही है। चारो और सुरम्य पर्वतों से घिरे प्राचीन मत्स्य देश की राजधानी रहे विराटनगर में पुरातात्विक अवशेषों की सम्पदा बिखरी पड़ी है या भूगर्भ में समायी हुई है। विराट नगर अरावली की पहाडियों के मध्य में बसा है। राजस्थान के जयपुर जिले में शाहपुरा के अलवर-जयपुर रोड के उत्तर-पूर्व की तरफ 25 किलोमीटर दूर विराट नगर कस्बा अपनी पौराणिक ऐतिहासिक विरासत को आज भी समेटे हुए हैं। विराटनगर नाम से प्राय: लोगों को भ्रम हो जाता है। विराटनगर नामक एक क़स्बा नेपाल की सीमा में भी है। किन्तु नेपाल का विराट नगर, महाभारत कालीन विराटनगर नहीं है। महाभारतकालीन गौरव में आराध्यदेव भगवान श्री केशवराय का मंदिर,जिसमे 3 ही कृष्ण एवम् 3 ही विष्णु की प्रतिमाये स्थित है। 64 खम्बे व108 टोड़ी है। ये केशवराय मंदिर विश्व दर्शन के लिए महत्वपूर्ण तीर्थस्थल है।इस सम्बन्ध विराटनगर पौराणिक, प्रगेतिहासिक, महाभारतकालीन तथा गुप्तकालीन ही नहीं मुगलकालीन महत्वपूर्ण घटनाओ को भी अपने में समेटे हुए, राजस्थान के जयपुर और अलवर जिले की सीमा पर स्थित है विराटनगर में पौराणिक शक्तिपीठ, गुहा चित्रों के अवशेष, बोद्ध माथों के भग्नावशेष, अशोक का शिला लेख और मुगलकालीन भवन विद्यमान है। अनेक जलाशय और कुंड इस क्षेत्र की शोभा बढा रहे हैं। प्राकर्तिक शोभा से प्रान्त परिपूर्ण है। विराटनगर के निकट सरिस्का राष्ट्रीय व्याघ्र अभ्यारण, भर्तृहरी का तपोवन, पाण्डुपोल नाल्देश्वर और सिलिसेढ़ जैसे रमणीय तथा दर्शनीय स्थल लाखों श्रद्धालुओं और पर्यटकों को आकर्षित करते है। यहाँ के दर्शय दर्शनीय स्थलो में प्रसिद्ध श्रीकेश्वराय मंदिर नगर के मध्य आकर्षक का केंद्र है। जिसमे भगवान केशव एवम् विष्णु के साथ कोई देवी (शक्ति) नहीं है। भगवान केशव का जो रूप महाभारत में था। उसी स्वरूप में भगवन श्रीकृष्ण का मंदिर दर्शनीय है। जो विराटनगर पर्यटन नगरी में सुविख्यात है। .

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विशाल जेठवा

विशाल जेठवा (अंग्रेजी: Vishal Jethwa) (जन्म: ०६ जुलाई १९९४) एक भारतीय टेलीविज़न अभिनेता है। इन्होंने अपने कैरियर की शुरुआत सोनी टीवी के पूर्व धारावाहिक भारत का वीर पुत्र – महाराणा प्रताप की थी उस धारावाहिक में इन्होंने बाल अकबर का किरदार निभाया था। इसके बाद विशाल जेठवा को महारक्षक आर्यन के लिए भी चुना गया जो ज़ी टीवी पर प्रसारित हुआ था उस धारावाहिक में विशाल ने एक सहायक भूमिका निभाई थी। २०१६ में विशाल जेठवा को एक दूजे के वास्ते जो कि सोनी टीवी २९ फ़रवरी को २०१६ को शुरू हुआ है उसमें भी इन्हें चुना गया है जिसमें इनकी कोस्टार पलक जैन है, धारावाहिक में ये श्रवण का किरदार निभा रहे हैं। २०१६ में ही विशाल को क्राइम पेटरोल के एक केस में भी अभिनय करने का मौका मिला है। .

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खुली अर्थव्यवस्था

खुली अर्थव्यवस्था (ओपेन इकनॉमी) अर्थव्यवस्था का एक दर्शन (philosophy) है। खुली अर्थव्यवस्था को अगर उसके शाब्दिक अर्थ से समझें तो इसका मतलब होता है एक ऐसा देश या समाज जहाँ किसी को किसी से भी व्यापार करने की छूट होती है और ऐसा भी नही कि इस व्यापार पे कोई सरकारी अंकुश या नियंत्रण नही होता। पर सरकार ऐसी नीतियाँ बनाती है जिससे आम लोग उद्योग और अन्य प्रकार के व्यापार आसानी से शुरू कर सकें। ऐसी अर्थव्यवस्था मे व्यापारों को स्वतंत्र रूप से फलने-फूलने दिया जाता है। सरकारी नियंत्रण ऐसे बनाये जातें है जिनमें व्यापारों को किसी भी प्रकार की बेईमानी से तो रोका जाता है पर नियंत्रण को इतना भी कड़ा नही किया जाता है कि ईमान्दार व्यापार मे असुविधा हो। खुली अर्थव्यवस्था न केवल उस समाज य देश के अंदरूनी व्यापार के लिये होती है बल्कि बाहरी व्यापार को भी उसी दृष्टि से देखा जाता है। .

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खूनी दरवाजा

खूनी दरवाजा (उर्दू خونی دروازہ), जिसे लाल दरवाजा भी कहा जाता है, दिल्ली में बहादुर शाह ज़फ़र मार्ग पर दिल्ली गेट के निकट स्थित है। यह दिल्ली के बचे हुए १३ ऐतिहासिक दरवाजों में से एक है। यह पुरानी दिल्ली के लगभग आधा किलोमीटर दक्षिण में, फ़िरोज़ शाह कोटला मैदान के सामने स्थित है। इसके पश्चिम में मौलाना आज़ाद चिकित्सीय महाविद्यालय का द्वार है। यह असल में दरवाजा न होकर तोरण है। भारतीय पुरातत्व विभाग ने इसे सुरक्षित स्मारक घोषित किया है। .

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गटका

गतका एक सिक्खों की पारंपरिक युद्धक कला है। वर्तमान में भी सिक्खों के धार्मिक उत्सवों में इस कला का शस्त्र संचालन प्रदर्शन किया जाता है। .

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गागरौन दुर्ग

गागरौन अथवा गागरन अथवा गागरों का किला भारतीय राज्य राजस्थान के झालावाड़ जिले में स्थित एक किला है। यह काली सिंध नदी और आहु नदी के संगम पर स्थित है। यह भारत की भारत के विश्व धरोहर स्थल सूची में शामील है। यह नगर से उत्तर में 13 किमी की दूरी पर स्थित है। किले के प्रवेश द्वार के निकट ही सूफी संत ख्वाजा हमीनुद्दीन चिश्ती की दरगाह है। यहां हर वर्ष तीन दिवसीय उर्स मेला भी लगता है। .

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गंग कवि

कवि गंग या 'गंग कवि' (1538 -1625 ई.) हिन्दी के कवि थे। उनका वास्तविक नाम गंगाधर था। वे अकबर के दरबारी कवि थे। जन्म, निधनतिथि तथा जन्मस्थान विवादास्पद है। वैसे ये इकनौर (जिला इटावा) के ब्रह्मभट्ट(चंडिसा राव) कहे जाते हैं। शिवसिंह सेंगर के आधार पर मिश्रबंधु इनका जन्म सं.

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गुरु अर्जुन देव

गुरु अर्जन देव के ५वे गुरु बनने की घोषणा अर्जुन देव या गुरू अर्जुन देव (15 अप्रेल 1563 – 30 मई 1606) सिखों के ५वे गुरु थे। गुरु अर्जुन देव जी शहीदों के सरताज एवं शान्तिपुंज हैं। आध्यात्मिक जगत में गुरु जी को सर्वोच्च स्थान प्राप्त है। उन्हें ब्रह्मज्ञानी भी कहा जाता है। गुरुग्रंथ साहिब में तीस रागों में गुरु जी की वाणी संकलित है। गणना की दृष्टि से श्री गुरुग्रंथ साहिब में सर्वाधिक वाणी पंचम गुरु की ही है। ग्रंथ साहिब का संपादन गुरु अर्जुन देव जी ने भाई गुरदास की सहायता से 1604में किया। ग्रंथ साहिब की संपादन कला अद्वितीय है, जिसमें गुरु जी की विद्वत्ता झलकती है। उन्होंने रागों के आधार पर ग्रंथ साहिब में संकलित वाणियों का जो वर्गीकरण किया है, उसकी मिसाल मध्यकालीन धार्मिक ग्रंथों में दुर्लभ है। यह उनकी सूझबूझ का ही प्रमाण है कि ग्रंथ साहिब में 36महान वाणीकारोंकी वाणियां बिना किसी भेदभाव के संकलित हुई। .

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गुरुग्राम

गुरुग्राम (पूर्व नाम: गुड़गाँव), हरियाणा का एक नगर है जो राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली से सटा हुआ है। यह दिल्ली से ३२ किमी.

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गौड़ (नगर)

गौड़ (आधुनिक नाम) या 'लक्ष्मणावती' (प्राचीन नाम) या 'लखनौती' (मध्यकालीन नाम) पश्चिम बंगाल के मालदा जिला में स्थित एक पुराना नगर है। यह हिंदू राजसत्ता के उत्कर्षकाल में संस्कृत विद्या के केंद्र के रूप में विख्यात थी और महाकवि जयदेव, कविवर गोवर्धनाचार्य तथा धोयी, व्याकरणचार्य उमापतिघर और शब्दकोशकार हलायुध इन सभी विद्वानों का संबंध इस प्रसिद्ध नगरी से था। इसके खंडहर बंगाल के मालदा नामक नगर से 10 मील दक्षिण पश्चिम की ओर स्थित हैं। .

