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स्मृति

सूची स्मृति

स्मृति हिन्दू धर्म के उन धर्मग्रन्थों का समूह है जिनकी मान्यता श्रुति से नीची श्रेणी की हैं और जो मानवों द्वारा उत्पन्न थे। इनमें वेद नहीं आते। स्मृति का शाब्दिक अर्थ है - "याद किया हुआ"। यद्यपि स्मृति को वेदों से नीचे का दर्ज़ा हासिल है लेकिन वे (रामायण, महाभारत, गीता, पुराण) अधिकांश हिन्दुओं द्वारा पढ़ी जाती हैं, क्योंकि वेदों को समझना बहुत कठिन है और स्मृतियों में आसान कहानियाँ और नैतिक उपदेश हैं। इसकी सीमा में विभिन्न धार्मिक ग्रन्थों—गीता, महाभारत, विष्णुसहस्रनाम की भी गणना की जाने लगी। शंकराचार्य ने इन सभी ग्रन्थों को स्मृति ही माना है। मनु ने श्रुति तथा स्मृति महत्ता को समान माना है। गौतम ऋषि ने भी यही कहा है कि ‘वेदो धर्ममूल तद्धिदां च स्मृतिशीले'। हरदत्त ने गौतम की व्खाख्या करते हुए कहा कि स्मृति से अभिप्राय है मनुस्मृति से। परन्तु उनकी यह व्याख्या उचित नहीं प्रतीत होती क्योंकि स्मृति और शील इन शब्दों का प्रयोग स्रोत के रूप में किया है, किसी विशिष्ट स्मृति ग्रन्थ या शील के लिए नहीं। स्मृति से अभिप्राय है वेदविदों की स्मरण शक्ति में पड़ी उन रूढ़ि और परम्पराओं से जिनका उल्लेख वैदिक साहित्य में नहीं किया गया है तथा शील से अभिप्राय है उन विद्वानों के व्यवहार तथा आचार में उभरते प्रमाणों से। फिर भी आपस्तम्ब ने अपने धर्म-सूत्र के प्रारम्भ में ही कहा है ‘धर्मज्ञसमयः प्रमाणं वेदाश्च’। स्मृतियों की रचना वेदों की रचना के बाद लगभग ५०० ईसा पूर्व हुआ। छठी शताब्दी ई.पू.

9 संबंधों: मनुस्मृति, महाभारत, याज्ञवल्क्य स्मृति, श्रुति, श्रीमद्भगवद्गीता, शूद्र, हिन्दू धर्म, विष्णुसहस्रनाम, वेद

मनुस्मृति

मनुस्मृति हिन्दू धर्म का एक प्राचीन धर्मशास्त्र (स्मृति) है। इसे मानव-धर्म-शास्त्र, मनुसंहिता आदि नामों से भी जाना जाता है। यह उपदेश के रूप में है जो मनु द्वारा ऋषियों को दिया गया। इसके बाद के धर्मग्रन्थकारों ने मनुस्मृति को एक सन्दर्भ के रूप में स्वीकारते हुए इसका अनुसरण किया है। धर्मशास्त्रीय ग्रंथकारों के अतिरिक्त शंकराचार्य, शबरस्वामी जैसे दार्शनिक भी प्रमाणरूपेण इस ग्रंथ को उद्धृत करते हैं। परंपरानुसार यह स्मृति स्वायंभुव मनु द्वारा रचित है, वैवस्वत मनु या प्राचनेस मनु द्वारा नहीं। मनुस्मृति से यह भी पता चलता है कि स्वायंभुव मनु के मूलशास्त्र का आश्रय कर भृगु ने उस स्मृति का उपवृहण किया था, जो प्रचलित मनुस्मृति के नाम से प्रसिद्ध है। इस 'भार्गवीया मनुस्मृति' की तरह 'नारदीया मनुस्मृति' भी प्रचलित है। मनुस्मृति वह धर्मशास्त्र है जिसकी मान्यता जगविख्यात है। न केवल भारत में अपितु विदेश में भी इसके प्रमाणों के आधार पर निर्णय होते रहे हैं और आज भी होते हैं। अतः धर्मशास्त्र के रूप में मनुस्मृति को विश्व की अमूल्य निधि माना जाता है। भारत में वेदों के उपरान्त सर्वाधिक मान्यता और प्रचलन ‘मनुस्मृति’ का ही है। इसमें चारों वर्णों, चारों आश्रमों, सोलह संस्कारों तथा सृष्टि उत्पत्ति के अतिरिक्त राज्य की व्यवस्था, राजा के कर्तव्य, भांति-भांति के विवादों, सेना का प्रबन्ध आदि उन सभी विषयों पर परामर्श दिया गया है जो कि मानव मात्र के जीवन में घटित होने सम्भव है। यह सब धर्म-व्यवस्था वेद पर आधारित है। मनु महाराज के जीवन और उनके रचनाकाल के विषय में इतिहास-पुराण स्पष्ट नहीं हैं। तथापि सभी एक स्वर से स्वीकार करते हैं कि मनु आदिपुरुष थे और उनका यह शास्त्र आदिःशास्त्र है। मनुस्मृति में चार वर्णों का व्याख्यान मिलता है वहीं पर शूद्रों को अति नीच का दर्जा दिया गया और शूद्रों का जीवन नर्क से भी बदतर कर दिया गया मनुस्मृति के आधार पर ही शूद्रों को तरह तरह की यातनाएं मनुवादियों द्वारा दी जाने लगी जो कि इसकी थोड़ी सी झलक फिल्म तीसरी आजादी में भी दिखाई गई है आगे चलकर बाबासाहेब आंबेडकर ने सर्वजन हिताय संविधान का निर्माण किया और मनु स्मृति में आग लगा दी गई जो कि समाज के लिए कल्याणकारी साबित हुई और छुआछूत ऊंच-नीच का आडंबर समाप्त हो गया। .

