लोगो
यूनियनपीडिया
संचार
Google Play पर पाएं
नई! अपने एंड्रॉयड डिवाइस पर डाउनलोड यूनियनपीडिया!
डाउनलोड
ब्राउज़र की तुलना में तेजी से पहुँच!
 

रीमान-समाकल

सूची रीमान-समाकल

गणित की वास्तविक विश्लेषण के रूप में पहचानी जाने वाली शाखा में रीमान समाकलन किसी फलन का किसी अन्तराल में परिभाषित प्रथम निश्चित परिभाषा है। यह परिभाषा बर्नहार्ड रीमान ने दी थी। विभिन्न फलनोम और प्रायोगिक अनुप्रयोगों के लिए रीमान समाकलन कलन की मूलभूत प्रमेय अथवा संख्यात्मक समाकलन के सन्निकटन द्वारा ज्ञात किया जा सकता है। रीमान समाकलन विभिन्न सैद्धान्तिक उद्देश्यों के लिए अनुपयुक्त है। .

6 संबंधों: फलन, बर्नहार्ड रीमान, संख्यात्मक समाकलन, वास्तविक संख्या, गणित, कलन का मूलभूत प्रमेय

फलन

''X'' के किसी सदस्य का ''Y'' के केवल एक सदस्य से सम्बन्ध हो तो वह फलन है अन्यथा नहीं। ''Y''' के कुछ सदस्यों का '''X''' के किसी भी सदस्य से सम्बन्ध '''न''' होने पर भी फलन परिभाषित है। गणित में जब कोई राशि का मान किसी एक या एकाधिक राशियों के मान पर निर्भर करता है तो इस संकल्पना को व्यक्त करने के लिये फलन (function) शब्द का प्रयोग किया जाता है। उदाहरण के लिये किसी ऋण पर चक्रवृद्धि ब्याज की राशि मूलधन, समय एवं ब्याज की दर पर निर्भर करती है; इसलिये गणित की भाषा में कह सकते हैं कि चक्रवृद्धि ब्याज, मूलधन, ब्याज की दर तथा समय का फलन है। स्पष्ट है कि किसी फलन के साथ दो प्रकार की राशियां सम्बन्धित होती हैं -.

नई!!: रीमान-समाकल और फलन · और देखें »

बर्नहार्ड रीमान

जॉर्ज फ्रेडरिक बर्नहार्ड रीमान (Georg Friedrich Bernhard Riemann; १७ सितम्बर १८२६ - २० जुलाई १८६६) एक प्रतिभाशाली जर्मन गणितज्ञ थे। उन्होंने विश्लेषण, संख्या सिद्धान्त और अवकल ज्यामिति के क्षेत्र में प्रभावी योगदान दिया जिसका उपयोग सामान्य आपेक्षिकता के विकास में भी किया गया। .

नई!!: रीमान-समाकल और बर्नहार्ड रीमान · और देखें »

संख्यात्मक समाकलन

संख्यात्मक समाकलन से आशय एक संख्यात्मक मान निकालने से है जो S के सन्निकट हो। संख्यात्मक विश्लेषण में किसी निश्चित समाकल का संख्यात्मक मान निकालने की कलनविधियाँ संख्यात्मक समाकलन (numerical integration) के अन्तर्गत आतीं हैं। इसके वितार के रूप में, कभी-कभी अवकलल समीकरणों के संख्यात्मक हल को भी 'संख्यात्मक समाकलन' का नाम दे दिया जाता है। संख्यात्मक समाकलन की मूल समस्या निम्नलिखित प्रकार के निश्चित समाकलों का सन्निकट संख्यात्मक हल निकालना है: संख्यात्मक समाकलन का उपयोग आरम्भिक मान वाले अवकल समीकरणों के लिए भी प्रयुक्त होता है, अर्थात् दिए होने पर y(b) का मान निकालना भी समाकल निकालने के जैसा ही है। यदि f(x) a, b के बीच किसी बिन्दु पर सिंगुलर न हो तथा समाकलन की सीमाएँ सीमित हों तो इसके संख्यात्मक समाकल का मान निकालने की बहुत सी विधियाँ मौजूद हैं। यदि समाकल की सीमाएँ सीमित न हों तो भी चर परिवर्तन (variable transformation) का उपयोग करके सीमाओं को सीमित किया जा सकता है और समाकल का संख्यात्मक मान निकाला जा सकता है। (नीचे देखें) .

नई!!: रीमान-समाकल और संख्यात्मक समाकलन · और देखें »

वास्तविक संख्या

गणित में, वास्तविक संख्या सरल रेखा के अनुदिश किसी राशी को प्रस्तुत करने वाला मान है। वास्तविक संख्याओं में सभी परिमेय संख्यायें जैसे -5 एवं भिन्नात्मक संख्यायें जैसे 4/3 और सभी अपरिमेय संख्यायें जैसे √2 (1.41421356…, 2 का वर्गमूल, एक अप्रिमेय बीजीय संख्या) शामिल हैं। वास्तविक संख्याओं में अप्रिमेय संख्याओं को शामिल करने से इन्हें वास्तविक संख्या रेखा के रूप में एक रेखा पर निरुपित किये जा सकने वाले अनन्त बिन्दुओं से प्रस्तुत किया जा सकता है। श्रेणी:गणित *.

नई!!: रीमान-समाकल और वास्तविक संख्या · और देखें »

गणित

पुणे में आर्यभट की मूर्ति ४७६-५५० गणित ऐसी विद्याओं का समूह है जो संख्याओं, मात्राओं, परिमाणों, रूपों और उनके आपसी रिश्तों, गुण, स्वभाव इत्यादि का अध्ययन करती हैं। गणित एक अमूर्त या निराकार (abstract) और निगमनात्मक प्रणाली है। गणित की कई शाखाएँ हैं: अंकगणित, रेखागणित, त्रिकोणमिति, सांख्यिकी, बीजगणित, कलन, इत्यादि। गणित में अभ्यस्त व्यक्ति या खोज करने वाले वैज्ञानिक को गणितज्ञ कहते हैं। बीसवीं शताब्दी के प्रख्यात ब्रिटिश गणितज्ञ और दार्शनिक बर्टेंड रसेल के अनुसार ‘‘गणित को एक ऐसे विषय के रूप में परिभाषित किया जा सकता है जिसमें हम जानते ही नहीं कि हम क्या कह रहे हैं, न ही हमें यह पता होता है कि जो हम कह रहे हैं वह सत्य भी है या नहीं।’’ गणित कुछ अमूर्त धारणाओं एवं नियमों का संकलन मात्र ही नहीं है, बल्कि दैनंदिन जीवन का मूलाधार है। .

नई!!: रीमान-समाकल और गणित · और देखें »

कलन का मूलभूत प्रमेय

कलन के मूलभूत प्रमेय के दो भाग हैं। इनको कभी-कभी 'कलन का प्रथम मूलभूत प्रमेय' एवं 'कलन का द्वितीय मूलभूत प्रमेय' कहा जाता हैं। इस प्रमेय का प्रथम भाग प्रदर्शित करता है कि अनिश्चित समाकल को अवकलन द्वरा उलटा जा सकता है। इस प्रमेय का दूसरा भाग किसी फलन के निश्चित समाकल निकालने के लिये उसके असीमित व्युत्क्रम-अवकलजों (antiderivatives) के उपयोग की छूट देता है। .

नई!!: रीमान-समाकल और कलन का मूलभूत प्रमेय · और देखें »

निवर्तमानआने वाली
अरे! अब हम फेसबुक पर हैं! »