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गोरखपुर

300px गोरखपुर उत्तर प्रदेश राज्य के पूर्वी भाग में नेपाल के साथ सीमा के पास स्थित भारत का एक प्रसिद्ध शहर है। यह गोरखपुर जिले का प्रशासनिक मुख्यालय भी है। यह एक धार्मिक केन्द्र के रूप में मशहूर है जो बौद्ध, हिन्दू, मुस्लिम, जैन और सिख सन्तों की साधनास्थली रहा। किन्तु मध्ययुगीन सर्वमान्य सन्त गोरखनाथ के बाद उनके ही नाम पर इसका वर्तमान नाम गोरखपुर रखा गया। यहाँ का प्रसिद्ध गोरखनाथ मन्दिर अभी भी नाथ सम्प्रदाय की पीठ है। यह महान सन्त परमहंस योगानन्द का जन्म स्थान भी है। इस शहर में और भी कई ऐतिहासिक स्थल हैं जैसे, बौद्धों के घर, इमामबाड़ा, 18वीं सदी की दरगाह और हिन्दू धार्मिक ग्रन्थों का प्रमुख प्रकाशन संस्थान गीता प्रेस। 20वीं सदी में, गोरखपुर भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन का एक केन्द्र बिन्दु था और आज यह शहर एक प्रमुख व्यापार केन्द्र बन चुका है। पूर्वोत्तर रेलवे का मुख्यालय, जो ब्रिटिश काल में 'बंगाल नागपुर रेलवे' के रूप में जाना जाता था, यहीं स्थित है। अब इसे एक औद्योगिक क्षेत्र के रूप में विकसित करने के लिये गोरखपुर औद्योगिक विकास प्राधिकरण (गीडा/GIDA) की स्थापना पुराने शहर से 15 किमी दूर की गयी है। .

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गोविंददेव मंदिर

गोविन्द देव जी का मंदिर वृंदावन में स्थित वैष्णव संप्रदाय का मंदिर है। इसका निर्माण १५९० ई. (तद. १६४७ वि॰सं॰) में हुआ था। इस मंदिर के शिला लेख से यह जानकारी पूरी तरह सुनिश्चित हो जाती है कि इस भव्य देवालय को आमेर के राजा भगवान दास के पुत्र राजा मानसिंह ने बनवाया था। रूप गोस्वामी एवं सनातन गोस्वामी नामक दो वैष्णव गुरूऔं की देखरेख में मंदिर के निर्माण होने का उल्लेख भी मिलता है। जेम्स फर्गूसन, प्रसिद्ध इतिहासकार ने लिखा है कि यह मन्दिर भारत के मन्दिरों में बड़ा शानदार है। मंदिर की भव्यता का अनुमान इस उद्धरण से लगाया जा सकता है 'औरंगज़ेब ने शाम को टहलते हुए, दक्षिण-पूर्व में दूर से दिखने वाली रौशनी के बारे जब पूछा तो पता चला कि यह चमक वृन्दावन के वैभवशाली मंदिरों की है। औरंगज़ेब, मंदिर की चमक से परेशान था, समाधान के लिए उसने तुरंत कार्यवाही के रूप में सेना भेजी। मंदिर, जितना तोड़ा जा सकता था उतना तोड़ा गया और शेष पर मस्जिद की दीवार, गुम्बद आदि बनवा दिए। कहते हैं औरंगज़ेब ने यहाँ नमाज़ में हिस्सा लिया। मंदिर का निर्माण में 5५ से १० वर्ष लगे और लगभग एक करोड़ रुपया ख़र्चा बताया गया है। सम्राट अकबर ने निर्माण के लिए लाल पत्थर दिया। श्री ग्राउस के विचार से, अकबरी दरबार के ईसाई पादरियों ने, जो यूरोप के देशों से आये थे, इस निर्माण में स्पष्ट भूमिका निभाई जिससे यूनानी क्रूस और यूरोपीय चर्च की झलक दिखती है। इस मंदिर की निर्माण शैली - हिन्दू (उत्तर-दक्षिण भारत), जयपुरी, मुग़ल, यूनानी और गोथिक का मिश्रण है। इसका लागत मूल्य- एक करोड़ रुपया (लगभग)। यह मंदिर ५-१० वर्षों में बनकर तैयार हुआ था। इसका माप- 105 x 117 फुट (200 x 120 फुट बाहर से) व ऊंचाई - 110 फुट (सात मंज़िल थीं आज केवल चार ही मौजूद हैं) १८७३ में श्री ग्राउस (तत्कालीन ज़िलाधीश मथुरा) ने मंदिर की मरम्मत का कार्य शुरू करवाया जिसमें ३८,३६५ रूपये का ख़र्च आया। जिसमें ५००० रूपये महाराजा जयपुर ने दिया और शेष सरकार ने। मरम्मत और रख रखाव आज भी जारी है लेकिन मंदिर की शोचनीय दशा को देखते हुए यह सब कुछ नगण्य है। .

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ओड़िशा का इतिहास

प्राचीन काल से मध्यकाल तक ओडिशा राज्य को कलिंग, उत्कल, उत्करात, ओड्र, ओद्र, ओड्रदेश, ओड, ओड्रराष्ट्र, त्रिकलिंग, दक्षिण कोशल, कंगोद, तोषाली, छेदि तथा मत्स आदि नामों से जाना जाता था। परन्तु इनमें से कोई भी नाम सम्पूर्ण ओडिशा को इंगित नहीं करता था। अपितु यह नाम समय-समय पर ओडिशा राज्य के कुछ भाग को ही प्रस्तुत करते थे। वर्तमान नाम ओडिशा से पूर्व इस राज्य को मध्यकाल से 'उड़ीसा' नाम से जाना जाता था, जिसे अधिकारिक रूप से 04 नवम्बर, 2011 को 'ओडिशा' नाम में परिवर्तित कर दिया गया। ओडिशा नाम की उत्पत्ति संस्कृत के शब्द 'ओड्र' से हुई है। इस राज्य की स्थापना भागीरथ वंश के राजा ओड ने की थी, जिन्होने अपने नाम के आधार पर नवीन ओड-वंश व ओड्र राज्य की स्थापना की। समय विचरण के साथ तीसरी सदी ई०पू० से ओड्र राज्य पर महामेघवाहन वंश, माठर वंश, नल वंश, विग्रह एवं मुदगल वंश, शैलोदभव वंश, भौमकर वंश, नंदोद्भव वंश, सोम वंश, गंग वंश व सूर्य वंश आदि सल्तनतों का आधिपत्य भी रहा। प्राचीन काल में ओडिशा राज्य का वृहद भाग कलिंग नाम से जाना जाता था। सम्राट अशोक ने 261 ई०पू० कलिंग पर चढ़ाई कर विजय प्राप्त की। कर्मकाण्ड से क्षुब्द हो सम्राट अशोक ने युद्ध त्यागकर बौद्ध मत को अपनाया व उनका प्रचार व प्रसार किया। बौद्ध धर्म के साथ ही सम्राट अशोक ने विभिन्न स्थानों पर शिलालेख गुदवाये तथा धौली व जगौदा गुफाओं (ओडिशा) में धार्मिक सिद्धान्तों से सम्बन्धित लेखों को गुदवाया। सम्राट अशोक, कला के माध्यम से बौद्ध धर्म का प्रचार करना चाहते थे इसलिए सम्राट अशोक ने बौद्ध धर्म को और अधिक विकसित करने हेतु ललितगिरि, उदयगिरि, रत्नागिरि व लगुन्डी (ओडिशा) में बोधिसत्व व अवलोकेतेश्वर की मूर्तियाँ बहुतायत में बनवायीं। 232 ई०पू० सम्राट अशोक की मृत्यु के पश्चात् कुछ समय तक मौर्य साम्राज्य स्थापित रहा परन्तु 185 ई०पू० से कलिंग पर चेदि वंश का आधिपत्य हो गया था। चेदि वंश के तृतीय शासक राजा खारवेल 49 ई० में राजगद्दी पर बैठा तथा अपने शासन काल में जैन धर्म को विभिन्न माध्यमों से विस्तृत किया, जिसमें से एक ओडिशा की उदयगिरि व खण्डगिरि गुफाऐं भी हैं। इसमें जैन धर्म से सम्बन्धित मूर्तियाँ व शिलालेख प्राप्त हुए हैं। चेदि वंश के पश्चात् ओडिशा (कलिंग) पर सातवाहन राजाओं ने राज्य किया। 498 ई० में माठर वंश ने कलिंग पर अपना राज्य कर लिया था। माठर वंश के बाद 500 ई० में नल वंश का शासन आरम्भ हो गया। नल वंश के दौरान भगवान विष्णु को अधिक पूजा जाता था इसलिए नल वंश के राजा व विष्णुपूजक स्कन्दवर्मन ने ओडिशा में पोडागोड़ा स्थान पर विष्णुविहार का निर्माण करवाया। नल वंश के बाद विग्रह एवं मुदगल वंश, शैलोद्भव वंश और भौमकर वंश ने कलिंग पर राज्य किया। भौमकर वंश के सम्राट शिवाकर देव द्वितीय की रानी मोहिनी देवी ने भुवनेश्वर में मोहिनी मन्दिर का निर्माण करवाया। वहीं शिवाकर देव द्वितीय के भाई शान्तिकर प्रथम के शासन काल में उदयगिरी-खण्डगिरी पहाड़ियों पर स्थित गणेश गुफा (उदयगिरी) को पुनः निर्मित कराया गया तथा साथ ही धौलिगिरी पहाड़ियों पर अर्द्यकवर्ती मठ (बौद्ध मठ) को निर्मित करवाया। यही नहीं, राजा शान्तिकर प्रथम की रानी हीरा महादेवी द्वारा 8वीं ई० हीरापुर नामक स्थान पर चौंसठ योगनियों का मन्दिर निर्मित करवाया गया। 6वीं-7वीं शती कलिंग राज्य में स्थापत्य कला के लिए उत्कृष्ट मानी गयी। चूँकि इस सदी के दौरान राजाओं ने समय-समय पर स्वर्णाजलेश्वर, रामेश्वर, लक्ष्मणेश्वर, भरतेश्वर व शत्रुघनेश्वर मन्दिरों (6वीं सदी) व परशुरामेश्वर (7वीं सदी) में निर्माण करवाया। मध्यकाल के प्रारम्भ होने से कलिंग पर सोमवंशी राजा महाशिव गुप्त ययाति द्वितीय सन् 931 ई० में गद्दी पर बैठा तथा कलिंग के इतिहास को गौरवमयी बनाने हेतु ओडिशा में भगवान जगन्नाथ के मुक्तेश्वर, सिद्धेश्वर, वरूणेश्वर, केदारेश्वर, वेताल, सिसरेश्वर, मारकण्डेश्वर, बराही व खिच्चाकेश्वरी आदि मन्दिरों सहित कुल 38 मन्दिरों का निर्माण करवाया। 15वीं शती के अन्त तक जो गंग वंश हल्का पड़ने लगा था उसने सन् 1038 ई० में सोमवंशीयों को हराकर पुनः कलिंग पर वर्चस्व स्थापित कर लिया तथा 11वीं शती में लिंगराज मन्दिर, राजारानी मन्दिर, ब्रह्मेश्वर, लोकनाथ व गुन्डिचा सहित कई छोटे व बड़े मन्दिरों का निर्माण करवाया। गंग वंश ने तीन शताब्दियों तक कलिंग पर अपना राज्य किया तथा राजकाल के दौरान 12वीं-13वीं शती में भास्करेश्वर, मेघेश्वर, यमेश्वर, कोटी तीर्थेश्वर, सारी देउल, अनन्त वासुदेव, चित्रकर्णी, निआली माधव, सोभनेश्वर, दक्क्षा-प्रजापति, सोमनाथ, जगन्नाथ, सूर्य (काष्ठ मन्दिर) बिराजा आदि मन्दिरों को निर्मित करवाया जो कि वास्तव में कलिंग के स्थापत्य इतिहास में अहम भूमिका का निर्वाह करते हैं। गंग वंश के शासन काल पश्चात् 1361 ई० में तुगलक सुल्तान फिरोजशाह तुगलक ने कलिंग पर राज्य किया। यह वह दौर था जब कलिंग में कला का वर्चस्व कम होते-होते लगभग समाप्त ही हो चुका था। चूँकि तुगलक शासक कला-विरोधी रहे इसलिए किसी भी प्रकार के मन्दिर या मठ का निर्माण नहीं हुअा। 18वीं शती के आधुनिक काल में ईस्ट इण्डिया कम्पनी का सम्पूर्ण भारत पर अधिकार हो गया था परन्तु 20वीं शती के मध्य में अंग्रेजों के निगमन से भारत देश स्वतन्त्र हुआ। जिसके फलस्वरूप सम्पूर्ण भारत कई राज्यों में विभक्त हो गया, जिसमें से भारत के पूर्व में स्थित ओडिशा (पूर्व कलिंग) भी एक राज्य बना। .