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महाभारत

महाभारत हिन्दुओं का एक प्रमुख काव्य ग्रंथ है, जो स्मृति वर्ग में आता है। कभी कभी केवल "भारत" कहा जाने वाला यह काव्यग्रंथ भारत का अनुपम धार्मिक, पौराणिक, ऐतिहासिक और दार्शनिक ग्रंथ हैं। विश्व का सबसे लंबा यह साहित्यिक ग्रंथ और महाकाव्य, हिन्दू धर्म के मुख्यतम ग्रंथों में से एक है। इस ग्रन्थ को हिन्दू धर्म में पंचम वेद माना जाता है। यद्यपि इसे साहित्य की सबसे अनुपम कृतियों में से एक माना जाता है, किन्तु आज भी यह ग्रंथ प्रत्येक भारतीय के लिये एक अनुकरणीय स्रोत है। यह कृति प्राचीन भारत के इतिहास की एक गाथा है। इसी में हिन्दू धर्म का पवित्रतम ग्रंथ भगवद्गीता सन्निहित है। पूरे महाभारत में लगभग १,१०,००० श्लोक हैं, जो यूनानी काव्यों इलियड और ओडिसी से परिमाण में दस गुणा अधिक हैं। हिन्दू मान्यताओं, पौराणिक संदर्भो एवं स्वयं महाभारत के अनुसार इस काव्य का रचनाकार वेदव्यास जी को माना जाता है। इस काव्य के रचयिता वेदव्यास जी ने अपने इस अनुपम काव्य में वेदों, वेदांगों और उपनिषदों के गुह्यतम रहस्यों का निरुपण किया हैं। इसके अतिरिक्त इस काव्य में न्याय, शिक्षा, चिकित्सा, ज्योतिष, युद्धनीति, योगशास्त्र, अर्थशास्त्र, वास्तुशास्त्र, शिल्पशास्त्र, कामशास्त्र, खगोलविद्या तथा धर्मशास्त्र का भी विस्तार से वर्णन किया गया हैं। .

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याज्ञवल्क्य स्मृति

याज्ञवल्क्य स्मृति धर्मशास्त्र परम्परा का एक हिन्दू धर्मशास्त्र का ग्रंथ (स्मृति) है। याज्ञवल्क्य स्मृति को अपने तरह की सबसे अच्छी एवं व्यवस्थित रचना माना जाता है। इसकी विषय-निरूपण-पद्धति अत्यंत सुग्रथित है। इसपर विरचित मिताक्षरा टीका हिंदू धर्मशास्त्र के विषय में भारतीय न्यायालयों में प्रमाण मानी जाती रही है। इसके श्लोक अनुष्टुप छंद में हैं - इसी छंद में गीता, वाल्मीकि रामायण और मनुस्मृति लिखी गई है। इसी विषय (यानि धर्मशास्त्र) पर मनुस्मृति को आधुनिक भारत में अधिक मान्यता मिली है। इसमें आचरण, व्यवहार और प्रायश्चित के तीन अलग अलग भाग हैं। .

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श्रुति

श्रुति हिन्दू धर्म के सर्वोच्च और सर्वोपरि धर्मग्रन्थों का समूह है। श्रुति का शाब्दिक अर्थ है सुना हुआ, यानि ईश्वर की वाणी जो प्राचीन काल में ऋषियों द्वारा सुनी गई थी और शिष्यों के द्वारा सुनकर जगत में फैलाई गई थी। इस दिव्य स्रोत के कारण इन्हें धर्म का सबसे महत्त्वपूर्ण स्रोत माना है। इनके अलावा अन्य ग्रंथों को स्मृति माना गया है - जिनका अर्थ है मनुष्यों के स्मरण और बुद्धि से बने ग्रंथ जो वस्तुतः श्रुति के ही मानवीय विवरण और व्याख्या माने जाते हैं। श्रुति और स्मृति में कोई भी विवाद होने पर श्रुति को ही मान्यता मिलती है, स्मृति को नहीं। श्रुति में चार वेद आते हैं: ऋग्वेद, सामवेद, यजुर्वेद और अथर्ववेद। हर वेद के चार भाग होते हैं: संहिता, ब्राह्मण-ग्रन्थ, आरण्यक और उपनिषद्। इनके अलावा बाकी सभी हिन्दू धर्मग्रन्थ स्मृति के अन्तर्गत आते हैं। स्मृतियों, धर्मसूत्रों, मीमांसा, ग्रंथों, निबन्धों महापुराणों में जो कुछ भी कहा गया है वह श्रुति की महती मान्यता को स्वीकार करके ही कहा गया है ऐसी धारणा सभी प्राचीन धर्मग्रन्थों में मिलती है। अपने प्रमाण के लिए ये ग्रन्थ श्रुति को ही आदर्श बताते हैं हिन्दू परम्पराओ के अनुसार इस मान्यता का कारण यह है कि ‘श्रुतु’ ब्रह्मा द्वारा निर्मित है यह भावना जन सामान्य में प्रचलित है चूँकि सृष्टि का नियन्ता ब्रह्मा है इसीलिए उसके मुख से निकले हुए वचन पुर्ण प्रमाणिक हैं तथा प्रत्येक नियम के आदि स्रोत हैं। इसकी छाप प्राचीनकाल में इतनी गहरी थी कि वेद शब्द श्रद्धा और आस्था का द्योतक बन गया। इसीलिए पीछे की कुछ शास्त्रों को महत्ता प्रदान करने के लिए उनके रचयिताओं ने उनके नाम के पीछे वेद शब्द जोड़ दिया। सम्भवतः यही कारण है कि धनुष चलाने के शास्त्र को धनुर्वेद तथा चिकित्सा विषयक शास्त्र को आयुर्वेद की संज्ञा दी गई है। महाभारत को भी पंचम वेद इसीलिए कहा गया है कि उसकी महत्ता को अत्यधिक बल दिया जा सके। उदाहरणार्थ मनु की संहिता को मनुस्मृति माना जाता है। इसके अनुसार समाज, परिवार, व्यापार दण्डादि के जो प्रावधान हैं वह मनु द्वारा विचारित और वेदों की वाणी पर आधारित हैं। लेकिन ये ईश्वर द्वारा कहे गए शब्द (या नियम) नहीं हैं। अतः ये एक स्मृति ग्रंथ है। लेकिन ईशावास्योपनिषद एक श्रुति है क्योंकि इसमें ईश्वर की वाणी का उन ऋषियों द्वारा शब्दांतरण है। वेदों को श्रुति दो वजह से कहा जाता है.

