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राग बहार

सूची राग बहार

राग बहार काफ़ी थाट से उत्पन्न षाड़व षाड़व जाति का राग है। अर्थात इसके आरोह तथा अवरोह से छे छे स्वरों का प्रयोग होता है। इसके गाने का समय रात्रि का दूसरा प्रहर है। गांधार और निषाद दोनो स्वर कोमल है लेकिन गायक अक्सर दोनों निषाद लेते हैं, शुद्ध निषाद का प्रयोग मध्य सप्तक में होता है और वह भी आरोह में। अन्य स्वर शुद्ध लगते हैं। कुछ गायक मध्यम के साथ विवादी के रूप में शुद्ध गंधार का भी थोड़ा सा प्रयोग करते हैं। लेकिन यह नियम नहीं, इसके अवरोह में कभी कभी ऋषभ और धैवत दोनो वर्जित करते हुए निधनिप ऐसा प्रयोग होता है पर यह आवश्यक नहीं। आरोह में गमपगमधनिसां इस प्रकार पंचम का वक्र प्रयोग भी होता है जिससे रागरंजकता बढ़ती है। इस राग का वादी स्वर षडज तथा संवादी स्वर मध्यम हैं। राग विस्तार मध्य व तार सप्तक में होने के कारण यह चंचल प्रकृति का राग माना जाता है। मपगम धनिसां इसकी मुख्य पकड़ है। यह राग बाकी अनेक रागों के साथ मिलाकर भी गाया जाता हैं। जिस राग के साथ उसे मिश्रित किया जाता है उसे उस राग के साथ संयुक्त नाम से जाना जाता है। उदाहरण के लिए बागेश्री राग में इसे मिश्र करने से बागेश्री-बहार, वसंत-बहार, भैरव-बहार इत्यादि। परंतु मिश्रण का एक नियम हे कि जिसमें बहार मिश्र किया जाय वह राग शुद्ध मध्यम या पंचम में होना चाहिए क्योंकि बहार का मिश्रण शुद्ध मध्यम से ही शुरू होता है। .

12 संबंधों: ठाट, धैवत, निषाद, पंचम, पकड़, मध्य सप्तक, मध्यम, शुद्ध स्वर, संवादी स्वर, वादी स्वर, गांधार, आरोह

ठाट

थाट अथवा ठाट हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत में रागों के विभाजन की पद्धति है। सप्तक के १२ स्वरों में से ७ क्रमानुसार मुख्य स्वरों के उस समुदाय को ठाट या थाट कहते हैं जिससे राग की उत्पत्ति होती है। थाट को मेल भी कहा जाता है। इसका प्रचलन पं॰ भातखंडे जी ने प्रारम्भ किया। हिन्दी में 'ठाट' और मराठी में इसे 'थाट' कहते हैं। उन्होंने दस थाटों के अन्तर्गत प्रचलित सभी रागों को सम्मिलित किया। वर्तमान समय में राग वर्गीकरण की यही पद्धति प्रचलित है। थाट के कुछ लक्षण माने गये हैं-.

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धैवत

भारतीय शास्त्रीय संगीत के सात स्वरों में से छठा स्वर। श्रेणी:भारतीय संगीत के स्वर.

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निषाद

भारतीय शास्त्रीय संगीत के सात स्वरों में से पहला स्वर। निषाद दो प्रकार के होते हैं- कोमल निषाद और शुद्ध निषाद। श्रेणी:भारतीय संगीत के स्वर.

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पंचम

भारतीय शास्त्रीय संगीत के सात स्वरों में से पाँचवाँ स्वर। श्रेणी:भारतीय संगीत के स्वर.

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पकड़

पकड़ वह छोटा सा स्वर समुदाय है जिसे गाने-बजाने से किसी राग विशेष का बोध हो जाये। उदाहरणार्थ- प रे ग रे,.नि रे सा गाने से कल्याण राग का बोध होता है। श्रेणी:संगीत.

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मध्य सप्तक

क्रमानुसार सात शुद्ध स्वरों के समुह को सप्तक कहते हैं। ये सात स्वर हैं- सा, रे, ग, म, प, ध, नि। जैसे-जैसे हम सा से ऊपर चढ़ते जाते हैं, इन स्वरों की आंदोलन संख्या बढ़ती जाती है। 'प' की अंदोलन संख्या 'सा' से डेढ़ गुनी ज़्यादा होती है। 'सा' से 'नि' तक एक सप्तक होता है, 'नि' के बाद दूसरा सप्तक शुरु हो जाता है जो कि 'सा' से ही शुरु होगा मगर इस सप्तक के 'सा' की आंदोलन संख्या पिछले सप्तक के 'सा' से दुगुनी होगी। इस तरह कई सप्तक हो सकते हैं मगर गाने बजाने में तीन सप्तकों का प्रयोग करते हैं। १) मन्द्र २) मध्य ३) तार। संगीतज्ञ साधारणत: मध्य सप्तक में गाता बजाता है और इस सप्तक के स्वरों का प्रयोग सबसे ज़्यादा करता है। मध्य सप्तक के पहले का सप्तक मंद्र और मध्य सप्तक के बाद आने वाला सप्तक तार सप्तक कहलाता है।.

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मध्यम

भारतीय शास्त्रीय संगीत के सात स्वरों में से चौथा स्वर। मध्यम दो प्रकार के होते हैं। शुद्ध मध्यम और तीव्र मध्यम। श्रेणी:भारतीय संगीत के स्वर.

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शुद्ध स्वर

स्वरों के दो प्रकार हैं- शुद्ध स्वर और विकृत स्वर। बारह स्वरों में से सात मुख्य स्वरों को शुद्ध स्वर कहते हैं अर्थात इन स्वरों को एक निश्चित स्थान दिया गया है और वो उस स्थान पर शुद्ध कहलाते हैं।.

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संवादी स्वर

भारतीय शास्त्रीय संगीत में प्रत्येक राग में दो स्वर महत्वपूर्ण माने गए हैं। सबसे महत्वपूर्ण स्वर को वादी स्वर कहते हैं और उसके बाद दूसरे सबसे महत्वपूर्ण स्वर को संवादी स्वर कहते हैं। संवादी स्वर का महत्व वादी स्वर से कम होता है लेकिन यह राग की चाल को स्पष्ट करने के लिए वादी के साथ मिलकर महत्वपूर्ण योगदान करता है। श्रेणी:भारतीय संगीत.

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वादी स्वर

भारतीय शास्त्रीय संगीत में किसी राग के सबसे महत्वपूर्ण स्वर को वादी स्वर कहते हैं। श्रेणी:भारतीय संगीत.

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गांधार

कोई विवरण नहीं।

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आरोह

संगीत के नीचे के सुर से आरम्भ करके ऊपर के सुरों की ओर चढ़ते हुये जब आलाप लिया जाता है तो उसे आरोह कहते हैं। मुख्यतः आरोह शब्द संगीत से सम्बंधित है किन्तु उत्थान, विकास आदि का भाव दर्शाने के लिये इस शब्द का प्रयोग किया जाता है। .

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