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औरंगज़ेब

अबुल मुज़फ़्फ़र मुहिउद्दीन मुहम्मद औरंगज़ेब आलमगीर (3 नवम्बर १६१८ – ३ मार्च १७०७) जिसे आमतौर पर औरंगज़ेब या आलमगीर (प्रजा द्वारा दिया हुआ शाही नाम जिसका अर्थ होता है विश्व विजेता) के नाम से जाना जाता था भारत पर राज्य करने वाला छठा मुग़ल शासक था। उसका शासन १६५८ से लेकर १७०७ में उसकी मृत्यु होने तक चला। औरंगज़ेब ने भारतीय उपमहाद्वीप पर आधी सदी से भी ज्यादा समय तक राज्य किया। वो अकबर के बाद सबसे ज्यादा समय तक शासन करने वाला मुग़ल शासक था। अपने जीवनकाल में उसने दक्षिणी भारत में मुग़ल साम्राज्य का विस्तार करने का भरसक प्रयास किया पर उसकी मृत्यु के पश्चात मुग़ल साम्राज्य सिकुड़ने लगा। औरंगज़ेब के शासन में मुग़ल साम्राज्य अपने विस्तार के चरमोत्कर्ष पर पहुंचा। वो अपने समय का शायद सबसे धनी और शातिशाली व्यक्ति था जिसने अपने जीवनकाल में दक्षिण भारत में प्राप्त विजयों के जरिये मुग़ल साम्राज्य को साढ़े बारह लाख वर्ग मील में फैलाया और १५ करोड़ लोगों पर शासन किया जो की दुनिया की आबादी का १/४ था। औरंगज़ेब ने पूरे साम्राज्य पर फ़तवा-ए-आलमगीरी (शरियत या इस्लामी क़ानून पर आधारित) लागू किया और कुछ समय के लिए ग़ैर-मुस्लिमों पर अतिरिक्त कर भी लगाया। ग़ैर-मुसलमान जनता पर शरियत लागू करने वाला वो पहला मुसलमान शासक था। मुग़ल शासनकाल में उनके शासन काल में उसके दरबारियों में सबसे ज्यादा हिन्दु थे। और सिखों के गुरु तेग़ बहादुर को दाराशिकोह के साथ मिलकर बग़ावत के जुर्म में मृत्युदंड दिया गया था। .

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आचार्य हिर्सुरीश्वरजी

आचार्य हिर्सुरीश्वरजी मुगल बादशाह अकबर के समकालीन जैन आचार्य थे। उनका जन्म 1527 में पालनपुर के ओस्वाल परिवार में हुआ। वे 1554 आचार्य बने थे। अकबर से सम्पर्क के पश्चात 60 वर्ष की आयु में उन्होंने अपने विहार की ओर प्रस्थान किया। उनके हस्तक्षेप के कारण अकबर ने शृद्धालु कर शत्रुनजय महातीर्थ से हटा दिया तथा पर्यूषण पर्व के दिनों में जानवरों के वध पर रोक लगा दी। 1596 में सौराष्ट्र के ऊना गाँव में उनका देहान्त हो गया। .

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आदिल शाह सूरी

आदिल शाह सूरी सूर वंश का सातवां और अंतिम शासक था। ये सिकंदर शाह सूरी का भ्राता था और इसने पूर्वी दिल्ली पर सिकंदर शाह सूरी के हुमायुं से १५५५ में हार जाने के ब्बाद भी शासन किया। आदिल शाह और सिकंदर शाह दिल्ली सल्तनत में मुगल बादशाह अकबर क विरुद्ध उत्तराधिकारी बने हुए थे। श्रेणी:1557 जन्म श्रेणी:1553 मृत्यु श्रेणी:Deaths श्रेणी:सूर वंश श्रेणी:पश्तून लोग.

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आधम ख़ान का मकबरा

आधम ख़ान का मकबरा (English:Adham Khan's Tomb,उर्दू: ادھم خان کا مزار, बांग्ला: আধম খানের সমাধি) 16वीं सदी की एक इमारत है। इस मकबरे में मुगल बादशाह अकबर के एक सिपहसालार आधम ख़ान को दफनाया गया था। आधम खान अकबर की धाय मां महम अनघा का छोटा पुत्र होने के नाते रिश्ते में अकबर का दूध भाई था। अकबर का चहेता होने के नाते आधम ख़ान को बेहद ताकतवर सिपहसालार था। लेकिन अकबर के दूसरे सिपहसालार अतगा खान की हत्या कर देने के बाद अकबर ने इस ज़ुर्म पर मौत की सजा सुनाते हुए आधम खान को आगरा किले की दीवार से सिर के बल नीचे फेंक देने का हुक्म दे दिया। यह मकबरा दक्षिणी दिल्ली के महरौली इलाके में स्थित है। इसका निर्माण अकबर द्वारा 1561 में करवाया गया। .

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आलमगीर द्वितीय

अज़ीज़-उद्दीन आलमगीर द्वितीय (१६९९-१७५९) (उर्दु:عالمگير) ३ जून १७५४ से ११ दिसम्बर १७५९ तक भारत में मुगल सम्राट रहा। ये जहांदार शाह का पुत्र था। .