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श्रीमद्भगवद्गीता

कुरु क्षेत्र की युद्धभूमि में श्रीकृष्ण ने अर्जुन को जो उपदेश दिया था वह श्रीमद्भगवदगीता के नाम से प्रसिद्ध है। यह महाभारत के भीष्मपर्व का अंग है। गीता में १८ अध्याय और ७०० श्लोक हैं। जैसा गीता के शंकर भाष्य में कहा है- तं धर्मं भगवता यथोपदिष्ट वेदव्यास: सर्वज्ञोभगवान् गीताख्यै: सप्तभि: श्लोकशतैरु पनिबंध। ज्ञात होता है कि लगभग ८वीं सदी के अंत में शंकराचार्य (७८८-८२०) के सामने गीता का वही पाठ था जो आज हमें उपलब्ध है। १०वीं सदी के लगभग भीष्मपर्व का जावा की भाषा में एक अनुवाद हुआ था। उसमें अनेक मूलश्लोक भी सुरक्षित हैं। श्रीपाद कृष्ण बेल्वेलकर के अनुसार जावा के इस प्राचीन संस्करण में गीता के केवल साढ़े इक्यासी श्लोक मूल संस्कृत के हैं। उनसे भी वर्तमान पाठ का समर्थन होता है। गीता की गणना प्रस्थानत्रयी में की जाती है, जिसमें उपनिषद् और ब्रह्मसूत्र भी संमिलित हैं। अतएव भारतीय परंपरा के अनुसार गीता का स्थान वही है जो उपनिषद् और ब्रह्मसूत्रों का है। गीता के माहात्म्य में उपनिषदों को गौ और गीता को उसका दुग्ध कहा गया है। इसका तात्पर्य यह है कि उपनिषदों की जो अध्यात्म विद्या थी, उसको गीता सर्वांश में स्वीकार करती है। उपनिषदों की अनेक विद्याएँ गीता में हैं। जैसे, संसार के स्वरूप के संबंध में अश्वत्थ विद्या, अनादि अजन्मा ब्रह्म के विषय में अव्ययपुरुष विद्या, परा प्रकृति या जीव के विषय में अक्षरपुरुष विद्या और अपरा प्रकृति या भौतिक जगत के विषय में क्षरपुरुष विद्या। इस प्रकार वेदों के ब्रह्मवाद और उपनिषदों के अध्यात्म, इन दोनों की विशिष्ट सामग्री गीता में संनिविष्ट है। उसे ही पुष्पिका के शब्दों में ब्रह्मविद्या कहा गया है। गीता में 'ब्रह्मविद्या' का आशय निवृत्तिपरक ज्ञानमार्ग से है। इसे सांख्यमत कहा जाता है जिसके साथ निवृत्तिमार्गी जीवनपद्धति जुड़ी हुई है। लेकिन गीता उपनिषदों के मोड़ से आगे बढ़कर उस युग की देन है, जब एक नया दर्शन जन्म ले रहा था जो गृहस्थों के प्रवृत्ति धर्म को निवृत्ति मार्ग के समकक्ष और उतना ही फलदायक मानता था। इसी का संकेत देनेवाला गीता की पुष्पिका में ‘योगशास्त्रे’ शब्द है। यहाँ ‘योगशास्त्रे’ का अभिप्राय नि:संदेह कर्मयोग से ही है। गीता में योग की दो परिभाषाएँ पाई जाती हैं। एक निवृत्ति मार्ग की दृष्टि से जिसमें ‘समत्वं योग उच्यते’ कहा गया है अर्थात् गुणों के वैषम्य में साम्यभाव रखना ही योग है। सांख्य की स्थिति यही है। योग की दूसरी परिभाषा है ‘योग: कर्मसु कौशलम’ अर्थात् कर्मों में लगे रहने पर भी ऐसे उपाय से कर्म करना कि वह बंधन का कारण न हो और कर्म करनेवाला उसी असंग या निर्लेप स्थिति में अपने को रख सके जो ज्ञानमार्गियों को मिलती है। इसी युक्ति का नाम बुद्धियोग है और यही गीता के योग का सार है। गीता के दूसरे अध्याय में जो ‘तस्य प्रज्ञाप्रतिष्ठिता’ की धुन पाई जाती है, उसका अभिप्राय निर्लेप कर्म की क्षमतावली बुद्धि से ही है। यह कर्म के संन्यास द्वारा वैराग्य प्राप्त करने की स्थिति न थी बल्कि कर्म करते हुए पदे पदे मन को वैराग्यवाली स्थिति में ढालने की युक्ति थी। यही गीता का कर्मयोग है। जैसे महाभारत के अनेक स्थलों में, वैसे ही गीता में भी सांख्य के निवृत्ति मार्ग और कर्म के प्रवृत्तिमार्ग की व्याख्या और प्रशंसा पाई जाती है। एक की निंदा और दूसरे की प्रशंसा गीता का अभिमत नहीं, दोनों मार्ग दो प्रकार की रु चि रखनेवाले मनुष्यों के लिए हितकर हो सकते हैं और हैं। संभवत: संसार का दूसरा कोई भी ग्रंथ कर्म के शास्त्र का प्रतिपादन इस सुंदरता, इस सूक्ष्मता और निष्पक्षता से नहीं करता। इस दृष्टि से गीता अद्भुत मानवीय शास्त्र है। इसकी दृष्टि एकांगी नहीं, सर्वांगपूर्ण है। गीता में दर्शन का प्रतिपादन करते हुए भी जो साहित्य का आनंद है वह इसकी अतिरिक्त विशेषता है। तत्वज्ञान का सुसंस्कृत काव्यशैली के द्वारा वर्णन गीता का निजी सौरभ है जो किसी भी सहृदय को मुग्ध किए बिना नहीं रहता। इसीलिए इसका नाम भगवद्गीता पड़ा, भगवान् का गाया हुआ ज्ञान। .

