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सर्कस

सूची सर्कस

सन् १९०० में एक सर्कस का विज्ञापन सर्कस (Circus) एक चलती-फिरती कलाकारों की कम्पनी होती है जिसमें नट (acrobats), विदूषक (clown), अनेक प्रकार के जानवर (जैसे टाइगर आदि) एवं अन्य प्रकार के भयानक करतब दिखाने वाले कलाकार होते हैं। सर्क्स एक वृत्तिय या अण्डाकार घेरे (रिंग) में दिखाया जाता है जिसके चारो तरफ दर्शकों के बैठने की व्यवस्था होती है। अधिकांशत: यह सब कुछ एक विशाल तम्बू के नीचे व्यवस्थित होता है। .

3 संबंधों: तम्बू, नट, विदूषक

तम्बू

सैनिक तम्बू अमेरिकी थलसेना का एक तम्बू जिसमें लकड़ी का प्रवेशद्वार, जलवाय-नियंत्रण इकाई, सुरक्षा के लिये बालू भरे बोरे, आदि हैं द्वितीय विश्वयुद्ध के समय का स्विस तम्बू तम्बू एक शरणस्थली (shelter) होती है जो कपड़े या अन्य चीज से बनी होती है और खम्भों (poles) के फ्रेम पर तना होता है। पहले बंजारा लोग इसका इस्तेमाल पोर्टेबल घर बनाने के लिये किया करते थे किन्तु आजकल यह मनोरंजन के लिये शिविर बनाने एवं अस्थायी घर बनाने (सेना, पुलिस आदि के लिये) किया जाता है। .

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नट

नट (अंग्रेजी: Nat caste) उत्तर भारत में हिन्दू धर्म को मानने वाली एक जाति है जिसके पुरुष लोग प्राय: बाज़ीगरी या कलाबाज़ी और गाने-बजाने का कार्य करते हैं तथा उनकी स्त्रियाँ नाचने व गाने का कार्य करती हैं। इस जाति को भारत सरकार ने संविधान में अनुसूचित जाति के अन्तर्गत शामिल कर लिया है ताकि समाज के अन्दर उन्हें शिक्षा आदि के विशेष अधिकार देकर आगे बढाया जा सके। नट शब्द का एक अर्थ नृत्य या नाटक (अभिनय) करना भी है। सम्भवत: इस जाति के लोगों की इसी विशेषता के कारण उन्हें समाज में यह नाम दिया गया होगा। कहीं कहीं इन्हें बाज़ीगर या कलाबाज़ भी कहते हैं। शरीर के अंग-प्रत्यंग को लचीला बनाकर भिन्न मुद्राओं में प्रदर्शित करते हुए जनता का मनोरंजन करना ही इनका मुख्य पेशा है। इनकी स्त्रियाँ खूबसूरत होने के साथ साथ हाव-भाव प्रदर्शन करके नृत्य व गायन में काफी प्रवीण होती हैं। नटों में प्रमुख रूप से दो उपजातियाँ हैं-बजनिया नट और ब्रजवासी नट। बजनिया नट प्राय: बाज़ीगरी या कलाबाज़ी और गाने-बजाने का कार्य करते हैं जबकि ब्रजवासी नटों में स्त्रियाँ नर्तकी के रूप में नाचने-गाने का कार्य करती हैं और उनके पुरुष या पति उनके साथ साजिन्दे (वाद्य यन्त्र बजाने) का कार्य करते हैं। .

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विदूषक

कूडियाट्टम् में विदूषक विदूषक, भारतीय नाटकों में एक हँसाने वाला पात्र होता है। मंच पर उसके आने मात्र से ही माहौल हास्यास्पद बन जाता है। वह स्वयं अपना एवं अपने परिवेश का मजाक उडाता है। उसके कथन एक तरफ हास्य को जन्म देते हैं और दूसरी तरफ उनमें कटु सत्य का पुट होता है। .

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