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आईन-ए-अकबरी

आईन-ए-अकबरी (अकबर के विधान; समाप्तिकाल 1598 ई.) अबुलफ़ज्ल-ए-अल्लामी द्वारा फारसी भाषा में प्रणीत, बृहत् इतिहासपुस्तक अकबरनामा का तृतीय तथा अधिक प्रसिद्ध भाग है। यह एक बृहत्, पृथक् तथा स्वतंत्र पुस्तक है। सम्राट अकबर की प्रेरणा, प्रोत्साहन तथा आज्ञा से, असाधारण परिश्रम के फलस्वरूप पाँच बार शुद्ध कर इस ग्रंथ की रचना हुई थी। यद्यपि अबुलफ़ज्ल ने अन्य पुस्तकें भी लिखी हैं, किंतु उसे स्थायी और विश्वव्यापी कीर्ति आईन-ए-अकबरी के आधार पर ही उपलब्ध हो सकी। स्वयं अबुलफ़ज्ल के कथानानुसार उसका ध्येय महान सम्राट् की स्मृति को सुरक्षित रखना तथा जिज्ञासु का पथप्रदर्शन करना था। मुगल काल के इस्लामी जगत् में इसका यथेष्ट आदर हुआ; किंतु पाश्चात्य विद्धानों को और उनके द्वारा भारतीयों को, इस अमूल्य निधि की चेतना तब हुई जब सर्वप्रथम वारेन हेस्टिंग्स के काल में ग्लैडविन ने इसका आँशिक अनुवाद किया; तत्पश्चात् ब्लाकमैन (1873) और जैरेट (1891,1894) ने इसका संपूर्ण अनुवाद किया। ग्रंथ पाँच भागों में विभाजित है तथा सात वर्षो में समाप्त हुआ था। प्रथम भाग में सम्राट् की प्रशस्ति तथा महली और दरबारी विवरण है। दूसरे भाग में राज्यकर्मचारी, सैनिक तथा नागरिक (सिविल) पद, वैवाहिक तथा शिक्षा संबंधी नियम, विविध मनोविनोद तथा राजदरबार के आश्रित प्रमुख साहित्यकार और संगीतज्ञ वर्णित हैं। तीसरे भाग में न्याय तथा प्रबंधक (एक्ज़ोक्यूटिव) विभागों के कानून, कृषिशासन संबंधी विवरण तथा बारह सूबों की ज्ञातव्य सूचनाएँ और आँकड़े संकलित हैं। चौथे विभाग में हिंदुओं की सामाजिक दशा और उनके धर्म, दर्शन, साहित्य और विज्ञान का (संस्कृत से अनभिज्ञ होने के कारण इनका संकलन अबुलफ़ज्ल ने पंडितों के मौखिक कथनों का अनुवाद कराकर किया था), विदेशी आक्रमणकारियों और प्रमुख यात्रियों का तथा प्रसिद्ध मुस्लिम संतों का वर्णन है और पाँचवें भाग में अकबर के सुभाष्य संकलित हैं एवं लेखक का उपसंहार है। अंत में लेखक ने स्वयं अपना जिक्र किया है। इस प्रकार सम्राट्, साम्राज्यशासन तथा शासित वर्ग का आईन-ए-अकबरी में अत्यंत सूक्ष्म दिग्दर्शन है। इसकी प्रमुख विशेषता यह है कि युद्धों, षड्यंत्रों तथा वंशपरिवर्तनों के पचड़ों को प्राधान्य देने की अपेक्षा शासित वर्ग को समुचित स्थान प्रदान किया गया है। एक प्रकार से यह आधुनिक भारत का प्रथम गज़ेटियर है। इसकी सर्वाधिक महत्ता यह है कि कट्टरता और धर्मोन्माद के विरोध में हिंदू समाज, धर्म और दर्शन को विशद् गुणग्राही स्थान देकर प्रगतिशील और उदात्त दृष्टिकोण की स्थापना की गई है। अबुलफ़ज्ल ऐसे प्रकांड विद्वान् अन्य काल में भी संभव था, किंतु आईन-ए-अकबरी जैसा ग्रंथ अकबर के काल में ही संभव था, क्योंकि असाधारण विद्वान् (इसलिए वह अल्लामी के विभूषण से प्रतिष्ठित हुआ) और असाधारण सम्राट् का बौद्धिक स्तर पर उदात्त भावनाओं की प्रेरणा से पूर्ण समन्वय संभव हो सका था। आईन-ए-अकबरी पर सम्राट् की प्रशस्ति में मुख्यत: अतिशयोक्ति का दोष लगाया जाता है, किंतु ब्लाकमैन के कथनानुसार "...

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आगरा

आगरा उत्तर प्रदेश प्रान्त का एक महानगर, ज़िला शहर व तहसील है। विश्व का अजूबा ताजमहल आगरा की पहचान है और यह यमुना नदी के किनारे बसा है। आगरा २७.१८° उत्तर ७८.०२° पूर्व में यमुना नदी के तट पर स्थित है। समुद्र-तल से इसकी औसत ऊँचाई क़रीब १७१ मीटर (५६१ फ़ीट) है। आगरा उत्तर प्रदेश का तीसरा सबसे बड़ा शहर है। .

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आगरा जिला

आगरा भारतीय राज्य उत्तर प्रदेश का एक ज़िला, तहसील व नगर है। ज़िले का मुख्यालय आगरा है। .

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आगरा का किला

आगरा का किला एक यूनेस्को द्वारा घोषित विश्व धरोहर स्थल है। यह किला भारत के उत्तर प्रदेश राज्य के आगरा शहर में स्थित है। इसके लगभग 2.5 किलोमीटर उत्तर-पश्चिम में ही विश्व प्रसिद्ध स्मारक ताज महल मौजूद है। इस किले को कुछ इतिहासकार चारदीवारी से घिरी प्रासाद महल नगरी कहना बेहतर मानते हैं। यह भारत का सबसे महत्वपूर्ण किला है। भारत के मुगल सम्राट बाबर, हुमायुं, अकबर, जहांगीर, शाहजहां और औरंगज़ेब यहां रहा करते थे, व यहीं से पूरे भारत पर शासन किया करते थे। यहां राज्य का सर्वाधिक खजाना, सम्पत्ति व टकसाल थी। यहाँ विदेशी राजदूत, यात्री व उच्च पदस्थ लोगों का आना जाना लगा रहता था, जिन्होंने भारत के इतिहास को रचा। .

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इलाहाबाद

इलाहाबाद उत्तर भारत के उत्तर प्रदेश के पूर्वी भाग में स्थित एक नगर एवं इलाहाबाद जिले का प्रशासनिक मुख्यालय है। इसका प्राचीन नाम प्रयाग है। इसे 'तीर्थराज' (तीर्थों का राजा) भी कहते हैं। इलाहाबाद भारत का दूसरा प्राचीनतम बसा नगर है। हिन्दू मान्यता अनुसार, यहां सृष्टिकर्ता ब्रह्मा ने सृष्टि कार्य पूर्ण होने के बाद प्रथम यज्ञ किया था। इसी प्रथम यज्ञ के प्र और याग अर्थात यज्ञ से मिलकर प्रयाग बना और उस स्थान का नाम प्रयाग पड़ा जहाँ भगवान श्री ब्रम्हा जी ने सृष्टि का सबसे पहला यज्ञ सम्पन्न किया था। इस पावन नगरी के अधिष्ठाता भगवान श्री विष्णु स्वयं हैं और वे यहाँ माधव रूप में विराजमान हैं। भगवान के यहाँ बारह स्वरूप विध्यमान हैं। जिन्हें द्वादश माधव कहा जाता है। सबसे बड़े हिन्दू सम्मेलन महाकुंभ की चार स्थलियों में से एक है, शेष तीन हरिद्वार, उज्जैन एवं नासिक हैं। हिन्दू धर्मग्रन्थों में वर्णित प्रयाग स्थल पवित्रतम नदी गंगा और यमुना के संगम पर स्थित है। यहीं सरस्वती नदी गुप्त रूप से संगम में मिलती है, अतः ये त्रिवेणी संगम कहलाता है, जहां प्रत्येक बारह वर्ष में कुंभ मेला लगता है। इलाहाबाद में कई महत्त्वपूर्ण राज्य सरकार के कार्यालय स्थित हैं, जैसे इलाहाबाद उच्च न्यायालय, प्रधान महालेखाधिकारी (एजी ऑफ़िस), उत्तर प्रदेश राज्य लोक सेवा आयोग (पी.एस.सी), राज्य पुलिस मुख्यालय, उत्तर मध्य रेलवे मुख्यालय, केन्द्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड का क्षेत्रीय कार्यालय एवं उत्तर प्रदेश माध्यमिक शिक्षा परिषद कार्यालय। भारत सरकार द्वारा इलाहाबाद को जवाहर लाल नेहरू राष्ट्रीय शहरी नवीकरण योजना के लिये मिशन शहर के रूप में चुना गया है। .

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इलाहाबाद का इतिहास

प्रयाग का इतिहास अत्यन्त प्राचीन है। जान पड़ता है जिस प्रकार सरस्वती नदी के तट पर प्राचीन काल में बहुत से यज्ञादि होते थे उसी प्रकार आगे चलकर गंगा-यमुना के संगम पर भी हुए थे। इसी लिये 'प्रयाग' नाम पड़ा। यह तीर्थ बहुत प्राचीन काल से प्रसिद्ध है और यहाँ के जल से प्राचीन राजाओं का अभिषेक होता था। इस बात का उल्लेख वाल्मीकि रामायण में है। वन जाते समय श्री राम प्रयाग में भारद्वाज ऋषि के आश्रम पर होते हुए गए थे। प्रयाग बहुत दिनों तक कोशल राज्य के अंतर्गत था। अशोक आदि बौद्ध राजाओं के समय यहाँ बौद्धों के अनेक मठ और विहार थे। अशोक का स्तंभ अबतक किले के भीतर खड़ा है जिसमें समुद्रगुप्त की प्रशस्ति खुदी हुई है। फाहियान नामक चीनी यात्री सन् ४१४ ई० में आया था। उस समय प्रयाग कोशल राज्य में ही लगता था। प्रयाग के उस पार ही प्रतिष्ठान नामक प्रसिद्ध दुर्ग था जिसे समुद्रगुप्त ने बहुत द्दढ़ किया था। प्रयाग का अक्षयवट बहुत प्राचीन काल से प्रसिद्ध चला आता है। चीनी यात्री हुएन्सांग ईसा की सातवीं शताब्दी में भारतवर्ष में आया था। उसने अक्षयवट को देखा था। आज भी लाखों यात्री प्रयाग आकर इस वट का दर्शन करते है जो सृष्टि के आदि से माना जाता है। वर्तमान रूप में जो पुराण में मिलते हैं उनमें मत्स्यपुराण बहुत प्राचीन और प्रामाणिक माना जाता है। इस पुराण के १०२ अध्याय से लेकर १०७ अध्याय तक में इस तीर्थ के माहात्म्य का वर्णन है। उसमें लिखा है कि प्रयाग प्रजापति का क्षेत्र है जहाँ गंगा और यमुना बहती हैं। साठ सहस्त्र वीर गंगा की और स्वयं सूर्य जमुना की रक्षा करते हैं। यहाँ जो वट है उसकी रक्षा स्वयं शूलपाणि करते हैं। पाँच कुंड हैं जिनमें से होकर जाह्नवी बहती है। माघ महीने में यहाँ सब तीर्थ आकर वास करते हैं। इससे उस महीने में इस तीर्थवास का बहुत फल है। संगम पर जो लोग अग्नि द्वारा देह विसर्जित करेत हैं वे जितने रोम हैं उतने सहस्र वर्ष स्वर्ग लोक में वास करते हैं। मत्स्य पुराण के उक्त वर्णन में ध्यान देने की बात यह है कि उसमें सरस्वती का कहीं उल्लेख नहीं है जिसे पीछे से लोगों ने 'त्रिवेणी' के भ्रम में मिलाया है। वास्तव में गंगा और जमुना की दो ओर से आई हुई धाराओं और एक दोनों की संमिलित धारा से ही त्रिवेणी हो जाती है। .