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शूद्र

शूद्रों का सर्वप्रथम उल्लेख ऋग्वेद के दसवें मण्डल के पुरुष सुक्त में मिलता है, जिसमें शूद्रों को विराट पुरुष के पैरों से उत्पन्न बताया गया है। यजुर्वेद में शूद्रों की उपमा समाजरूपी शरीर के पैरों से दी गई है; इसीलिये कुछ लोग इनकी उत्पत्ति ब्रह्मा के पैरों से मानते हैं। परन्तु वैज्ञानिक दृष्टि से भी देखा जाए तो किसी मानव के विभिन्न अंगों से किसी व्यक्ति को पैदा नहीं किया जा सकता है l यह केवल भारतीय काल्पनिक ग्रंथों में ही संभव है l हालाँकि की कुछ मुर्ख स्टेम सेल के उदाहरण देते हैं, परन्तु जहां लोगों को रहने और खाने का तरीका न वहां स्टेम सेल की बात करना मूर्खता है l शूद्रों को दलित, हरिजन, अछूत आदि नामो से संबोधित किया जाता है l .

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हिन्दू धर्म

हिन्दू धर्म (संस्कृत: सनातन धर्म) एक धर्म (या, जीवन पद्धति) है जिसके अनुयायी अधिकांशतः भारत,नेपाल और मॉरिशस में बहुमत में हैं। इसे विश्व का प्राचीनतम धर्म कहा जाता है। इसे 'वैदिक सनातन वर्णाश्रम धर्म' भी कहते हैं जिसका अर्थ है कि इसकी उत्पत्ति मानव की उत्पत्ति से भी पहले से है। विद्वान लोग हिन्दू धर्म को भारत की विभिन्न संस्कृतियों एवं परम्पराओं का सम्मिश्रण मानते हैं जिसका कोई संस्थापक नहीं है। यह धर्म अपने अन्दर कई अलग-अलग उपासना पद्धतियाँ, मत, सम्प्रदाय और दर्शन समेटे हुए हैं। अनुयायियों की संख्या के आधार पर ये विश्व का तीसरा सबसे बड़ा धर्म है। संख्या के आधार पर इसके अधिकतर उपासक भारत में हैं और प्रतिशत के आधार पर नेपाल में हैं। हालाँकि इसमें कई देवी-देवताओं की पूजा की जाती है, लेकिन वास्तव में यह एकेश्वरवादी धर्म है। इसे सनातन धर्म अथवा वैदिक धर्म भी कहते हैं। इण्डोनेशिया में इस धर्म का औपचारिक नाम "हिन्दु आगम" है। हिन्दू केवल एक धर्म या सम्प्रदाय ही नहीं है अपितु जीवन जीने की एक पद्धति है। .

