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राग हिंडोल

सूची राग हिंडोल

राग हिंडोल 16वीं शती का एक लघुचित्रराग हिंडोल या राग हिंदोल का जन्म कल्याण थाट से माना गया है। इसमें मध्यम तीव्र तथा निषाद व गंधार कोमल लगते हैं। ऋषभ तथा पंचम वर्जित है। इसकी जाति ओड़व ओड़व है तथा वादी स्वर धैवत व संवादी स्वर गांधार है। गायन का समय प्रातःकाल है। शुद्ध निषाद, रिषभ और पंचम इस स्वर इसमें वर्ज्य हैं। तीव्र मध्यम वाला यह एक ही राग है जिसको प्रातःकाल गाया जाता है। अन्य सभी तीव्र मध्यम वाले रागों का गायन समय रात्रि में होता है। राग हिंदोल में निषाद को बहुत कम महत्व दिया गया है। इतना ही नहीं, आरोह में उसे वर्ज्य करके अवरोह में भी सां ध इन दो स्वरों के बीच में छुपाना पड़ता है क्यों कि म ध नि सा लेने से सोहनी और सां नि, ध म लेने से पूरिया राग की छाया इसमें आने लगती है। इसको सोहनी और पूरिया से बचाने के लिए मध सांध, धम गसा ध सां ऐसी पकड़ लेने से इसका स्वरूप स्पष्ट होता है। इस राग में जब सां ध ऐसे स्वर आते हैं तब सां से ध स्वर पर आते समय बीच के निषाद को धैवत में जोड़ दिया जाता है। राग चिकित्सा में इस राग को जोड़ों के दर्द के लिए लाभकारी माना गया है। .

15 संबंधों: तीव्र मध्यम, धैवत, निषाद, पंचम, संवादी स्वर, वादी स्वर, गायन समय, गांधार, गांधार स्वर, ओड़व ओड़व, आरोह, कल्याण थाट, ऋषभ, २ अप्रैल, २००९

तीव्र मध्यम

भारतीय शास्त्रीय संगीत में जब कोई स्वर अपनी शुद्धावस्था से ऊपर होता है तब उसे तीव्र विकृत स्वर कहते हैं। ऐसा स्वर मध्यम है। जिसे म के लघु रूप में भी जाना जाता है। अनेक रागों में शुद्ध के साथ अथवा केवल तीव्र मध्यम का प्रयोग होता है। उदाहरण के लिए राग हिंडोल में केवल तीव्र मध्यम का प्रयोग होता है। जिसका अर्थ है हिंडोल राग में मध्यम स्वर अपने निश्चित स्थान से ऊपर की ओर प्रयोग किया जाता है। राग यमन कल्याण में शुद्ध और तीव्र दोनों मध्यम प्रयोग किए जाते हैं। श्रेणी:भारतीय संगीत के स्वर.

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धैवत

भारतीय शास्त्रीय संगीत के सात स्वरों में से छठा स्वर। श्रेणी:भारतीय संगीत के स्वर.

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निषाद

भारतीय शास्त्रीय संगीत के सात स्वरों में से पहला स्वर। निषाद दो प्रकार के होते हैं- कोमल निषाद और शुद्ध निषाद। श्रेणी:भारतीय संगीत के स्वर.

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पंचम

भारतीय शास्त्रीय संगीत के सात स्वरों में से पाँचवाँ स्वर। श्रेणी:भारतीय संगीत के स्वर.

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संवादी स्वर

भारतीय शास्त्रीय संगीत में प्रत्येक राग में दो स्वर महत्वपूर्ण माने गए हैं। सबसे महत्वपूर्ण स्वर को वादी स्वर कहते हैं और उसके बाद दूसरे सबसे महत्वपूर्ण स्वर को संवादी स्वर कहते हैं। संवादी स्वर का महत्व वादी स्वर से कम होता है लेकिन यह राग की चाल को स्पष्ट करने के लिए वादी के साथ मिलकर महत्वपूर्ण योगदान करता है। श्रेणी:भारतीय संगीत.

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वादी स्वर

भारतीय शास्त्रीय संगीत में किसी राग के सबसे महत्वपूर्ण स्वर को वादी स्वर कहते हैं। श्रेणी:भारतीय संगीत.

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गायन समय

भारतीय शास्त्रीय संगीत में प्रत्येक राग के गाने का समय निश्चित है। यह समय दिन या रात के प्रहरों में निश्चित किया गया है। दिन के चार प्रहर माने गए हैं और रात के भी चार प्रहर हैं। सभी रागों को उनकी प्रकृति के अनुसार इन आठ प्रहरों में से किसी प्रहर में गाया या बजाया जाता है। श्रेणी:भारतीय संगीत.

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गांधार

कोई विवरण नहीं।

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गांधार स्वर

भारतीय शास्त्रीय संगीत के सात स्वरों में से तीसरा स्वर। गांधार दो प्रकार के होते हैं। शुद्ध गांधार और कोमल गांधार। श्रेणी:भारतीय संगीत के स्वर.

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ओड़व ओड़व

"जाति" शब्द राग में प्रयोग किये जाने वाले स्वरों की संख्या का बोध कराती है। रागों में जातियां उनके आरोह तथा अवरोह में प्रयोग होने वाले स्वरों की संख्या पर निर्धारित होती है। जिन रागों के आरोह में पाँच व अवरोह में भी पाँच स्वर प्रयोग होते हैं वे राग ओड़व ओड़व जाति के राग कहलाते हैं। श्रेणी:राग की जाति.

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आरोह

संगीत के नीचे के सुर से आरम्भ करके ऊपर के सुरों की ओर चढ़ते हुये जब आलाप लिया जाता है तो उसे आरोह कहते हैं। मुख्यतः आरोह शब्द संगीत से सम्बंधित है किन्तु उत्थान, विकास आदि का भाव दर्शाने के लिये इस शब्द का प्रयोग किया जाता है। .

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कल्याण थाट

भारतीय संगीत में सभी रागों को किसी न किसी थाट से उत्पन्न माना गया है। थाट संख्या में दस हैं। कल्याण थाट के रागों में तीव्र मध्यम का प्रयोग किया जाता है। कलयान थाट मे थाट, कल्याण.

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ऋषभ

भारतीय शास्त्रीय संगीत के सात स्वरों में से दूसरा स्वर। श्रेणी:भारतीय संगीत के स्वर.

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२ अप्रैल

2 अप्रैल ग्रेगोरी कैलंडर के अनुसार वर्ष का 92वाँ (लीप वर्ष मे 93वाँ) दिन है। साल मे अभी और 273 दिन बाकी हैं।.

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२००९

२००९ ग्रेगोरी कैलंडर का एक साधारण वर्ष है। वर्ष २००९ बृहस्पतिवार से प्रारम्भ होने वाला वर्ष है। संयुक्त राष्ट्र संघ, यूनेस्को एवं आइएयू ने १६०९ में गैलीलियो गैलिली द्वारा खगोलीय प्रेक्षण आरंभ करने की घटना की ४००वीं जयंती के उपलक्ष्य में इसे अंतर्राष्ट्रीय खगोलिकी वर्ष घोषित किया है। .

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