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इलाहाबाद किला

इलाहाबाद का किला इलाहाबाद में संगम के निकट स्थित इस किले को मुगल सम्राट अकबर ने 1583 ई. में बनवाया था। वर्तमान में इस किले का कुछ ही भाग पर्यटकों के लिए खुला रहता है। बाकी हिस्से का प्रयोग भारतीय सेना करती है। इस किले में तीन बड़ी गैलरी हैं जहां पर ऊंची मीनारें हैं। सैलानियों को अशोक स्तंभ, सरस्वती कूप और जोधाबाई महल देखने की इजाजत है। इसके अलावा यहां अक्षय वट के नाम से मशहूर बरगद का एक पुराना पेड़ और पातालपुर मंदिर भी है। .

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इलाहाबाद/आलेख

इलाहाबाद (اللہآباد), जिसे प्रयाग (پریاگ) भी कहते हैं, उत्तर भारत के राज्य उत्तर प्रदेश के पूर्वी भाग में स्थित एक शहर एवं इलाहाबाद जिले का प्रशासनिक मुख्यालय है। शहर का प्राचीन नाम अग्ग्र (संस्कृत) है, अर्थात त्याग स्थल। हिन्दू मान्यता अनुसार, यहां सृष्टिकर्ता ब्रह्मा ने सृष्टि कार्य पूर्ण होने के बाद प्रथम बलिदान दिया था। यही सबसे बड़े हिन्दी सम्मेलन महाकुंभ की चार स्थलियों में से एक है, शेष तीन हरिद्वार, उज्जैन एवं नासिक हैं। हिन्दू धर्मग्रन्थों में वर्णित प्रयाग स्थल पवित्रतम नदी गंगा और यमुना के संगम पर स्थित है। यहीं सरस्वती नदी गुप्त रूप से संगम में मिलती है, अतः ये त्रिवेणी संगम कहलाता है, जहां प्रत्येक बारह वर्ष में कुंभ मेला लगता है। शहर का वर्तमान नाम मुगल सम्राट अकबर द्वारा १५८३ में रखा गया था। हिन्दी नाम इलाहाबाद का अर्थ अरबी शब्द इलाह (अकबर द्वारा चलाये गए नये धर्म दीन-ए-इलाही के सन्दर्भ से, अल्लाह के लिये) एवं फारसी से आबाद (अर्थात बसाया हुआ) – यानि ईश्वर द्वारा बसाया गया, या ईश्वर का शहर है। शहर में कई महत्त्वपूर्ण राज्य सरकार के कार्यालय स्थित हैं, जैसे इलाहाबाद उच्च न्यायालय, प्रधान महालेखाधिकारी (एजी ऑफ़िस), उत्तर प्रदेश राज्य लोक सेवा आयोग (पी.एस.सी), राज्य पुलिस मुख्यालय, उत्तर मध्य रेलवे मुख्यालय, केन्द्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड का क्षेत्रीय कार्यालय एवं उत्तर प्रदेश राज्य हाईस्कूल एवं इंटरमीडियेट शिक्षा कार्यालय। इलाहाबाद भारत के १४ प्रधानमंत्रियों में से ७ से संबंधित रहा है: जवाहर लाल नेहरु, लालबहादुर शास्त्री, इंदिरा गांधी, राजीव गांधी, गुलजारी लाल नंदा, विश्वनाथ प्रताप सिंह एवं चंद्रशेखर; जो या तो यहां जन्में हैं, या इलाहाबाद विश्वविद्यालय से पढ़े हैं या इलाहाबाद निर्वाचन क्षेत्र से चुने गए हैं। भारत सरकार द्वारा इलाहाबाद को जवाहरलाल नेहरु अर्बन रिन्यूअल मिशन(JNNURM) के लिये मिशन शहर के रूप में चुना गया है, जिसके अन्तर्गत शहरी अवसंरचना में सुधार, दक्ष प्रशासन एवं शहरी नागरिकों हेतु आधारभूत सुविधाओं का प्रयोजन करना है। इलाहाबाद में संगम स्थल का दृश्य इलाहाबाद शहर देश के बड़े शहरों से सड़क व रेल यातायात द्वारा जुड़ा हुआ है। शहर में आठ रेलवे-स्टेशन हैं:प्रयाग रेलवे स्टेशन, इलाहाबाद सिटी रेलवे स्टेशन, दारागंज रेलवे स्टेशन, इलाहाबाद जंक्शन रेलवे स्टेशन, नैनी जंक्शन रेलवे स्टेशन, प्रयाग घाट रेलवे स्टेशन, सूबेदारगंज रेलवे स्टेशन और बमरौली रेलवे स्टेशन। .

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इस्लाम शाह सूरी

इस्लाम शाह सूरी सूर वंश का द्वितीय शासक था। उसका वास्तविक नाम जलाल खान था, एवं वह शेरशाह सूरी का पुत्र था। उसने सात वर्ष (1545–53) दिल्ली पर शासन किया। इस्लाम शाह सूरी के बारह वर्षीय पुत्र फिरोज़ शाह सूरी उसका उत्तराधिकारी था। परंतु गद्दी पर बैठने के कुछ ही दिन बाद शेर शाह के भतीजे मुहम्मद मुबरीज़ द्वारा उसको मौत के घाट उतार दिया गया, एवं मुबरीज़ ने मुहम्मद शाह आदिल के नाम से शासन किया। .

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इस्लामी वास्तुकला

ताज महल इस्लामिक वास्तुकला की एक अनुपम कृति इस्लामी वास्तुकला एक प्रकार की वास्तु कला है जो की इस्लाम धर्म से प्रभावित है और इस्लामिक शासको एवं सरकारों द्वारा दुनिया भर में प्रचारित की गयी। .

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कड़ा-मानिकपुर

कड़ा-माणिकपुर मध्ययुगीन भारत में एक सूबा (प्रांत) था। यह सूबा दो गढ़ों: कड़ा और माणिकपुर से मिलकर बना था जो गंगा नदी के दोनो किनारों पर आमने सामने स्थित थे। आज यह भारत के राज्य उत्तर प्रदेश का हिस्सा हैं। ग्यारहवीं शताब्दी में इस्लाम के योद्धा संत गाजी सैय्यद सालार मसूद ने माणिकपुर और कड़ा के सरदारों को हराया था, हालांकि यहाँ मुस्लिम शासन की स्थापना मोहम्मद ग़ोरी के हाथों जयचंद्र की हार के बाद ही हुई थी। प्रारंभिक मुस्लिम काल में माणिकपुर और कड़ा दोनो ही सरकार के महत्वपूर्ण आधार थे। अपने चाचा को मणिकपुर और कड़ा के बीच वाली नदी की रेती पर मारकर दिल्ली का सिंहासन हासिल करने से पहले अलाउद्दीन खिलजी यहां के राज्यपाल थे। पंद्रहवीं शताब्दी में, यह सूबा कुछ समय के लिए जौनपुर के शार्की राजाओं के शासन के आधीन आ गया था लेकिन जल्द ही यह फिर से दिल्ली के शासन के आधीन आ गया। इस पर कब्जे के लिए मुस्लिमों और राजपूत शासकों के मध्य संघर्ष जारी रहे। अफगानों ने सूबे पर अपनी मजबूत पकड़ बरकरार रखी और अकबर के शासनकाल की शुरुआत में (16 वीं सदी के मध्य), माणिकपुर के राज्यपाल ने विद्रोह किया। इनका नाम अभी भी कड़ा-माणिकपुर ही है, हालांकि कड़ा अब कौशांबी जिले का हिस्सा है, जबकि माणिकपुर प्रतापगढ़ जिले में पड़ता है। .

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कणकुत प्रणाली

अकबर के समय कणकुत प्रणाली राजस्व निर्धारण की एक प्रणाली थी। हिन्दी में 'कण' का अर्थ है 'अनाज' और कुत का अर्थ है 'अनुमान'। इसके अनुसार फसल को तीन अलग-अलग पुलिन्दों में काटा जाता था -(1) अच्छा (2) मध्यम और (3) खराब। श्रेणी:प्रणाली श्रेणी:राजस्व निर्धारण की प्रणाली.

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कन्नौज

कन्नौज, भारत में उत्तर प्रदेश प्रांत के कन्नौज जिले का मुख्यालय एवं प्रमुख नगरपालिका है। शहर का नाम संस्कृत के कान्यकुब्ज शब्द से बना है। कन्नौज एक प्राचीन नगरी है एवं कभी हिंदू साम्राज्य की राजधानी के रूप में प्रतिष्ठित रहा है। माना जाता है कि कान्यकुब्ज ब्राह्मण मूल रूप से इसी स्थान के हैं। विन्ध्योत्तर निवासी एक ब्राह्मणौंकी समुह है जिनको पंचगौड कहते हैं। उनमें गौड, सारस्वत, औत्कल, मैथिल,और कान्यकुब्ज है। उनकी ऐसी प्रसिद्ध लोकोक्ति प्रचलित है- ""सर्वे द्विजाः कान्यकुब्जाःमागधीं माथुरीं विना"" कान्यकुब्जी ब्राह्मण अपनी इतिहासको बचाये रखें | वर्तमान कन्नौज शहर अपने इत्र व्यवसाय के अलावा तंबाकू के व्यापार के लिए मशहूर है। कन्नौज की जनसंख्या २००१ की जनगणना के अनुसार ७१,५३० आंकी गयी थी। यहाँ मुख्य रूप से कन्नौजी भाषा/ कनउजी भाषा के तौर पर इस्तेमाल की जाती है। यहाँ के किसानों की मुख्य फसल आलू है। .