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विष्णुसहस्रनाम

विष्णुसहस्रनाम विष्णु के 1000 नामों की महिमा श्रीविष्णुसहस्रनाम (श्लोक में विष्णु के एक हजार नाम) ॐ नमो भगवते वासुदेवाय। ॐ विश्वं विष्णु:-वषठ्कारो भूत-भव्य-भवत-प्रभुः। भूत-कृत भूत-भृत भावो भूतात्मा भूतभावनः।। १।। पूतात्मा परमात्मा च मुक्तानां परमा गतिः। अव्ययः पुरुशः साक्षी क्षेत्रज्ञो अक्षर एव च।। २।। योगो योग-विदां नेता प्रधान-पुरुशेश्वरः। नारसिंह-वपुः श्रीमान केशवः पुरुशोत्तमः।। ३।। सर्वः शर्वः शिवः स्थाणु: भूतादि: निधि:-अव्ययः। संभवो भावनो भर्ता प्रभवः प्रभु:-ईश्वरः।। ४।। स्वयंभूः शम्भु: आदित्यः पुष्कराक्षो महास्वनः। अनादि-निधनो धाता विधाता धातुरुत्तमः।। ५।। अप्रमेयो हृषीकेशः पद्मनाभो-अमरप्रभुः। विश्वकर्मा मनुस्त्वष्टा स्थविष्ठः स्थविरो ध्रुवः।। ६।। अग्राह्यः शाश्वतः कृष्णो लोहिताक्षः प्रतर्दनः। प्रभूतः त्रिककुब-धाम पवित्रं मंगलं परं।। ७।। ईशानः प्राणदः प्राणो ज्येष्ठः श्रेष्ठः प्रजापतिः। हिरण्य-गर्भो भू-गर्भो माधवो मधुसूदनः।। ८।। ईश्वरो विक्रमी धन्वी मेधावी विक्रमः क्रमः। अनुत्तमो दुराधर्षः कृतज्ञः कृति:-आत्मवान।। ९।। सुरेशः शरणं शर्म विश्व-रेताः प्रजा-भवः। अहः संवत्सरो व्यालः प्रत्ययः सर्वदर्शनः।। १०।। अजः सर्वेश्वरः सिद्धः सिद्धिः सर्वादि:-अच्युतः। वृषाकपि:-अमेयात्मा सर्व-योग-विनिःसृतः।। ११।। वसु:-वसुमनाः सत्यः समात्मा संमितः समः। अमोघः पुण्डरीकाक्षो वृषकर्मा वृषाकृतिः।। १२।। रुद्रो बहु-शिरा बभ्रु: विश्वयोनिः-शुचि-श्रवाः। अमृतः शाश्वतः-स्थाणु:-वरारोहो महातपाः।। १३।। सर्वगः सर्वविद्-भानु:-विष्वक-सेनो जनार्दनः। वेदो वेदविद-अव्यंगो वेदांगो वेदवित् कविः।। १४।। लोकाध्यक्षः सुराध्यक्षो धर्माध्यक्षः कृता-कृतः। चतुरात्मा चतु:-व्यूह:-चतु:-दंष्ट्र:-चतु:-भुजः।। १५।। भ्राजिष्णु:-भोजनं भोक्ता सहिष्णु:-जगदादिजः। अनघो विजयो जेता विश्वयोनिः पुनर्वसुः।। १६।। उपेंद्रो वामनः प्रांशु:-अमोघः शुचि:-ऊर्जितः। अतींद्रः संग्रहः सर्गो धृतात्मा नियमो यमः।। १७।। वेद्यो वैद्यः सदायोगी वीरहा माधवो मधुः। अति-इंद्रियो महामायो महोत्साहो महाबलः।। १८।। महाबुद्धि:-महा-वीर्यो महा-शक्ति: महा-द्युतिः। अनिर्देश्य-वपुः श्रीमान अमेयात्मा महाद्रि-धृक।। १९।। महेष्वासो महीभर्ता श्रीनिवासः सतां गतिः। अनिरुद्धः सुरानंदो गोविंदो गोविदां-पतिः।। २०।। मरीचि:-दमनो हंसः सुपर्णो भुजगोत्तमः। हिरण्यनाभः सुतपाः पद्मनाभः प्रजापतिः।। २१।। अमृत्युः सर्व-दृक् सिंहः सन-धाता संधिमान स्थिरः। अजो दुर्मर्षणः शास्ता विश्रुतात्मा सुरारिहा।। २२।। गुरुः-गुरुतमो धामः सत्यः-सत्य-पराक्रमः। निमिषो-अ-निमिषः स्रग्वी वाचस्पति:-उदार-धीः।। २३।। अग्रणी:-ग्रामणीः श्रीमान न्यायो नेता समीरणः। सहस्र-मूर्धा विश्वात्मा सहस्राक्षः सहस्रपात।। २४।। आवर्तनो निवृत्तात्मा संवृतः सं-प्रमर्दनः। अहः संवर्तको वह्निः अनिलो धरणीधरः।। २५।। सुप्रसादः प्रसन्नात्मा विश्वधृक्-विश्वभुक्-विभुः। सत्कर्ता सकृतः साधु: जह्नु:-नारायणो नरः।। २६।। असंख्येयो-अप्रमेयात्मा विशिष्टः शिष्ट-कृत्-शुचिः। सिद्धार्थः