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करनेस (कवि)

करनेस, अकबर के दरबार से संबंध रखनेवाले हिंदी के एक कवि थे। इनका जन्मकाल सन्‌ 1554 ई. और रचनाकाल 1580 ई. के लगभग माना जाता है। मिश्रबंधुविनोद के अनुसार ये नरहरि कवि (जन्म 1505 ई.) के साथ अकबर के दरबार में आया जाया करते थे। करनेस ने 'कर्णाभिरण', 'श्रुतिभूषण' तथा 'भूपभूषण' नामक तीन अलंकार संबंधी ग्रंथों की रचना की थी किंतु, उक्त सभी ग्रंथ अभी तक अप्राप्य हैं। मिश्रबंधुओं के अनुसार करनेस ने खड़ी बोली में भी कविताएँ लिखी थीं, लेकिन इनका उक्त काव्य साधारण कोटि का ही है। करनेस का 'करनेसि', 'करणेश', 'कर्नेश', आदि विभिन्न नामों से उल्लेख मिलता है। हजारीप्रसाद द्विवेदी तथा भगीरथ मिश्र इन्हें 'करनेस बंदीजन' लिखते हैं तो सरयूप्रसाद अग्रवाल ने इनका उल्लेख 'करनेश' नाम से किया है (अकबरी दरबार के हिंदी कवि); लेकिन रामचंद्र शुक्ल तथा विजयेंद्र स्नातक ने इन्हें 'करनेस कवि' ही लिखा है। असनी निवासी महापात्र करनेश कवि की चर्चा भी डॉ॰ भगीरथ मिश्र ने चंद्रशेखर बाजपेयी के प्रसंग में की है। लेकिन ये अकबरी दरबार के करनेस नहीं हैं क्योंकि चंद्रशेखर बाजपेयी का जन्म संवत्‌ 1855 वि., तद्नुसार 1798 ई. के आसपास आँका गया है। दोनों में 200 वर्ष का अंतर है, अत: दोनों दो भिन्न व्यक्ति हैं। 'रसकल्लोल' (रचना सन्‌ 1700 अथवा 1800 के आसपास) के रचयिता 'करन कवि, जिनका उल्लेख शिवसिंह सेंगर ने पन्ना नरेश के आश्रित कवि के रूप में किया और डॉ॰ भगीरथ मिश्र द्वारा उल्लिखित 'साहित्यरस' (रचना सन्‌ 1803 ई.) नामक काव्यशास्त्रीय ग्रंथ के प्रणेता 'करन' कवि भी करनेस कवि से अलग व्यक्ति हैं। .

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कलनौर

कलनौर पंजाब के गुरदासपुर जिले की एक उप तहसील हैं। .

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कलिंजर

उत्तर प्रदेश के बांदा जिले में स्थित कालिंजर बुंदेलखंड का ऐतिहासिक और सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण नगर है। प्राचीन काल में यह जेजाकभुक्ति साम्राज्य के अधीन था। यहां का किला भारत के सबसे विशाल और अपराजेय किलों में एक माना जाता है। 9वीं से 15वीं शताब्दी तक यहां चंदेल शासकों का शासन था। चंदेल राजाओं के शासनकाल में कालिंजर पर महमूद गजनवी, कुतुबुद्दीन ऐबक,शेर शाह सूरी और हुमांयू ने आक्रमण किए लेकिन जीतने में असफल रहे। अनेक प्रयासों के बावजूद मुगल कालिंजर के किले को जीत नहीं पाए। अन्तत: 1569 में अकबर ने यह किला जीता और अपने नवरत्नों में एक बीरबल को उपहारस्वरूप प्रदान किया। बीरबल क बाद यह किला बुंदेल राजा छत्रसाल के अधीन हो गया। छत्रसाल के बाद किले पर पन्ना के हरदेव शाह का अधिकार हो गया। 1812 में यह किला अंग्रेजों के नियंत्रण में आ गया। एक समय कालिंजर चारों ओर से ऊंची दीवार से घिरा हुआ था और इसमें चार प्रवेश द्वार थे। वर्तमान में कामता द्वार, पन्ना द्वार और रीवा द्वार नामक तीन प्रवेश द्वार ही शेष बचे हैं। ऐतिहासिक दृष्टि से महत्वपूर्ण यह नगर पर्यटकों को बहुत पसंद आता है। पर्यटक यहां इतिहास से रूबरू होने के लिए नियमित रूप से आते रहते हैं। धार्मिक लेख बताते हैं, कि प्रत्येक युग में इस स्थान के भिन्न नाम रहे.

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कल्ला जी राठौड़

कल्ला जी राठौड़ जसोल,मेहवा के रावल मेघराज के ज्येष्ठ पुत्र थे,इनकी मृत्यू तीसरे साका युद्ध (विक्रम संवत 1624) में चितौड़गढ में अकबर से लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हो गये थे ' ये मेवाड़ के लिये महाराणा प्रताप के साथ अकबर से युद्ध किया था ' .

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क़ुतुबुद्दीन बख़्तियार काकी

कुतब उल अक्ताब हजरत ख्वाजा सय्यद मुहम्मद बख्तियार अल्हुस्सैनी क़ुतुबुद्दीन बख़्तियार काकी चिश्ती (जन्म ११७३-मृत्यु १२३५) चिश्ती आदेश के एक मुस्लिम सूफी संत और विद्वान थे| वह ख्वाजा मोईनुद्दीन चिश्ती के अध्यात्मिक उत्तराधिकारी और शिष्य थे, जिन्होंने भारत उपमहाद्वीप में चिश्ती तरीके की नीव रखी थी| उनसे पूर्व भारत में चिश्ती तरीका अजमेर और नागौर तक ही सीमित था, उन्होंने दिल्ली में आदेश को स्थापित करने में एक प्रमुख भूमिका निभाई थी। मेहरौली में जफर महल के नजदीक स्थित उनकी दरगाह दिल्ली की सबसे प्राचीन दरगाहों में से एक हैं। इनका उर्स (परिवाण दिवस) दरगाह पर मनाया जाता है। यह रबी-उल-अव्वल की चोहदवी तारीख को (हिजरी अनुसार) वार्षिक मनाया जाता है। उर्स को दिल्ली के कई शासकों ने उच्च स्तर पर आयोजित किया था, जिनमे कुतुबुद्दीन ऐबक, इल्तुतमिश जिन्होंने उनके लिए गंधक की बाओली का निर्माण किया, शेर शाह सूरी, जिन्होंने एक भव्य प्रवेश द्वार बनवाया, बहादुर शाह प्रथम, जिन्होंने मोती मस्जिद का निर्माण कराया और फररुखसियार,जिन्होंने एक संगमरमर स्क्रीन और एक मस्जिद जोड़ा, शामिल है.

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कालिंजर दुर्ग

कालिंजर, उत्तर प्रदेश के बुन्देलखण्ड क्षेत्र के बांदा जिले में कलिंजर नगरी में स्थित एक पौराणिक सन्दर्भ वाला, ऐतिहासिक दुर्ग है जो इतिहास में सामरिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण रहा है। यह विश्व धरोहर स्थल प्राचीन मन्दिर नगरी-खजुराहो के निकट ही स्थित है। कलिंजर नगरी का मुख्य महत्त्व विन्ध्य पर्वतमाला के पूर्वी छोर पर इसी नाम के पर्वत पर स्थित इसी नाम के दुर्ग के कारण भी है। यहाँ का दुर्ग भारत के सबसे विशाल और अपराजेय किलों में एक माना जाता है। इस पर्वत को हिन्दू धर्म के लोग अत्यंत पवित्र मानते हैं, व भगवान शिव के भक्त यहाँ के मन्दिर में बड़ी संख्या में आते हैं। प्राचीन काल में यह जेजाकभुक्ति (जयशक्ति चन्देल) साम्राज्य के अधीन था। इसके बाद यह दुर्ग यहाँ के कई राजवंशों जैसे चन्देल राजपूतों के अधीन १०वीं शताब्दी तक, तदोपरांत रीवा के सोलंकियों के अधीन रहा। इन राजाओं के शासनकाल में कालिंजर पर महमूद गजनवी, कुतुबुद्दीन ऐबक, शेर शाह सूरी और हुमांयू जैसे प्रसिद्ध आक्रांताओं ने आक्रमण किए लेकिन इस पर विजय पाने में असफल रहे। अनेक प्रयासों के बाद भी आरम्भिक मुगल बादशाह भी कालिंजर के किले को जीत नहीं पाए। अन्तत: मुगल बादशाह अकबर ने इसे जीता व मुगलों से होते हुए यह राजा छत्रसाल के हाथों अन्ततः अंग्रेज़ों के अधीन आ गया। इस दुर्ग में कई प्राचीन मन्दिर हैं, जिनमें से कई तो गुप्त वंश के तृतीय -५वीं शताब्दी तक के ज्ञात हुए हैं। यहाँ शिल्पकला के बहुत से अद्भुत उदाहरण हैं। .