सिद्धसंकल्पः सिद्धिदः सिद्धिसाधनः।। २७।। वृषाही वृषभो विष्णु:-वृषपर्वा वृषोदरः। वर्धनो वर्धमानश्च विविक्तः श्रुति-सागरः।। २८।। सुभुजो दुर्धरो वाग्मी महेंद्रो वसुदो वसुः। नैक-रूपो बृहद-रूपः शिपिविष्टः प्रकाशनः।। २९।। ओज:-तेजो-द्युतिधरः प्रकाश-आत्मा प्रतापनः। ऋद्धः स्पष्टाक्षरो मंत्र:-चंद्रांशु:-भास्कर-द्युतिः।। ३०।। अमृतांशूद्भवो भानुः शशबिंदुः सुरेश्वरः। औषधं जगतः सेतुः सत्य-धर्म-पराक्रमः।। ३१।। भूत-भव्य-भवत्-नाथः पवनः पावनो-अनलः। कामहा कामकृत-कांतः कामः कामप्रदः प्रभुः।। ३२।। युगादि-कृत युगावर्तो नैकमायो महाशनः। अदृश्यो व्यक्तरूपश्च सहस्रजित्-अनंतजित।। ३३।। इष्टो विशिष्टः शिष्टेष्टः शिखंडी नहुषो वृषः। क्रोधहा क्रोधकृत कर्ता विश्वबाहु: महीधरः।। ३४।। अच्युतः प्रथितः प्राणः प्राणदो वासवानुजः। अपाम निधिरधिष्टानम् अप्रमत्तः प्रतिष्ठितः।। ३५।। स्कन्दः स्कन्द-धरो धुर्यो वरदो वायुवाहनः। वासुदेवो बृहद भानु: आदिदेवः पुरंदरः।। ३६।। अशोक:-तारण:-तारः शूरः शौरि:-जनेश्वर:। अनुकूलः शतावर्तः पद्मी पद्मनिभेक्षणः।। ३७।। पद्मनाभो-अरविंदाक्षः पद्मगर्भः शरीरभृत। महर्धि-ऋद्धो वृद्धात्मा महाक्षो गरुडध्वजः।। ३८।। अतुलः शरभो भीमः समयज्ञो हविर्हरिः। सर्वलक्षण लक्षण्यो लक्ष्मीवान समितिंजयः।। ३९।। विक्षरो रोहितो मार्गो हेतु: दामोदरः सहः। महीधरो महाभागो वेगवान-अमिताशनः।। ४०।। उद्भवः क्षोभणो देवः श्रीगर्भः परमेश्वरः। करणं कारणं कर्ता विकर्ता गहनो गुहः।। ४१।। व्यवसायो व्यवस्थानः संस्थानः स्थानदो-ध्रुवः। परर्र्द्विः परमस्पष्टः-तुष्टः पुष्टः शुभेक्शणः।। ४२।। रामो विरामो विरजो मार्गो नेयो नयो-अनयः। वीरः शक्तिमतां श्रेष्टः धर्मो धर्मविदुत्तमः।। ४३।। वैकुंठः पुरुषः प्राणः प्राणदः प्रणवः पृथुः। हिरण्यगर्भः शत्रुघ्नो व्याप्तो वायुरधोक्षजः।। ४४।। ऋतुः सुदर्शनः कालः परमेष्ठी परिग्रहः। उग्रः संवत्सरो दक्षो विश्रामो विश्व-दक्षिणः।। ४५।। विस्तारः स्थावर: स्थाणुः प्रमाणं बीजमव्ययम। अर्थो अनर्थो महाकोशो महाभोगो महाधनः।। ४६।। अनिर्विण्णः स्थविष्ठो-अभूर्धर्म-यूपो महा-मखः। नक्षत्रनेमि: नक्षत्री क्षमः क्षामः समीहनः।। ४७।। यज्ञ इज्यो महेज्यश्च क्रतुः सत्रं सतां गतिः। सर्वदर्शी विमुक्तात्मा सर्वज्ञो ज्ञानमुत्तमं।। ४८।। सुव्रतः सुमुखः सूक्ष्मः सुघोषः सुखदः सुहृत। मनोहरो जित-क्रोधो वीरबाहुर्विदारणः।। ४९।। स्वापनः स्ववशो व्यापी नैकात्मा नैककर्मकृत। वत्सरो वत्सलो वत्सी रत्नगर्भो धनेश्वरः।। ५०।। धर्मगुब धर्मकृद धर्मी सदसत्क्षरं-अक्षरं। अविज्ञाता सहस्त्रांशु: विधाता कृतलक्षणः।। ५१।। गभस्तिनेमिः सत्त्वस्थः सिंहो भूतमहेश्वरः। आदिदेवो महादेवो देवेशो देवभृद गुरुः।। ५२।। उत्तरो गोपतिर्गोप्ता ज्ञानगम्यः पुरातनः। शरीर भूतभृद्भोक्ता कपींद्रो भूरिदक्षिणः।। ५३।। सोमपो-अमृतपः सोमः पुरुजित पुरुसत्तमः। विनयो जयः सत्यसंधो दाशार्हः सात्वतां पतिः।। ५४।। जीवो विनयिता-साक्षी मुकुंदो-अमितविक्रमः। अम्भोनिधिरनंतात्मा महोदधिशयो-अंतकः।। ५५।। अजो महार्हः स्वाभाव्यो जितामित्रः प्रमोदनः। आनंदो नंदनो नंदः सत्यधर्मा त्रिविक्रमः।। ५६।। महर्षिः कपिलाचार्यः कृतज्ञो