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काशी

काशी जैनों का मुख्य तीर्थ है यहाँ श्री पार्श्वनाथ भगवान का जन्म हुआ एवम श्री समन्तभद्र स्वामी ने अतिशय दिखाया जैसे ही लोगों ने नमस्कार करने को कहा पिंडी फट गई और उसमे से श्री चंद्रप्रभु की प्रतिमा जी निकली जो पिन्डि आज भी फटे शंकर के नाम से प्रसिद्ध है काशी विश्वनाथ मंदिर (१९१५) काशी नगरी वर्तमान वाराणसी शहर में स्थित पौराणिक नगरी है। इसे संसार के सबसे पुरानी नगरों में माना जाता है। भारत की यह जगत्प्रसिद्ध प्राचीन नगरी गंगा के वाम (उत्तर) तट पर उत्तर प्रदेश के दक्षिण-पूर्वी कोने में वरुणा और असी नदियों के गंगासंगमों के बीच बसी हुई है। इस स्थान पर गंगा ने प्राय: चार मील का दक्षिण से उत्तर की ओर घुमाव लिया है और इसी घुमाव के ऊपर इस नगरी की स्थिति है। इस नगर का प्राचीन 'वाराणसी' नाम लोकोच्चारण से 'बनारस' हो गया था जिसे उत्तर प्रदेश सरकार ने शासकीय रूप से पूर्ववत् 'वाराणसी' कर दिया है। विश्व के सर्वाधिक प्राचीन ग्रंथ ऋग्वेद में काशी का उल्लेख मिलता है - 'काशिरित्ते..

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कुम्भनदास

कुम्भनदास(१४६८-१५८३) अष्टछाप के प्रसिद्ध कवि थे। ये परमानंददास जी के समकालीन थे। कुम्भनदास का चरित "चौरासी वैष्णवन की वार्ता" के अनुसार संकलित किया जाता है। कुम्भनदास ब्रज में गोवर्धन पर्वत से कुछ दूर "जमुनावतौ" नामक गाँव में रहा करते थे। उनके घर में खेती-बाड़ी होती थी। अपने गाँव से वे पारसोली चन्द्रसरोवर होकर श्रीनाथ जी के मन्दिर में कीर्तन करने जाते थे। उनका जन्म गौरवा क्षत्रिय कुल में हुआ था। कुम्भनदास के सात पुत्र थे, जिनमें चतुर्भजदास को छोड़कर अन्य सभी कृषि कर्म में लगे रहते थे। उन्होंने १४९२ ई० में महाप्रभु वल्लभाचार्य से दीक्षा ली थी। वे पूरी तरह से विरक्त और धन, मान, मर्यादा की इच्छा से कोसों दूर थे। एक बार अकबर बादशाह के बुलाने पर इन्हें फतेहपुर सीकरी जाना पड़ा जहाँ इनका बड़ा सम्मान हुआ। पर इसका इन्हें बराबर खेद ही रहा, जैसा कि इनके इस पद से व्यंजित होता है- .

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कुंडी भंडारा

कुंडी भंडारा या खूनी भंडारा महाराष्ट्र की सीमा से सटे मध्य प्रदेश के बुरहानपुर जिले में नगरवासियों को पेयजल उपलब्ध करवाने की एक जीवित भू-जल संरचना है। मध्यकालीन भारत की इंजीनियरिंग कितनी समृद्ध रही होगी यह बुरहानपुर के कुंडी भंडारे को देखने से ही पता चलता है। 400 साल पुरानी ये जल यांत्रिकी आधुनिक युग के लिए भी एक कठिन पहेली है। उस समय कैसे सतपुड़ा की पहाड़ियों के पत्थरों को चीरकर नगर की जल आवश्यकताओं को पूरा किया गया होगा, जब न तो आज की तरह मशीनें थीं और न ही भू-गर्भ में बहते पानी के श्रोतों का पता लगाने वाले यंत्र। .

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कैथल

कैथल हरियाणा प्रान्त का एक महाभारत कालीन ऐतिहासिक शहर है। इसकी सीमा करनाल, कुरुक्षेत्र, जीन्द और पंजाब के पटियाला जिले से मिली हुई है। पुराणों के अनुसार इसकी स्थापना युधिष्ठिर ने की थी। इसे वानर राज हनुमान का जन्म स्थान भी माना जाता है। इसीलिए पहले इसे कपिस्थल के नाम से जाना जाता था। आधुनिक कैथल पहले करनाल जिले का भाग था। लेकिन 1973 ई. में यह कुरूक्षेत्र में चला गया। बाद में हरियाणा सरकार ने इसे कुरूक्षेत्र से अलग कर 1 नवम्बर 1989 ई. को स्वतंत्र जिला घोषित कर दिया। यह राष्ट्रीय राजमार्ग 65 पर स्थित है। .

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कोलकाता

बंगाल की खाड़ी के शीर्ष तट से १८० किलोमीटर दूर हुगली नदी के बायें किनारे पर स्थित कोलकाता (बंगाली: কলকাতা, पूर्व नाम: कलकत्ता) पश्चिम बंगाल की राजधानी है। यह भारत का दूसरा सबसे बड़ा महानगर तथा पाँचवा सबसे बड़ा बन्दरगाह है। यहाँ की जनसंख्या २ करोड २९ लाख है। इस शहर का इतिहास अत्यंत प्राचीन है। इसके आधुनिक स्वरूप का विकास अंग्रेजो एवं फ्रांस के उपनिवेशवाद के इतिहास से जुड़ा है। आज का कोलकाता आधुनिक भारत के इतिहास की कई गाथाएँ अपने आप में समेटे हुए है। शहर को जहाँ भारत के शैक्षिक एवं सांस्कृतिक परिवर्तनों के प्रारम्भिक केन्द्र बिन्दु के रूप में पहचान मिली है वहीं दूसरी ओर इसे भारत में साम्यवाद आंदोलन के गढ़ के रूप में भी मान्यता प्राप्त है। महलों के इस शहर को 'सिटी ऑफ़ जॉय' के नाम से भी जाना जाता है। अपनी उत्तम अवस्थिति के कारण कोलकाता को 'पूर्वी भारत का प्रवेश द्वार' भी कहा जाता है। यह रेलमार्गों, वायुमार्गों तथा सड़क मार्गों द्वारा देश के विभिन्न भागों से जुड़ा हुआ है। यह प्रमुख यातायात का केन्द्र, विस्तृत बाजार वितरण केन्द्र, शिक्षा केन्द्र, औद्योगिक केन्द्र तथा व्यापार का केन्द्र है। अजायबघर, चिड़ियाखाना, बिरला तारमंडल, हावड़ा पुल, कालीघाट, फोर्ट विलियम, विक्टोरिया मेमोरियल, विज्ञान नगरी आदि मुख्य दर्शनीय स्थान हैं। कोलकाता के निकट हुगली नदी के दोनों किनारों पर भारतवर्ष के प्रायः अधिकांश जूट के कारखाने अवस्थित हैं। इसके अलावा मोटरगाड़ी तैयार करने का कारखाना, सूती-वस्त्र उद्योग, कागज-उद्योग, विभिन्न प्रकार के इंजीनियरिंग उद्योग, जूता तैयार करने का कारखाना, होजरी उद्योग एवं चाय विक्रय केन्द्र आदि अवस्थित हैं। पूर्वांचल एवं सम्पूर्ण भारतवर्ष का प्रमुख वाणिज्यिक केन्द्र के रूप में कोलकाता का महत्त्व अधिक है। .

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कोश

कोश एक ऐसा शब्द है जिसका व्यवहार अनेक क्षेत्रों में होता है और प्रत्येक क्षेत्र में उसका अपना अर्थ और भाव है। यों इस शब्द का व्यापक प्रचार वाङ्मय के क्षेत्र में ही विशेष है और वहाँ इसका मूल अर्थ 'शब्दसंग्रह' (lexicon) है। किंतु वस्तुत: इसका प्रयोग प्रत्येक भाषा में अक्षरानुक्रम अथवा किसी अन्य क्रम से उस भाषा अथवा किसी अन्य भाषा में शब्दों की व्याख्या उपस्थित करनेवाले ग्रंथ के अर्थ में होता है। .

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कोहिनूर हीरा

Glass replica of the Koh-I-Noor as it appeared in its original form, turned upside down कोहिनूर (फ़ारसी: कूह-ए-नूर) एक १०५ कैरेट (२१.६ ग्राम) का हीरा है जो किसी समय विश्व का सबसे बड़ा ज्ञात हीरा रह चुका है। कहा जाता है कि यह हीरा भारत की गोलकुंडा की खान से निकाला गया था। 'कोहिनूर' का अर्थ है- आभा या रोशनी का पर्वत। यह कई मुगल व फारसी शासकों से होता हुआ, अन्ततः ब्रिटिश शासन के अधिकार में लिया गया, व उनके खजाने में शामिल हो गया, जब ब्रिटिश प्रधान मंत्री, बेंजामिन डिजराएली ने महारानी विक्टोरिया को १८७७ में भारत की सम्राज्ञी घोषित किया। अन्य कई प्रसिद्ध जवाहरातों की भांति ही, कोहिनूर की भी अपनी कथाएं रही हैं। इससे जुड़ी मान्यता के अनुसार, यह पुरुष स्वामियों का दुर्भाग्य व मृत्यु का कारण बना, व स्त्री स्वामिनियों के लिये सौभाग्य लेकर आया। अन्य मान्यता के अनुसार, कोहिनूर का स्वामी संसार पर राज्य करने वाला बना। .

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अब्दुल क़ादिर बदायूंनी

मुल्ला अब्द-उल-कादिर बदायुनी (१५४० - १६१५) एक फारसी मूल के भारतीय इतिहासकार एवं अनुवादक रहे थे। ये मुगल काल में भारत में सक्रिय थे।"Bada'uni, 'Abd al-Qadir." ये मुलुक शाह के पुत्र थे।Majumdar, R.C. (ed.) (2007).