मेदिनीपतिः। त्रिपदस्त्रिदशाध्यक्षो महाश्रृंगः कृतांतकृत।। ५७।। महावराहो गोविंदः सुषेणः कनकांगदी। गुह्यो गभीरो गहनो गुप्तश्चक्र-गदाधरः।। ५८।। वेधाः स्वांगोऽजितः कृष्णो दृढः संकर्षणो-अच्युतः। वरूणो वारुणो वृक्षः पुष्कराक्षो महामनाः।। ५९।। भगवान भगहानंदी वनमाली हलायुधः। आदित्यो ज्योतिरादित्यः सहीष्णु:-गतिसत्तमः।। ६०।। सुधन्वा खण्डपरशुर्दारुणो द्रविणप्रदः। दिवि:-स्पृक् सर्वदृक व्यासो वाचस्पति:-अयोनिजः।। ६१।। त्रिसामा सामगः साम निर्वाणं भेषजं भिषक। संन्यासकृत्-छमः शांतो निष्ठा शांतिः परायणम।। ६२।। शुभांगः शांतिदः स्रष्टा कुमुदः कुवलेशयः। गोहितो गोपतिर्गोप्ता वृषभाक्षो वृषप्रियः।। ६३।। अनिवर्ती निवृत्तात्मा संक्षेप्ता क्षेमकृत्-शिवः। श्रीवत्सवक्षाः श्रीवासः श्रीपतिः श्रीमतां वरः।। ६४।। श्रीदः श्रीशः श्रीनिवासः श्रीनिधिः श्रीविभावनः। श्रीधरः श्रीकरः श्रेयः श्रीमाऩ्-लोकत्रयाश्रयः।। ६५।। स्वक्षः स्वंगः शतानंदो नंदिर्ज्योतिर्गणेश्वर:। विजितात्मा विधेयात्मा सत्कीर्तिश्छिन्नसंशयः।। ६६।। उदीर्णः सर्वत:-चक्षुरनीशः शाश्वतस्थिरः। भूशयो भूषणो भूतिर्विशोकः शोकनाशनः।। ६७।। अर्चिष्मानर्चितः कुंभो विशुद्धात्मा विशोधनः। अनिरुद्धोऽप्रतिरथः प्रद्युम्नोऽमितविक्रमः।। ६८।। कालनेमिनिहा वीरः शौरिः शूरजनेश्वरः। त्रिलोकात्मा त्रिलोकेशः केशवः केशिहा हरिः।। ६९।। कामदेवः कामपालः कामी कांतः कृतागमः। अनिर्देश्यवपुर्विष्णु: वीरोअनंतो धनंजयः।। ७०।। ब्रह्मण्यो ब्रह्मकृत् ब्रह्मा ब्रह्म ब्रह्मविवर्धनः। ब्रह्मविद ब्राह्मणो ब्रह्मी ब्रह्मज्ञो ब्राह्मणप्रियः।। ७१।। महाक्रमो महाकर्मा महातेजा महोरगः। महाक्रतुर्महायज्वा महायज्ञो महाहविः।। ७२।। स्तव्यः स्तवप्रियः स्तोत्रं स्तुतिः स्तोता रणप्रियः। पूर्णः पूरयिता पुण्यः पुण्यकीर्तिरनामयः।। ७३।। मनोजवस्तीर्थकरो वसुरेता वसुप्रदः। वसुप्रदो वासुदेवो वसुर्वसुमना हविः।। ७४।। सद्गतिः सकृतिः सत्ता सद्भूतिः सत्परायणः। शूरसेनो यदुश्रेष्ठः सन्निवासः सुयामुनः।। ७५।। भूतावासो वासुदेवः सर्वासुनिलयो-अनलः। दर्पहा दर्पदो दृप्तो दुर्धरो-अथापराजितः।। ७६।। विश्वमूर्तिमहार्मूर्ति:-दीप्तमूर्ति:-अमूर्तिमान। अनेकमूर्तिरव्यक्तः शतमूर्तिः शताननः।। ७७।। एको नैकः सवः कः किं यत-तत-पदमनुत्तमम। लोकबंधु:-लोकनाथो माधवो भक्तवत्सलः।। ७८।। सुवर्णोवर्णो हेमांगो वरांग:चंदनांगदी। वीरहा विषमः शून्यो घृताशीरऽचलश्चलः।। ७९।। अमानी मानदो मान्यो लोकस्वामी त्रिलोकधृक। सुमेधा मेधजो धन्यः सत्यमेधा धराधरः।। ८०।। तेजोवृषो द्युतिधरः सर्वशस्त्रभृतां वरः। प्रग्रहो निग्रहो व्यग्रो नैकश्रृंगो गदाग्रजः।। ८१।। चतुर्मूर्ति:-चतुर्बाहु:-श्चतुर्व्यूह:-चतुर्गतिः। चतुरात्मा चतुर्भाव:चतुर्वेदविदेकपात।। ८२।। समावर्तो-अनिवृत्तात्मा दुर्जयो दुरतिक्रमः। दुर्लभो दुर्गमो दुर्गो दुरावासो दुरारिहा।। ८३।। शुभांगो लोकसारंगः सुतंतुस्तंतुवर्धनः। इंद्रकर्मा महाकर्मा कृतकर्मा कृतागमः।। ८४।। उद्भवः सुंदरः सुंदो रत्ननाभः सुलोचनः। अर्को वाजसनः श्रृंगी जयंतः सर्वविज-जयी।। ८५।। सुवर्णबिंदुरक्षोभ्यः सर्ववागीश्वरेश्वरः। महाह्रदो महागर्तो महाभूतो महानिधः।। ८६।। कुमुदः कुंदरः कुंदः पर्जन्यः पावनो-अनिलः। अमृताशो-अमृतवपुः सर्वज्ञः सर्वतोमुखः।। ८७।। सुलभः सुव्रतः सिद्धः शत्रुजिच्छत्रुतापनः। न्यग्रोधो.औदुंबरो-अश्वत्थ:-चाणूरांध्रनिषूदनः।। ८८।। सहस्रार्चिः सप्तजिव्हः सप्तैधाः सप्तवाहनः। अमूर्तिरनघो-अचिंत्यो भयकृत्-भयनाशनः।। ८९।। अणु:-बृहत कृशः स्थूलो गुणभृन्निर्गुणो महान्। अधृतः स्वधृतः स्वास्यः प्राग्वंशो वंशवर्धनः।। ९०।। भारभृत्-कथितो योगी योगीशः सर्वकामदः। आश्रमः श्रमणः क्षामः सुपर्णो वायुवाहनः।। ९१।। धनुर्धरो धनुर्वेदो दंडो दमयिता दमः। अपराजितः सर्वसहो नियंता नियमो यमः।। ९२।। सत्त्ववान सात्त्विकः सत्यः सत्यधर्मपरायणः। अभिप्रायः प्रियार्हो-अर्हः प्रियकृत-प्रीतिवर्धनः।। ९३।। विहायसगतिर्ज्योतिः सुरुचिर्हुतभुग विभुः। रविर्विरोचनः सूर्यः सविता रविलोचनः।। ९४।। अनंतो हुतभुग्भोक्ता सुखदो नैकजोऽग्रजः। अनिर्विण्णः सदामर्षी लोकधिष्ठानमद्भुतः।। ९५।। सनात्-सनातनतमः कपिलः कपिरव्ययः। स्वस्तिदः स्वस्तिकृत स्वस्ति स्वस्तिभुक स्वस्तिदक्षिणः।। ९६।। अरौद्रः कुंडली चक्री विक्रम्यूर्जितशासनः। शब्दातिगः शब्दसहः शिशिरः शर्वरीकरः।। ९७।। अक्रूरः पेशलो दक्षो दक्षिणः क्षमिणां वरः। विद्वत्तमो वीतभयः पुण्यश्रवणकीर्तनः।। ९८।। उत्तारणो दुष्कृतिहा पुण्यो दुःस्वप्ननाशनः। वीरहा रक्षणः संतो जीवनः पर्यवस्थितः।। ९९।। अनंतरूपो-अनंतश्री: जितमन्यु: भयापहः। चतुरश्रो गभीरात्मा विदिशो व्यादिशो दिशः।। १००।। अनादिर्भूर्भुवो लक्ष्मी: सुवीरो रुचिरांगदः। जननो जनजन्मादि: भीमो भीमपराक्रमः।। १०१।। आधारनिलयो-धाता पुष्पहासः प्रजागरः। ऊर्ध्वगः सत्पथाचारः प्राणदः प्रणवः पणः।। १०२।। प्रमाणं प्राणनिलयः प्राणभृत प्राणजीवनः। तत्त्वं तत्त्वविदेकात्मा जन्ममृत्यु जरातिगः।। १०३।। भूर्भवः स्वस्तरुस्तारः सविता प्रपितामहः। यज्ञो यज्ञपतिर्यज्वा यज्ञांगो यज्ञवाहनः।। १०४।। यज्ञभृत्-यज्ञकृत्-यज्ञी यज्ञभुक्-यज्ञसाधनः। यज्ञान्तकृत-यज्ञगुह्यमन्नमन्नाद एव च।। १०५।। आत्मयोनिः स्वयंजातो वैखानः सामगायनः। देवकीनंदनः स्रष्टा क्षितीशः पापनाशनः।। १०६।। शंखभृन्नंदकी चक्री शार्ंगधन्वा गदाधरः। रथांगपाणिरक्षोभ्यः सर्वप्रहरणायुधः।। १०७।। सर्वप्रहरणायुध ॐ नमः इति। वनमालि गदी शार्ंगी शंखी चक्री च नंदकी। श्रीमान् नारायणो विष्णु:-वासुदेवोअभिरक्षतु।। .

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वेद

वेद प्राचीन भारत के पवितत्रतम साहित्य हैं जो हिन्दुओं के प्राचीनतम और आधारभूत धर्मग्रन्थ भी हैं। भारतीय संस्कृति में वेद सनातन वर्णाश्रम धर्म के, मूल और सबसे प्राचीन ग्रन्थ हैं, जो ईश्वर की वाणी है। ये विश्व के उन प्राचीनतम धार्मिक ग्रंथों में हैं जिनके पवित्र मन्त्र आज भी बड़ी आस्था और श्रद्धा से पढ़े और सुने जाते हैं। 'वेद' शब्द संस्कृत भाषा के विद् शब्द से बना है। इस तरह वेद का शाब्दिक अर्थ 'ज्ञान के ग्रंथ' है। इसी धातु से 'विदित' (जाना हुआ), 'विद्या' (ज्ञान), 'विद्वान' (ज्ञानी) जैसे शब्द आए हैं। आज 'चतुर्वेद' के रूप में ज्ञात इन ग्रंथों का विवरण इस प्रकार है -.

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