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अमरकोट

अमरकोट एक नगर है जो सिंध,अमरकोट ज़िला,पाकिस्तान में स्थित है। अकबर की जन्मभूमि भी अमरकोट मानी जाती है। अमरकोट पहले सिंध की राजधानी थी। हुमायूँ के पुत्र अकबर का जन्म भी अमरकोट दुर्ग में 14 अक्टुबर 1542 को हुआ था। .

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अष्टदिग्गज

अष्टदिग्गज (तेलुगु: అష్టదిగ్గజాలు) विजयनगर राज्य के राजा कृष्णदेव राय के दरबार में विभूषित आठ कवियों के लिये प्रयुक्त शब्द है। कहा जाता है कि इस काल में तेलुगु साहित्य अपनी पराकाष्ठा तक पहुंच गया था। कृष्णदेव के दरबार में ये कवि साहित्य सभा के आठ स्तम्भ माने जाते थे। इस काल (१५४० से १६००) को तेलुगू कविता के सन्दर्भ में 'प्रबन्ध काल' भी कहा जाता है। ये अष्टदिग्गज ये हैं-.

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अहमद शाह बहादुर

अहमद शाह बहादुर (१७२५-१७७५) मुहम्मद शाह (मुगल) का पुत्र था और अपने पिता के बाद १७४८ में २३ वर्ष की आयु में १५वां मुगल सम्राट बना। इसकी माता उधमबाई थी, जो कुदसिया बेगम के नाम से प्रसिद्ध थीं। .

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अकबर बीरबल

चित्र:Birbal.jpg अकबर बीरबल भारतीय ऐतिहासिक हास्य टेलीविजन धारावाहिक है। इसका प्रसारण 28 अप्रैल 2014 को आरम्भ हुआ। किकु शारदा और विशाल कोटियान इसमें प्रमुख अभिनय भूमिका में हैं। कार्यक्रम लोकप्रचलित अकबर बीरबल कहानियों पर आधारित है। .

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अकबर के नवरत्न

अकबर के नवरत्न: टोडरमल, तानसेन, अबुल फजल, फैजी, अब्दुल रहीम भारत का महान मुगल बादशाह अकबर स्वयं निरक्षर होते हुए भी इतिहासज्ञों, चित्रकारों, सुलेख लिखने वाले केलिग्राफिस्ट, विचारकों, धर्म-गुरुओं, कलाकारों एवं बुद्धिजीवियो का विशेष प्रेमी था। कहा जाता है अकबर के दरबार में ऐसे नौ (९) गुणवान दरबारी थे जिन्हें कालांतर में अकबर के नवरत्न के नाम से भी जाना गया। .

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अकबरनामा

अकबरनामा का शाब्दिक अर्थ है अकबर की कहानी | इसे अबुल फजल जो की अकबर के दरबारी ने लिखा है। इसमे अकबर के जीवन काल की सुंदर व्याख्या है। श्रेणी:अकबर श्रेणी:मुगल श्रेणी:भारत का इतिहास श्रेणी:चित्र जोड़ें अकबरनामा 3 जिल्दो में प्राप्त होता है जिसमें तीसरा अत्यंत महत्वपूर्ण है जो आईने अकबरी के नाम से प्रसिद्ध है.

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उत्तर प्रदेश

आगरा और अवध संयुक्त प्रांत 1903 उत्तर प्रदेश सरकार का राजचिन्ह उत्तर प्रदेश भारत का सबसे बड़ा (जनसंख्या के आधार पर) राज्य है। लखनऊ प्रदेश की प्रशासनिक व विधायिक राजधानी है और इलाहाबाद न्यायिक राजधानी है। आगरा, अयोध्या, कानपुर, झाँसी, बरेली, मेरठ, वाराणसी, गोरखपुर, मथुरा, मुरादाबाद तथा आज़मगढ़ प्रदेश के अन्य महत्त्वपूर्ण शहर हैं। राज्य के उत्तर में उत्तराखण्ड तथा हिमाचल प्रदेश, पश्चिम में हरियाणा, दिल्ली तथा राजस्थान, दक्षिण में मध्य प्रदेश तथा छत्तीसगढ़ और पूर्व में बिहार तथा झारखंड राज्य स्थित हैं। इनके अतिरिक्त राज्य की की पूर्वोत्तर दिशा में नेपाल देश है। सन २००० में भारतीय संसद ने उत्तर प्रदेश के उत्तर पश्चिमी (मुख्यतः पहाड़ी) भाग से उत्तरांचल (वर्तमान में उत्तराखंड) राज्य का निर्माण किया। उत्तर प्रदेश का अधिकतर हिस्सा सघन आबादी वाले गंगा और यमुना। विश्व में केवल पाँच राष्ट्र चीन, स्वयं भारत, संयुक्त राज्य अमेरिका, इंडोनिशिया और ब्राज़ील की जनसंख्या उत्तर प्रदेश की जनसंख्या से अधिक है। उत्तर प्रदेश भारत के उत्तर में स्थित है। यह राज्य उत्तर में नेपाल व उत्तराखण्ड, दक्षिण में मध्य प्रदेश, पश्चिम में हरियाणा, दिल्ली, राजस्थान तथा पूर्व में बिहार तथा दक्षिण-पूर्व में झारखण्ड व छत्तीसगढ़ से घिरा हुआ है। उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ है। यह राज्य २,३८,५६६ वर्ग किलोमीटर के क्षेत्रफल में फैला हुआ है। यहाँ का मुख्य न्यायालय इलाहाबाद में है। कानपुर, झाँसी, बाँदा, हमीरपुर, चित्रकूट, जालौन, महोबा, ललितपुर, लखीमपुर खीरी, वाराणसी, इलाहाबाद, मेरठ, गोरखपुर, नोएडा, मथुरा, मुरादाबाद, गाजियाबाद, अलीगढ़, सुल्तानपुर, फैजाबाद, बरेली, आज़मगढ़, मुज़फ्फरनगर, सहारनपुर यहाँ के मुख्य शहर हैं। .

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उत्तर प्रदेश का इतिहास

उत्तर प्रदेश का भारतीय एवं हिन्दू धर्म के इतिहास मे अहम योगदान रहा है। उत्तर प्रदेश आधुनिक भारत के इतिहास और राजनीति का केन्द्र बिन्दु रहा है और यहाँ के निवासियों ने भारत के स्वतन्त्रता संग्राम में प्रमुख भूमिका निभायी। उत्तर प्रदेश के इतिहास को निम्नलिखित पाँच भागों में बाटकर अध्ययन किया जा सकता है- (1) प्रागैतिहासिक एवं पूर्ववैदिक काल (६०० ईसा पूर्व तक), (2) हिन्दू-बौद्ध काल (६०० ईसा पूर्व से १२०० ई तक), (3) मध्य काल (सन् १२०० से १८५७ तक), (4) ब्रिटिश काल (१८५७ से १९४७ तक) और (5) स्वातंत्रोत्तर काल (1947 से अब तक)। .

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उदयपुर

उदयपुर राजस्थान का एक नगर एवं पर्यटन स्थल है जो अपने इतिहास, संस्कृति एवम् अपने अाकर्षक स्थलों के लिये प्रसिद्ध है। इसे सन् 1559 में महाराणा उदय सिंह ने स्थापित किया था। अपनी झीलों के कारण यह शहर 'झीलों की नगरी के नाम से भी जाना जाता है। उदयपुर शहर सिसोदिया राजवंश द्वारा ‌शासित मेवाड़ की राजधानी रहा है। .

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उदयसिंह द्वितीय

उदयसिंह द्वितीय (जन्म ०४ अगस्त १५२२ – २८ फरवरी १५७२,चित्तौड़गढ़ दुर्ग, राजस्थान, भारत) एक मेवाड़के महाराणा थे और उदयपुर शहर के स्थापक थे जो वर्तमान में राजस्थान राज्य है। ये मेवाड़ साम्राज्य के ५३वें शासक थे उदयसिंह मेवाड़ के शासक महाराणा सांगा (संग्राम सिंह) के चौथे पुत्र थेTod, James (1829, reprint 2002).

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उदाकिशुनगंज

260 वर्ग मील में फैले इस उदाकिशुनगंज को 21 मई 1983 को अनुमंडल का दर्जा प्राप्त करने वाला उदाकिशुनगंज अनुमंडल का ऐतिहासिक और सांस्कृतिक गाथा गौरवशाली रहा है।छह प्रखंडों का प्रतिनिधित्व करने वाले इस अनुमंडल अंतर्गत कुल 76 ग्राम पंचायतें है। उदय सिंह और किशुन सिंह दो भाई थे.

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ऋतिक रोशन के फ़िल्मों की सूची

ऋतिक रोशन के फिल्मों की सूची। .

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१५ अक्टूबर

१५ अक्टूबर ग्रेगोरी कैलंडर के अनुसार वर्ष का २८८वां (लीप वर्ष में १८९ वां) दिन है। साल मे अभी और ७७ दिन बाकी है। .

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१५७३

१५७३ ग्रेगोरी कैलंडर का एक साधारण वर्ष है। .

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१५७५

१५७५ ग्रेगोरी कैलंडर का एक साधारण वर्ष है। .

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१७ दिसम्बर

17 दिसंबर ग्रेगोरी कैलंडर के अनुसार वर्ष का 351वॉ (लीप वर्ष मे 352 वॉ) दिन है। साल में अभी और 14 दिन बाकी है। .

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२ सितम्बर

२ सितंबर ग्रेगोरी कैलंडर के अनुसार वर्ष का २४५वाँ (लीप वर्ष मे २४६वाँ) दिन है। वर्ष मे अभी और १२० दिन बाकी है। .

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३ मार्च

3 मार्च ग्रेगोरी कैलंडर के अनुसार वर्ष का 62वॉ (लीप वर्ष में 63 वॉ) दिन है। साल में अभी और 303 दिन बाकी है। .

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